अर्थशास्त्र / Economics

उपभोग का मनोवैज्ञानिक नियम | उपभोग के मनोवैज्ञानिक नियम के तीन निर्देश | उपभोग के मनोवैज्ञानिक नियम की मान्यताएं या सीमाएं | उपभोग फलन की सीमाएँ

उपभोग का मनोवैज्ञानिक नियम | उपभोग के मनोवैज्ञानिक नियम के तीन निर्देश | उपभोग के मनोवैज्ञानिक नियम की मान्यताएं या सीमाएं | उपभोग फलन की सीमाएँ

उपभोग का मनोवैज्ञानिक नियम

(Psychological Law of Consumption)

आय, उत्पादन तथा रोजगार सम्बन्धी विश्लेषण में केन्ज के उपभोग के मनोवैज्ञानिक नियम का बहुत अधिक महत्व है। इस नियम के अनुसार जब आय में वृद्धि होती है तो उपभोग में भी वृद्धि होती है, परन्तु उपभोग में होने वाली वृद्धि आय में होने वाली वृद्धि के अनुपात से कम होती है। केन्ज के अनुसार, “समाज की मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति इस प्रकार की है कि जब कुल वास्तविक आय में वृद्धि होती है तो कुल उपभोग में भी वृद्धि होती है, परन्तु इतनी नहीं जितनी कि आय में” केन्ज ने 1936 में प्रकाशित अपनी पुस्तक “सामान्य सिद्धान्त” में उपभोग के मनोवैज्ञानिक नियम की निम्नलिखित परिभाषा दी है-“मनोवैज्ञानिक आधारभूत नियम जिस पर कि हम प्रथमतः मानव स्वभाव के ज्ञान तथा अनुभव के विस्तृत तथ्यों के आधार अत्यधिक विश्वास के साथ निर्भर रहने के अधिकारी हैं, यह है कि मनुष्य नियमानुसार और औसतन अपनी आय वृद्धि के साथ-साथ अपने उपभोग में भी वृद्धि करने के इच्छुक होते हैं, परन्तु इतनी नहीं जितनी कि उनकी आय में वृद्धि होती है। दूसरे शब्दों में इस नियम को इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है कि सीमान्त उपभोग प्रवृत्ति हमेशा धनात्मक (Positive) अर्थात् शून्य से अधिक परन्तु इकाई से कम होती है। अर्थात् MPC> O<1 | इसी नियम या प्रवृत्ति को उपभोग प्रवृत्ति (Propensity to Consume) या उपभोग फलन (Consumption Function) कहते हैं।

उपभोग के मनोवैज्ञानिक नियम के तीन निर्देश

(Three Prepositions of the Psychological law of Consumption)

केन्ज के उपभोग के मनोवैज्ञानिक नियम को समझने हेतु निम्नलिखित तीन निर्देश वचनों का अध्ययन आवश्यक है-

(i) कुल उपभोग में कुल आय की अपेक्षा कम अनुपात में वृद्धि होती है।

(ii) आय में वृद्धि को उपभोग और बचत में बांटा जाता है।

(iii) कुल आय में वृद्धि के कारण उपभोग व्यय तथा बचत दोनों में वृद्धि होती है अर्थात् दोनों में पहले से कमी नहीं हो सकती।

केन्ज द्वारा प्रतिपादित उपभोग के मनोवैज्ञानिक नियम में इन तीनों निर्देश वचनों में से पहला निर्देश वचन ही बहुत जरूरी एवं मुख्य हैं अन्य दो निर्देश वचन पहले निर्देश वचन के स्वाभाविक परिणाम हैं।

उपभोग के मनोवैज्ञानिक नियम की रेखाचित्र द्वारा व्याख्या

निम्न रेखाचित्र में OX रेखा पर आय तथा OY रेखा पर बचत तथा उपभोग व्यय को दर्शाया गया है। OY1 रेखा ऋणात्मक बचतों को प्रकट करती हैं। CC1 उपभोग वक्र तथा SS1 बचत वक्र है। 0Q आय-उपभोग रेखा है जो 45° पर है। प्रारम्भ में जब आय शून्य या कम है तो उपभोग शून्य से अधिक है अर्थात् उपभोग OC1 या इससे अधिक है और बचत ऋणात्मक (Negative) है जब आय स्तर OY है तो उपभोग व्यय इसके बराबर है अर्थात् E बिन्दु पर आय का उपभोग बराबर है और इसलिए बचत शून्य है। इसके बाद जब आय स्तर OY से बढ़कर OY1 हो जाता है तो उपभोग व्यय MY1 है और बचत KY1 है। इसी प्रकार जब आय स्तर बढ़कर OY2 हो जाता है तो इस आय स्तर पर उपभोग व्यय NY2 है और बचत बढ़कर LY2 हो जाती है। इसी कारण ऊँचे आय स्तरों पर व्यक्तियों की उपभोग प्रवृत्ति कम होती है तथा बचत प्रवृत्ति अधिक होती है।

उपभोग के मनोवैज्ञानिक नियम की मान्यताएं या सीमाएं

(Assumption or Limitations of the Psychological Law of Consumption)

केन्ज का उपभोग का मनोवैज्ञानिक नियम निम्नलिखित तीन मान्यताओं पर आधारित है-(i) यह मान लिया जाता है कि व्यक्तियों की व्यय-सम्बन्धी आदतों में सामान्यतया परिवर्तन नहीं होते अर्थात् उपभोग प्रवृत्ति सामान्यतया स्थिर रहती है।

(ii) अर्थव्यवस्था में सदैव सामान्य परिस्थितियाँ बनी रहती हैं।

(iii) यह नियम केवल अबाध स्वातन्त्र्य पर आधारित सम्पन्न पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में ही लागू होता है।

अतः प्रो० केन्ज के उपभोग के मनोवैज्ञानिक नियम की उपरोक्त तीनों मान्यताएं न्यूनाधिक रूप में अल्पकालीन अवधि तथा सामान्य परिस्थितियों में ही संभव है कुरीहारा के अनुसार, “इन मान्यताओं पर आधारित केन्ज का नियम सामान्य अल्पकाल में स्वतन्त्र उपभोक्ताओं के वास्तविक सामूहिक व्यवहार की अपूर्ण गणना कहा जा सकता है और यह सामान्यतया सत्य है।

उपभोग फलन की सीमाएँ

कीन्स के उपभोग फलन की निम्नलिखित सीमाएं हैं-

(i) इसकी यह मान्यता थी कि व्यक्तियों की व्यय सम्बन्धी आदतों में परिवर्तन नहीं होते अर्थात् उपभोग, प्रवृत्ति सामान्यतया स्थिर रहती है, तथा केवल आय में परिवर्तन होता है। अर्थात् जनसंख्या, आदतें, रीतिरिवाज अपरिवर्तित रहते हैं।

(ii) इस नियम की मान्यता कि सदैव सामान्य परिस्थितियां बनी रहती हैं अर्थात् युद्ध, क्रान्ति, राजनीतिक उथल-पुथल, मन्दी, स्फीति जैसी परिस्थितियां उत्पन्न नहीं होती।

(iii) यह नियम केवल सम्पन्न पूँजीवाद अर्थव्यवस्था में ही लागू होता है। यह नियम केवल ऐसी अर्थव्यवस्था में लागू होता है जो पूर्ण रूप से स्वतन्त्र हो अर्थात् उसमें सरकारी हस्तक्षेप न हो तथा वह अर्थव्यवस्था सम्पन्न हो। यह निमय उस अर्थव्यवस्था में नहीं लागू होता जहां उपभोग व उत्पादन सम्बन्धी क्रियाओं में सरकारी हस्तक्षेप होता है। अर्थात् समाजवादी या साम्यवादी अर्थव्यवस्था में यह नियम नहीं लागू होता!

प्रो० कुरीहारा के अनुसार, “कीन्स का नियम सामान्य अल्पकाल में स्वतन्त्र उपभोक्ताओं को वास्तविक सामूहिक व्यवहार की अपूर्ण गणना कहा जा सकता है और सामान्यतया यह सत्य है कि आय में वृद्धि होने पर उपभोग में भी वृद्धि होती है परन्तु उतनी नहीं जितनी कि आय में।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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