अर्थशास्त्र / Economics

भारत की नई व्यापार नीति | व्यापार नीति में परिवर्तन | भारत की नई व्यापार नीति 1991 की व्याख्या

भारत की नई व्यापार नीति | व्यापार नीति में परिवर्तन | भारत की नई व्यापार नीति 1991 की व्याख्या

भारत की नई व्यापार नीति

(New Trade Policy of India)

1990-91 और चालू वर्ष में निर्यात वृद्धि में प्रवृत्तियों के प्रत्यावर्तन से व्यापक निर्यात की जरूरत है। इसके विपरीत, पहले आर्थकि नीति के वातावरण का इस सम्बन्ध में बाधाकारी प्रभाव था। उच्च टैरिफ और सख्त आयात लाइसेंस व्यवस्था से एक घरेलू लागत ढाँचा तैयार हो गया था जो विश्व मूल्यों से अलग-अलग था। उच्च लागत ढाँचा और उद्यमियों द्वारा निर्णय लेने पर बहुत सी नीतियों द्वारा लगी सीमाओं के कारण यह उद्योग अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में अप्रतियोगी हो रहा है और इसे व्यापक आर्थिक सहायता और दूसरे विशेष प्रोत्साहनों के बगैर चलाना बहुत कठिन हो गया है।

इस स्थिति में सुधार करने और निर्यात वृद्धि की दर, जो अर्थव्यवस्था में मध्यावधिक सुधार के लिए महत्वपूर्ण है, को बढ़ाने के लिए रुपये की विनिमय दर में जुलाई 1991 में दो बार समायोजन किया गया। विनिमय दर के इन समायोजनों से अल्पावधि और मध्यावधि में देश की अन्तर्राष्ट्रीय प्रतियोगितात्मक में सुधार होने का अनुमान है जिससे निर्यात वृद्धि के बढ़ावा मिलेगा। तथापि यह बताती है कि मुद्रा स्फीति नियन्त्रित होगी और उत्पादन बढ़ेगा। इन विनिमय दर नीति परिवर्तनों के बाद व्यापार नीति में प्रमुख संरचनात्मक सुधार किये गये, जिनका उद्देश्य नियन्त्रणों और लाइसेंसों का पर्याप्त उदारीकरण, व्यापार की गई मदों का सारणीकरण न करना, उच्च टैरिफ दरों में कमी, निर्यात सम्बन्धी आर्थिक सहायता समाप्त करना और अर्थव्यवस्था में प्रतियोगितात्मकता और उद्यमशीलता को बढ़ावा देने के अन्य उपाय करना है। इसके अतिरिक्त औद्योगिक नीति में सरकार द्वारा किये जा रहे परिवर्तन से भारतीय उद्योग की अन्तर्राष्ट्रीय प्रतियोगितात्मकता में सुधार करने में भी सहायता मिलेगी और इस प्रकार निर्यात सम्बर्द्धन होगा। व्यापार असन्तुलन को सुधारने के लिए समर्थनकारी सख्त राजकोषीय और मौद्रिक नीतियाँ भी अपनाई गई थीं।

जुलाई-अगस्त, 1991 के दौरान सरकार ने व्यापार नीति में दूरगामी परिवर्तनों की घोषणा की। नीति में इन परिवर्तनों का उद्देश्य निर्यात सम्बन्धी प्रोत्साहनों को सुदृढ़ करना, आयात लाइसेंसीकरण का पर्याप्त मात्रा में विलोपन और आयात में इष्टतम संकुचन करना है। संवेदनशील मदें (जैसे पेट्रोल-तेल, स्नेहक और उर्वरक) के आवश्यक आयातों को पूरी तरह सुरक्षित किया गया, परन्तु कच्ची सामग्रियों और संघटकों के अन्य आयातों को पुनः पूर्ति लाइसेंसीकरण प्रणाली को बढ़ाकर औरप उनः संरचित करके निर्यात-निष्पादन से संयोजित किया गया। विनिमय दर में परिवर्तन और सुधार के अन्य उपायों, जिन्होंने कुल मिलाकर निर्यातों निर्यातों के लिए पर्याप्त प्रोत्साहन प्रदान किए, के परिणामस्वरूप नकद प्रतिपूरक सदृश्यता की प्रणाली समाप्त कर दी गई। लागू किये गये नीति सम्बन्धी मुख्यप परिवर्तन नीचे दिये गये हैं-

(1) नई व्यापार नीति में निर्यात अर्जन से सम्बद्ध आयात हकदारियों द्वारा आयत के संचालित लाइसेंसिंग के बड़े भाग को प्रतिस्थापित करके आयात लाइसेंसिंग प्रणाली में मुख्य परिवर्तन अपरिहार्य बनाती है। आयातप पुनः पूर्ति प्रणाली को परिवर्द्धित और पुनः संरचित किया गया था और इसका एक्जिमस्क्रिम्स के रूप में पुनः नामकरण किया गया। एक्जिमस्क्रिप्स मुक्त रूप से व्यापार योग्य होंगे। स्क्रिम पर बाजार में निर्धारित प्रीमियम निर्यातकों के लिए अधिक प्रोत्साहन और बाजार शक्तियों के अनुसार आयात आबण्टन करने का एक साधन प्रदर्शित करेंगे। यह निर्यातकों, जिनकी आयात तीव्रता कम है, को अधिकतम प्रोत्साहन के साथ निर्यात लाभदायता में सुधार करेगी। एक्जिमस्क्रिप्स की बढ़ी हुई व्याप्ति और एक्जिमस्क्रिप्स खरीदकर नई नीति के अधीन वित्त पोषण और अधिक से अधिक आयात करने की आवश्यकता एक्जिमस्क्रिप्स की माँग में प्रमुख विस्तार उपलक्षित करेगी, जिससे बाजार प्रीमियम और निर्यात लाभदायकता में वृद्धि होगी। एक्जिमस्क्रिप की निम्नलिखित विशेषताएँ होंगी-

(i) धातु आधारित हस्तशिल्पों, समाचार-पत्रों/पत्रिकाओं/पत्रों, धुली हुई सिनेमा फिल्मों और रत्न/जेवरात क्षेत्र, जो पुनः पूर्ति के अधिक लाभ, जो पहले स्वीकार्य थी, प्राप्त करते रहेंगे, को छोड़कर सभी निर्यात उत्पादों की पोतपर्यन्त निःशुल्क के 30 प्रतिशत की समरूप एक्जिमस्क्रिप्स दर (पहले की 5 से 20 प्रतिशत की तुलना में) होगी। इसके अतिरिक्त, मूल्य-समर्थित कृषि उत्पादों, औषधियों, इलेक्ट्रानिकी उत्पादों, उच्च प्रौद्योगिकीय इंजीनियरी उत्पादों जैसे कुछ अधिसूचित निर्यात उत्पादों के सम्बन्ध में निर्यातक निर्यातों के पोतपर्यन्त निःशुल्क मूल्य के 10 प्रतिशत के अतिरिक्त एक्जिमस्क्रिप्स के पात्र होंगे।

 (ii) सामान्य मुद्रा क्षेत्र (जी0 सी0 ए0) और रुपया अदायगी क्षेत्र (आर० पी० ए०) से किये जाने वाले निर्यात क्रमशः जी0 सी0 ए0 और आर० पी० ए० से प्रयोग के लिए आयात पुनः पूर्ति का लाभ प्राप्त करेंगे।

(iii) निर्यात सेवाओं की व्याप्ति को परिवर्द्धित कर दिया गया है और सेवा निर्यातों की पुनः पूर्ति की दर को निबल विदेशी मुद्रा आय के 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 30 प्रतिशत कर, दिया गया है।

(iv) शुल्क रहित आयातों के आधार पर किये गये निर्यातों के सम्बन्ध में अग्रिम लाइसेंस, एक्जिमस्क्रिप 30 प्रतिशत की सामान्य दर पर उपलब्ध होंगे, परन्तु यह एन0 एफ0 ई० पर लागू होगा।

(v) एक्जिमस्क्रिप्स व्यापार योग्य होंगे और इनका प्रयोग आयात-निर्यात नीति, 1990- 93 की सीमित अनुमत्य सारणीकृत सूची (परिशिष्ट 3) गैर संवेदनशील सारणीकृत सूची (परिशिष्ट 5 क) में किसी मद वास्तविक प्रयोक्ताओं के लिए सभी युक्त सामान्य लाइसेंस की मदों (परिशिष्ट 6 सूची 8, भाग 1) और (परिशिष्ट 6, सूची 10) और प्रतिबन्धित सूची में दर्ज वस्तुओं को छोड़कर अन्य गैर-मुक्त सामान्य लाइसेंस वाली पूँजीगत वस्तुओं (परिशिष्ट 1-क) का आयात करने के लिए किया जायेगा।

(vi) पूरक लाइसेंसों की प्रणाली समाप्त कर दी गई है और असूचीबद्ध मुक्त सामान्य लाइसेंस की श्रेणी (लघु उद्योगो और विशिष्ट जीवनरक्षक औषधियों और उपस्कर के विनिर्माण को छोड़कर) समाप्त कर दी गई है और ये सभी आयात आवश्यकताओं को एक्जिमस्क्रिप्स के माध्यम से पूरा किया जायेगा।

(2) निर्यातकों को उन निविष्टियों, जिनका उन्हें विश्व बाजार के लिए प्रतियोगितात्मक उत्पादन करना आवश्यक करना आवश्यक है, के लिए शुल्क मुक्त सुविधा प्रदान करने के लिए बनाई गई अग्रिम लाइसेंस की प्रणाली व्यापार नीति का एक महत्वपूर्ण साधन है, विशेषकर हमारी परिस्थिति में जहाँ आयात टैरिफ (शुल्क) स्तर अभी भी अधिक है। नई व्यापार नीति ने इन अग्रिम लाइसेंस की प्रणाली को इन लाइसेंसों को जारी करने की प्रक्रिया को सरल और तेज करके, अपेक्षित दस्तावेजों की संख्या में कमी करके, मानदण्ड निर्धारण के लिए अधिक मूल्य को विनिर्दिष्ट करके, अग्रिम लाइसेंस के समग्र लागत बीमा और भाड़ा मूल्य के भीतर प्रत्येक आयातित मदों के मूल्य में घट-बढ़ को समायोजित करने की अनुमति देकर, इन लाइसेंसों के पुनः वैधीकरण के लिए शक्तियाँ प्रत्यायोजित करके, बैंक गारण्टी और कानूनी बचत प्राप्त करने के लिए कार्यविधि को कारगर बनाकर लाइसेंसदाता प्राधिकारी (वैसे मामलों में जहाँ मोडवाट की सुविधा नहीं ली गई हो) की पूर्वानुमति लिए बिना इन लाइसेंसों के एवज में आयातित सामग्रियों का निपटान करने की अनुमति देकर और इन लाइसेंसों के लिए सामान्य मुद्रा क्षेत्र को निर्यात करने के लिए पर्याप्त विनिर्माण क्रियाकलाप की दशा को हटा करके सुदृढ़ बनाया है। चुने हुए प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों में सामान्य मुद्रा क्षेत्र में निर्यात के लिए हस्तान्तरणीय अग्रिम लाइसेंस, जिसके द्वारा निर्यातक बाजार से प्राप्त शुल्क प्रदत्त निविष्टियों पर आधारित निर्यात कर सकते हैं और तत्पश्चात् इन निविष्टियों की पुनः पूर्ति के लिए अग्रिम लाइसेंस प्राप्त कर सकें, शुरू की गई थी। अग्रिम लाइसेंस स्कीम में ये परिवर्तन शुल्क मुक्त कच्ची सामग्रियाँ प्राप्त करने वाले निर्यातकों को अधिक स्वतन्त्रता प्रदान करेंगे और इसे निर्यात सम्बर्द्धन के एक साधन के रूप में सुदृढ़ करेंगे।

(3) औद्योगिक नीति पर बयान देने के पश्चात् पूँजीगत वस्तुओं के लिए आयात की गई विधि को सरल बना दिया गया है। नई इकाइयों और पर्याप्त विस्ताराधीन इकाइयों को देशी उपलब्धता के दृष्टिकोण से किसी स्वीकृति के बिना पूंजीगत वस्तुओं (प्रतिबन्धित सूची में दर्ज वस्तुओं को छोड़कर परिशिष्ट भाग क) के आयात के लिए स्वतः ही लाइसेंस दे दिया जायेगा, शर्ते कि उनका आयात पूरी तरह विदेशी इक्विटी के अधीन हो अथवा आयात की आवश्यकता संयन्त्र और मशीनरी के मूल्य की 25 प्रतिशत अर्थात् अधिकतम 2 करोड़ रुपये तक हो। जनवरी, 1992 में और छूट दिये जाने से उच्च प्राथमिकता वाले उद्योगों में 51 प्रतिशत तक के विदेशी निवेश की उपरोक्त योजना के अधीन पूँजीगत सामग्रियों के आयात के लिए लाइसेंस की आवश्यकता समाप्त कर दी गई है। ऐसे मामलों में, जहाँ पूँजीगत सामग्रियों आयात के लिए विदेशी मुद्रा को पूरी तरह विदेशी इक्विटी द्वारा शामिल किया जाता है भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा दी गई अनुमति के आधार पर किसी विशिष्ट लाइसेंस के बिना मुक्त सामान्य लाइसेंस की पूँजीगत सामग्रियों (परिशिष्ट 1, भाग ख), गैर-मुक्त सामान्य लाइसेंस की पूँजीगत सामग्रियाँ (परिशिष्टत्तर भाग क और ख) और प्रबन्धित सामग्रियों (परिशिष्ट 1 भाग क) के आयात की अनुमति दी जायेगी। विदेशी इक्विटी के एवज में ऐसी पूँजीगत सामग्रियों का आयात केवल वास्तविक प्रयोग के लिए होगा। युक्तियुक्त बनाने के उपायों के रूप में पूँजीगत सामग्रियों के आयात के लिए विदेशी निवेशक द्वारा विदेश में सीधे भुगतान करने की भी अनुमति दी जा सकती है। ऐसे भुगतान को कम्पनी की विदेशी इक्विटी में उसका अंशदान माना जायेगा। मुक्त सामान्य लाइसेंस से इतर पूँजीगत सामग्रियों (प्रतिबन्धित सूची की सामग्रियों को छोड़कर) पहुंच को भी सभी निर्यातों और निर्यात गृहों द्वार एक्जिमस्क्रिप्स के एवज में उसके आयात की अनुमति देकर विस्तारित किया गया है। विदेशों में वित्तपोषित परियोजनाओं, जिनमें अन्तर्राष्ट्रीय स्पर्धात्मक बोलियों की प्रक्रिया अपनाई जाती है, के मामलों में पूँजीगत सामग्रियों के आयात के लिए देशीय दृष्टि से अनुमति देना समाप्त कर दिया गया है।

(4) नई व्यापार नीति में निर्यात सम्वर्द्धन के एक साधन के रूप में निर्यातगृहों और व्यापार गृहों के विकास को सुदृढ़ करने के उपाय भी शामिल हैं। इनमें निर्यात गृहों, व्यापार गृहों और शीर्ष व्यापार गृहों द्वारा वर्ष 1991-92 के दौरान उनके अतिरिक्त लाइसेंसों के अधीन आयात किये जाने के लिए अनुमत्य मदों की विस्तृत सूची शामिल है और इन गृहों की अतिरिक्त हुकदारी पहली अप्रैल, 1992 से पोत पर्यन्त निःशुल्क के 5 प्रतिशत की दर पर एक्जिमस्क्रिप्स है। सरकार ने निर्यात सम्वर्द्धन के उद्देश्य के लिए 51 प्रतिशत विदेशी इक्विटी सहित व्यापार गृहों की स्थापना करने की अनुमति दी है। ऐसे व्यापार गृह घरेलू निर्यात और व्यापार गृहों को उपलब्ध सभी लाभ प्राप्त करने के पात्र होंगे।

(5) प्रतिबन्धित सूची की मदों और मुक्त सामान्य लाइसेंस की मदों की समीक्षा की गई थी और 98 मदों को प्रतिबन्धित सूची से हटाकर सीमित अनुमत्य सूची में स्थानान्तरित कर दिया गया था। मुक्त सामान्य लाइसेंस सूची की मदों की भी समीक्षा की गई थी और सीमित अनुमत्य सूची से 37 मदों को हटाकर मुक्त सामान्य लाइसेंस की सूची में रख दिया गया। इसी प्रकार मुक्त सामान्य लाइसेंस सूची की मदों की समीक्षा की गई थी और शुरू में 76 मदों को और दिसम्बर, 1991 में 34 मदों को मुक्त सामान्य लाइसेंस से सीमित अनुमत्य सूची में स्थानान्तरित कर दिया गया।

(6) वर्षों से निर्यात और आयात की गई मदों को विनिर्दिष्ट सरकारी क्षेत्र की एजेंसियों के माध्यम से निर्यात और आयात के लिए सारणीकृत किया गया है। नई नीति का उद्देश्य सारणीकरण की सीमा को प्रगामी तौर पर कम करना है। सरकार ने 116 मदों को लाइसेंस की औपचारिकताओं के बिना उनके निर्यात की अनुमति देकर विनियन्त्रित कर दिया है। अन्य 29 मदों को मुक्त सामान्य लाइसेंस सूची में स्थानान्तरित कर दिया गया है। आयातों के मामले में 6 मदों को सारणीकरण से हटा दिया गया और उन्हें मुक्त सामान्य लाइसेंस पर रख दिया गया था जबकि 16 मदों को सारणीकरण से हटाकर परिशिष्ट 3, जहाँ वे एक्जमस्क्रिप्स के एवज में आयात के लिए उपलब्ध होंगे, में सूचीबद्ध कर दिया गया था।

(7) निर्यात संसाधन क्षेत्र स्कीम (ई0 पी0 जेड0) और शतप्रतिशत ई० ओ० यू० स्कीम, जिन्हें शुल्क मुक्त क्षेत्र उपलब्ध कराने के लिए शुरू किया गया था और जिससे विशेषकर निर्यात के लिए उत्पादन हो सके, को जैसा अनुमान था समाप्त नहीं किया गया है और यह वांछित सीमा तक निर्यात बाजार का पता लगाने के लिए विदेशी निवेश आकषित करने में भी असफल रहा। इन स्कीमों की कार्यपद्धति की समीक्षा करने के बाद इनमें निम्नलिखित परिवर्तन किये गये-

(i) सभी ई०ओ०यू०/ई0पी0 जेड0 इकाइयाँ एन0 एफ0 ई0 पर लागू 30 प्रतिशत की मूल्य दर पर लागू 30 प्रतिशत की मूल्य दर पर एक्जिमस्क्रिप्स के लिए पात्र होंगी।

(ii) ई0ओ0यू/ई०पी०जेड0 इकाइयों से डी0टी0ए0 विक्रियों पर लागू शुल्क को सामान्य सीमा शुल्क के 50 प्रतिशत तक कम कर दिया गया है बर्शते कि देय शुल्क उसी उत्पाद पर लगाये उत्पाद शुल्क से कम न हो। उन इकाइयों, जिनके कच्ची सामग्रियों का प्रयोग उत्पादन के 30 प्रतिशत से अधिक हो, के मामले में निर्यात बिक्री के सम्बन्ध में 25:75 के अनुपात में डी0टी0ए0 बिक्री की अनुमति दी जाएगी। अन्य सभी मामलों में निर्यातों विक्रियों की तुलना में अनुमत्य डी0 टी0 ए0 विक्री का अनुपात 15:85 होगा।

(iii) ई0ओ0यू0 अथवा ई0पी0 जेड0 इकाइयों द्वारा अर्जि निवल विदेशी मुद्रा को निर्यात गृहों अथवा शीर्ष व्यापार गृहों को परवर्ती स्तर प्रदान करने के उद्देश्य के लिए डी0टी0ए0 में उनके मूल/सम्बद्ध कम्पनियों की आय के साथ मिला दिया जा सकता है।

(iv) इस्पात की आपूर्ति के लिए आई0पी0आर0एस0 स्कीम की सुविधा ई0ओ०यू० और ई०पी0जे0 इकाइयों को भी प्रदान कर दी गई है।

(v) इन इकाइयों के लिए पूँजीगत सामग्रियों के आयात की अनुमति स्वचालि अनुमोदन कार्य-विधि के अधीन दी जायेगी। अगर वे पूरी तरह विदेशी इक्विटी के अधीन होते हैं अथवा अगर वे संयन्त्र और मशीनरी के मूल्य का 50 प्रतिशत अर्थात् 3 करोड़ रुपये की सीमा से अधिक नहीं होते।

इसके अतिरिक्त, अनुमोदन अधिकारों का प्रत्यायोजन, सीमाशुल्क स्वीकृति निपटाने के लिए अन्तिम आधार पर आयातित कच्ची सामग्रियों के प्रवेश की अनुमति देने, आयात सम्बन्धी स्वीकृति प्राप्त करने के लिए बहुप्रयोजनीय बॉण्ड को एकल बॉण्ड द्वारा प्रतिस्थापित करने और

की गई थी। ईoपीo जेड0 और ई0ओ0यू0 स्कीमों के अधीन इकाइयों को उनके बीच तैयार सामग्रियों की आपूर्ति अन्तरण करने के लिए अनुमति देने जैसे प्रक्रियात्मक सुधारों की भी घोषणा सरकार द्वारा की गई थी।

(8) मुक्त सामान्य लाइसेंसों की पूँजीगत सामग्रियों और मुक्त सामान्य लाइसेंसों की कच्ची सामग्रियों और संघटकों के सम्बन्ध में वास्तविक प्रयोक्ता की अनिवार्यता को हटा दिया गया है। मुक्त सामान्य लाइसेंस की पूँजीगत वस्तुओं, कच्ची सामग्रियों, संघटकों, उपभोक्ता वस्तुओं और पुर्जों के आयात के लिए सम्बन्धित प्राधिकारी से पूंजीकरण/औद्योगिक अनुमोदन लेने की शर्त भी समाप्त कर दी गई थी।

(9) यह भी महसूस किया गया है कि टैरिफ संरक्षण की सीमा आवश्यक रूप से अधिक है, जो अन्तर्राष्ट्रीय स्पर्धात्मक की ओर बढ़ने में बाधा खड़ी कर रही है। बजट और व्यापार नीति सम्बन्धी व्यक्तव्य यह दर्शाते हैं कि कुछ समय में सीमा शुल्कों को राजकोषीय और भुगतान सन्तुलन की स्थिति में सुधारों के आगे पीछे कम किया जाएगा। वर्ष 1991-92 के केन्द्रीय बजट ने उच्च टैरिफ दरों में अधिकतम 150 प्रतिशत (300 प्रतिशत अथवा इससे अधिक से) तक कमी लाकर और पूँजीगत वस्तुओं के आयातों पर शुल्कों में कुल मिलाकर सन्तुलित कमी करके टैरिफ (शुल्क) सम्बन्धी सुधारों की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इन सुधारों के एक भाग के रूप में टैरिफ सम्बन्धी ढांचे के युक्तिकरण और सरलीकरण पर भी बल देना आवश्यक होगा।

(10) अक्टूबर, 1991 से व्यापार और सीमा शुल्क वर्गीकरण के सुंसगतीकरण ने टैरिफ ढाँचे सहित आयात नीति में अधिक सुस्पष्टता लाई है।

(11) सरकारी क्षेत्र के व्यापारिक संगठन, जो परम्परागत तौर पर सारणीकृत व्यापार पर निर्भर थे, का उद्देश्य उनके प्रतियोगी विश्वव्यापी वातावरण में प्रचालन के समक्ष अन्तर्राष्ट्रीय व्यापारिक गृह के रूप में उभरने, जन नीति के प्रभावी साधन के रूप में सेवा करने और लघु उद्योग/कुटीर उद्योगों को पर्याप्त समर्थन प्रदान करने की ओर पुनः अभिमुख करना होगा।

(12) सरकार ने प्रतिष्ठित निर्यातकों को अनुमोदित बैंकों में विदेशी मुद्रा खाता खोलने की अनुमति देने और निर्यातकों को विदेशी ऋण जुटाने, ऐसे खातों से निर्यात सम्बद्ध आयातों के भुगतान करने और ऐसे खातों में निर्यात से होने वाली प्राप्ति को जमा करने की अनुमति देने का निर्णय किया है। यह निर्यातकों द्वारा उनके आवश्यक आयातों के लिए भुगतान को सुसाध्य बनायेगा।

सरकार का मध्यावधिक उद्देश्य पूँजीगत वस्तुओं और कच्ची सामग्रियों/संघटकों पर लाइसेंसों तथा मात्रात्मक प्रतिबन्धों को प्रगामी तौर पर हटा देना है ताकि एक सावधानीपूर्वक परिभाषित छोटी नकारात्मक सूची को छोड़कर इन सभी मदों को मुक्त सामान्य लाइसेंस की सूची में रखा जा सके। वाणिज्य मन्त्रालय ने इस परिवर्तन की उपलब्धि को पूरा करने की पद्धति बनाने के लिए व्यापार नीति सम्बन्धी सुधारों की एक उच्चस्तरीय समिति गठित कर ली है।

व्यापार नीति में परिवर्तन

पिछले तीन-चार वर्षों में व्यापार नीति के उदारीकरण के लिए कई कदम उठाये गये हैं। मुख्य कदम निम्नलिखित हैं-

रुपये का अवमूल्यन तथा परिवर्तनीयता (Rupee depreciation and Convertibility)- 1966 के अवमूल्यन से पहले, एक अमरीकी डालर का मूल्य 4.75 रुपये था (वह 1961-65 में विद्यमान विनिमय दर थी)। 1966 के अवमूल्यन के बाद, एक अमरीकी डालर 7.50 रुपये के बराबर हो गया। 1973 में अधिकतर देशों ने निश्चित विनिमय दरों (Fixed exchange rates) की प्रणाली को तिलांजलि दे दी। भारत सरकार ने भी इस प्रणाली का त्याग कर दिया तथा भारतीय रुपये को पांच प्रमुख व्यापारिक सहयोगी राष्ट्रों को मुद्राओं के साथ जोड़ दिया। यह परिवर्तनशील विनिमय दर प्रणाली (Floating exchange rate system) सितम्बर 1975 से लागू है। इस प्रणाली के अधीन, रुपये के मूल्य में, डालर तथा अन्य मुख्य मुद्राओं के सापेक्ष, गिरावट आती रही। यहाँ तक कि 1990 के अन्त तक आते- आते अमरीरी डालर 18.07 रुपये के बराबर हो गया। विशेष आहरण अधिकारों (Special Drawing Rights) के रूप में, 1970 में मूल्य था- एक SDR 7.58 रुपये। 1990 के अन्त तक यह विनिमय दर एक SDR = 25.71 रुपये तक पहुंच गई। जुलाई 1991 के आरम्भ में भारत सरकार ने पांच प्रमुख मुद्राओं (अमेरिका के डालर, इंग्लैण्ड के पौंड, स्टार्लिंग, फ्रांस के फ्रैंक, जर्मनी के मार्क तथा जापान के येन) के सापेक्ष रुपये का लगभग 18 प्रतिशत अवमूल्यन कर दिया (यह अवमूल्यन दो चरणों में किया गया) इसके परिणामस्वरूप, पांच प्रमुख मुद्राओं के मूल्य में, रुपये के सापेक्ष, 20-23 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

(i) रुपये की आंशिक परिवर्तनीयता (Partial convertibility of rupee)- 1992-93 के बजट में वित्त मन्त्री ने उदारीकृत विनिमय दर-प्रबन्ध प्रणाली (Liberalised exchange Rate Mechanism System) की घोषणा की। इस प्रणाली में रुपये की आंशिक परिवर्तनीयता की व्यवस्था थी। इसके अन्तर्गत दोहरी विनिमय दर (dual exchange rate) लागू की गई जिसमें यह व्यवस्था थी कि कुल अर्जित विदेशी विनिमय आय का 40 प्रतिशत सरकारी विनिमय दर पर सरकार को देना होगा और बाकी का 60 प्रतिशत बाजार द्वारा निर्धारित दर पर परिवर्तित किया जाएगा। सरकारी दर पर दी गई विदेशी मुद्रा का प्रयोग आवश्यक वस्तुओं (जैसे तेल, पेट्रोलियम उत्पादन, उर्वरक, जीवन रक्षक दवाइयों इत्यादि) के आयात के लिए किया जाएगा। अन्य सब आयात बाजार द्वारा निर्धारित दर पर करने की व्यवस्था थी। क्योंकि सरकारी विनिमय दर बाजार द्वारा निर्धारित दर की तुलना में कम थी इसलिए इस व्यवस्था का अर्थ यह था कि निर्यातकों को एक तरह का कर (Tax) देना होगा। ऐसा अनुमान लगाया गया है कि निहित कर 12 प्रतिशत के बीच था।

(ii) व्यापार खाते पर पूर्ण परिवर्तनीयता (Full convertibility on trade accounts)- 1993-94 के बजट में व्यापार खाते पर पूर्ण परिवर्तनीयता (Full convertibility on trade accounts) लागू की गई। इस नीति के अधीन दोहरी विनिमय दर प्रणाली के स्थान पर केवल एक विनिमय दर लागू की गई। इसका अर्थ यह हुआ कि 60.40 परिवर्तनीयता के स्थान पर 100 प्रतिशत परिवर्तनीयता लागू की गई। वह परिवर्तनीयता निम्नलिखित क्षेत्रों में की गई (i) वस्तुओं का सम्पूर्ण आयात व निर्यात तथा (ii) भुगतान शेष पर सभी प्राप्तियां चाहे व चालू खाते में हो अथवा पूँजी खाते में (परन्तु सभी देनदारियों पर यह परिवर्तनीयता लागू नहीं की गई)। इसके साथ-साथ एकीकृत विनिमय दर की परिधि से बाहर की कुछ मदों के लिए सरकारी विनिमय दर को बनाये रखा गया। इस प्रकार की 6 अदृश्य मदें चालू व पूंजी खातों में धीं अर्थात् इनमें लेन-देन सरकारी दर पर ही करने की अनुमति दी गई। इसके अलावा, रिजर्व बैंकद्वारा लगाये गये कोई विनिमय नियंत्रणों को चालू रखा गया हालांकि उनमें कुछ ढील अवश्य दी गई।

(iii) चालू खाते पर पूर्ण परिवर्तनीयता– भारत ने चालू खाते पर पूर्ण परिवर्तनीयता की स्थिति 19 अगस्त 1994 को प्राप्त की और 20 अगस्त 1994 को अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुच्छेद VIII चालू का दर्जा प्राप्त किया। अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुच्छेद के अन्तर्गत यह प्रावधान है कि चालू खाते पर पूर्ण परिवर्तनीयता प्राप्त करने वाले देशों को (i) चालू भुगतानों पर कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाना चाहिए (पूंजी खाते पर प्रतिबन्ध लगाए जा सकते हैं); तथा (ii) भेदमूलक मुद्रा व्यवहार (जिसमें बहुविनिमय दरों की नीति भी शामिल है) से बचना चाहिए। चालू खाते पर परिवर्तनीयता को निम्नलिखित अन्तर्राष्ट्रीय लेन-देन के लिए विदेशी मुद्रा खरीदने अथवा बेचने की स्वतन्त्रता के रूप में परिभाषित किया गया है- (i) विदेशी व्यापार, चालू व्यवसायों व सेवाओं तथा अल्पकालीन बैंकिंग व ऋण सुविधाओं से जुड़े सभी भुगतान; (ii) ऋणों पर ब्याज तथा अन्य निवेशों से निवल आय के रूप में देय भुगतान; (iii) ऋणों को चुकाने अथवा प्रत्यक्ष निवेशों के मूल्य ह्रास के लिए मामूली राशि का भुगतान तथा (iv) परिवारों के निर्वाह का खर्च पूरा करने के लिए मामूली प्रेषणाएं।

वर्ष 1994-95 में बजट में वित्त मन्त्री ने कहा था कि “चालू खाते पर परिवर्तनीयता की ओर अब अगला कदम उठाने का वक्त आ गया है।” बजट में की गई इस घोषणा के अनुसरण में भारतीय रिजर्व बैंक ने 28 फरवरी, 1994 को ही विदेशी विनिमय नियंत्रणों का एक निर्दिष्ट सीमा तक उदारीकरण कर दिया। निर्दिष्ट सीमा तक यह उदारीकरण निम्नलिखित क्षेत्रों में किया गया; (i) मुद्रा अर्जक विदेशी मुद्रा खाता; (ii) बुनियादी यात्रा कोटा; (iii) विदशों में अध्ययन; (iv) उपहार प्रेषणाएं, (v) दान; और (vi) विदेशी पक्षों द्वारा प्रदान की गई विशिष्ट सेवाओं का भुगतान।

19 अगस्त, 1994 को रिजर्व बैंक ने परिवर्तनीयता की दिशा में और कदम उठाये जब चालू खातों पर भुगतान पर छूट व रियायतें दी गईं; कुछ ऐसे अनिवासी खातों पर ब्याज को अन्य देशों में ले जाने की छूट दी गई जिन पर पहले यह सुविधा उपलब्ध नहीं थी तथा अनिवासियों द्वारा निवेश आय को तीन वर्ष की अवधि में चरणबद्ध रूप से प्रत्यावर्तनीय करने की सुविधा दी गई।

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Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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