इतिहास / History

हिन्दू समाज को शंकराचार्य की देन | शंकराचार्य का अद्वैत दर्शन | शंकराचार्य पर एक संक्षिप्त टिप्पणी | हिन्दू समाज के लिए शंकराचार्य का योगदान

हिन्दू समाज को शंकराचार्य की देन | शंकराचार्य का अद्वैत दर्शन | शंकराचार्य पर एक संक्षिप्त टिप्पणी | हिन्दू समाज के लिए शंकराचार्य का योगदान

हिन्दू समाज को शंकराचार्य की देन

बौद्ध धर्म की पराजय-

कहा जाता है कि जहाँ-जहाँ तक शंकराचार्य के शंख की ध्वनि पहुँच गई, वहाँ के सभी बौद्ध ब्राह्मण-प्रधान वैदिक धर्म के अनुयायी हो गये। वस्तुतः हिन्दू समाज को शंकराचार्य की यही सबसे बड़ी देन थी।

ब्राह्मण-

प्रधान वैदिक धर्म भारत का अत्यन्त प्राचीन धर्म था। ऋग्वैदिक काल (ईसापूर्व 2000) से लेकर ईसापूर्व 600 तक भारत में इस धर्म का एकछत्र प्रभुत्व रहा था। परन्तु ईसापूर्व 600 के आसपास बौद्ध तथा जैन धर्मों ने उसे कड़ी चुनौती दी। बौद्ध धर्म की लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि अशोक के शासन काल में वह राजधर्म बन गया। बौद्ध धर्म न केवल सारे भारत में छा गया, अपितु भारत से बाहर चीन, कोरिया, जापान, बर्मा, दक्षिण-पूर्वी एशिया और लंका आदि देशों में भी उसका खूब प्रचार हुआ। भारत से बौद्ध धर्म को उखाड़ फेंकने में शंकराचार्य ने महत्वपूर्ण योग दिया।

शंकराचार्य का परिचय-

शंकराचार्य का जन्म सन् 788 ईस्वी में मलाबार प्रदेश के कालड़ी नामक गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता शैव थे। शंकराचार्य अत्यन्त मेधावी तथा प्रतिभाशाली पुरुष थे। छोटी आयु में ही उन्होंने वेद आदि धार्मिक ग्रन्थों का अध्ययन कर लिया था।

धर्म की विकृति-

उस काल में हिन्दू धर्म की दशा बड़ी दयनीय थी। यद्यपि पुष्यमित्र शुंग के समय से ही वैदिक धर्म का पुनरुत्थान और बौद्ध धर्म का ह्रास शुरू हो गया था, फिर भी कनिष्क, मीनांदर आदि राजाओं ने बौद्ध धर्म को फिर प्रोत्साहन दिया था। महायान सम्प्रदाय का प्रभाव बढ़ने पर बौद्ध धर्म तथा हिन्दू धर्म एक-टूसरे के निकट आ गये थे। पर इन दोनों ही धर्मों में भ्रष्टाचार की बाढ़ आ रही थी। बौद्धों का वज्रयान और शैवों का तांत्रिक सम्प्रदाय जोर पकड़ रहे थे और वे धर्म की आड़ में दुराचार को बढ़ावा दे रहे थे। कुमारिल भट्ट ने फिर वैदिक यज्ञों की परम्परा को स्थापित करने और धर्म को सुधारने का प्रयत्न किया। उसने एक ओर तांत्रिकों से और दूसरी ओर कर्मकांड का विरोध करने वाले बौद्धों से टक्कर ली। परन्तु जनसाधारण की रुचि कर्मकांड की ओर नहीं हुई।

अद्वैतवाद का प्रतिपादन-

उस समय शंकराचार्य ने पाक रगमंच पर प्रवेश किया। उन्होंने जगह-जगह बौद्धों से शास्त्रार्थ किये और उन्हें पराजित किया। शंकराचार्य ने अद्वैत वेदान्त का प्रचार किया। उन्होंने कहा, “केवल ब्रह्म ही सत्य और नित्य है। यह दृश्य जगत् मिथ्या है। जीवात्मा ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं है।” अर्थात् संसार में ब्रह्म के सिवाय दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं। यही अद्वैतवाद कहलाता है।

ब्रह्म अपनी माया से इस संसार प्रपंच को रचता है। अज्ञानवश ब्रह्म का अंश जीव स्वयं को ब्रह्म से भिन्न समझने लगता है। सच्चा ज्ञान प्राप्त होते ही माया लुप्त हो जाती है और जीव अपने असली रूप (ब्रह्म रूप) को पहचान लेता है। इस प्रकार उन्होंने मुक्ति प्राप्त करने के लिए ज्ञान मार्ग का प्रतिपादन किया। इससे भक्ति आन्दोलन को बहुत धक्का लगा।

संन्यासियों का गौरव बढ़ाया-

शंकराचार्य स्वयं अविवाहित रहे। उन्होंने गृहस्थ की अपेक्षा संन्यास को अच्छा बताया। उनके काल में संन्यासियों का गौरव बहुत बढ़ा।

हिन्दू मठों का संगठन-

हिन्दू धर्म किसी संघ के रूप में संगठित न था, जब कि बौद्ध धर्म का संघ सुसंगठित था। बौद्धों के विहारों के अनुकरण में शंकराचार्य ने हिन्दू मठों की स्थापना की, जिनमें बड़ी संख्या में संन्यासी रह कर हिन्दू धर्म का प्रचार करने लगे। उन्होंने देश के चार कोनों में चार मठ स्थापित किये : उत्तर में बद्रीनाथ के पास जोशीमठ, पूर्व में जगन्नाथपुरी में, दक्षिण में श्रृंगेरी में और पश्चिम में द्वारिकापुरी में। ये मठ हिन्दू धर्म को संगठित रूप देने में सहायक बने।

मन्दिरों का निर्माण-

गुप्त काल में और उसके बाद भारी संख्या में हिन्दू मन्दिर बने थे। इन मन्दिरों में ही विद्यालय भी बन गये। श्री बी० एन० लूनिया ने लिखा है कि “शंकराचार्य के सिद्धान्तों का विस्तृत प्रचार मन्दिर-महाविद्यालयों के द्वारा हुआ। ये महाविद्यालय, जो बड़े पैमाने पर निःशुल्क शिक्षा देते थे, प्रमुख रूप से धार्मिक थे और इन्होंने अपनी शिक्षा में से बौद्ध दर्शन शास्त्र का अध्ययन पृथक् कर दिया।” 2 हिन्दू धर्म के पुनर्गठन में इन महाविद्यालयों का बड़ा योग रहा।

प्रस्थानत्रयी का भाष्य-

शंकराचार्य केवल समाजसुधारक तथा संगठनकर्ता ही नहीं थे, अपितु प्रभावशाली विद्वान् लेखक भी थे। उन्होंने प्रस्थानत्रयी (वेदान्त सूत्रों, उपनिषदों और गीता) पर सुन्दर भाष्य लिखे। इन ग्रन्थों ने हिन्दू धर्म के लिए एक सुदृढ़ आधार प्रदान किया।

शंकराचार्य का देहान्त 32 वर्ष की छोटी सी आयु में ही हो गया। यदि वह अधिक समय तक जीवित रहे होते, तो हिन्दू समाज की स्थिति और भी सुदृढ़ कर गये होते।

संक्षेप में, हिन्दू समाज के प्रति शंकराचार्य की देन निम्नलिखित हैं : (1) उन्होंने प्रभुताशाली बौद्ध धर्म को परास्त करके हिन्दू धर्म को लोकप्रिय बनाया। भारत से बौद्ध धर्म ऐसा लुप्त हुआ कि बौद्ध कहीं ढूंढे न मिलता था। यह परिवर्तन किसी दबाव उत्पीड़न द्वारा नहीं, अपितु विद्वत्ता तथा शास्त्रार्थ के बल पर हुआ। (2) अद्वैत सिद्धान्त की स्थापना करके शंकराचार्य ने एकेश्वरवाद का प्रतिपादन किया। (3) मठों और मन्दिर-महाविद्यालयों की स्थापना करके उन्होंने हिन्दू धर्म का संगठन किया। (4) ‘प्रस्थानत्रयी’ का भाष्य करके उन्होंने हिन्दू धर्म के लिए एक सुदृढ़ शास्त्रीय आधार प्रस्तुत कर दिया। (5) उन्होंने मुक्ति के लिए ज्ञान मार्ग का उपदेश किया।(6) सन्यासियों का गौरव उन्होंने बढ़ाया।

  1. प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ग्रन्थकोटिभिः ।

ब्रह्म सत्यं, जगन्मिथ्या, जीवो ब्रहौव नापरः ।

  1. श्री बी० एन० लूनिया : भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति का विकास
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Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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