इतिहास / History

भक्ति की परिभाषा | भक्तिवाद की उत्पत्ति | भक्ति क्या है ? | भक्ति के प्रकार या भेद | भक्ति के अंग तथा भक्त के प्रकार | भक्ति के रस | भक्तिवाद का क्रमिक विकास

भक्ति की परिभाषा | भक्तिवाद की उत्पत्ति | भक्ति क्या है ? | भक्ति के प्रकार या भेद | भक्ति के अंग तथा भक्त के प्रकार | भक्ति के रस | भक्तिवाद का क्रमिक विकास

भक्ति की परिभाषा

भक्ति’ शब्द की उत्पत्ति भज सेवायाम्’ धातु से हुई है। इसका अर्थ है ‘भक्त द्वारा ईश्वर की सेवा’ । प्रश्न उठता है कि यह सेवा किस प्रकार की है ? भक्ति के वास्तविक अर्थानुसार निष्काम भाव से ईश्वर की सेवा करना ही भक्ति है।

भक्तिवाद की उत्पत्ति

भक्तिवाद की उत्पत्ति वेदों के समय में हुई थी। भक्ति के अवतारवाद का मूल स्वरूप पुरुष सूक्त में ब्रह्म की निराकार रूप में की गई स्तुति में विराजमान है। विष्णु (जो वैष्णव भक्ति के उपास्य देवता हैं) वेदों के अनुसार परम हितकारी तथा रक्षक हैं। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार विष्णु सर्वोपरि देवता है। भक्ति में सेवा के जिन नियमों तथा विधियों का पालन किया जाता है वे सभी ऋग्वेद की ऋचाओं में मिलते हैं।

भक्ति क्या है ?

भक्ति योग, श्रुति सिद्ध है तथा भक्ति द्वारा मुक्ति का मार्ग अनुभव जन्य होता है। भक्ति का जन्म मानव हृदय में होता है तथा इससे प्रेरणा लेकर मनुष्य ईश्वर के लिये सर्वस्व अर्पण कर देता है। भक्ति द्वारा हृदय में ईश्वर से साक्षात्कार होता है। यथा भगवान भक्ति द्वारा मानव हृदय के वश में हो जाते हैं।

भक्ति के प्रकार या भेद

भक्ति के दो प्रकार हैं- (1) सकाम भक्ति तथा (2) निष्काम भक्ति सकाम भक्ति में कामना पूर्ति के उद्देश्य से भक्ति की जाती हैं और निष्काम भक्ति में भक्त और ईश्वर के बीच मात्र प्रेम भाव होता है। इसे अव्यभिचारिणी भक्ति भी कहा जाता है। इस भक्ति के तीन भेद हैं-(1) साधन भक्ति, (2) भाव भक्ति तथा-

भक्ति के अंग तथा भक्त के प्रकार

भक्ति के नौ अंग हैं- श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पाद सेवन, अर्थन, बन्दन, दास्य सख्य तथा आत्मनिवेदन। भक्त चार प्रकार के होते हैं, यथा-

(1) आर्त- द्रौपदी तथा गजेन्द्र जैसे पीसित भत्तः, (2) जिज्ञासु- जैसे उद्धव, (3) अर्थाथी- जो कामनापूर्ण भक्ति करते है जैसे ध्रुब तथा (4) ज्ञानी- जैसे शुकदेवा

भक्ति के रस

भक्ति के पाँच रस हैं- (1) शान्त रस, (2) दात्य रस, (3) सख्य निष्ठा, (4) वात्सल्य, तथा (5) माधुर्य। समस्त भक्त इन्ही पाँच रसों के अधीन होते हैं। सच्चा भक्त इन रसों द्वारा अपना भाव ईश्वर में लगा देता है। ऐसा करना ही भक्ति का पुरुषार्थ है।

भक्तिवाद का क्रमिक विकास

ऐतिहासिक दृष्टि से भक्तिवाद का विकास तथा भक्ति आन्दोलन का प्रारम्भ दो पृथक बातें है। जैसा कि हम पहले ही कह चुके हैं- भक्तिवाद के बीज ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में विराजमान थे। परन्तु वैदिक भक्तिवाद में भक्ति की कोमल भावनाओं के स्थान पर कर्मकाण्ड का प्राधान्य था। उपनिषद काल में भक्तिवाद का रूप चिन्तनशील हो गया। समय के साथ-साथ वैदिक कर्मकाण्ड के हवनकुण्ड तथा बलिदान का रूप क्रमशः देवालयों तथा अर्चना ने ले लिया। अब सभी देवताओं का प्रतिनिधित्व विष्णु तथा महादेव करने लगे। यह क्रम काफी दिनों तक चलता रहा। मोटे तौर पर भक्तिवाद के प्रमुख सम्प्रदायों में वैष्णव तथा शैव सम्प्रदाय राजपूतों के समय तक काफी विकसित हो गये। दक्षिण भारत में आलवार (वैष्णव) तथा नायनार (शैव) सन्तों ने भक्तिवाद का बड़ा प्रचार तथा प्रसार किया।

यह विशेष स्मरणीय तथा महत्वपूर्ण बात है कि वैदिक काल से लेकर, इस्लाम धर्म के भारत आगमन के समय तक का काल भक्तिवाद के क्रमिक विकास की गाथा है। इसके पश्चात् भक्तिवाद में जो कुछ भी तीव्रता, नवीनता तथा परिवर्तन आया, उसके अनेक कारण थे।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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