समाज शास्‍त्र / Sociology

सामाजिक उद्विकास | सामाजिक उद्विकास की परिभाषा | सामाजिक उद्विकास की विशेषतायें | डार्विन का जैवकीय उद्विकास का सिद्धान्त | स्पेंसर का सामाजिक उद्विकास का सिद्धान्त

सामाजिक उद्विकास | सामाजिक उद्विकास की परिभाषा | सामाजिक उद्विकास की विशेषतायें | डार्विन का जैवकीय उद्विकास का सिद्धान्त | स्पेंसर का सामाजिक उद्विकास का सिद्धान्त

सामाजिक उद्विकास

एवोल्यूशन’ (Evolution) शब्द की उत्पत्ति लेटिन भाषा के ‘एवोल्वर’ (evolvere) शब्द से मानी जाती है। लेटिन के ‘एवोल्वर’ का अर्थ होता है प्रकट करना अथवा उन्नति करना। इस प्रकार ‘एवोल्यूशन से हमारा आशय उस परिवर्तन से है जो कि किसी वस्तु के आन्तरिक गुणों का प्रकट होना अथवा विकसित होना, उस वस्तु को सरलता से जटिलता की ओर ले जाता है तथा उसके आकार एवं स्वरूप में परिवर्तन लाता है। सभी अन्तर्निहित गुण एवं अंग-प्रत्यंग प्रकट होकर स्पष्ट हो जाते हैं। चूंकि यह परिवर्तन मूल्य रहित होता है इसलिए किसी वस्तु में होने वाला परिवर्तन अपनी मनचाही दिशा ग्रहण कर सकता है। उद्विकास की गति बहुत कुछ उसके आन्तरिक गुणों के विकास एवं प्रकृति पर निर्भर करती है। जब हम उद्विकास शब्द का प्रयोग समाज के संदर्भ में करते हैं तो इसे सामाजिक उद्विकास की संज्ञा देते हैं। समाज विभिन्न प्रकार के सामाजिक सम्बन्धों का जाल एवं संस्थाओं की समग्रता की ओर संकेत करता है। जब सामाजिक प्राणियों के बीच बनने वाले सामाजिक सम्बन्धों का विस्तार होने लगता है तथा सामाजिक संस्थायें अपने सरलतम रूप से जटिलता की ओर अग्रसर होती हैं तो हम उसे सामाजिक उद्विकास (Social Evolution) की संज्ञा देते हैं।

सामाजिक उद्विकास की परिभाषा

स्पेन्सर (Spencer) का कथन है उद्विकास तत्व का समन्वय एवं गति है जिससे कि वह तत्व अनिश्चित असम्बद्ध समानता से निश्चित सम्बद्ध विभिन्नता में बदल जाता है।

मैकाइबर और पेज (Maciver and Page)-  उद्विकास की परिभाषा देते हुए लिखते हैं, “सामाजिक उद्विकास वह प्रक्रिया है जिसमें अन्तर्निहित लक्षण अपने आपकी धीरे-धीरे प्रकट करते हैं। संरचनात्मक या प्रकार्यात्मक दृष्टिकोण से यह एक गुणात्मक प्रक्रिया है।”

आपके मतानुसार सामाजिक व्यवस्था के ये गुण या लक्षण आन्तरिक व्यवस्था के अनुसार प्रकट होते हैं न कि किसी वाह्य व्यवस्था के अनुसार और इस व्यवस्था के अनुसार प्रत्येक चीज सरलता से जटिलता में परिवर्तन होती जाती है।

जिन्सबर्ग (Ginsberg) लिखते हैं, “सामाजिक उद्विकास परिवर्तन की वह प्रक्रिया कही जायेगी जो किसी वस्तु में नवीनता पैदा करती है और संक्रमण की निरन्तरता को प्रकट करती हैं।”

ई.एन. हाऊस (E. N. House)- समाजशास्त्र के शब्दकोष में हाऊस लिखते हैं, “सामाजिक उद्विकास नियोजित एवं अनियोजित विकास है जो कि संस्कृति या सामाजिक सम्बन्धों के स्वरूपों अथवा सामाजिक अन्तःक्रियाओं के स्वरूप में होता है।”

सामाजिक उद्विकास की विशेषतायें

उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर हम सामाजिक उद्विकास के बारे में निम्न निष्कर्ष निकाल सकते हैं-

(1) सामाजिक उद्विकास परिवर्तन का एक स्वरूप है।

(2) सामाजिक उद्विकास में निरन्तरता की मात्रा होती है।

(3) निरन्तरता के साथ ही सामाजिक उद्विकास में दिशा भी निश्चित होती है।

(4) सामाजिक उद्विकास वस्तुओं के आन्तरिक गुणों को प्रकटन से सम्बन्धित हैं।

(5) गुणों के प्रकट होने पर वस्तु सरलता से जटिलता की ओर अग्रसर होती है।

(6) सामाजिक उद्विकास का सम्बन्ध सामाजिक ढाँचा, सामाजिक सम्बन्धों या अन्तःक्रियाओं में होने वाले परिवर्तनों से होता है जिसका कारण आन्तरिक शक्ति होती है न कि वाह्य शक्तियाँ।

(7) सामाजिक उद्विकास की प्रक्रिया विभिन्न स्तरों से होकर गुजरती है।

डार्विन का जैवकीय उद्विकास का सिद्धान्त

डार्विन (Darwin) ने उद्विकास सिद्धान्त (theory of Evolution) का प्रतिपादन 19वीं शताब्दी में किया। आपने बताया कि प्रकृति में केवल वही पदार्थ जीवित रह जाते हैं जो इतने सक्षम हैं कि अपने अस्तित्व के लिए अन्य समान पदार्थों र्या जीवों से संघर्ष कर सकते हैं, जो जीव अपने पर्यावरण से अनुकूलन कर पाते हैं वह जीवित रहते हैं तथा वे जो इस अनुकूलन में पिछड़ जाते हैं संघर्ष में नष्ट हो जाते हैं। इस संघर्ष में जीवित रहने के लिए जीवों की आन्तरिक विशेषतायें एवं क्षमतायें और भी स्पष्ट एवं प्रकट होने लगती हैं जिसके कारण समरूपता के स्थान पर विभिन्नता एवं सरलता के स्थान पर जटिलता आती है। जीवन में निरन्तर गतिशीलता का जन्म होता है।

इस प्रकार डार्विन (Darwin) के सिद्धान्त का एक आवश्यक तत्व प्राकृतिक प्रवरण (Natural Selection) भी है। प्रकृति के अपने नियम एवं दशायें हैं तथा प्राकृतिक पर्यावरण में अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए जीव के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने अन्दर इस प्रकार की क्षमतायें पैदा करे जो प्राकृतिक दशाओं के साथ उसके सफल अभियोजन (adjustment) में योग दें। यदि जीव ऐसा नहीं करता तो प्रकृति का उसका चयन (Selection) कर उसे समाप्त (eliminate) कर देती है। इस प्रकार सबसे योग्य ही जीवित रहते हैं (Survival of the gittest)और “प्राकृतिक प्रवरण के सिद्धान्त” (Theory of Natural Selection) के आधार पर आपने जीवों को समानता से असमानता, सरलता से जटिलता, अनश्चितता से निश्चितता एवं समरूपता से विषमता की ओर बढ़ते हुए बताया। आपके उद्विकासीय सिद्धान्त की ओर भी संक्षेप में, हम निम्न प्रकार से स्पष्ट कर सकते हैं-

(1) प्रारम्भ में जीव बड़ा सरल होता है किन्तु धीरे-धीरे जब उसके आन्तरिक गुणों का विकास होता है तो वही बड़ा जटिल हो जाता है। विभिन्न अंग अलग-अलग स्पष्ट होने लगते हैं और समग्रता (Totality) का विभिन्न भागों में विकास होने लगता है। जैसे प्रारम्भ में बीज एक अभिन्न समग्रता होता है किन्तु बाद में उसमें अंकुर निकलता है, जड़ें फैलती हैं, पत्तियों का जन्म होता है और धीरे-धीरे शाखाओं आदि के विकास के पश्चात वह बीज एक पूर्ण विकसित वृक्ष बन जाता है।

(2) जैसे विभिन्न अंगों का विकास होता जाता है, उन अंगों के कत्त कार्यों का भी निर्धारण होता जाता है जड़ें पृथ्वी से शक्ति खींचती हैं, पत्तियाँ वायु एवं गर्मी को खींचती है तथा भोजन को एकत्रित करता है एवं शाखायें उसे वितरित करती हैं। एक अंग एक निश्चित कार्य ही सम्पादित करता है।

(3) जैसे-जैसे अंगों में कार्यों का विभाजन होता जाता है वे एक दूसरे पर और भी निर्भर होते जाते हैं। पेड़ के सभी अंग आपस में अन्तः निर्भर होते हैं। यही बात मानव शरीर के बारे में कहा जा सकती है। किसी भी अंग में लगने वाली चोट सम्पूर्ण शरीर को व्यथा(दर्द) प्रदान करती है।

(4) उद्विकास की प्रक्रिया निरन्तर चला करती है भले ही बाहर से देखने पर स्पष्ट न हो। घर में बच्चे निरन्तर बढ़ा करते हैं भले ही आप उसे न समझ सकें।

(5) उद्विकास की प्रक्रिया विभिन्न निश्चित स्तरों से होती हुई आगे बढ़ती है। जैसे बीज क्रमशः अंकुर,पत्तियों एवं जड़ों के विकास के पश्चात् एक छोटा पौधा और फिर एक वृक्ष का रूप ले लेता है। इसी प्रकार मानव पहले बालक, युवक, प्रौढ़, और तब वृद्धावस्था को प्राप्त करता है।

अब हम डार्विन (Darwin) के जैवकीय उद्विकास के आधार पर सामाजिक उद्विकास के सिद्धान्त को स्पष्ट करने का प्रयास करेंगे।

स्पेंसर का सामाजिक उद्विकास का सिद्धान्त

स्पेन्सर (Spencer) ने डार्विन (Darwin) के जैवकीय उद्विकास के सिद्धान्त के आधार पर सामाजिक उद्विकास केसिद्धान्त का प्रतिपादन किया। आपने यह निष्कर्ष निकाला कि उद्विकास के विभिन्न नियम एवं दशायें समाज एवं संस्कृति पर भी समान रूप से लागू हो सकती हैं। इस सन्दर्भ में हम स्पेन्सर के विचारों को निम्न प्रकार से स्पष्ट कर सकते हैं।

स्पेन्सर (Spencer) का कथन है। कि मानव जीवन की प्रारम्भिक अवस्था में समाज अत्यन्त सरल था। मानव की सीमित आवश्यकताओं थीं एवं उसके सामाजिक सम्बन्धों का क्षेत्र भी बहुत सीमित था।इसी कारण सामाजिक जीवन के विभिन्न पक्षों से संस्थाओं का स्वरूप भी अत्यन्त सरल एवं सीधा सादा था। विवाह, परिवार, धर्म, आर्थिक व्यवस्था एवं प्रशासन का स्वरूप सरल था। किन्तु धीरे-धीरे जब सभ्यता का विकास हुआ सामाजिक सम्बन्धों का दायरा विस्तृत हुआ, सामाजिक जीवन में जटिलता का समावेश हुआ। व्यक्ति जो कि हरफन मौला (Jack of all trades) हुआ करता था अब विशेष प्रकृति के कार्यों र्को करने लगा। दूसरी ओर परिवार, धर्म, राज्य तथा शैक्षिक सांस्कृतिक एवं आर्थिक इकाइयों का जन्म हुआ जो अपने- अपने क्षेत्र विशेष के कार्यों के ही सम्पादन को अपना मुख्य विषय समझने लगी।

सामाजिक उद्विकास के द्वितीय चरण में समाज विभिन्न कार्यों र्को लेकर विभेदीकृत हो जाता है। श्रम के विभाजन का अस्तित्व पैदा हो जाता है। प्रत्येक सामाजिक संस्था अपने को एक विशेष कार्य से सम्बन्धित करने लगती है। जैसे राज्य प्रशासन का कार्य करेगा, विद्यालय शिक्षा का और परिवार मानव के सामाजीकरण का। ऐसा नहीं हो सकता कि परिवार का कार्य राज्य करे तथा राज्य का कार्य परिवार।

तृतीय स्तर में श्रम का विभाजन और भी स्पष्ट हो जाता है। तथा एक ही प्रकार का कार्य करने कारण व्यक्ति और संस्थाओं को एक विशेषीकृत ज्ञान प्राप्त हो जाता है। परन्तु जितनी ही विशेषीकरण की मात्रा बढ़ती जाती है व्यक्ति उतना ही दूसरों पर और अधिक निर्भर होता जाता है। इस प्रकार समाज में अन्तःनिर्भरता की मात्रा बढ़ती है। इसी आधार पर स्पेंसर ने कहा है कि उद्विकास तत्व का समन्वय एवं गति है जिससे कि वह तत्व अनिश्चित, असम्बद्ध समानता से निश्चित सम्बद्ध विभिन्नता में बदल जाता है।

इसके अतिरिक्त स्पेन्सर (Spener) यह भी मानते हैं कि सामाजिक उद्विकास की प्रक्रिया में निरन्तरता की मात्रा पाई जाती है। यह इस निरन्तरता का ही परिणाम है कि आदिम सरलतम समाज आज जटिल समाज में रूपान्तरित हो गया है। सामाजिक उद्विकास की प्रक्रिया विभित्र स्तरों में काम करती है। आशय यह हैकि आदिमकाल का पशुवत मानव एकाएक आधुनिक युग का सभ्य मानव नहीं बन गया है बल्कि आखेट, चारागाह, कृषि आदि स्तरों को पार कर आज वह औद्योगिक अवस्था में आ सका है।

इस प्रकार स्पेन्सर ने यह बताने का प्रयास किया कि प्राचीनकाल का समाज अत्यन्त सीधा सादा एवं जीवन सरल था किन्तु धीरे-धीरे उसके विभिन्न अंगों का विकास हुआ, श्रम विभाजन का सिद्धान्त लागू हुआ और तब विशेषीकरण का युग आया। इस प्रकार एक ओर विशेषीकरण तो दूसरी ओर पारस्परिक अन्तःनिर्भरता की मात्रा में वृद्धि हुई।

मैकाइवर तथा पेज (Maciver and Pager)-  ने आदिम समाजों के उद्विकास के तीन स्तरों की व्यख्या की है-

(1) सामुदायिक प्रथायें (Communal Customs)-  प्रथायें ही आदिम समाजों में सामाजिक नियंत्रण में मुख्य भूमिका अदा करती थी। परिवार, राज्य, धार्मिक, पारिवारिक तथा सांस्कृतिक सभी पक्ष इन्हीं सामुदायिक प्रथाओं के द्वारा नियंत्रित थे।

(2) विभेदीकृत सामुदायिक संस्थायें (Differentiated Communal Institutions)-  जीवन के सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं राजनैतिक पक्षों को नियंत्रित एवं निर्देशित करने के लिए विशिष्ट और अलग-अलग संस्थाओं का अस्तित्व पैदा हुआ।

(3) विभेदीकृत समितियाँ (Differentiated Association)- समितियाँ विभिन्न प्रकार के उद्देश्यों के साधन के रूप में कार्य करने लगीं।

आलोचना (Criticism)-  

सामाजिक उद्विकास के सिद्धान्त का सूक्ष्म निरीक्षण करने (Productive force) पर हमें कुछ दोष भी दिखलाई पड़ते हैं। यह सिद्धान्त विज्ञान तथा उसके आविष्कारों के प्रति कोई रूचि प्रदर्शित नहीं करता जबकि मानव जीवन के विकास का बहुत कुछ रहस्य विज्ञान की उपलब्धियों में छिपा है। इसके अतिरिक्त जिस प्रकार के स्तरों की व्याख्या की गई है इस सत्य को हम किसी भी समाज के ऊपर जबरदस्ती नहीं थोप सकते। कुछ समाज इसके अपवाद स्वरूप भी हैं जहाँ कृषि करने का स्तर वर्णित है परन्तु वे पशुपालक भी थे अथवा नहीं, कहा नहीं जा सकता। इसके अलावा संस्कृति के प्रसार एवं व्यक्ति के सामाजिक सम्बन्धों के विस्तार को भी लेकर विचारक नगण्य मानते हैं जबकि ऐसा नहीं है। समाज के विकास में व्यक्ति के योगदान को स्वीकार करना सत्यता का गला घोंटना है।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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