विपणन प्रबन्ध / Marketing Management

विपणन नियोजन की प्रक्रिया | Process of Marketing Planning in Hindi

विपणन नियोजन की प्रक्रिया | Process of Marketing Planning in Hindi

विपणन नियोजन की प्रक्रिया

(Process of Marketing Planning)

विपणन नियोजन की प्रक्रिया को निम्न दो भागों में विभाजित करके अध्ययन किया जा सकता है –

  1. दीर्घकालीन विपणन नियोजन प्रक्रिया;
  2. अल्पकालीन या वार्षिक विपणन नियोजन प्रक्रिया

(1) दीर्घकालीन विपणन-नियोजन प्रक्रिया

(Long Term Marketing Planning Process)

फिलिप कोटलर (Philip Kotler) ने दीर्घकालीन विपणन नियोजन की प्रक्रिया के लिये निम्नलिखित छः आवश्यक कदम या चरण बतायें हैं –

  1. रोग का पता लगाना (Diagnosis)- जिस प्रकार रोगी का इलाज तभी सम्भव है जबकि उसके रोगी की सही जानकारी हो जाये, उसी प्रकार नियोजन कार्य तभी सम्भव है जबकि कम्पनी या संस्था की वर्तमान स्थिति का अध्ययन किया जाये। कम्पनी की वर्तमान स्थिति का अध्ययन ही रोग का पता लगाने के समान है। कम्पनी की वर्तमान स्थिति का अध्ययन करने के लिए उत्पाद और विक्रय क्षेत्रों के अनुसार कम्पनी को बिक्री की मात्रा, ग्राहक संतुष्टि एवं उनकी आधुनिक प्रवृत्तियों, विपणन लागतों, प्लाण्ट की प्रयुक्त क्षमता, लाभ-स्तर, आदि के सम्बन्ध में आँकड़े एकत्रित करके कम्पनी की वर्तमान स्थिति का अध्ययन करना चाहिए।
  2. पूर्व सूचना (Prognosis)- रोग का पता लगाने के अतिरिक्त यह भी अध्ययन करना चाहिए कि यदि रोगी की सही हालत चलती रही तो उसकी क्या स्थिति होगी? इसी प्रकार कम्पनी के सम्बन्ध में यह अध्ययन करना चाहिए कि यदि वर्तमान स्थिति जारी रही तो कम्पनी की भविष्य में क्या स्थिति होगी? अर्थात भविष्य में लाभ और विक्रय की मात्रा में वृद्धि होगी या कमी होगी। यदि इस प्रकार के अध्ययन से पता चलता है कि कम्पनी का भविष्य उज्जवल है तो कम्पनी की वर्तमान नीतियों को चालू रखा जा सकता है और यदि कम्पनी का भविष्य अन्धकारमय प्रतीत हो तो कम्पनी के नियोजन में आवश्यक परिवर्तन करने की आवश्यकता होती है।
  3. उद्देश्य (Objectives)- यदि पूर्व सूचना के अध्ययन के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि कम्पनी का भविष्य अन्धकारमय है तो यह निर्धारित करना चाहिए कि कम्पनी के भावी उद्देश्य क्या हैं, अर्थात भविष्य में कम्पनी कितने लाभ या बिक्री की मात्रा प्राप्त करना चाहती है।
  4. रीति-नीति (Strategy)- रीति-नीतियों से आशय ऐसे सिद्धान्तों से है जो कम्पनी को उपलब्ध साधनों का अधिक विदोहन करने के लिए प्रतिस्पर्धा का सामना करने के लिए और अधिक से अधिक मात्रा में ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए प्रयोग में लाये जाते हैं। कम्पनी के निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए रीति-नीति का प्रयोग किया जाता है। रीति नीतियाँ कम्पनी की अस्थायी नीतियाँ होती हैं। एक समय में एक रीति-नीति के अनेक विकल्प हो सकते हैं। अतः ऐसी स्थिति में कम्पनी को सभी विकल्पों का गहन अध्ययन करके सर्वोत्तम विकल्प का चयन करना चाहिए।
  5. युक्तियाँ या दाँव पेंच (Tactics)- कम्पनी के उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु रीति-नीतियों का किस प्रकार प्रयोग किया जायेगा, इसको कम्पनी की युक्ति या दाँव-पेंच कहा जाता है। वास्तव में युक्तियाँ रीति-नीतियों के क्रियान्वयन का तरीका है।.
  6. नियन्त्रण (Control)- नियन्त्रण से आशय यह जाँच करने से है कि प्रत्येक कार्य पूर्व निर्धारित लक्ष्यों एवं निर्देशों के अनुसार हो रहा है अथवा नहीं। यदि नहीं तो उसके कारणों का पता लगाया जाता है ताकि उनको यथा समय सुधारने के लिए उचित कार्यवाही की जा सके, जिससे कि उनकी पुनरावृत्ति को रोका जा सके। कम्पनी की रीति नीतियाँ और युक्तियाँ कम्पनी के पूर्व निर्धारित लक्ष्य को किसी सीमा तक प्राप्त करने में सफल रही हैं, इसके लिए नियन्त्रण की आवश्यकता है। संक्षेप में, नियन्त्रण के अन्तर्गत पूर्व निर्धारित उद्देश्यों की तुलना वास्तविक निष्पादन से की जाती है और दोनों में विचलनों (Variation) का पता लगाया जाता है तत्पश्चात् यह देखा जाता है कि ये विचलन अनुकूल हैं या प्रतिकूल। यदि विचलन प्रतिकूल हो तो उनके कारणों का अध्ययन करके सुधारात्मक कार्यवाही की जाती है।

(II) अल्पकालीन या वार्षिक विपणन नियोजन प्रक्रिया

(Short term Or Annual Marketing Planning Process)

विभिन्न कम्पनियों द्वारा वार्षिक विपणन योजना बनाने के लिए भिन्न-भिन्न क्रिया अपनायी जाती है। एक कम्पनी में वार्षिक विपणन योजना तैयार करने हेतु अग्रिम कदम उठाये जा सकते हैं –

  1. विपणन अनुसंधान प्रवन्धक क्षेत्रीय विक्रय प्रबंधकों से आवश्यक सूचनायें एकत्रित करके अपनी रिपोर्ट उत्पाद नियोजन प्रबन्धक को प्रस्तुत करता है।
  2. उत्पाद नियोजन प्रबन्धक प्रारम्भिक योजनायें तैयार करता है। ऐसा करते समय वह विपणन आवश्यकताओं और प्रमुख कार्यक्रमों की लागतों पर विशेष ध्यान देता है।
  3. उत्पाद नियोजन प्रबन्धक विपणन प्रबन्धक को प्रारम्भिक योजनायें प्रस्तुत करता है।
  4. विपणन प्रबन्धक उन योजनाओं की व्यावहारिकता पर विचार करता है और यदि वह आवश्यक समझता है तो उनमें संशोधन कर देता है।
  5. विपणन प्रबन्धक फिर इन योजनाओं को उच्च प्रबन्धक या अध्यक्ष के पास भेज देता है।
  6. उच्च प्रबन्धक उन योजनाओं पर विचार करके उनका अनुमोदन कर देता है।
विपणन प्रबन्ध – महत्वपूर्ण लिंक

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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