हिंदी साहित्य का इतिहास

प्रगतिवाद | प्रगतिवादी की परिभाषायें | प्रगतिवाद का जन्म और विकास | प्रगतिवादी प्रमुख कवि | प्रगतिवादी काव्य की प्रवृत्तियां (विशेषताएं)

प्रगतिवाद | प्रगतिवादी की परिभाषायें | प्रगतिवाद का जन्म और विकास | प्रगतिवादी प्रमुख कवि | प्रगतिवादी काव्य की प्रवृत्तियां (विशेषताएं)

प्रगतिवाद

यह युग हिन्दी साहित्य के आधुनिक काल की काव्य धारा का चतुर्थ उत्थान का है। इस युग की कविता में मार्क्सवादी प्रभाव अधिक है। इसी के फलस्वरूप वर्ग संघर्ष को बढ़ावा मिला और काव्य के क्षेत्र में निम्न वर्ग के चित्रण को प्रधानता मिली। प्रगतिवादी युग में कविता कल्याण के क्षेत्र से निकलकर यथार्थ में आ गई। इन कवियों ने यह अनुभव किया कि शोषित जीवन में हाहाकार है, पीड़ा है। अतः पूंजीवादी अर्थ नीति के प्रति विरोध हुआ और समता लाने का प्रयास किया गया।

प्रगतिवादी की परिभाषायें

डा. रांगेय राघव- जीवित रहने वाले व्यक्ति को चलते समाज के भीतर देखना और उस व्यक्ति के पूर्णत्व को प्रतिबिम्बित करके लोक कल्याण की ओर ले जाने वाला वह वास्तविकता का चित्रण है जो उसे उदात्त बनाकर सत्य की ओर प्रेरित करता है वही वास्तविक यथार्थवाद है।

डॉ. नामवर सिं- छायावाद के गर्भ में सन् 1930 के आस-पास नवीन सामाजिक चेतना से युक्त जिस साहित्य धारा का जन्म हुआ उसे सन् 1936 में प्रगतिशील साहित्य अथवा प्रगतिवाद की संज्ञा दी गई और तब से इस नाम के औचित्य-अनौचित्य को लेकर काफी वाद विवाद होने के बावजूद छाया के बाद की प्रधान साहित्य धारा को प्रगतिवाद के नाम से पुकारा जाता है।

डा. नगेन्द्र- अब के समय में दो विरोधी शक्तियाँ हैं पूंजीवाद और साम्यवाद। पूंजीवाद जिसका साम्राज्यवाद भी अंग है विकासोन्मुख है और साम्यवाद विकासोन्मुख है। निदान प्रगतिवाद साम्यवाद का पोषक है और पूंजीवाद का शत्रु है। बल्कि यो कहिए कि प्रगतिवाद साम्यवाद की साहित्यिक अभिव्यक्ति है।

प्रगतिवाद का जन्म और विकास-

प्रगतिवाद का जन्म सन् 1936 में हुआ। वैसे इसकी नींव और पहले पड़ने लगी थी। सन् 1917 के रूप में वर्गहीन समाज की स्थापना हुई, धीरे-धीरे इसका प्रभाव भारत पर भी पड़ा। फलस्वरूप 1927 में भारत में मार्क्सवादी दल का गठन हुआ। प्रगतिवाद का असली स्वरूप तभी आया जब सन् 1936 में लखनऊ में प्रगतिशील लेखकों की बैठक हुई और उसकी अध्यक्षता प्रेमचंद्र जी ने की। उसी समय से आधुनिक हिन्दी कविता में एक नया मोड़ आया। इसमें शुद्ध रूप से यथार्थ का चित्रण हुआ और तभी से बहुत लोग प्रभावित हुए। यहां तक कि पन्त जी ने 1938 में रूपाभ में कवियों से कल्याण छोड़कर यथार्थ की भूमि पर आने का आग्रह किया। प्रगति वाद का यह क्रम सन् 1943 तक इसी प्रकार चलता रहा।

प्रगतिवादी प्रमुख कवि-

प्रगतिवादी कवियों में केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, नामविलास शर्मा, गजानन माधव, मुक्तबोध रांगेयराघव, त्रिलोचन, शिवमंगल सिंह सुमन, नेमिचन्द्र जैन, भारतभूषण अग्रवाल आदि प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त पन्त, निराला, दिनकर, नरेन्द्र शर्मा, बालकृष्ण शर्मा नवीन आदि की भी कुछ रचनाएं प्रगतिवाद से संबंधित मिलती हैं। इन कवियों ने अपनी-अपनी कविताओं के माध्यम से शोषित एवं निम्न वर्ग की वास्तविकता का चित्रण किया। पन्त तथा निराला जी छायाबाद के प्रसिद्ध कवि थे, उन्होंने भी प्रगतिवाद को मुक्त कंठ से स्वीकार किया और जन-जीवन की यथार्थता का चित्रण किया।

प्रगतिवादी काव्य – प्रवृत्तियां (विशेषताएं)

प्रगतिवादी काव्य की निम्नलिखित प्रमुख प्रवृतियां हैं-

  1. सामाजिक यथार्थ का चित्रण- यहां छायावादी कवि में कल्पना की प्रचुरता थी वहां प्रतिवादी कवि ने जनवादी विचारधारा को अपनाकर समाज के यथार्थ रूप का चित्रण किया शोषकों तथा पूंजीपतियों को छोड़कर मजदूर किसान एवं अन्य निम्न वर्ग का वास्तविक रूप उभर कर जनता के सामने आया। अभी तक किसान, मजदूर को तो कविता में स्थान मिला ही नहीं था यदि मिलता भी था तो कल्पना के सहारे उसे रंक से राजा सिद्ध कर दिया जाता था। प्रगतिवादी कवियों ने इस कल्पना के नकली आचरण को समाप्त किया। केदारनाथ अग्रवाल ने एक गांव का चित्रण किया है देखिए।

सड़े घूर के गोबर की बदबू से दबकर

महक जिन्दगी के गुलाब की मर जाती है।

  1. सामाजिक समस्याओं के प्रति जागरूकता- प्रगतिवादी कवि राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं के प्रति सदैव सजग रहा है। फलतः काव्य और जीवन के अधिक निकट पहुंच सका है। इन कवियों ने तत्कालीन मंहगाई, बेकारी, दरिद्रता, विलास तथा ऐश्वर्य आदि का मार्मिक चित्रण किया है। गांधी जी की मृत्यु के बाद लोगों ने देश को अनाथ समझा लेकिन प्रगतिवादी कवियों ने इसे एक ढोंग माना। “महाशत्रुओं की दाल न गलने देंगे हम’ शीर्षक कविता में नागार्जुन ने लिखा है।

बापू मरे,

अनाथ हो गई भारत माता

अब क्या होगा।

हाय! हाय! हम रहे कहीं के नहीं

लुट गये

रो-रो करके आंखें कर ली लाल आज इन धूर्तो ने

  1. क्रान्तिकारी भावना- प्राचीनता का विरोध कर नवीनता लाने का स्तुत्य प्रयास प्रगतिवादी कवियों ने किया है। युग चेतना के आधार पर समाज, धर्म तथा राजनीति के रूढ़ियों और परम्पराओं में यथोचित परिवर्तन किया। नवीन जी ने सामाजिक स्थिति को बिगड़ते देखकर विप्लवन गान किया-

कवि कुछ ऐसी तान सुना, जिससे उथल पुथल मच जाये।

एक हिलोर इधर से आये एक हिलोर उधर से आये ॥

प्राणों के लाले पड़ जाये, त्राहि त्राहि स्वर नभ में छाये।

नाश और सत्यानाशों का धुआंधार जग में छा जाये ॥

  1. मानवता की असीम शक्ति में विश्वास- इन प्रगतिवादी कवियों ने गिरते हुए मानव को कर्म का सन्देश देकर सदैव ऊंचा उठाया है। वे ईश्वर में उतना विश्वास नहीं करते जितना कि मानव की समृद्धि में धीरे-धीरे ईश्वर का अस्तित्व ही समाप्त होने लगा और कर्म के प्रति लोगों में आस्था बढ़ने लगी। नरेन्द्र शर्मा की पंक्तियां दृष्टव्य हैं।

जिसे तुम कहते हो भगवान

जो बरसाता है जीवन में।

रोग शोक दुख दैन्य अपार

उसे सुनाने चले पुकार?

  1. जन शोषण का विरोध- मार्क्सवाद के आधार पर समस्त मानव जाति शोषक और शोषित इन वर्गों में विभाजित है। प्रगतिवादी कवियों ने शोषक वर्ग के प्रति घृणा और रोष तथा घोषित वर्ग के प्रति करुणा का भाव प्रकट किया है। इस संबंध में दिनकर जी की कविता की पंक्तियां बड़ी सुन्दर है-

श्वानों को मिता दूध वस्त्र, भूखे बालक अकुलाते हैं।

माँ की हड्डी से चिपक चिपक जाड़ों की रात बिताते हैं।

युवती के लज्जा बसन बेंच जय ब्याज चुकाये जाते हैं।

मालिक जब तेल फलेलों पर पानी सा द्रव्य बहाते हैं।

इसके अतिरिक्त नारी स्वतंत्रता की भावना, बौद्धिकता, सांस्कृतिक समन्वय की भावना, धर्म विरोध, पाशववाद का विरोध आदि प्रवृत्तियाँ भी प्रगतिवादी कवियों में ही प्राप्त होती हैं।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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