समाज शास्‍त्र / Sociology

सामाजिक परिवर्तन का अर्थ | सामाजिक परिवर्तन की परिभाषा | सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तन में अन्तर

सामाजिक परिवर्तन का अर्थ | सामाजिक परिवर्तन की परिभाषा | सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तन में अन्तर

सामाजिक परिवर्तन का अर्थ

समाज एक परिवर्तनशील व्यवस्था है। परिवर्तन प्रकृति का नियम है। निश्चित रूप से प्रत्येक वस्तु में परिवर्तन होता है और यह परिवर्तन निश्चित समय सीमा में होता है। देखा जाए तो दार्शनिक लहजे में, प्रत्येक दिन हर व्यक्ति के लिए नया होता है और इस अर्थ में प्रत्येक क्षण नया होता है। यूनानी दार्शनिक हेराविलटज का यह कहना सही है कि “एक व्यक्ति कमी भी एक ही नदी में दो बार दुबकी नहीं लगा सकता है।” उसके लिए ऐसा करना ही दो कारणों में असंभव है- पहला तो यह कि दूसरी बार डुबकी लगाते समय व्यक्ति पहली बार जैसा नहीं रहता। उसके विचार, दृष्टिकोण आदि बदल जाते हैं और दूसरा यह कि स्वयं व्यक्ति पहली बार जैसा नहीं रहता। उसके विचार दृष्टिकोण आदि बदल जाते हैं और दूसरा वह कि स्वयं नदी का पानी भी प्रवाहमान है। जो पानी वह गया, वापस नहीं आता। वस्तुतः व्यक्ति और नदी दोनों ही बदल जाते हैं। हेराक्लिटज के इस दर्शन का केन्द्र यही है कि संसार में प्रत्येक वस्तु बदलती रहती है। परिवर्तन सृष्टि का नियम है। यह चिरंतन है।

इस दर्शन के प्रतिकूल एक और दर्शन है जिसका प्रतिपादन परमेनिडीज ने किया है। इस दार्शनिक का मत है कि परिवर्तन एक भ्रम है, एक धोखा है । समाज में प्रत्येक वस्तु ज्यों की त्यों रहती है, वह अपरिवर्तनशील है। फिर भी यह एक सार्वभोमिक सत्य है कि परिवर्तन प्रकृति का नियम है। कोई भी वस्तु स्थिर नहीं है। ग्रीन का कहना है कि , परिवर्तन इसीलिए होता है क्योंकि प्रत्येक समाज असंतुलन के निरंतन दौर से गुजर रहा है। कुछ व्यक्ति एक संपूर्ण संतुलन की इच्छा रखते हैं तो कुछ इसके लिए प्रयास भी करते हैं।

सामाजिक परिवर्तन मुख्य रूप से समाज के तीन पक्षों को प्रभावित करता है-

(1) समूह के व्यवहार में परिवर्तन

(2) सामाजिक संरचना में परिवर्तन तथा

(3) सांस्कृतिक विशेषताओं में परिवर्तन।

जब हम सामाजिक परिवर्तन की किसी भी प्रक्रिया में परिवर्तन की बात करते हैं तो हमारा तात्पर्य उपरोक्त तीनों पक्षों में होने वाले बदलाव से है। इस प्रकार, किसी वस्तु में दो समय में दिखाई देने वाली भिन्नता ही परिवर्तन है। परिवर्तन का संबंध प्रमुख रूप से तीन बातों से है- वस्तु, समय एवं भिन्नता।

सामाजिक परिवर्तन की परिभाषा

एंथोनी गिडिग्स- प्रत्येक सामाजिक संरचना में एक अंतर्निहित संरचना होती है। इस अन्तर्निहित संरचना में जब परिवर्तन आता है तो इसे सामाजिक परिवर्तन कहते हैं।

मैकाइवर व पेज- सामाजशास्त्री होने के नाते हमारा प्रत्यक्ष संबंध केवल साजाजिक संबंधों से हैं। और उसमें आए हुए परिवर्तन को हम सामाजिक परिवर्तन कहते हैं।

किंग्सले डेविस (Human Society)-  सामाजिक परिवर्तन से हमारा अभिप्राय उन परिवर्तनों से है जो सामाजिक संगग अर्थात् समाज की संरचना और कार्यों में उत्पन्न होते हैं।

डासन एवं गेटिस के अनुसार- “सांस्कृतिक परिवर्तन ही सामाजिक परिवर्तन है।”

जिन्सबर्ग के अनुसार- सामाजिक परिवर्तन का अभिप्राय सामाजिक ढाँचे में परिवर्तन अर्थात् समाज के आकार, इसके विभिन्न अंगो अथवा इसके संगठन की प्रकृति और संतुलन में होने वाले परिवर्तन से हैं।

बोटोमोर के शब्दों में- “सामाजिक परिवर्तन में हम उन परिवर्तनों को सम्मिलित करते हैं जो सामाजिक संरचना, सामाजिक संस्थाओं अथवा उनके पारस्परिक संबंधो में घटित होता है।

जोन्स के अनुसार- सामाजिक परिवर्तन वह शब्द है जिसका प्रयोग सामाजिक प्रक्रियाओं, सामाजिक प्रतिमानों, सामाजिक अंतक्रियाओं और सामाजिक संगठन के किसी भी पक्ष में होने वाले परिवर्तन को समझने के लिये किया जाता है।

गिलिन व गिलिन के शब्दों में- सामाजिक परिवर्तन का अर्थ जीवन की स्वीकृत विधियों में परिवर्तन से है। चाहे ये परिवर्तन भौगोलिक दशाओं के कारण हो, सांस्कृतिक उपकरणों, जनसंख्या के रूप में अथवा विचारों के कारण हो अथवा समूह में आविष्कार या संस्कृति के प्रसार से उत्पन्न हो।

मैरिल तथा एल्ड्रिजः- मानव क्रियाओं में परिवर्तन को सामाजिक परिवर्तन कहते हैं। आपके अनुसार-“जब मानव व्यवहार में बदलाव की प्रक्रिया में होता है तब हम उसी को दूसरे रूप में सामाजिक परिवर्तन कहते हैं।”

उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि परिवर्तन एक व्यापक प्रक्रिया है। समाज के किसी भी क्षेत्र में विचलन को सामाजिक परिवर्तन कहा जा सकता है विचलन का मतलब यहाँ खराब या असामाजिक नहीं है। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक, नैतिक, भौतिक , आदि सभी क्षेत्रों में होने वाले किसी भी प्रकार के परिवर्तन को सामाजिक परिवर्तन कहा जा सकता है। अतः सामाजिक परिवर्तन वह स्थिति है जिसमें समाज द्वारा स्वीकृत संबंधो, संस्थाओं, सामाजिक रुचि तथा विचारों का रूप परिवर्तित हो जाते हैं।

सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवर्तन में अन्तर

(1) सामाजिक परिवर्तन मात्र सामाजिक संबंधो में होने वाला परिवर्तन है। जबकि सांस्कृतिक परिवर्तन धर्म, ज्ञान, विश्वास, कला, साहित्य, प्रथा , कानून आदि सभी क्षेत्रों में होने वाले परिवर्तन है।

(2) सामाजिक परिवर्तन में सामाजिक संरचना में परिवर्तन का बोध होता है, जबकि सांस्कृतिक परिवर्तन से संस्कृति के विभिन्न पक्षों में होने वाले परिवर्तनों का बोध होता है।

(3) सामाजिक परिवर्तन चेतन एवं अचेतन दोनों परिवर्तनों के परिणामस्वरूप उत्पन्न होता है, जबकि सांस्कृतिक परिवर्तन प्रायः सचेत प्रयत्नों से घटित होता है।

(4) सामाजिक परिवर्तन की गति काफी तीव्र भी हो सकती है, जबकि सांस्कृतिक परिवर्तन की गति अपेक्षाकृत कम तीव्र होता है। इसका तात्पर्य यह है कि सामाजिक संबंधो में परिवर्तन तेजी से भी हो सकता है जबकि धर्म, विश्वास जीवन के मूल्यों आदि में परिवर्तन धीमी रफ्तार से होता है।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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