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पाठ्यक्रम में इतिहास | इतिहास का पाठ्यक्रम में स्थान प्राप्त करने का अधिकार | इतिहास का महत्व | राष्ट्रीय दृष्टिकोण से इतिहास को आवश्यकता | अन्तरराष्ट्रीय दृष्टिकोण से इतिहास का महत्व

पाठ्यक्रम में इतिहास | इतिहास का पाठ्यक्रम में स्थान प्राप्त करने का अधिकार | इतिहास का महत्व | राष्ट्रीय दृष्टिकोण से इतिहास को आवश्यकता | अन्तरराष्ट्रीय दृष्टिकोण से इतिहास का महत्व | History in Curriculum in Hindi | Right to be included in the curriculum of History in Hindi | Importance of History in Hindi | History is needed from the national point of view in Hindi | Importance of history from international point of view in Hindi

पाठ्यक्रम में इतिहास विषय प्रवेश –

इतिहास मानव के विचारों, कार्यों आदि का विवेचन करता है। मानव ने अतीत में क्या कार्य किये, उनका सामाजिक, नागरिक आदि दृष्टिकोण से क्या महत्व था? इन बातों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए इतिहास का अध्ययन आवश्यक है। साथ ही आज के अन्तर्राष्ट्रीय युग में इतिहास के अध्ययन की उपयोगिता और भी बढ़ गई है। अधिकांश शिक्षा शास्त्री इस बात पर सहमत हैं कि छात्रों में अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना के विकास के लिए इतिहास को विद्यालय पाठ्यक्रम में स्थान प्रदान किया जाय। इसके शिक्षण से छात्रों में उन रुचियों, मनोवृत्तियों तथा भावनाओं का विकास किया जाय जो अन्तर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण के विकास में सहायक हों। इसके अतिरिक्त इतिहास को राष्ट्रीय दृष्टिकोण से विद्यालय-पाठ्यक्रम में स्थान देना अनिवार्य है। साथ ही सांस्कृतिक उत्थान एवं अन्तर-सांस्कृतिक सम्बन्धों को स्थापना के लिए भी इसको पाठ्यक्रम में स्थान प्रदान किया जाता है।

इतिहास का पाठ्यक्रम में स्थान प्राप्त करने का अधिकार

(1) इतिहास को सार्वभौमिक रूप से विद्यालय पाठ्यक्रम का एक महत्वपूर्ण विषय माना गया है। यह समाज में मनुष्य के विकास का एक अध्ययन है। यद्यपि इतिहास अधिकतर अतीत से सम्बन्धित है, परन्तु यह वर्तमान पर बल देता है जिससे आज के समाज का अतीत के प्रकाश में अध्ययन किया जा सके। इस प्रकार इतिहास उस सामाजिक वातावरण पर प्रकाश डालता है जिसमें कि बालक रहता है। इतिहास के अध्ययन के अभाव में न तो हम अपने वर्तमान को समझ सकते हैं और न भविष्य को। इस कारण पाठ्यक्रम में इतिहास को स्थान प्रदान किया गया है।

(2) हमारे देश के नवयुवकों में एक प्रवृत्ति घर कर गई है कि वे अपने अतीत को तुच्छ मानते हैं और उसको समझने योग्य भी नहीं मानते। उनके हृदयों में ऐसी प्रवृत्ति के दृढ़ हो जाने का प्रमुख कारण पाश्चात्य पद्धति के अनुसार शिक्षित होना है। लेकिन भारतीय इतिहास के अध्ययन से उन्हें उसके अतीत से अवगत कराना चाहिए और उन्हें इस योग्य बनाया जाय जिससे वे अपने देश के अतीत का वर्तमान की दृष्टि से विश्लेषण कर सकें। इससे उनके हृदयों में अपने अतीत के लिए प्रेम उत्पन्न हो सकेगा। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि देश के नवयुवकों को अपने देश के इतिहास का ज्ञान कराया जाय जिससे उनमें उसके प्रति प्रेम जाग्रत हो सके ।

(3) राष्ट्रीय दृष्टिकोण से इतिहास को आवश्यकता- विद्यालय के पाठ्यक्रम में इतिहास को राष्ट्रीय दृष्टिकोण से रखा गया है। भारत विभिन्नताओं का देश है। इस समय आर्थिक एवं सामाजिक विषमताओं, भाषायी विभिन्नताओं, धार्मिक भेदभावों तथा क्षेत्रीय लगावों ने हमारे राष्ट्रीय जीवन को कमजोर बना दिया है। अतः यह आवश्यक हो गया कि भारत को राष्ट्रीय दृष्टिकोण से एकीकृत बनाया जाय। इस दृष्टि से भारत की एकता को प्राप्त करना परमावश्यक है। इस एकता की प्राप्ति के लिए इतिहास को पाठ्यक्रम में स्थान प्रदान करना अनिवार्य माना गया। इसके शिक्षण से छात्रों में यह भावना विकसित की जा सकती है कि भारत एक राष्ट्र है। साथ ही उसमें विभिन्नताओं के होते हुए एकता है। वस्तुतः राष्ट्रीय एकता का अर्थ विभिन्नताओं को समाप्त करना नहीं है वरन राष्ट्रीय एवं मौलिक निष्ठाओं की व्यापक व्यवस्था में अपनी विभिन्नताओं को दिवेकपूर्ण एवं निर्भयता के साथ व्यक्त करना है। इतिहास शिक्षण के द्वारा छात्रों में इस प्रकार का दृष्टिकोण विकसित करना सम्भव है। इतिहास द्वारा छात्रों में देश की संस्कृति के लिए प्रेम उत्पन्न किया जा सकता है। साथ ही उनमें ‘भारतीता’ (Indianness) की भावना विकसित की जा सकती है। इतिहास द्वारा छात्रों में दूसरे लोगों, उनके विश्वासों, परम्पराओं आदि के लिए आदर की भावना विकसित की जाती है। साथ ही यह उनको योग्य नागरिक बनने में सहायता प्रदान करता है। इतिहास भावनात्मक एकता, जो कि राष्ट्रीय एकता का आधार है, की भावना उत्पन्न करने में बहुत सहायक है। इसके शिक्षण द्वारा छात्रों में निम्नलिखित धारणाओं का विकास किया जाता है जो कि भावनात्मक एकता की  आधारशिला का कार्य करती हैं –

(i) विभिन्न समुदायों तथा अल्पसंख्यकों की देनों का सम्मान करना |

(ii) अपनी संस्कृति में निहित एकता को परखना ।

(iii) बालकों को इस सम्बन्ध में चेतना प्रदान करना कि देश में जो भी उन्नति हुई, वह विभिन्न जातियों एवं समुदायों के लोगों पर परस्पर मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों का ही फल है।

(iv) बालकों को अपने अतीत का ज्ञान प्राप्त करने में सहायता प्रदान करना और इस बात को परखने के लिए तत्पर बनाना कि वे एकीकृत संस्कृति के अधिकारी है।

(v) राष्ट्रीय संस्कृति के लिए जिन लोगों ने योगदान दिया है- चाहे वे विभिन्न क्षेत्रों के क्यों न हों, उनको सम्मान प्रदान करना।

(vi) छात्रों में विभिन्न वातावरणो की अन्योन्याश्रितता को समझने की चेतना उत्पन्न करना।

(4) अन्तरराष्ट्रीय दृष्टिकोण से इतिहास का महत्व – अन्तरराष्ट्रीय सद्भावना के विकास में इतिहास का शिक्षण बहुत लाभप्रद है। इसके अध्यापन से छात्रों में उन अभिरुचियों, मनोवृत्तियों तथा निष्पक्षता आदि दृष्टिकोण का विकास किया जा सकता है जो अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना के विकास में आधार का कार्य करेंगे । सी० पी० हिल (C. P. Hill) का कथन है- “इतिहास- शिक्षण से छात्रों को सत्य की खोज करने के लिए तत्पर बनाया जा सकता है और विभिन्न राष्ट्रों के पारस्परिक सम्बन्धों एवं प्रभावों तथा उनकी सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक परिस्थितियों को समझने की क्षमता उत्पन्न करके अन्तरराष्ट्रीय सद्भावना का विकास किया जा सकता है।” अतः शिक्षक का यह परम कर्तव्य है कि वह निष्पक्षता से अपने राष्ट्र एवं अन्य दूसरे राष्ट्रों की सामाजिक उपलब्धियों एवं निर्बलताओं को छात्रों के समक्ष प्रस्तुत करे। यदि वह ऐसा नहीं करेगा तो इतिहास का महत्व इस दृष्टिकोण से समाप्त हो जायगा ।

(5) इतिहास का अध्ययन भारतीय विद्यालयों में अत्यन्त आवश्यक है; क्योंकि इसके अध्ययन से बालक ‘भारतीय जीवन के ढंग के विकास को समझने में समर्थ हो सकेंगे। इस जीवन के ढंग को समझ कर ही सामाजिक एकता (Social Solidarity) को स्थापित किया जा सकता है। इसके ज्ञान से जाति, धर्म, भाषा दूरी आदि बन्धनों को समाप्त किया जा सकता है।

(6) इतिहास का वैज्ञानिक अध्ययन समाज की विभिन्न समस्याओं को हल करने में बहुत सहायता प्रदान कर सकता है। इस प्रकार के अध्ययन से भाषा तथा साम्प्रदायिक सम्बन्धों को अच्छा बनाया जा सकता है । इतिहास के अध्ययन द्वारा‌ इन सम्बन्धों को नकारात्मक तथा मकारात्मक दोनों ही ढंगों से अच्छा बनाया जा सकता है। इस कारण भी इतिहास को पाठ्यक्रम में स्थान प्राप्त हुआ है ।

(7) इसके द्वारा ऐतिहासिक विधि को स्पष्ट किया जाता है। इसलिए उसको पाठ्यक्रम में स्थान देना आवश्यक समझा गया है ।

(8) ग्रान्ट राबर्टसन के अनुसार, इतिहास के द्वारा छात्रों को ज्ञान का भण्डार प्रदान किया जाता है जिससे वे अपनी कौतूहल-प्रवृत्ति को सन्तुष्ट कर सकें।

(9) इसके द्वारा छात्रों के मानसिक अन्तरिक्ष को विस्तृत किया जाता है। प्रो० भाटिया ने इतिहास के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए लिखा है-

“The study of history, besides widening the mental horizon of children gives a useful intellectual training. It involves the exercise of memory for assimilating the facts taught, the use of imagination for the past science and events which have to be visualized, the use of judgment and reasoning as facts and events have to be weighed. Conclusions have to be drawn and comparisons and contrasts have to be made.”

इस प्रकार इतिहास मानसिक प्रशिक्षण के साथ-साथ एक प्रकार का मानसिक दृष्टिकोण भी निर्मित करने में सहायता देता है ।

अन्त में, हम कह सकते हैं कि जहाँ कुछ इतिहासकारों ने इतिहास की उपयोगिता राष्ट्रीय भावना विकसित करने, अपनी संस्कृति को समझने तथा बौद्धिक विकास करने में देखी, वहीं दूसरी ओर कुछ इतिहासकारों ने ऐतिहासिक ज्ञान को व्यवहारिक ज्ञान माना। उसे एक ऐसा दर्शन माना जिसको दृष्टान्तों द्वारा स्पष्ट किया जाता है। यदि हम आज के भौतिकवादी दृष्टिकोण से इसके महत्व को देखें तो हमें निराशा ही हाथ लगेगी। परन्तु यह मानव प्रकृति को जगत् से अवगत होने का अवसर प्रदान करता है। यह मानव प्रकृति के विभिन्न आयामों तथा पक्षों से हमें अवगत कराता है। साथ ही यह हमें सुसमायोजन के लिये मार्गदर्शन प्रदान करता है।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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