अर्थशास्त्र / Economics

सीमान्तवाद के पतन के कारण | फर्म के सिद्धान्त से सम्बन्धित सीमान्तवादी उपागम की प्रमुख आलोचना

सीमान्तवाद के पतन के कारण | फर्म के सिद्धान्त से सम्बन्धित सीमान्तवादी उपागम की प्रमुख आलोचना

सीमान्तवाद के पतन के कारण

फर्म के सिद्धान्त से सम्बन्धित सीमान्तवादी उपागम की प्रमुख आलोचना

1939 में सर्वप्रथम हाल एवं हिच (Hall and Hitch) ने फर्म के परम्परागत नवप्रतिष्ठित सिद्धान्त की आलोचना की। कालान्तर में लेस्टर, मैकल, ओलिवर, गार्डन तथा फ्रीडमैन ने भी किसी अनुक्रम में सीमान्तवादी सिद्धान्त का खंडन किया। यह खंडन दो स्तर पर किया गया। सर्वप्रथम मान्यतापरक खंडन तत्पश्चात् अर्थशास्त्री परक खंडन प्रस्तुत किये गये।

(A) मान्यता प्रधान आलोचनाएं

(1) एकल स्वामित्व प्रधान साहसी- सीमान्तवादी विचारधारा के अन्तर्गत फर्म का साहसी पूर्णतया फर्म का स्वामी माना गया था अर्थात् स्वामित्व एवं प्रबन्ध में कोई अन्तर की परिकल्पना नहीं की गई थी परन्तु आधुनिक जटिल, औद्योगिक जगत में फर्मों का संगठन दुष्कर होने के कारण फर्मों के स्वायित्व एवं प्रबन्ध के स्वरूप स्वतन्त्र हो गये। इस प्रकार सीमान्तवादी फर्म की निर्णयात्मकता का विखंडन हो चुका है।

(2) महत्तम लाभ का लक्ष्य- नवप्रतिष्ठित सिद्धान्त के अन्तर्गत फर्मों का अन्तिम लक्ष्य लाभ महत्तमीकरण माना गया था। यह मान्यता इसलिए अधूरी प्रतीत होती है क्योंकि अनिश्चितता, सूचना, योग्यता एवं ज्ञान के अभाव में लागत एवं आगमों में समागम से सन्तुलन का ज्ञान करना नितान्त दुष्कर है तथा दूसरी ओर ये भी सत्य है कि फर्मों के समक्ष प्रबन्धकीयवाद, व्यवहारवाद, बाजार-सहभागितावाद एवं दीर्घकालीन अस्तित्ववाद जैसे अनेक लक्ष्य आधुनिक जगत में प्रस्तुत हो चुके हैं जिसके परिणामस्वरूप इन बहुमुखी लक्ष्यों के मध्य सीमान्तवादी लक्ष्य अत्यन्त गौण सा प्रतीत होता है।

(3) अनिश्चितता के समाधान का अभाव- विगत सिद्धान्त में यह माना जाता था कि लागत एवं माँग फलनों का फर्मों को पूर्ण ज्ञान रहता है। वस्तुत: आधुनिक बाजार जटिलताओं को देखते हुए यह मान्यता अव्यावहारिक प्रतीत होती है क्योंकि अनिश्चितता के इस वातावरण में किसी भी फर्म का इतना सर्वज्ञ होना अत्यन्त कठिन सा प्रतीत होता है।

(4) स्थैतिक प्रकृति- फर्म का सीमान्तवादी सिद्धान्त पूर्णतया एक स्थैतिक सिद्धान्त है क्योंकि इसके अन्तर्गत समय तत्व का प्रवेश तीन परिप्रेक्ष्यों में हुआ है। सर्वप्रथम अल्पकाल तथा दीर्घकाल विभेद के सन्दर्भ में द्वितीय लाभ महत्तमीकरण की समयावधि के परिप्रेक्ष्य में तथा तृतीय उत्पादन प्रवाह के सन्दर्भ में मांग सापेक्ष समयावधि का। उक्त तीनों परिप्रेक्ष्यों में समयावधि सापेक्ष गत्यात्मकता का पूर्व अभाव प्रतीत होता है क्योंकि विश्लेषण का स्वरूप नितान्त स्थैतिक है।

(5) फर्म प्रवृष्टि की अस्पष्टता-नव प्रतिष्ठित सिद्धान्त के अन्तर्गत एक ऐसे बाजार की परिकल्पना की गई है जिसमें फर्मों की प्रवृष्टि उद्योग के अन्तर्गत पूर्णतया मुक्त है। इस तथ्य की पुष्टि शुद्ध प्रतियोगिता एवं एकाधिकारात्मक प्रतियोगिता के लक्षणों से की जा सकती है परन्तु एकाधिकार में ये प्रवृष्टि वर्जित मानी गई है। परन्तु इस सिद्धान्त के अन्तर्गत फर्मों की शक्य प्रवृष्टि का कोई भी उल्लेख नहीं है जबकि आधुनिक औद्योगिक परिवेश में शक्य प्रवृष्टियाँ नीति-निर्माण का आधार होती हैं।

(6) संदिग्ध सीमान्तवादी सिद्धान्त-  सारांश भूत रूप सीमान्तवादियों का सिद्धान्त सन्तुलन की दशा को निम्नवत् प्रस्तुत करता है। MC = MR

उक्त सन्तुलन सूत्र के अनुसार फर्मे एक ओर तो अपने उत्पादन की मात्रा तथा मूल्य का निर्धारण करती हैं तथा दूसरी ओर अपने लाभ को अधिकतम करती है। इस विवेचन के प्रतिपक्ष में यह कहा गया है कि सैद्धान्तिक रूप में तो यह दशा परिकल्पनीय है परन्तु व्यावहारिक जगत में इसका सूक्ष्म ज्ञान होना सम्भव है।

(B) अर्थशास्त्री प्रधान आलोचनाएँ

(1) हाल एवं हिच (Hall and Hitch) की आलोचना- 1939 में हाल एवं हिच ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Price Theory and “business Behavior” में आक्सफोर्ड बी० 38 फर्मों का सर्वेक्षण प्रधान विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने अपने अनुभवगम्य निष्कर्षों के आधार पर सीमान्तवादी विचारधारा का खंडन किया। उनके प्रमुख आलोच्य बिन्दु निम्नवत् हैं-

(i) फर्मों की प्रक्रिया पूर्णतया स्वचालित प्रक्रिया नहीं होती क्योंकि इस पर अन्य प्रतियोगी फर्मों को जागरूकता एवं प्रतिक्रिया का प्रभाव पड़ता है।

(ii) MC = MR नामक सूत्र से लाभ के महत्तमीकरण का ज्ञान करना भ्रामक है अपितु इसके स्थान पर पूर्ण लागत सिद्धान्त’ (Full Cost Principle) अथवा औसत लागत सिद्धान्त (Average Cost Principle) का निम्न सूत्र अधिक व्यावहारिक है।

P = AVC + AFC + Profit Margin

(मूल्य) (ऑ० परिवर्ती लागत) (ऑ० स्थित लागत) (लाभ अन्तरण)

(iii) हाल एवं हिच के अनुसार मांग एवं लागतों में परिवर्तन के बावजूद भी कभी-कभी फर्मों के मूल्य अत्यन्त दृढ़ हो जाते हैं ऐसी दशा में सीमान्तवादी सिद्धान्त का यह कथन विवादास्पद प्रतीत होने लगता है कि मूल्य एवं उत्पादन में उत्पन्न परिवर्तन अल्पकाल में मांग एवं लगतों द्वारा प्रभावित होते हैं।

(2) गार्डन (Gordon) की आलोचना- हाल और हिच की परम्परा में भी गार्डन ने भी सीमान्तवादी विचारधारा का खंडन किया है जिसके आधार निम्नवत् हैं-

(i) वास्तविक औद्योगिक जगत में जटिलताओं के परिणामस्वरूप फर्मे अपने मांग एवं लागतों को निर्धारण करते समय अनेक महत्त्वपूर्ण नीतियाँ जैसे मूल्य, उत्पादन, विज्ञापन आदि पर अत्यधिक ध्यान देती हैं अत: आधुनिक जगत में कोई भी फर्म अपने विगत अनुभवों के आधार पर भावी मांग को पूर्वानुमानित नहीं कर सकती। अतः सीमान्तवादी परिकल्पना स्वत: खंडित प्रतीत होने लगती है।

(ii) अनिश्चितता के वातावरण में लागतों एवं आगमों के स्वरूपों का प्रक्षेपण करना भी नितान्त सैद्धान्तिक सा प्रतीत होता है।

(iii) आधुनिक फर्मों को लाभ महत्तमीकरण के अलावा अन्य और भी महत्त्वपूर्ण साख सम्बन्धी लक्ष्यों का ध्यान देना पड़ता है।

(iv) दीर्घकाल में सीमान्तवादियों द्वारा प्रतिपादित मांग सम्बन्धी अंश शुद्धता का ज्ञान करना इस गत्यात्मक जगत में परिवर्तनशील चरों के मध्य दुष्कर सा प्रतीत होता है।

अन्ततः गाईन का यह विचार था कि सीमान्तवादी सिद्धान्त की उपयोगिता तभी सम्पादित की जा सकती है जबकि इसका विश्लेषण बहुकाल खण्डी एवं गत्यात्मक आधार पर किया जाय।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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