मानव संसाधन प्रबंधन / Human Resource Management

मानव संसाधन विकास के प्रमुख सिद्धान्त | मानव संसाधन विकास के उद्देश्य | मानव संसाधन विकास में शिक्षा की भूमिका | कार्मिक प्रबन्ध के सिद्धान्त | मानव संसाधन विकास में गुणात्मक चक्र क्रियायें

मानव संसाधन विकास के प्रमुख सिद्धान्त | मानव संसाधन विकास के उद्देश्य | मानव संसाधन विकास में शिक्षा की भूमिका | कार्मिक प्रबन्ध के सिद्धान्त | मानव संसाधन विकास में गुणात्मक चक्र क्रियायें | Key Principles of Human Resource Development in Hindi | Objectives of Human Resource Development in Hindi | Role of Education in Human Resource Development in Hindi | Principles of Personnel Management in Hindi | Qualitative Cycle of Actions in Human Resource Development in Hindi

मानव संसाधन विकास के प्रमुख सिद्धान्त

कार्मिक प्रबन्ध के सिद्धान्त

(Principles of Personnel Management)

कार्मिक प्रबन्ध के चार सिद्धान्त निम्नलिखित है-

  1. व्यक्तिगत विकास का सिद्धान्त (Principle of Personal Development)- प्रबन्ध की सफलता व्यक्ति विशेष की सन्तुष्टि पर निर्भर करती है और व्यक्ति की सन्तुष्टि तभी होती है जब उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति हो। इसके अतिरिक्त प्रत्येक व्यक्ति को उसकी योग्यतानुसार विकास के अवसर मिलने चाहिए। इस प्रकार उसे निराशा नहीं होगी।
  2. वैज्ञानिक चयन का सिद्धान्त (Principle of Scientific Selection) – इस सिद्धान्त के अनुसार कर्मचारियों का चयन वैज्ञानिक आधार पर होना चाहिए। सही कार्य प्रदान करना भी एक कला है। अर्थात कर्मचारी को उसके अनुसार ही स्थान प्रदान करना चाहिए।
  3. संचार का सिद्धान्त (Principle of Communication)- इस सिद्धान्त के अनुसार आदेश एवं अनुरोधों को सही रूप में गन्तव्य स्थान पर पहुँचना चाहिए।
  4. सहकारिता चयन सिद्धान्त (Principle of Co-operation)- सहकारिता का अर्थ मिल-जुल कर कार्य करने से लगाया जाता है। इसके अन्तर्गत सभी कर्मचारी मिल-जुल कर कार्य करते है उनमें धर्म, जाति व लिंग का कोई भेदभाव नहीं होता है।

मानव संसाधन विकास के उद्देश्य

Objectives of HRD

(1) उचित योग्यता वाले व्यक्तियों की नियुक्ति करना ताकि वह संगठन को सुचारु रूप से चला सकें।

(2) नये कर्मचारियों को उनके कार्य से परिचित कराना।

(3) आकर्षण मजदूरी एवं वेतन पद्धतियों की व्यवस्था करना।

(4) श्रमिकों की कार्यक्षमता में वृद्धि के लिए प्रेरणात्मक योजनाएं लागू करना ।

(5) संगठन के भीतर उत्तम मानव संबंध बनाये रखना।

(6) कार्य के लिए सुविधाएं पैदा करना।

(7) ऐसे कर्मचारी को निकाल कर बाहर करना जिनका कार्य संतोषजनक नहीं है।

(8) कर्मचारी की उत्पादकता, योग्यता एवं दक्षता का अवलोकन करना।

(9) ऐसे कर्मचारियों को रोककर रखना जो लक्ष्य प्राप्त करने में मदद करते हैं।

(10) कर्मचारियों को प्रशिक्षण देने की स्थायी व्यवस्था करना।

(11) मानवीय साधन का प्रभावी उपयोग करना।

(12) संगठन के सभी सदस्यों के मध्य बांछनीय कार्यकारी सम्बन्ध स्थापित करना।

(13) अधिकतम वैयक्तिक विकास करना।

मानव संसाधन विकास में शिक्षा की भूमिका

(Role Education in HRD)

मानव संसाधन विकास में शिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान है। शिक्षित व्यक्ति अधिक योग्य होने के कारण अधिक समझदार होता है तथा वह अच्छी मानव शक्ति का निर्माण करता है। शिक्षित व्यक्ति को प्रशिक्षण देना आसान होता है। वह मानव विकास सम्बन्धी बातों, नियमों, संविधियों, प्रक्रियाओं आदि के प्रति अधिक जागरूक होता है तथा मानव संसाधन विकास में योगदान देता है। मानव संसाधन विकास सम्बन्धी कार्यक्रमों व योजनाओं के प्रति उसमें समझ व जागरूकता होती है। शिक्षा से मानव संसाधन (श्रमिक) अपने कैरियर के विकास पर ध्यान देते है। शिक्षित कर्मचारियों को इस बात की समझ होती है कि संगठन के विकास में ही उनका विकास छिपा हैं।

हमारे देश की मात्र एक-तिहाई जनसंख्या शिक्षित है पर हम विश्व में अमेरिका एवं रूस के बाद तीसरे सबसे बड़े कार्यबल धारक है। जरा विचार कीजिए। उस समय वैज्ञानिक एवं अभिक्रियायें में क्या स्थिति होगी जब हमारे देश में अधिक लोग शिक्षित होंगे। शिक्षा सुस्थिर विकास को उत्पन्न करती है।

शिक्षा को मानव संसाधन विकास का एक उपकरण माना जा सकता है। शिक्षित व्यक्ति विभिन्न समस्याओं को हल करने में अधिक सक्षम होता है। इससे श्रम व सेवायोजक के मध्य संघर्ष में कमी आती है। वह कार्य एवं संगठन के सम्बन्ध में बेहतर निर्णय लेकर मानव संसाधन विकास में योगदान करता है। शिक्षा द्वारा मानव शक्ति के आचरण एवं व्यवहार में सुधार होता है जिससे कर्मचारी अपने अन्दर वांछित परिवर्तन कर सकता है। शिक्षा कर्मचारी के कुशलता, उत्पादकता, आत्मविश्वास व मनोबल में वृद्धि करती है इससे संस्थान का मानवीय संसाधन उपयुक्त रहता है।

मानव संसाधन विकास में शिक्षा की भूमिका अग्रवत है-

  1. यह औद्योगिक उत्पादकता को बढ़ायेगी।
  2. शिक्षा द्वारा कर्मचारियों के गौरव में वृद्धि होती है।
  3. इससे देश के छवि व प्रतिष्ठा में सुधार आता है।
  4. यह सेवासेवक कर्मचारी सम्बन्धों को बढ़ावा देती है।

गुणात्मक चक्र क्रियायें

(Quality Cycle Activities)

गुणात्मक चक्र व्यक्तियों का एक छोटा समूह होता है। ये व्यक्ति एक ही प्रकार के कार्य में संलग्न होते हैं। इस चक्र के व्यक्ति अपनी समस्याओं को समझने, उन पर विचार-विमर्श करने तथा उनका समाधान करने के लिए ऐच्छिक रूप से निर्धारित समय पर अनेक एक पर्यवेक्षक के नेतृत्व में मिलते हैं। एक संगठन में कई गुणवत्ता चक्र हो सकते हैं। इन गुणात्मक चक्रों द्वारा जो कार्य किये जाते है वे गुणवत्ता चक्र क्रियायें कहलाती है। गुणवत्ता चक्र क्रियाओं में समस्याओं की जानकारी करना, उन पर विचार-विमर्श करना, समस्याओं के कारणों का विश्लेषण करना, गुणवत्ता चक्र में शामिल व्यक्तियों द्वारा अपनी सीमा में रहते हुए समस्याओं के समाधान हेतु कार्य करना सम्मिलित है। गुणवत्ता चक्र क्रियाओं के अन्तर्गत गुणवत्ता चक्र के सदस्यों को वांछित प्रशिक्षण दिया जाता है। गुणवत्ता चक्र क्रियायें अनुभव प्रदान करने के साथ-साथ समस्याओं से वचने के उपाय भी सुझाती है। कठिन परिस्थिति में गुणवत्ता चक्र के सदस्य सप्ताह में एक बार बैठकर विभिन्न समस्याओं जैसे- रुकावट, मशीनरी समस्या, सम्भावित खतरा, आदानों की कमी आदि का समाधान खोजने के साथ-साथ गुणवत्ता सुधार सम्बन्धी कार्य भी करते हैं।

संगठन को गुणवत्ता चक्र क्रियाओं से दृश्य एवं अदृश्य लाभ प्राप्त होते हैं-

(a) दृश्य लाभ (Tangible Benefits)- गुणवत्ता चक्र क्रियाओं से संगठन को निम्नलिखित दृश्य लाभ मिलते हैं-

  1. उत्पादन तथा उत्पादकता में सुधार होना,
  2. कार्यक्षमता में वृद्धि तथा लागतों में कमी आना,
  3. उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार होना आदि।

(b) अदृश्य लाभ (Intangible Benefits) – गुणवत्ता चक्र क्रियाओं के अदृश्य लाभ निम्नलिखित होते हैं-

  1. कर्मचारियों का नैतिक उन्नयन होना,
  2. कर्मचारियों में बड़े उत्तरदायित्वों को स्वीकार करने की इच्छा शक्ति उत्पन्न होना,
  3. विभागों के अन्दर तथा अन्तर्विभागीय सम्प्रेषण में सुधार होना,
  4. समूह भावना का विकास होना,
  5. संगठन के प्रति वफादारी उत्पन्न होना,
  6. सुरक्षा के प्रति जागरुकता उत्पन्न होना,
  7. स्व-शिक्षा पर ध्यान दिया जाना आदि।
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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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