हिंदी साहित्य का इतिहास

हिन्दी आलोचना के विकास में रामचन्द्र शुक्ल का योगदान

हिन्दी आलोचना के विकास में रामचन्द्र शुक्ल का योगदान

हिन्दी आलोचना के विकास में रामचन्द्र शुक्ल का योगदान

हिन्दी में आलोचना का वास्तविक आरम्भ वस्तुता आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के आगमन के साथ ही होता है। इनके पहले जो कुछ भी आलोचना थी उसे आलोचना की पृष्ठभूमि ही कहा जा सकता है।

रीतिकाल में लिखे गये लक्षण ग्रन्थों को आलोचना ग्रन्थ न कहकर एक विशिष्ट परिपाटी  पर लिखे गये काव्य के अंगों-उपांगों का निरूपण करने वाले ग्रन्थ ही कहा जा सकता है। भारतेन्दु युग में आलोचना का क्षेत्र सामान्य परिचय तक सीमित रहा और उसके पश्चात् डॉ० श्यामसुन्दर दास के समय तक आलोचना का स्वरूप सामान्य गुण दोष कथन ही रहा उसका कोई स्वतन्त्र एवं मौलिक स्वरूप प्रतिष्ठित नहीं हो सका। इसी समय शुक्ल जी ने इस क्षेत्र में पदार्पण किया। डॉ0 नन्ददुलारे वाजपेयी के शब्दों में, “हिन्दी आलोचना की इसी प्रारम्भिक किन्तु नवचेतन अवस्था में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का आगमन हुआ। इनके आगमन के साथ ही हमें स्वतन्त्र आलोचना के क्षेत्र में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल चिन्तन का प्रशस्त मार्ग दिखायी देता है। अतः निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में जिस समय विस्तार, वृद्धि और नवचेतन की अवस्था थी, उसी समय इस क्षेत्र में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का आगमन हुआ। उन्होंने समीक्षा के क्षेत्रों को अपनाया-

(क) साहित्य की धाराओं का क्षेत्र- इसके अन्तर्गत उनका हिन्दी साहित्य का इतिहास आता है तथा

(ख) प्रसिद्ध कवियों की समालोचना का क्षेत्र – इसके अन्तर्गत, जायसी, सूरदास और गोस्वामी तुलसीदास की विस्तृत समीक्षायें आती हैं। शुक्ल जी के आते ही हिन्दी आलोचना की काया पलट गयी। विद्वानों ने शुक्ल जी के आलोचना सम्बन्धी योगदान का मूल्यांकन विभिन्न प्रकार से किया है। एक विद्वान का कहना है कि “उपन्यास और नाटक के क्षेत्र में क्रमशः युगान्तकारी कार्य प्रेमचन्द्र और प्रसाद ने किया, वही कार्य आलोचना के क्षेत्र में शुक्ल जी ने किया। शुक्ल जी के आलोचनात्मक साहित्य का विश्लेषणात्मक अध्ययन करते हुए आचार्य नन्द दुलारे बाजपेयी ने लिखा है कि उन्होंने रस और अलंकार को नवीन मनोवैज्ञानिक दीप्ति प्रदान की और उन्हें ऊंची मानसिक भूमि पर ला उठाया। इस प्रकार रस और अलंकार हिन्दी समीक्षा से बहिष्कृत हो जाने से बच गये दूसरे शब्दों में शुक्ल जी ने समीक्षा के लिए भारतीय साँचे को बना रहने दिया।

शुक्ल जी ने आलोचना कार्य के लिए जायसी, सूर और तुलसी जैसे श्रेष्ठ रस सिद्ध कवियों को चुना और अपने भारतीय और यूरोपीय साहित्य के गम्भीर अध्ययन तथा वैज्ञानिक पद्धति के आधार पर उनके श्रेष्ठ काव्य सौन्दर्य का उद्घाटन किया। ऐसा करते हुए उन्होंने काव्य-सौन्दर्य के साथ रस और अलंकार का विन्यास करके रस सिद्धान्त को एक अपूर्व दीप्ति और गौरव प्रदान किया। इस सम्बन्ध में आचार्य नन्द दुलारे वाजपेयी ने बहुत ठीक लिखा है कि उन्होंने काव्य की स्थापना ऐसी ऊँची मानसिक संवेदना के स्तर पर ही की कि लोग यह भूल ही गये कि रसों एवं अलंकारों का दुरुपयोग भी हो सकता है। अपनी विवेचनात्मक एवं रचनात्मक आलोचना पद्धति के द्वारा उन्होंने भारतीय समीक्षा पद्धति को गौरव ही प्रदान नहीं किया, अपितु यह भी दावा किया कि भविष्य की समीक्षा का निर्माण इसी के आधार पर होना चाहिए।

शुक्ल जी ने भारतीय और पाश्चात्य समालोचना-सिद्धान्तों का गम्भीर अध्ययन एवं सुन्दर समन्वय करके हमारे सामने आलोचना का स्वतन्त्र मौलिक रूप प्रस्तुत किया। शुक्ल जी ने आलोचना करते समय एक बहुत बड़ा काम किया। उन्होंने कवियों के गुण-दोष विवेचना का कार्य बहुत कम किया, उन्होंने कवियों की विशेषताओं एवं उनकी अन्तः वृत्तियों के उद्घाटन पर विशेष बल दिया और इस प्रकार उन्होंने वैज्ञानिक समालोचना का रूप सफलतापूर्वक किया।

शुक्ल जी, जायसी, सूर और तुलसी जैसे उच्च कोटि के कवियों की प्रयोगात्मक समीक्षा में प्रवृत्त हुए। इस कारण उनकी आलोचना के पैमाने आप ही स्खलित होने से बचे हैं। (आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी)। हमारे विचार से आचार्य वाजपेयी यहाँ कुछ जल्दी कर गये। शुक्ल की मान्यतायें इतनी सुनिश्चित एवं सुदृढ़ थी कि उनके विचलित होने अथवा स्खलित होने का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता था। उनमें इतना नैतिक मनोबल भी था कि वह चाहे जब दो टूक बात भी कह सकते थे। उनकी कसौटी पर जो खरा उतरा उन्होंने अविलम्ब और निसंकोच एक ओर कर दिया। जिस व्यक्ति को सूरदास जैसे महाकवि को साधन पक्ष से विमुख कहते हुए संकोच नहीं हुआ, जिसने महाकवि केशव दास को धड़ल्ले के साथ ‘हृदयहीन’ कह दिया तथा रहस्यवाद और छायावाद को ‘नया ऊंट’ कहकर ही एक झटके में एक ओर बैठा दिया उस व्यक्ति के मान्यताओं के स्खलन का प्रश्न उठाना कुछ अजीब सा प्रतीत होता है। आगे चलकर स्वयं आचार्य बाजपेयी ने भी शुक्ल जी को दृढ़ एवं मौलिक चिन्ता धारा को इस प्रकार स्वीकार किया है- “उत्तानमूलक आदर्शवादी विचारणा से उनका सम्पर्क कभी नहीं छूटा है। शुक्ल जी के मान्यताओं का यही सही रूप है और दृष्टिकोण से हमें उसकी समीक्षा पद्धति का मूल्यांकन करना चाहिए।

समीक्षा के क्षेत्र में शुक्ल जी का योगदान बहुत ही महत्वपूर्ण है। समीक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान का मूल्यांकन करते हुए हमें उनकी निम्नलिखित उपलब्धियों दृष्टिगत होती हैं-

  1. आचार्य शुक्ल हिन्दी के सर्वप्रथम मौलिक और प्रौद आलोचक हैं। उन्हें हम हिन्दी आलोचना के वास्तविक स्वरूप के जन्मदाता कह सकते हैं। वस्तुतः आचार्य शुक्ल में ही सर्वप्रथम उस संगति के दर्शन हुए जो हिन्दी आलोचना सिद्धान्तों को किसी पाठ्य अथवा पाश्चात्य सिद्धान्त से नहीं, अपने लक्ष्य ग्रन्थों और सृजनशील चेतना से जोड़ती है। इसीलिए उन्हें मौलिक एवं उद्भावक ही नहीं, बल्कि हिन्दी आलोचना का जन्मदाता कहना सर्वथा युक्तिसंगत है। (डॉ0 जयचन्द राय)
  2. उन्होंने मौलिक सिद्धान्त विवेचन किया और आलोचना के क्षेत्र में स्वतंत्र चिन्तन का विकास किया। संक्षेप में शुक्ल जी ने हिन्दी में मौलिक शास्त्र का निर्माण किया। उन्होंने विषपर्यन्त लक्षण-ग्रन्थों की परम्परा को साहित्य शास्त्र की पदवी पर पहुँचाया, उसे आदर्शात्मक रूप दिया।

(आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी)

  1. शुक्ल जी ने भारतीय समीक्षा के आदर्श की प्रतिष्ठा की, शुक्ल जी ने रस और अलंकार को दीप्ति प्रदान की, रस सिद्धान्त को मनोवैज्ञानिक भूमि प्रदान की तथा तीन सौ वर्ष बाद साधारणीकरण का पुनरुत्थान किया। भारतीय समीक्षा शास्त्र के परम्परागत आदर्श की प्रतिष्ठा का श्रेय शुक्ल जी को ही है।
  2. शुक्ल जी के कविता के स्वरूप सौन्दर्य और उसकी शक्ति पर सर्वप्रथम मौलिक चिन्तन प्रस्तुत किया। शुक्ल जी के विवेचना के अभाव में कदाचित यह ध्यान बहुत बाद में आया कि भारतीय मनीषियों ने इस विषय में वैज्ञानिक पद्धति पर विचार किया था। उन्होंने सैद्धान्तिक विचारणा को गहरी मति व उत्तेजना प्रदान की। कविता के स्वरूप, शक्ति और सम्भावनाओं पर उन्होंने हिन्दी में पहली बार तलस्पर्शी एवं प्रौढ़ चिन्तन प्रस्तुत किया। (डॉ० रामेश्वर लाल खण्डेलवाल)
  3. उन्होंने सशक्त मौलिक व्याख्या द्वारा सैद्धान्तिक समीक्षा का सफल व्यावहारिक प्रयोग किया। आचार्य शुक्ल की व्यावहारिक समीक्षा ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं उल्लेखनीय विशेषता है- सैद्धान्तिक समीक्षा के सुनिश्चित आधार का निर्वाह। उन्होंने यह दिखा दिया कि व्यावहारिक समीक्षा में सुनिश्चित समीक्षा सिद्धान्तों के निर्वाह द्वारा पूर्ण और वैज्ञानिक आलोचना किस प्रकार प्रस्तुत की जाती है।
  4. लोकमंगल के सिद्धान्त के द्वारा उन्होंने समीक्षा के सामाजिक सम्पर्क की स्थापना की। उनका यह सिद्धान्त भारतीय वर्णाश्रम की श्रेष्ठता, कर्तव्यों के निर्वाह और लोकादर्श वाद पर आधारित है। शुक्ल जी साहित्य और जीवन को अन्योन्याश्रित मानते थे। वह लोक जीवन में विमुख काव्य की कल्पना कर ही नहीं सकते थे। यथा ‘मनुष्य लोकबद्ध प्राणी है। उसकी अपनी सत्ता का ज्ञान बद्ध है।” तथा सच्चा कवि वही है जिसे लोक हृदय की पहिचान हो।

शुक्ल जी यद्यपि रसवादी थे, तथापि वह रससिद्ध अथवा आनन्द की प्राप्ति को ही काव्य का लक्ष्य अथवा सर्वस्व नहीं मानते थे। इसको लेकर यदि कुछ लोग शुक्ल जी पर यह आरोप लगाते हैं कि उनका दृष्टिकोण एकांगी समाजशास्त्रीय है, तो इसका कोई इलाज नहीं है। इस आधार पर शुक्ल जी की जो देन है, उसको डॉ० रामविलास शर्मा ने बहुत ही अच्छी तरह से स्पष्ट किया है- “लोक हृदय में लीन होने की कसौटी रखकर उन्होंने हर तरह की संकुचित व्यक्तिवादी और भाग्यवादी धारणाओं से साहित्य को मुक्त करके उसे सामाजिक जीवन का एक अंग बना दिया।

  1. शुक्ल जी ने हिन्दी आलोचना में पहली बार रचनाकार की अन्तरवृत्तियों, उसके मानस विश्लेषण की महत्ता का प्रतिपादन किया। सूर की आलोचना में मानव अन्तः प्रकृति और गोस्वामी तुलसीदास की आलोचना में भक्ति के नाना सूक्ष्मातिसूक्ष्म उपादानों का विश्लेषण इसी पद्धति पर किया गया है।
  2. आलोचना करते समय इन्होंने समीक्षा के सब अंगों का समान रूप से विन्यास किया। उन्होंने काव्य के सभी अंगों पर विचार किया है तथा सभी प्रकार की समीक्षा पद्धतियों का सफलतापूर्वक प्रयोग किया।

कुछ लोगों ने शुक्ल जी के ऊपर अत्यधिक, गम्भीरता, नैतिक विचारणा के प्रति अत्यन्त आग्रह तथा व्यक्तिगत रुचि का आरोप लगाया है। हमारे विचार से इसे उनका गुण ही माना जाना चाहिए। उन्होंने एक बार जो सिद्धान्त निश्चित कर लिया, उनका उन्होंने पूरी निष्ठा और कड़ाई के साथ पालन किया। इस प्रकार हमें कहीं भी उनकी कथनी और करनी के मध्य अन्तर नहीं दिखाई देता है।

निष्कर्ष-

समीक्षा के क्षेत्र में शुक्ल जी का स्थान बहुत ऊँचा है। उन्होंने इस क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन किया। वह नये युग की समीक्षा के प्रायः विधाता ही थे। आज के समीक्षकों के लिए उनका यह सन्देश समझना चाहिए कि साहित्य समीक्षक को सभी अंगों पर दृष्टि रखनी चाहिए। साहित्य की समीक्षा किसी एक अंग या पहलू पर समाप्त नहीं हो जानी चाहिए।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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