अर्थशास्त्र / Economics

अन्तर्राष्ट्रीय तरलता | अन्तर्राष्ट्रीय तरलता की समस्या | अन्तर्राष्ट्रीय तरलता का महत्व | विशेष आहरण अधिकार | विशेष आहरण अधिकारों की विशेषताएँ | सामान्य ऋण अधिकारों में भिन्नता

अन्तर्राष्ट्रीय तरलता | अन्तर्राष्ट्रीय तरलता की समस्या | अन्तर्राष्ट्रीय तरलता का महत्व | विशेष आहरण अधिकार | विशेष आहरण अधिकारों की विशेषताएँ | सामान्य ऋण अधिकारों में भिन्नता

अन्तर्राष्ट्रीय तरलता

कीथ होर्सफील्ड के अनुसार, “अन्तर्राष्ट्रीय तरलता से आशय विश्व के स्वर्ण कोष या मुद्रा की पूर्ति से लगाया जाता है, जिसका स्वतन्त्र रूप से अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रयोग किया जाता है; जैसे-डालर या स्टर्लिंग तथा उन्हें ऋण प्राप्त करने की सुविधायें भी सम्मिलित हैं।” अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार, “अन्तर्राष्ट्रीय तरलता में वह सब साधन सम्मिलित हैं जो विभिन्न देशों के मदा अधिकारियों को भुगतान सन्तुलन सम्बन्धी घाटे को पूरा करने के लिए उपलव्य होते हैं,

संक्षेप में अन्तर्राष्ट्रीय तरलता के अन्तर्गत उन समस्त तरल कोषों, वित्तीय साधनों व सुविधाओं को लिया जाता है जो कि व्यक्तिगत देशों के मुद्राधिकारियों को भुगतान सन्तुलन के घाटे को पूरा करने के लिए उपलब्ध होते हैं।

अन्तर्राष्ट्रीय तरलता की समस्या-

अन्तर्राष्ट्रीय तरलता की वृद्धि करने में अनेक समस्याएँ उपस्थित हो जाती हैं जो कि निम्न प्रकार हैं-

(1) तस्कर बाजार- स्वर्ण का बाजार मूल्य अधिक होने पर वहाँ तस्कर व्यापार द्वारा स्वर्ण आकर बिकेगा, जिससे विदेशी विनिमय कोषों को निरन्तर हानि होगी। स्वर्ण का मूल्य बढ़ने पर एक ओर तो काला धन जमा करने वालों को लाभ होगा तथा दूसरी ओर स्वर्ण में ही विनियोजन बढ़ेगा।

(2) डालर के अवमूल्यन की समस्या- विश्व के अनेक राष्ट्रों ने डालर एवं स्टर्लिंग को अपनी पत्र-मुद्रा का आधार बना लिया है। स्वर्ण के मूल्य में वृद्धि होने मात्र से स्वर्ण की माँग बढ़ जायेगी, परिणामस्वरूप समस्त स्वर्ण-कोष समाप्त होकर दायित्वों को पूर्ण करना सम्भव नहीं हो पायेगा। इस प्रकार स्वर्ण के मूल्य में वृद्धि होने से डालर में अवमूल्यन हुआ समझा जायेगा।

(3) विश्व तरलता पर नियन्त्रण- मुद्रा कोष के संचालक मण्डल ने भी विश्व में तरलता के नियन्त्रण के प्रश्न पर कोई ध्यान नहीं दिया तथा कठोर नियमों का पालन नहीं किया।

(4) विनिमय दरों में लोच-को अभाव- विनिमय दरों में लोच के अभाव के कारण तरलता में वृद्धि सम्भव नहीं हो पाती है।

(5) अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा- विश्व में एक अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा का अभाव पाया जाता है तथा मुद्रा- कोष समाशोधन-गृह का भी कार्य नहीं करता है।

(6) स्वर्ण-कोषों का असमान वितरण- विश्व के स्वर्ण-कोषों का असमान वितरण के कारण एक समस्या बनी हुई है। विदेशी विनिमय कोषों का लगभग 40% भाग केवल 7 देशों के पास है। इसी प्रकार विश्व के अधिकृत स्वर्ण-कोष का लगभग 70% भाग 7 देशों के पास है। वर्तमान समय में स्वर्ण-कोषों का अधिकांश भाग तेल-निर्यातक देशों में केन्द्रित होता जा रहा है।

(7) मुद्रा-स्फीति– प्रत्येक राष्ट्र स्वर्ण की आड़ पर पत्र-मुद्रा का प्रचलन करता है। स्वर्ण के मूल्य में वृद्धि होने पर मुद्रा-स्फीति का भय बना रहेगा और देश की अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है। इससे मुद्रा एवं साख-व्यवस्था पर भी प्रभाव पड़कर देश के आर्थिक विकास को प्रोत्साहन नहीं मिल सकेगा।

अन्तर्राष्ट्रीय तरलता का महत्व-

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के विस्तार के साथ-साथ अन्तर्राष्ट्रीय तरलता का महत्व भी बढ़ता जा रहा है। इसका महत्व निम्न कारणों से है-

(1) अन्तर्राष्ट्रीय भुगतानों में तरलता- अन्तर्राष्ट्रीय तरलता के पर्याप्त मात्रा में होने पर अन्तर्राष्ट्रीय भुगतान सुविधाजनक हो जाते हैं और विनिमय दर में अधिक उच्चावचन नहीं हो पाते। फलस्वरूप अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में वृद्धि हो जाती है।

(2) डालर सहायता में कमी- डालर सहायता उदारतापूर्वक प्राप्त होने पर तरल कोषों की कमी को दूर किया जा सकता था, परन्तु 1968 से सहायता में कमी करने के कारण तरल कोषों में जो अभाव उत्पन्न हो गया है उसकी पूर्ति करने के लिए तरलता का महत्व बढ़ गया है।

(3) स्वर्ण कोषों में कमी- अमरीकी स्वर्ण-कोषों की कमी के कारण अन्तर्राष्ट्रीय तरलता की मात्रा में कमी होने से तरलता का महत्व बढ़ गया है।

विशेष आहरण अधिकार-

विगत वर्षों में, विशेष रूप से अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की स्थापना के पश्चात्, अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की मात्रा में अत्यन्त तीव्र गति वृद्धि हुई है। लेकिन अन्तर्राष्ट्रीय तरलता में उनती तीव्रता से वृद्धि न हो सको। तरलता के इस अभाव की समस्या को दूर करने के लिए ही जनवरी, 1970 से कोष ने एक नयी योजना को कार्यान्वित किया। इसी योजना को विशेष ऋण अधिकार कहकर पुकारा गया। ये अधिकार स्वर्ण मुद्राओं के पूरक के रूप में कार्य करते हैं। अतः इन्हें कागजी स्वर्ण भी कहा जाता है।

S.D.R. की स्थापना एवं इनकी व्यावहारिक रूप में कार्यान्वित प्रणाली को अन्तर्राष्ट्रीय मौद्रिक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना गया है तथा ऐसा माना जाने लगा है कि अधिकारों ने अन्तर्राष्ट्रीय मौद्रिक सहयोग को बढ़ाने में काफी सहायता की है। रॉय जेविन्स का यह न सच ही प्रतीत होता है, “मौद्रिक व्यवस्था के विकास में S.D.R. के महत्वपूर्ण योगदान के अतिरिक्त विश्व की जटिल परन्तु वास्तविक समस्याओं के समाधान हेतु अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग का भी ये अधिकार एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।”S.D.R. “प्रशासन के माध्यम से सुरक्षित सृजन” (Reserve creation through administration) के आधार पर अन्तर्राष्ट्रीय तरलता का प्रबन्ध करने की नीति पर आधारित है। वह व्यवस्था ठीक उस घरेलू नीति के अनुरूप है जिसके अन्तर्गत कोई सरकार मुद्रा स्फीति को बदले हुए देश के विकास हेतु वित्तीय प्रबन्ध करते हैं।

S.D.R. के अन्तर्गत मुद्रा कोष के प्रत्येक सदस्य देश को उसके कोटे के अनुपात में विशेष आहरण अधिकार दिये जायेंगे। इस अवस्था के अनुसार अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के अन्तर्गत एक पृथक्  खाता खोला जायेगा। मुद्रा कोष के सामान्य लेन-देन का विवरण होगा जबकि दूसरे में| S.D.R. से सम्बद्ध लेखा-जोखा होगा। इस प्रकार मुद्रा कोष के साधारण साधनों से भिन्न तौर पर S.D.R. के लिए नये स्रोतों से साधन जुटाये जायेंगे और इनका विवरण भी इस प्रकार अलग रूप में होगा। दूसरे शब्दों में, यह व्यवस्था अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा-कोष के माध्यम से विभिन्न देशों के खातों का हिसाब चुकता करने हेतु लागू की गई परन्तु इस प्रक्रिया में न तो स्वर्ण का उपयोग किया जाता है और न ही पत्र-मुद्रा का।

विशेष आहरण अधिकारों की विशेषताएँ

(1) तरलता वृद्धि विधि- विशेष आहरण अधिकार विश्व के वर्तमान तरल कोषों को बढाने की विधि है।

(2) पृथक खाता- इसके लिए मुद्रा कोष में अपने मूल खाते से अलग एक विशेष खाता खोलता है।

(3) वितरण- विशेष आहरण अधिकार का निर्माण मुद्रा कोषों के पारस्परिक समझौते से पाँच वर्ष की अवधि के लिए किया जाता है। प्रत्येक देश का मुद्रा कोष में जितने प्रतिशत अभ्यंश है, उसी अनुपात में विशेष आहरण अधिकार में उस देश का भाग होता है।

(4) पुस्तक प्रविष्ट मात्रा- पुस्तक प्रविष्ट मात्रा इसका आधार है। इसके पीछे कोई मूल्यवान कोष नहीं है। सदस्य देशों की सामान्य स्वीकृति ही इसका आधार है।

(5) स्वर्ण मूल्य- विशेष आहरण अधिकार एक कागजी-स्वर्ण है जिसका प्रारम्भिक मूल्य 0.888671 ग्राम शुद्ध स्वर्ण अथवा एक डालर के बराबर था, किन्तु यह स्वर्ण में परिवर्तनीय नहीं था। सन् 1974 से इसका मूल्य 16 मान्यता प्राप्त मुद्राओं के औसत मूल्य के बराबर आँका जाने लगा है।

(6) प्रयोग- इसका प्रयोग केवल आकस्मिक अथवा स्थायी अभाव पूर्ति के लिए किया जा सकता है। यह दो अवसरों पर उचित बताया गया है- (क) प्रतिकूल भुगतान सन्तुलन के लिए, (ख) तरल कोषों में अप्रत्याशित कमी-पूर्ति के लिए। पाँच वर्ष की निर्धारित अवधि में शुद्ध संचय के 70% से अधिक विशेष आहरण अधिकारों के प्रयोग की अनुमति किसी देश को नहीं है।

(7) वैकल्पिक हिस्सेदारी- मुद्रा कोष का कोई भी सदस्य स्वेच्छा से विशेष आहरण अधिकार का भागीदार हो सकता है।

(8) अधिकारों की सीमा- किसी भी देश को अपने अभ्यंशों को तिगुने से अधिक विशेष आहरण अधिकार कोष रखना आवश्यक नहीं है, यद्यपि वह चाहे तो ऐसा कर सकता है।

(9) ब्याज- अपने निर्धारित अभ्यंश से अधिक किसी देश के खाते में आहरण अधिकार जमा होने पर अभ्यंश से अधिक कोषों पर मुद्रा कोष एक निश्चित दर से ब्याज देता है। इस समय ब्याज की दर 3.75 प्रतिशत है।

(10) दैनिक कोष- आहरण अधिकार कोषों से दिये गये ऋणों की भाँति चुकता करने की अनिवार्यता नहीं है। योजनाओं में भाग लेने वाले देश को अपने खातों में अपने निर्धारित भार के कम से कम 30% विशेष आहरण अधिकारों का दैनिक श्रेय रखना अनिवार्य है।

(11) दण्ड- आहरण अधिकारों का प्रयोग तरल कोषों की आकस्मिक अथवा पूर्ति के लिए किया जा सकता है। यदि कोई देश नियमों की अवहेलना कर अधिकारों का प्रयोग अनुचित अथवा अवांछनीय रूप में करता है तो मुद्रा-कोष उस देश को आहरण अधिकारों के प्रयोग से वंचित कर सकता है।

(12) प्रादिष्ट मुद्रा- विशेष आहरण अधिकार व्यवहार में एक अन्तर्राष्ट्रीय प्रादिष्ट मुद्रा है जिसके पीछे केवल मुद्रा कोष की साख और प्रतिष्ठा ही एकमात्र विधि है, यह स्वर्ण में परिवर्तनीय नहीं है।

(13) आकर्षक गुण- विशेष आहरण अधिकार में कुछ अन्य आकर्षक गुण भी हैं-

(क) बिना स्वर्ण अथवा राष्ट्रीय मुद्रा की आड़ के विश्वव्यापी स्वीकृति प्राप्त है। (ख) इसके बिना मुद्रा प्रसार के अन्तर्राष्ट्रीय तरलता में वृद्धि होती है। (ग) विशेष आहरण अधिकार केवल सरकारों के पारस्परिक लेन-देन के लिए ही प्रयुक्त हो सकते हैं। (घ) मुद्रा कोष व्यवस्था में बिना किसी संगठनात्मक परिवर्तन के विशेष आहरण अधिकार प्रणाली द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय तरलता में वृद्धि कर दी गयी है।

प्रारम्भिक योजना के अनुसार इन अधिकारों की अवधि 1972 तक थी परन्तु विकासशील देशों के प्रतिनिधि इन अधिकारों के निरन्तर सृजन के पक्ष में हैं क्योंकि तरलता का अभाव आज भी बना हुआ है।

सामान्य ऋण अधिकारों में भिन्नता-

मुद्रा कोष के पास अब दो खाते हैं-

(1) सामान्य खाता- जिसमें स्वर्ण तथा विदेशी मुद्राओं का लेन-देन शामिल है। इसमें से कोष सदस्य देशों को उस समय अल्पकालीन ऋण प्रदान करता है, जब इसका भुगतान सन्तुलन प्रतिकूल होता है। इसी खाते से कोष विदेशी मुद्रा बेचता अथवा ऋण देता है, आवश्यकता पड़ने पर ऋण देने का आश्वासन देता है।

(2) विशेष ऋण अधिकार खाता- इसके माध्यम से S.D.R. की सुविधा प्रदान की जाती है।

आलोचना- इस योजना की कई बातों में आलोचना की गई-

(1) किसी देश की संचित कोषीय आवश्यकता अनुमान लगाने को कोई निश्चित फार्मूला नहीं है और न निकट भविष्य में ऐसे फार्मूला की दिशा में कोई प्रयल ही किया जा रहा है।

(2) विशेष आहरण अधिकार का एक बड़ा भाग (लगभग 73%) विश्व के महान् उद्योग प्रधान देशों को मिला है और विकासशील देशों को, जिनकी जनसंख्या विश्व की दो-तिहाई है, बहुत थोड़ा भाग, (लगभग 27%) दिया गया है।

(3) ब्याज की दर (3.75%) बहुत कम है।

(4) विशेष आहरण अधिकार का प्रयोग सीमित है और इस दृष्टि से यह योजना अन्य कोषों (स्वर्ण व विदेशी विनिमय कोष) की तुलना में निकृष्ट है।

(5) यद्यपि इस योजना का परम उद्देश्य विकासशील देशों के आर्थिक विकास को सुलभ बनाना बताया. गया है, किन्तु व्यवहार में इस उद्देश्य से लाभ की कम सम्भावना है, क्योंकि विकासशील देशों को “सरल ऋण” मिलने से उनमें मुद्रा प्रसार के वातावरण को और अधिक बल मिलेगा जिससे उनको आर्थिक विकास में बाधा पड़ेगी।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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