इतिहास / History

सोन नदी घाटी में सांस्कृतिक अनुक्रम | सिहावल जमाव | पटपरा जमाव | बाघोर जमाव | खेतौंही जमाव | सोन नदी घाटी के सांस्कृतिक अनुक्रम का निरूपण कीजिए

सोन नदी घाटी में सांस्कृतिक अनुक्रम | सिहावल जमाव | पटपरा जमाव | बाघोर जमाव | खेतौंही जमाव | सोन नदी घाटी के सांस्कृतिक अनुक्रम का निरूपण कीजिए

सोन नदी घाटी में सांस्कृतिक अनुक्रम

मध्य सोन घाटी का भारत के भूतात्त्विक एवं पुरातात्त्विक अध्ययन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण स्थान है। सोन एक पहाड़ी नदी है जो अमरकण्टक के पास से निकलती है। लगभग 485 किमी तक कैमूर की पहाडियों के कगार के साथ-साथ बहती है। इसके बात उत्तर-पूर्व की ओर बहती हुई डेहरी आन सोन नामक स्थान पर गंगा नदी में मिल जाती है।

निसार अहमद ने सन 1960 में ऊपरी सोन घाटी का अन्वेषण किया तथा 35 पुरास्थलों से 167 उपकरण प्रतिवेदित किये थे। कुछ समय बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग ने जी०आर० शर्मा के निर्देशन में सन् 1975 से 1977 के बीच में मध्य सोन घाटी का विस्तृत सर्वेक्षण किया जिसके परिणामस्वरूप न केवल प्रातिनूतन काल के भूतात्त्विक जमाव अपितु पाषाण काल के विभिन्न चरणों से सम्बन्धित 300 से अधिक पुरास्थल भी मध्य प्रदेश के सीधी जिले में प्रकाश में आए हैं। मध्य सोन घाटी के भूतात्त्विक  में पशुओं के बहुसंख्यक जीवाश्म भी मिले हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्राचीन  इतिहास विभाग और संयुक्त राज्य अमेरिका के कैलीफोर्निया स्थित बर्कले विश्वविद्यालय के नृतत्त्व विभाग के प्रागैतिहासविदों ने जी०आर० शर्मा एवं जे०डी० क्लार्क के संयुक्त निर्देशन में सन् 1980 से 1982 के बीच पश्चिम में चुरहट से लेकर पूर्व में गोपद-सोन के संगम के समीप स्थित बाघोर तक मध्य सोन घाटी का भूतात्त्विक तथा पुरातात्त्विक विस्तृत अध्ययन किया है।

आस्ट्रेलिया के मैक्वायर विश्वविद्यालय के मार्टिन विलियम्स तथा न्यूजीलैण्ड के कीथ रॉयल के अनुसार मध्य सोन घाटी के भूतात्त्विक अनुसंधान के फलस्वरूप आधारशिला के ऊपर जो जमाव प्रकाश में आये हैं उन्हें चार भागों में विभाजित किया जा सकता है-

  1. सिहावल जमाव (Sihawal Formation),
  2. पटपरा जमाव (Patapara Formation),
  3. बाघोर जमाव (Baghor Formation),
  4. खेतौंही जमाव (Khetaunhi Formation)।

सिहावल चार भूतात्त्विक जमावों में से सबसे निचले एवं पुराने जमाव की यह नाम इसलिए दिया गया है क्योंकि सिहावल नामक पुरास्थल के पास इसका सबसे अच्छा जमाव है जहाँ इसका अध्ययन किया गया है। इस जमाव की मोटाई 1.50 मीटर है जो चट्टान के ऊपर दिखती है। इस जमाव में कही-कहीं बलुआ पत्थर, क्वार्टजाइट तथा शेल के नुकीले छोटे टुकड़े मिलते हैं जो बालू के महीन कण के आकार से लेकर 50 सेमी तक के हैं। ये मिट्टी में चिपके हुए मिलते हैं। इसमें कहीं-कहीं पर 50 सेमी मोटी चितकबरी मिट्टी का जमाव मिलता है जिसमें बलुआ पत्थर, क्वार्टजाइट एवं शेल के छोटे-छोटे टुकड़े मिलते हैं। इस जमाव का निर्माण अर्द्ध-शुष्क से लेकर मध्यम आर्द्र-जलवायु के समय में हुआ। प्रेवेल जमाव अर्द्धशुष्क चरण में तथा मिट्टी का जमाव आर्द्र-जलवायु के काल में हुआ। इसमें एश्यूलन परम्परा के हैण्ड एक्स, क्लीवर, स्क्रेपर आदि मिले हैं। इन उपकरणों के ऊपर कुछ क्षेत्रों में घिसने-पिटने के लक्षण भी मिलते हैं लेकिन अधिकांश उपकरण नये दिखते हैं। सिहावल जमाव की उष्मा दीप्ति विधि से अभी तक एक तिथि ज्ञात है जो 103,800 + 19,800 बी० पी० है। सिहावल जमाव बहुत दिनों तक खुला पड़ा रहा अतएव इसके ऊपर क्षरण की प्रक्रिया क्रियाशील रही।

पटपरा जमाव मध्य सोन घाटी का दूसरा जमाव पटपरा के नाम से जाना जाता है। इसका अध्ययन सीधी जिले के पटपरा नामक पुरास्थल पर सम्पन्न हुआ। जगह-जगह पर यह जमाव 10 मीटर मोटा है तथा सिहावल जमाव के ऊपर विषम-विन्यास के साथ यह दृष्टिगोचर होता है लेकिन इन दोनों जमावों को देखने से ऐसा लगता है कि इनके बीच में समय का लम्बा व्यवधान रहा होगा। पटपरा जमाव मुख्य रूप से अपने लाल रंग के कारण पहचाना जाता है। इसमें बालू के कण तथा छोटे-छोटे पत्थर के टुकड़े, क्वार्ट्ज, बलुआ पत्थर, शेल और क्वार्ट्जाइट पत्थर के टुकड़े मिलते हैं। यह जमाव काफी सीमा तक लौह टुकड़ों से भरा दिखाई पड़ता है इसलिए इसका रंग गहरा लाल दिखाई पड़ता है। इस जमाव के अन्दर अगेट, चाल्सेडनी आदि पत्थरों के टुकड़े घिसी-पिटी अवस्था में मिलते हैं। पटपरा जमाव उस समय हुआ जब सोन नदी का बहाव तीव्र गति पर था। सोन नदी की निक्षेप-क्रिया (Aggradation) के परिणामस्वरूप इस जमाव का निर्माण हुआ है। पटपरा जमाव के ऊपर गहरी लाल/भूरी मिट्टी का जमाव दिखलाई देता है जिसकी मोटाई 1 मीटर के लगभग है। अनेक स्थान पर इसका ऊपरी जमांव कट-छंट गया है। पटपरा जमाव से मध्य पुरापाषाण काल के उपकरण नव-निर्मित अवस्था में मिलते हैं जिन पर घिसने-पिटने के लक्षण नहीं दिखाई देते हैं। इस जमाव में हैण्ड एक्स, क्लीवर आदि उभयपक्षीय उपकरण मिलते हैं जिससे यह इंगित होता है कि एश्यूलन परम्परा उच्च प्रातिनूतन काल के प्रारम्भिक चरण तक चलती रही।

बाघोर जमाव मध्य सोन घाटी का सबसे विशिष्ट जमाव है जिसकी मोटाई 20 मीटर के लगभग दिखलाई देती है। पटपरा तथा बाघोर जमाव के बीच भी समय का वैसा ही अन्तराल है जैसा कि सिहावल और पटपरा के बीच में है। बाघोर जमाव को दो भागों में विभाजित किया गया है-

  1. रुक्ष वर्ग (Coarse member), 2. महीन वर्ग (Fine member)।

बाघोर का निचला जमाव मोटी बालू का है इसलिए इसको ‘रुक्ष वर्ग’ के जमाव की संज्ञा दी गई है। यह जमाव 5 सेमी से 6 मीटर मोटा है। इसमें क्वार्ट्ज़ाइट, शेल (Shale), क्वार्ट्ज, चाल्सेडनी, अगेट तथा चर्ट के टुकड़े मिलते हैं जो मोटी बालू के आकार से लेकर पत्थर के छोटे टुकड़ों के आकार के हैं। कुछ स्थानों पर इस उप-जमाव के ऊपर बालू तथा मिट्टी का पतला संस्तरित जमाव मिला है।

मध्य सोन घाटी में ज्वालामुखी के उद्गार से निकली हुई राख का जमाव मिला है। यह जमाव बाघोर जमाव के ‘रुक्ष वर्ग’ के ऊपरी स्तर से मिला है। यह जमाव लगभग 50 सेमी से 1 मीटर तक मोटा मिला है। मार्टिन विलियम्स तथा एम० क्लार्क ने इस जमाव की ओर सर्वप्रथम विद्वानों का ध्यान आकर्षित किया। मध्य सोन घाटी में घोघर के खेतौही नामक स्थान तक लगभग 30 वर्ग किमी के क्षेत्र में यह जमाव फैला हुआ मिला है। भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण के पी० के० बसु, एस० विश्वास तथा पी० के० आचार्य के अनुसार यह जमाव सुमात्रा के तोबा (Toba) नामक ज्वालामुखी पर्वत के उद्गार से निकली हुई राख से बना है। इसका सम्बन्ध ‘नवीनतम तोबा राख के जमाव से बतलाया गया है (Youngest Toba Ash Deposit) पौटेशियम-ऑर्गन तिथि विधि से इसकी तिथि 74,000 + 20,000 बी० पी० है। जो साक्ष्य उपलब्ध हैं, उसके अनुसार सुमात्रा में तीन बार ज्वालामुखी का उद्गार समय-समय पर हुआ था। इस जमाव का सम्बन्ध तीसरे तथा नवीनतम जमाव से है।

बाघोर का ‘महीन वर्ग’ ‘रुक्ष वर्ग’ के जमाव के ऊपर मिलता है। यह लगभग 10 मीटर मोटा जमाव है जो अपेक्षाकृत महीन जलोढ़ मिट्टी से बना है। इस पूरे जमाव में कंकड़ मिलते हैं किन्तु ज्यों-ज्यों ऊपर बढ़ते जाते हैं, कंकड़ों की संख्या बढ़ती जाती है। बाघोर जमाव के निचले स्तरों से मध्य पुरापाषाण काल के घिसे हुए उपकरण मिले हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि ये उपकरण इसके बहुत पहले अस्तित्त्व में आ चुके थे। जमाव की प्रक्रिया में लम्बी यात्रा तय करके उसके अंग बने हैं। इसलिये इन उपकरणों को इस जमाव का समसामयिक न कह कर उससे बहुत पहले का कहना ही उचित होगा। बाघोर जमाथ के महीन वर्ग वाले ऊपरी स्तरों से उच्च पुरापाषाण काल के उपकरण मिले हैं जो ‘नवीन’ (Fresh) स्थिति में हैं। यह कहा जा सकता है कि इस जमाव के अंतिम क्षणों में उच्च पुरापाषाण काल की संस्कृति अस्तित्त्व में आ चुकी थी।

खेतौंही जमाव मध्य लोन घाटी का सबसे नया जमाव है। इस जमाव का सम्यक् अध्ययन सोन और रेही के संगम के 1 किमी ऊपर सोन के दाहिने तट पर स्थित खेतोही नामक पुरास्थल पर किया गया है इसलिये इसे यह नाम दिया गया है। यह जमाव 10 मीटर मोटा है तथा सोन नदी के वर्तमान जलस्तर से मात्र 10 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। यह जमाव जलोढ़ मिट्टी तथा सिल्ट से निर्मित है जिसमें यदा-कदा महीन बालू मिलती है। इस जमाव का निर्माण मध्यम आर्द्र (Sub-humid) जलवायु के काल में हुआ। इस जमाव से मध्य पाषाण काल के लघु पाषाण उपकरण मिले हैं।

मध्य सोन घाटी के उत्तर में कैसूर (Kaimur) से लेकर दक्षिण में कुंढ़ेरी नाला (Kundheri Nullah) के बीच में स्थित क्षेत्र का भी भूतात्त्विक दृष्टि से अनुसंधान किया गया। इस क्षेत्र में अधोलिखित जमाव प्रकाश में आये हैं सबसे नीचे आधारभूत शेलयुक्त चूना पत्थर का जमाव है, इसके ऊपर भूरी मिट्टी का लगभग 90 सेमी मोटा जमाव है। भूरी मिट्टी के ऊपर ग्रेवल जमाव है जिसके ऊपर पुनः भूरी मिट्टी का 3.20 मीटर मोटा जमाव है। अगला जमाव फिर एक ग्रेवल है जो 50 सेमी मोटा है जिसके ऊपर गहरे भूरे रंग का 30 सेमी मोटा जमाव है। सबसे ऊपर 1 मीटर मोटी भूरे रंग की दुमट मिट्टी का जमाव है। उपर्युक्त इन जमावों का सह-सम्बन्धीकरण सोन घाटी के जमावों के साथ किया गया है।

मध्य सोन घाटी में हुए पुरातात्त्विक अन्वेषण के फलस्वरूप पुरापाषाण काल, मध्य पाषाण काल तथा नव पाषाण काल से सम्बन्धित अनेक पुरास्थल प्रकाश में आये हैं। पुरापाषाण काल एवं मध्य पाषाण काल की संस्कृतियाँ अपने भूतात्त्विक परिप्रेक्ष्य में देखी जा सकती हैं। निम्न पुरापाषाण काल से सम्बन्धित 30 से अधिक पुरास्थल अब तक प्रकाश में आ चुके हैं। मध्य सोन घाटी के सिहावल जमाव से निम्न पुरापाषाण काल के उपकरण प्राप्त हुए हैं। पुरापाषाण काल से सम्बन्धित प्रमुख उत्खनित पुरास्थलों में सिहावल, नकझरखुर्द तथा पटपरा प्रमुख हैं। मध्य सोन घाटी में निम्न पुरापाषाणिक पुरास्थल सोन नदी के उत्तर और

श दक्षिण दोनों तरफ मिले हैं लेकिन बहुसंख्यक पुरास्थल नदी के उत्तर में ही हैं। नदी के उत्तर में छोटी पहाड़ियों की एक श्रृंखला नदी के समानान्तर है।

मध्य सोन घाटी के बहुत से पुरास्थलों से मध्य पुरापाषाण काल के पुरावशेष प्राप्त हुए हैं। इस संस्कृति से सम्बन्धित अनेक कार्य-स्थल (Factory Sites) मिले हैं। सोन नदी के पटपरा जमाव से भी इस तरह के उपकरण प्राप्त हुए हैं। उपकरणों में तरह-तरह के स्क्रेपर, प्वाइन्ट (नोक), छिद्रक एवं ब्लेड उल्लेखनीय हैं। उपकरण निर्माण के लिये क्वार्ट्जाइट एवं चर्ट जैसे पत्थरों का उपयोग किया गया है। यहाँ पर यह बात भी उल्लेखनीय है कि मध्य सोन घाटी में अनेक पुरास्थलों पर पटपरा जमाव से हस्त-कुठार एवं विदारक प्राप्त हुए हैं जिससे यह पता चलता है कि मध्य पुरापाषाण काल में इस प्रकार के उपकरण अत्यल्प संख्या में प्रयुक्त होते रहे। नकझरखुर्द तथा पटपरा के उत्खनन से मध्य पुरापाषाणिक उपकरणों का भी एक स्तर मिला है।

मध्य सोन घाटी के अभी तक लगभग 70 से अधिक उच्च पुरापाषाणिक पुरास्थल प्रकाश में आ चुके हैं। बाघोर जमाव के ‘महीन वर्ग’ से इस प्रकार के उपकरण प्राप्त हुए हैं। मध्य सोन घाटी में कैमूर की तलहटी को उच्च पुरापाषाण काल के मानव ने अपने कार्य-स्थलों के लिये चुना। इससे यह संकेत मिलता है कि मानव का कार्य-क्षेत्र विस्तृत हो रहा था। उच्च पुरापाषाण काल के कतिपय पुरास्थलों का उत्खनन भी किया गया है जिसमें बाघोर प्रथम (1) बाघोर तृतीय (III) तथा रामपुर उल्लेखनीय हैं। उच्च पुरापाषाण काल के उपकरण इन उपर्युक्त पुरास्थलों पर भूतात्त्विक जमावों से मिले हैं। उच्च पुरापाषाण काल के उपकरणों में प्वाइन्ट (नोक), खुरचनी, चान्द्रिक (Lunate) तथा ब्लेड आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। ब्लेड पर बने उपकरण अधिक हैं। फलक पर भी अनेक उपकरण बने हैं। क्रोड से ब्लेड निकालने के लिए निपीड तकनीक (Pressure Technique) का उपयोग किया गया है। उपकरणों के कार्याग को तेज करने के लिये पुनर्गठन के भी साक्ष्य मिलते हैं। अधिकांश उपकरण चर्ट पर बने हुए हैं।

मध्य सोन घाटी से उच्च पुरापाषाणिक मानव के धार्मिक आचार-विचार के विषय में भी कुछ संकेत मिले हैं। बाघोर । से उपकरणों के धरातल के नीच बलुअर पत्थर का एक ढेर मिला जिसके मध्य में एक विशेष प्रकार के पत्थर के कुछ टुकड़े प्राप्त हुए जिनको आपस में जोड़ने पर उनमें प्राकृतिक रूप से बनी हुई त्रिभुजाकार आकृतियां दृष्टिगत हुई। आसपास के क्षेत्रों में अब भी इस प्रकार के पत्थरों को दैवी शक्ति का प्रतीक मान कर पूजने की परम्परा है। इससे यह संकेत मिलता है कि संभवतः उच्च पुरापाषाण काल के मानव के मन में भी इस प्रस्तर-खण्डों के सन्दर्भ में ऐसी ही धारणा रही हो।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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