इतिहास / History

भारत में प्रागैतिहासिक काल | पुरापाषाण काल | मध्य-पाषाण काल | उत्तर-पाषाण काल | ताँबे और काँसे का काल | लौह-काल | भारत में प्रागौतिहासिक काल के इतिहास

भारत में प्रागैतिहासिक काल | पुरापाषाण काल | मध्य-पाषाण काल | उत्तर-पाषाण काल | ताँबे और काँसे का काल | लौह-काल | भारत में प्रागौतिहासिक काल के इतिहास

भारत में प्रागौतिहासिक काल के इतिहास

प्रागैतिहासिक काल मानव-प्रगति का वह काल है जिसके इतिहास का ज्ञान हमें नहीं है। भारत में मानव-अस्तित्व के प्रारम्भ से ही मानव का अस्तित्व स्वीकार किया गया है। इस कारण भारत में मानव-प्रगति का यह अत्यधिक लम्बा समय ही प्रागैतिहासिक काल माना जाता है। मनुष्य की उस प्रगति को जिसके इतिहास का ज्ञान हमें नहीं है परन्तु जिसका ज्ञान हम पुरातत्व सम्बन्धी खोजों के आधार पर कर सके हैं, हम प्रागैतिहासिक काल में सम्मिलित करते हैं। इस दृष्टि से मनुष्य की प्रगति के समय को निम्नलिखित विभिन्न भागों में बाँटा गया है-

  1. पुरापाषाण काल (Palaeolithic Age)

सम्भवतया 500000 वर्ष पूर्व द्वितीय हिम-युग के आरम्भ-काल में भारत में मानव का अस्तित्व प्रारम्भ हुआ। कुछ विद्वानों के अनुसार मानव का अस्तित्व सर्वप्रथम दक्षिण-भारत में हुआ जहाँ से वह उत्तर-पश्चिम पंजाब गया। परन्तु कुछ अन्य इतिहासकारों के अनुसार मानव के अस्तित्व का प्रारम्भ सर्वप्रथम सिन्धु और झेलम नदी के बीच उत्तर-पश्चिम के पंजाब प्रदेश और जम्मू में हुआ। तत्पश्चात् मानव इस युग में गंगा-यमुना के दोआब को छोड़कर राजपूताना, गुजरात, बंगाल, बिहार, उड़ीसा और सम्पूर्ण दक्षिण भारत में फैल गया। भारत के इस विभिन्न स्थानों पर इस युग के मानव द्वारा प्रयोग में लाये जाने वाले हथियार प्राप्त हुए हैं। अनुमानतः यह युग ई०पू० 25000 वर्ष (25000 B.C.) तक माना गया है।

पुरापाषाण-काल को भी अब तीन भागों में विभक्त किया गया है-

  1. पूर्व-पुरापाषाण काल (Lower Palaeolithic Age)- के अवशेष उत्तर-पश्चिम के सोहन क्षेत्र (सोहन सिन्धु नदी की एक सहायक नदी थी) में प्राप्त हुए हैं। इस काल के अवशेष नर्मदा नदी तथा उसकी सहायक नदियों की घाटियों में प्रायः आधे दर्जन स्थानों से प्राप्त हुए हैं। नर्मदा नदी की घाटी में नरसिंहपुर और नर्मदा नदी के निकट ही मध्य-प्रदेश में भीमवेटका की गुफाओं में इस समय के अवशेष पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध किये जा चुके हैं;
  2. मध्य-पुरापाषाण काल (Middle Palaeolithic Age)- इस काल के अवशेष सिन्ध, राजस्थान, मध्य-भारत, उड़ीसा, उत्तरी आन्ध्र, उत्तरी महाराष्ट्र, कर्नाटक और गुजरात के विभिन्न क्षेत्रों में पाये गये हैं; और
  3. उत्तर पुरापाषाण काल (Upper Palaeolithic Age)- इस समय के अवशेष हाल ही में इलाहाबाद की बेलनघाटी, आन्ध्र प्रदेश में बेटमचेली तथा कर्नाटक के शोरापुर और बीजापुर जिलों में प्राप्त हुए हैं।

इस युग के मानव ने क्वार्टजाइट नामक कठोर पत्थर के हथियार बनाये जो बहुत ही साधारण और भद्दे थे। यह मानव द्वारा हथियारों के प्रयोग का प्रारम्भ था। इस युग में मानव खेती करना अथवा अपने लिए निवास-गृह बनाना नहीं जानता था। वह नदियों अथवा झीलों के किनारे या गुफाओं में रहता था। वह फल खाकर अथवा मछली या अन्य पशुओं का शिकार करके उनके माँस से अपना पेट भरता था। वह आग जलाना नहीं जानता था। इस युग के प्रारम्भ में उसे वस्त्रों का ज्ञान भी नहीं था। वह नग्न रहता था यद्यपि बाद के समय में उसने पहले पेड़ों के पत्तों से और तत्पश्चात् पशुओं की खालों से अपने शरीर को ढकना आरम्भ कर दिया था। उसे कोई मृतक-संस्कार नहीं आता था अपितु मृतकों को यथावत् छोड़ दिया जाता था। परन्तु हिंसक पशुओं से अपनी रक्षा करने के लिए उसमें मिलजुलकर रहने की भावना थी। कुछ गुफाओं में पशुओं की आकृतियों की रेखाएँ मिली हैं जो कला के प्रति मनुष्य की सहज रुचि का प्रमाण हैं।

  1. मध्य-पाषाण काल (Mesolithic Age)

ई०पू० प्रायः 25000 वर्ष पूर्व मानव ने अपने पत्थर के हथियारों में कुछ साधारण सुधार करने में सफलता प्राप्त की और उनके साथ-साथ पशुओं की हड्डियों से बने हुए हथियारों का प्रयोग भी आरम्भ किया। यह मध्य-पाषाण काल का प्रारम्भ था। इस स्थिति में मानव प्रायः ई०पू० 5000 शताब्दी (5000 B.C.) तक रहा।

इस काल में मानव ने क्वार्टनाइट पत्थर के स्थान पर अधिकांशतया जैस्पर, चर्ट और ब्लडस्टोन नामक पत्थर का प्रयोग आरंभ किया और अपने हथियार इन्हीं पत्थरों से बनाये। इन हथियारों का आकार एक इंच से अधिक न था परन्तु अब इन्हें लकड़ी के हत्थे में लगाकर प्रयोग में लाया जाना प्रारम्भ किया गया। इस काल में भी मानव-जीवन के अवशेष भारत में प्रायः अनेक स्थानों पर पाये जाते हैं। इन स्थानों में अभी तक पश्चिमी बंगाल में वीरभानपुर, गुजरात में लंघनज, तमिलनाडु में टेहरी-समूह, मध्य-प्रदेश में आजमगढ़ और राजस्थान में नागौर प्रमुख थे। परन्तु 1970-74 ई० के मध्य में गंगा नदी के मैदान में भी मध्य- पाषाणकालीन संस्कृति के अवशेष विभिन्न स्थानों पर प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हुए हैं। इस काल में भी मानव का मुख्य पेशा शिकार करना था। कृषि-कार्य और निवास-गृहों का निर्माण अभी आरम्भ नहीं हुआ था। परन्तु इस काल के मानव ने अपने मृतकों को भूमि में गाड़ना आरम्भ कर दिया था। कुत्ता उसका पालतू पशु बन गया था। सम्भवतया, बाद के समय में उसने मिट्टी के बर्तन बनाना भी आराम्भ कर दिया था।

  1. उत्तर-पाषाण काल (Neolithic Age)

ई०पू० 5000 वर्ष से पूर्व प्रायः 3000 वर्ष या उससे भी अधिक समय तक का काल इसमें सम्मिलित किया जाता है। सम्पूर्ण भारत में इस काल के अवशेष प्राप्त हुए हैं जो कलकत्ता, मद्रास (चेन्नई), मैसूर, हैदराबाद के अजायबघरों में सुरक्षित हैं।

मानव ने इस काल में तीव्रता से प्रगति की। यद्यपि उसके हथियार पत्थर के ही थे। परन्तु उन्हें नुकीला और पालिश करके चमकीला बना दिया गया था। शस्त्रों की संख्या में वृद्धि कर ली गयी थी और विभिन्न कार्यों के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के हथियार प्रयोग में लाये जाने लगे थे। इस काल में मानव ने कृषि और पशु-पालन आरम्भ कर दिया था। उसने अपने लिए निवास-गृह बनाने आरम्भ कर दिये थे और वह चर्म अथवा अन्य प्रकार के वस्त्र भी बनाने लगा था। वह मिट्टी के अच्छे बर्तन बनाने लगा था। उसे आग जलाना भी आ गया था और वह खाने को पकाकर खाने लगा था। सम्भवतया मानव ने इस समय कुम्हार का चाक और लकड़ी का पहिया बनाना भी सीख लिया था। वह शवों को गाड़ता अथवा जलाता था। उसने धर्म और दैवी तथा दानवी शक्तियों की कल्पना करना आरम्भ कर दिया था। यद्यपि कुछ विद्वान इस बात में सन्देह करते हैं कि इस काल में मानव ने चित्र बनाने आरम्भ कर दिये थे, परन्तु अधिकांश यह विश्वास करते हैं कि मानव ने चित्रकारी आरम्भ कर दी थी और अनेक रेखाचित्रों को इस युग का ही स्वीकार किया गया है।

  1. ताँबे और काँसे का काल (Copper and Bronze Age)

अनुमानतया यह युग ई०पू० 3000 वर्ष से ई०पू० 1000 वर्ष अथवा उससे भी थोडा आगे के समय तक रहा। कुछ विद्वानों के अनुसार दक्षिण-भारत में तो यह युग आया ही नहीं। उनके अनुसार उत्तर-पाषाण काल के पश्चात् ही दक्षिण भारत में लौह-काल आरम्भ हो गया। परन्तु अब नवीन खोजों से उपलब्ध सामग्री से यह प्रमाणित हो गया है कि दक्षिण-भारत में भी कुछ क्षेत्रों में ताँबे का प्रयोग आरम्भ हुआ था। इस कारण दक्षिण-भारत भी ताँबे के युग से गुजरा, यह मान्य है। यद्यपि यह भी प्रमाणित हो चुका है कि भारत एक ऐसा देश रहा है जिसने लोहे के युग को आरम्भ किया और यह क्रिया आर्यों के भारत में आगमन से पहले आरम्भ हो चुकी थी, परन्तु ताम्र-काल में भी पत्थर के हथियारों का प्रयोग चलता रहा जिसके कारण एक ऐसा काल भी माना गया है जिसे ताम्र-पाषाण काल(Chalcolithic Age) के नाम से पुकारा गया है। इसी काल में मनुष्य ने कुछ स्थानों पर ताँबे और टिन या कुछ अन्य धातुओं को मिलाकर कौसा बनाना आरम्भ किया जिसके कारण यह उन स्थानों के लिए कांस्य-काल भी कहलाया।

इस काल में मानव ने पर्याप्त प्रगति की। उसके हथियार ताँबे के बनाये जाने लगे जो नुकीले और तीक्ष्ण होते थे। इस युग में मानव रहने के लिए गाँव और नगर बसाता था, कृषि के द्वारा विभिन्न प्रकार के अनाज उत्पन्न करता था, पशु-पालन करता था, कपड़ा बनाना जान गया था, ऊनी और सूती वस्त्रों का प्रयोग करता था, जीवन-स्तर को उन्नतशील बना चुका था, दैनिक आवश्यकताओं की. अनेक वस्तुओं का निर्माण कर चुका था, आवागमन के साधनों में वृद्धि कर चुका था, अर्थात् एक वाक्य में उन सभी साधनों को जन्म दे चुका था जिन पर सभ्यता और संस्कृति की प्रगति निर्भर करती है। यद्यपि इस समय के इतिहास के बारे में जानने के साधन अधिक उपलब्ध नहीं है तब भी कुछ साधन उपलब्ध हो गये हैं और भविष्य में उनमें वृद्धि होने की पर्याप्त आशा है।

  1. लौह-काल (Stone Age)

पूर्व-वैदिक काल में आर्यों को लोहे का ज्ञान नहीं था परन्तु उत्तर-वैदिक काल में आर्यों को लोहे का ज्ञान हो गया था। इस कारण, अभी तक यह माना जाता रहा था कि भारत में लोहे का ज्ञान प्रायः1000 ई०पू० हो गया था। परन्तु नवीन पुरातात्विक खोजों से यह ज्ञात हुआ है कि हड़प्पा-सभ्यता के विनष्ट हो जाने के पश्चात् भी भारत के भीतरी भागों में ग्राम्य- सभ्यताएँ विभिन्न स्थानों पर विकसित हो रही थीं और उनमें से कुछ के निवासियों को लोहे का ज्ञान था। इस कारण, अब यह माना गया है कि भारत में लोहे का ज्ञान सम्भवतया आर्यों के आगमन से पहले हो चुका था। ऐसी स्थिति में भारत में लोहे के ज्ञान का समय 1000 ई०पू० से पहले का माना गया है यद्यपि उसका समय निश्चित नहीं किया जा सका है। उस समय से आधुनिक समय तक लौह-काल ही माना जाता है।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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