विपणन प्रबन्ध / Marketing Management

बाजार विभक्तीकरण से आशय | बाजार विभक्तीकरण की प्रमुख मान्यताएँ | विपणन विभक्तिकरण के मुख्य उद्देश्य | उपभोक्ता व्यवहार की विशेषताएँ

बाजार विभक्तीकरण से आशय | बाजार विभक्तीकरण की प्रमुख मान्यताएँ | विपणन विभक्तिकरण के मुख्य उद्देश्य | उपभोक्ता व्यवहार की विशेषताएँ | What is meant by market segmentation in Hindi | Key Assumptions of Market Segmentation in Hindi | Main Objectives of Marketing Segmentation in Hindi | Features of consumer behavior in Hindi

बाजार विभक्तीकरण से आशय (Meaning of market Segmentation)

बाजार विभक्तीकरण के अन्तर्गत किसी वस्तु के सम्पूर्ण बाजार को ग्राहकों की विशेषताओं, प्रकृति अथवा विक्रय क्षेत्रों के आधार पर विभिन्न उप-बाजारों या खण्डों में विभक्त किया जाता है। बाजार विभक्तीकरण समजातीय विशेषताओं के आधार पर किया जाना चाहिए अर्थात् प्रत्येक उप- बाजार या उप-खण्ड की विशेषतायें एक जैसी हों ताकि प्रत्येक उप-बाजार की विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए प्रभावपूर्ण विपणन कार्यक्रम तैयार किए जा सके। संक्षेप में, किसी वस्तु या सेवा के बाजार का विभिन्न खण्डों या उप-बाजारों में बाँटना ही बाजार विभक्तीकरण कहलाता है।

हमें व्यावहारिक जीवन में बाजार विभक्तीकरण के अनेक उदाहरण देखने को मिलते हैं, जैसे- सरकार की विद्युत शक्ति की दरें, औद्योगिक, गृह एवं प्रकाश हेतु अलग-अलग उपयोग के लिए भिन्न-भिन्न दरें हैं। रेलवे के द्वारा वातानुकूलित, प्रथम एवं द्वितीय श्रेणी के लिए अलग- अलग किराये की दरें निर्धारित की गई हैं: इसे अतिरिक्त रेलवे द्वारा विद्यार्थियों, दैनिक यात्रियों, पर्यटकों आदि को किराये में रियायत दी जाती है। पुस्तक बाजार को अध्ययन या शिक्षा के आधार पर पाँच भागों में विभाजित किया जा सकता है – प्राइमरी, माध्यमिक, स्नातक, स्नातकोत्तर एवं सामान्य पुस्तक बाजार। इस प्रकार बाजार विभक्तीकरण एक व्यापक प्रक्रिया है जिसमें बाजार को  विभिन्न उप-बाजारों में विभाजित करके प्रत्येक उप-बाजार के लिए उत्पाद विकास, मूल्य निर्धारण, विज्ञापन, विक्रय एवं वितरण सम्बन्धी निर्णय लिये जाते हैं और इनके आधार पर प्रत्येक उपबाजार के लिए प्रभावी विपणन कार्यक्रम बनाये जाते हैं।

बाजार विभक्तीकरण की प्रमुख मान्यताएँ

(Main Assumptions of Market Segmentation)

बाजार विभक्तीकरण की तीन प्रमुख मान्यताएँ हैं जो निम्नानुसार हैं –

  1. बाजार में विषम या विजातीय ग्राहकों की विद्यमानता – बाजार विभक्तिकरण की प्रथम मान्यता यह है कि सम्पूर्ण बाजार में अनेक प्रकार के ग्राहकों एवं भावी ग्राहकों के विषम या विजातीय (Heterogenous) समूह है। इनमें एकांकी व्यक्ति, परिवार एवं संगठन सम्मिलित हैं। इन सभी की विशेषताओं (यथा आयु, लिंग, निवास स्थान, भाषा, जाति, जातीय मूल्य, आय, व्यय, पेशा, धन्धा, व्यवसाय आदि) आवश्यकताओं, रूचियों, सोच-विचार, व्यवहार आदि में पर्याप्त अन्तर पाया जाता है।
  2. विपणन मिश्रणों एवं व्यूह रचनाओं का निर्माण- विपणन विभक्तिकरण में एक मान्यता यह भी है कि सम्पूर्ण बाजार के विभिन्न ग्राहक समूहों में विपणन हेतु पृथक-पृथक विपणन मिश्रणों एवं व्यूहरचनाओं का निर्माण करना सम्भव है। ऐसे करके विपणन कार्यों को अधिक प्रभावी कुशलतापूर्वक सम्पन्न किया जा सकता है।

विपणन विभक्तिकरण के मुख्य उद्देश्य

(Main Objectives of Market Segmentation)

  1. बाजार के सही स्वरूप को समझना।
  2. बाजार में विद्यमान एवं भावी ग्राहकों में से एक समान आवश्यकताओं, विशेषताओं, व्यवहार वाले ग्राहकों के समूह बनाना।
  3. प्रत्येक समूह के ग्राहकों की रूचियों, आवश्यकताओं, वरीयताओं, पसन्द-नापसन्द की जानकारी करना ।
  4. उन नये बाजार क्षेत्रों को ज्ञात करना जिनमें संस्था की विपणन क्रियाओं का विस्तार किया जा सके।
  5. समुचित एवं सर्वोत्तम बाजार क्षेत्रों का चयन एवं विकास करना।
  6. संस्था के लिए सर्वश्रेष्ठ ग्राहक वर्ग को ज्ञात करना एवं उनके प्राप्ति लक्ष्य ग्राहकों के रूप में मानकर प्रयास करना।

उपभोक्ता व्यवहार की विशेषताएँ

(Characteristics of Consumer Behaviour)

उपभोक्ता व्यवहार की कुछ प्रमुख विशेषताएँ निम्नानुसार हैं जिनसे उसकी प्रकृति का अनुमान लगाया जा सकता है-

  1. क्रियाओं एवं प्रतिक्रियाओं से प्रकटीकरण- उपभोक्ता व्यवहार उपभोक्ता की उन क्रियाओं एवं प्रतिक्रियाओं से प्रकट होता है जो वह किसी उत्पाद या सेवा के क्रय करने से पहले या बाद में अथवा क्रय करने के दौरान करता है।
  2. शारीरिक, मानसिक, सामाजिक क्रियाएँ तथा प्रतिक्रियाएँ- क्रय व्यवहार व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक अथवा सामाजिक क्रियाओं तथा प्रतिक्रियाओं द्वारा अथवा इन सभी की सम्मिलित क्रियाओं तथा प्रतिक्रियाओं से प्रकट होता है।
  3. अनेक घटकों के प्रभावों का परिणाम- उपभोक्ता व्यवहार की एक विशेषता यह है कि यह उपभोक्ता से सम्बन्धित अनेक घटकों के प्रभावों का परिणाम है। उपभोक्ता का क्रय-व्यवहार उसके व्यक्तिगत, आर्थिक, मानसिक, सामाजिक, सांस्कृतिक घटकों तथा विभिन्न विपणन सूचनाओं के प्रभावों का सामूहिक परिणाम है। कुर्ज तथा बून (Kurtz and Boone) ने ठीक ही लिखा है कि, “उपभोक्ता व्यवहार उपभोक्ता के व्यक्तिगत प्रभावों तथा बाह्य वातावरण के घटकों के प्रभावों का परिणाम है।”
  4. क्रय-व्यवहार क्रय-निर्णयन प्रक्रिया- उपभोक्ता का व्यवहार उसके क्रय-व्यवहार की प्रक्रिया है जिसके अन्तर्गत वह किसी उत्पाद/सेवा के क्रय का निर्णय करता है। कुर्ज तथा बून (Kurtz and Boone) का कहना है कि “एक व्यक्ति का क्रय-व्यवहार उसकी सम्पूर्ण क्रय-निर्णयन प्रक्रिया है न कि केवल क्रय प्रक्रिया का एक चरण। इसमें न केवल क्रय से पहले एवं बाद के चरण सम्मिलित हैं बल्कि क्रय करने के दौरान आने वाले विभिन्न चरण भी सम्मिलित हैं।
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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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