इतिहास / History

तामिल संस्कृति तथा आर्य संस्कृतियों का सम्मिलन | तामिल संस्कृति के प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

तामिल संस्कृति तथा आर्य संस्कृतियों का सम्मिलन | तामिल संस्कृति के प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

तामिल संस्कृति तथा आर्य संस्कृतियों का सम्मिलन

एक लम्बे समय तक, भौगोलिक परिस्थितियों के कारणवश पृथक् रहने के पश्चात् जब तामिल और आर्य संस्कृतियों ने एक-दूसरे को गले लगाया, तो भारतीय संस्कृति को अनेक नवीन उपलब्धियों की प्राप्ति हुई। अनेक जनश्रुतियों से विदित होता है कि तामिल प्रदेश में आर्य संस्कृति की निधि को लेकर अगस्त्य ऋषि आये थे। अगस्त्य ऋषि का समय उत्तर वैदिक युग के लगभग माना जाता है। ‘रामायण’ महाकाव्य से विदित होता है कि भगवान राम इस प्रदेश में आये थे। अगस्त्य ऋषि तथा अन्य अनेक वैदिक ऋषि मुनियों के प्रयत्नों के फलस्वरूप लगभग 400 वर्ष ई०पू० में आर्य संस्कृति ने तामिल प्रदेश में भलीभाँति प्रवेश कर लिया था। इस समय तक बौद्ध तथा जैन धर्म भी यहाँ पर अपना विस्तार कर रहे थे। प्राचीन समय में काँची को ब्राह्मणों का नगर कहा जाता था। साहित्य का ‘संगम’ क्षेत्र मदुरा में ब्राह्मण, जैनियों तथा बौद्धों के प्रभाव होने के कई प्रमाण मिलते हैं। पल्लव काल के आगमन तक तो काँची में संस्कृत विश्वविद्यालय की भी स्थापना हो चुकी थी। इन समस्त प्रमाणों के आधार पर हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि तामिल प्रदेश में आर्य संस्कृति ने काफी विस्तार कर लिया था।

प्रभाव

प्रारम्भ में आर्य संस्कृति ने तामिल प्रदेश में शस्त्र बल के आधार पर प्रवेश नहीं किया था। परन्तु बाद में मौर्यों तथा गुप्तों ने अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा के परिणाम स्वरूप इस क्षेत्र की ओर सैनिक प्रयाण किया था। यद्यपि मौर्य अधिक समय तक इस क्षेत्र में अपना प्रभाव नहीं रख पाये तथापि उनका राजनैतिक प्रभाव अवश्य बना रहा। आर्यों का तामिल प्रदेश से सम्बन्ध स्थापित होने पर यहाँ संस्कृत भाषा गहरा प्रभाव जमाया। यद्यपि तामिल वर्णमाला संस्कृत के समान नहीं है तथापि उसके उच्चारण में संस्कृत का प्रभाव आज भी अनुभव किया जा सकता है। इस प्रकार आर्यों ने तामिल भाषा पर विशेष प्रभाव डाला। जहाँ तक धार्मिक प्रभाव का प्रश्न है, हम कह सकते हैं कि इस क्षेत्र में आर्यों ने तामिल प्रभाव को शिवोपासना के रूप में ग्रहण किया परन्तु स्वयं अपने धार्मिक विचारों द्वारा प्राचीन तामिल धार्मिक विश्वासों को ऊपर से नीचे तक अपने प्रभाव में ले लिया। जबकि यह सत्य नहीं है तब भी प्रायः ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि तामिल धर्म शुरू से वैदिक धर्म के समान रहा हो। अतः हम कह सकते हैं कि आर्य-तामिल संस्कृति के सम्मिलन द्वारा तामिलों पर आर्य धार्मिक विश्वासों का बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा।

तामिल संस्कृति के प्रमुख ऐतिहासिक स्थल

कोलडिहवा पुरास्थल (24° 54 उ०; 82°2′ पू०) इलाहाबाद से दक्षिण पूर्व दिशा में 85 किमी की दूरी पर मेजा तहसील में बेलन के बायें तट पर स्थित है। यह पुरास्थल 500 x 200 मीटर (पूर्व-पश्चिम) विस्तृत रहा होगा, किन्तु बेलन नदी तथा उसके सहायक नालों के निरन्तर अपरदन के फलस्वरूप अब यह अनेक छोटे-छोटे टीलों में विभक्त हो गया है। कालानुक्रम को जानने के उद्देश्य से यहाँ पर अत्यन्त सीमित उत्खनन किया गया था जिसके फलस्वरूप तीन सांस्कृतिक स्तर प्रकाश में आए जो नीचे से ऊपर क्रमशः नवपाषाणिक, ताम्रपाषाणिक तथा लौहयुगीन थे। 45 से०मी० के नव पाषाणिक जमाव से ज्ञात हुआ कि यहाँ की नवपाषाणिक संस्कृति के लोग हस्त निर्मित, मृद्भाण्ड घर्षित उपकरणों, गोलाकार समन्तान्त के छोटी कुल्हाड़ियों, नवपाषाणिक ब्लेड तथा लघु पाषाणोपकरणों का उपयोग करते थे। पात्र परम्परा मुख्यतया तीन प्रकार की थी। डोरीछाप (Cord Impressed) खुरदरी(Rustricated) तथा ओपदार (Burnished ware) थी। यहाँ के उत्खनन की महत्वपूर्ण खोज पालतू प्रकार का चावल (Domesticated rice) था जिसका परीक्षण विष्णुमित्रे तथा ते-जु-चांग (Te- Tzu-Chang) ने किया था। धान तथा भूसी के निशान यहाँ से प्राप्त पात्रों में मिले थे। यहां से तीन कार्बन तिथियाँ उपलब्ध हैं जो क्रमशः इस प्रकार हैं – 6570 + 210 ई०पू०, 5440 + 240 ई०पू० 4530 + 185 ई०पू० । उत्खनन योग्य स्थान के अभाव के कारण यहाँ पर विस्तृत उत्खनन नहीं किया जा सका। अतः निकटवर्ती महगड़ा में विस्तृत उत्खनन किया गया।

महगड़ा

महगड़ा इलाहाबाद की मेजा तहसील में इलाहाबाद से 85 कि०मी० की दूरी पर, नवीन तथा बूढ़ी बेलन के संगम के पश्चिम में कोलडिहवा के सामने, नई बेलन धारा के बायें तट पर स्थित है। चोपानी माण्डों से यह दक्षिण पश्चिम दिशा में 3 कि०मी० की दूरी पर है।

महगड़ा पुरास्थल लगभग अण्डाकार है, तथा इसका क्षेत्र विस्तार लगभग 8,000 वर्ग फीट है। इसके दक्षिण-पूर्व में बूढ़ी बेलन तथा दक्षिण पश्चिम में नई धारा है। इसके अतिरिक्त सभी दिशाओं में यह एक प्राकृतिक कटक (Ridge) से सुरक्षित है।

यह पुरास्थल 1975-76 में प्रकाश में आया था। 1976 से 1978 तक यहाँ पर क्षैतिज उत्खनन किया गया। जिससे यहाँ की नवपाषाणिक संस्कृति पर समुचित प्रकाश पड़ता है। यह उल्लेख्य है कि महगड़ा एकाकी सांस्कृतिक स्थल(Single Culture Site) है। इसका सांस्कृतिक जमाव 2.60 मी० था।

नवपाषाणिक काल में यहाँ के लोग गोलाकार अथवा अण्डाकार झोपड़ियों में रहते थे जिनका व्यास 4.30 से 6.40 मी० होता था। झोपड़ियों के फर्श के किनारे-किनारे स्तम्भगर्त मिले हैं,जिससे अनुमान किया जाता है कि स्तम्भों के ऊपर सरकण्डों तथा घासफूस के छाजन बनाते थे। छाजन के नीचे के भाग में भी स्तम्भ गर्त मिले हैं। दीवालें भी टट्टर से बनायी जाती थीं। खपच्ची, सरकण्डे तथा घासफूस लगाकर उस पर मिट्टी से दोनों ओर प्लास्टर करते थे। दो या तीन झोपड़ियों के समूह एक पास मिलते हैं। इनमें से प्रायः एक छोपड़ी रहने के लिए तथा अन्य भोजन बनाने अथवा अन्य कार्यों के लिये प्रयुक्त होती थी। झोपड़ों के फर्श पर मृद्भाण्ड, पशुओं की हड्डियाँ, सिल लोढ़ें, लघुपाषाणोपकरण तथा कुल्हाड़ियाँ आदि मिले हैं।

ये अपने उपकरणों के निर्माण के लिए बसाल्ट, ग्रेनाइट तथा क्वाइट का उपयोग करते थे। इनकी कुल्हाड़ियाँ छोटी, गोलाकार समन्तात की आयताकार अथवा प्रलम्ब अण्डाकार अनुभाग की पूर्णतया ओपदार होती थी। यह उल्लेख्य है कि आवासीय क्षेत्र में कोई उद्योग स्थल नहीं प्राप्त हुआ है। दक्षिण भारत के त्रिकोणात्मक प्रकार की कुल्हाड़ी उत्खनन से प्राप्त नहीं हुई। इनके अतिरिक्त सिल-लोढ़े हथौड़ा-पत्थर (Hammer) तथा पूर्ण निर्मित उपकरणों यथा समानन्तर द्विबाहुब्लेड (Parallel sided blades) भूथड़े पार्श्वब्लेड (Blunted back blades) दन्तुरित ब्लेड Serrated blades), तिरछा पान्ति ब्लेड (Penknife blades), शर (Points), बेधक (Borer), स्क्रेपर (Scraper), त्रिकोण (Triangle), समलम्ब चतुर्भुज (Trapeze), अर्धचान्द्रिक (Lunate) तथा ट्रांचेट (Tranchet) आदि मिले हैं। इनके अतिरिक्त लघुपाषाणोपकरण जिनमें उपकरणों के अतिरिक्त ब्लेड, कोर तथा अनुपयोजित प्रस्तर सामग्री भी प्राप्त हुई है। इनके निर्माण के लिए चाल्सेडनी, चर्ट, अगेट, कार्नेलियन, क्वार्ट्ज तथा क्रिस्टल आदि का उपयोग किया गया था। इनके अतिरिक्त चार एकल-स्कंधित (Single-tanged), हड्डी के शर (Arrow head), मिट्टी के छिद्रयुक्त चकरी, गोलाकार मिट्टी की गुरियाँ छिद्रयुक्त सीपी की लकटन आदि महगड़ा से मिले हैं।

इनकी अर्थव्यवस्था कृषि पशुपालन तथा आखेट पर आश्रित थी। धान के प्रमाण मृद्भाण्डों के सालन में तथा कार्बनीकृत रूप में मिले हैं। चावल ही इनका प्रमुख भोज्य था। विष्णुमित्रे तथा ते-जू-चांग (Te-Tzu-Chang) ने इनका परीक्षण किया था। इनके अध्ययन के आधार पर यहाँ से प्राप्त धान ओरिजा सतीवा (Oryza Sativa) प्रकार का था। तिथि क्रम के आधार पर इसे चावल के खेती का प्राचीनतम प्रमाण कहा जा सकता था। यह वेवीलाव(Vavilov) की इस धारणा की भी पुष्टि करता है कि भारत चावल की जन्मस्थली हो सकती है।

उत्खनन में बेर (Jijube) की गुठलियाँ भी प्राप्त हुई हैं जिनका उपयोग खाद्य सामग्री के रूप में होता होगा।

खाद्यान्न इनकी अर्थव्यवस्था में अहम् भूमिका का निर्वहन करते थे। इसकी पुष्टि यहाँ से प्राप्त सिल लोढ़े तथा संग्रहोपयोगी पात्रों से किया जा सकता है। बेलन का कछार धान की खेती के लिए बहुत उपयुक्त रहा होगा।

आखेट का महत्व इनकी अर्थव्यवस्था में यथेष्ट था। मवेशियों (Cattle) भेड़, बकरी, घोड़े, हिरन, जंगली सुअर, कछुआ, मछली तथा चिड़ियों की हड्डियाँ समुचित मात्रा में मिली हैं। इन पशुओं की हड्डियों में पालतू तथा जंगली दोनों प्रकार के पशु मिश्रित रूप से मिलते हैं।

गैरिक मृद्भाण्ड

गैरिक मृदभाण्ड सभी स्थलों पर एक प्रकार के नहीं हैं उनकी गठन में अन्तर मिलता है कहीं पर वे पतली बारी में मिलते हैं तो कहीं मोटी किन्तु प्रायः सभी भंगुर हैं। उनके किनारे घिसे से लगते हैं तथा वे स्पर्श करने पर रंग छोड़ते हैं। सांकलिया का विचार था कि दीर्घ काल तक पानी में दबे रहने के कारण उनकी इस प्रकार की स्थिति हो गई है। ड्रा० बी०बी०लाल जो पुरातात्विक सर्वेक्षण में प्रमुख रसायनशास्त्री थे उनकी विचारधारा इससे भिन्न थी। उनके अनुसार उनकी यह स्थिति दीर्घकालीन वातावरणीय प्रभाव का प्रतिफल है।

इस पात्र परम्परा में बड़े तथा कुछ छोटे दोनों प्रकार के बर्तन मिलते हैं। मोटी बारी में बड़े बर्तनों में बड़े कठौते(Trough), बेसिन (Basin), डोरी छापयुक्त घड़े, बड़े संग्रह पात्र (Storage Jars) छोटे बर्तनों में साधार तश्तरियों, कटोरे आदि हैं।

गैरिक पात्रों पर अलंकरण अपेक्षाकृत कम मिलता है किन्तु बड़े बर्तनों के स्कंध भाग अथवा नीचे गहरी काली पट्टी(Thick band) समानान्तर पट्टियाँ तथा चौखाने मिलते हैं। इनके अतिरिक्त कतिपय पात्रों पर उत्कीर्णन भी मिलता है।

अतरंजीखेड़ा, लाल किला, नासिरपुर तथा झिनझिना से कतिपय उष्मादीप्ति तथियाँ उपलब्ध हैं। जिनके आधार पर अलचिन इसे 2560-1180 ईसा पूर्व के अन्तर्गत रखते हैं। इनमें तीन तिथियाँ 2650 तथा 2030 के अन्तर्गत तथा पाँच तिथियाँ 1730 और 1180 के बीच की हैं।

अलचिन दम्पत्ति इसी पॉटरी को हड़प्पा परम्परा की लाल पॉटरी (Red Ware of Harappan Tradition) कहते हैं। इसी को बारा वेयर, लेट सिसवाल वेयर (Late Siswal Ware) तथा गैरिक मृद्भाण्ड (Ochre Coloured Pottery) कहते हैं। उनके अनुसार इस पात्र परम्परा का एक संस्तर प्रारम्भिक हड़प्पा के काल से यमुना के पश्चिम तथा पूर्वी दोनों ही क्षेत्रों में विद्यमान था। दोआब के पश्चिमवर्ती क्षेत्रों में नगरीय सभ्यता का विकास हुआ तथा इस क्षेत्र में ग्रामीण खेतिहर अर्थव्यवस्था ही रही। व्हीलर की धारणा थी कि ताम्रनिधि- संस्कृति के लोग संचरणशील संग्रहक अर्थव्यवस्था के लोग थे। जो पूर्णतया स्थायी रूप से एक स्थान पर नहीं रहते थे। वे जंगलों को काटकर थोड़ी खेती भी करते थे। सांकलिया की धारणा है कि इनके निर्माता दक्ष कारीगर तथा सुविज्ञ लोग थे जैसा कि उनके उपकरणों से प्रतीत होता है।

इस संस्कृति के केन्द्र प्रायः नदियों के प्रवाह क्षेत्र में बाढ़ के स्तर के ठीक ऊपर मिलते हैं। उनके पुरास्थलों का विस्तार भी एक हेक्टेयर से कम है।

इनके आवास किस प्रकार के होते थे, इसके सम्बन्ध में स्पष्ट रूप से कुछ कहना कठिन है। मिट्टी के जो लोंदे मिले हैं उन पर बांस की खपच्चियों और सरकण्डे आदि के निशान मिले हैं। उनके आधार पर अनुमान किया जा सकता है कि ये झोपड़ेनुमा घरों का निर्माण करते थे। सभी उत्खनित स्थलों पर इस प्रकार के प्रमाण मिले हैं। अम्बाखेड़ी में ईंट का भट्टा तथा हस्तनिर्मित इंटें मिली थीं। लालकिला में कच्ची ईटों की भग्न संरचनाएँ चिन्हित की गई थीं। इस संस्कृति के भौतिक अवशेषों में बाणाग्र, गुरियाँ, कुल्हाड़ी, चूड़ियाँ उत्कीर्णित मिट्टी की गुरियाँ, मातृदेवी की प्रतिभा, सिलखड़ी तथा उपरनों की वस्तुयें तथा सिललोढ़े आदि लाल किला, अतरंजी खेड़ा, अम्बाखेड़ी तथा सौपाई आदि के उत्खननों में मिली हैं। स्त्रियाँ अपने को सुन्दर बनाने के लिए विविध प्रकार के प्रसाधनों का उपयोग करती थीं। लाल किले से एक मुँह देखने की शीशे के समान वस्तु मिली है। रेवाड़ी से एक दाढ़ी बनाने का अस्तूरा भी मिला था।

शृंगवेरपुर से सूत तथा लाल किला से भेड़ की हड्डियाँ तथा सूत कातने का चक्र (Spindle whirl) मिले हैं जिससे प्रतीत होता है कि ये सूत तथा ऊन का प्रयोग करते थे।

अतरंजीखेड़ा से प्राप्त साक्ष्यों से ज्ञात होता है कि ये जाड़ों में गेहूं तथा जौ और गर्मी में धान की खेती करते थे। इनके अतिरिक्त चना, खेसारी, फली (Legume) भी बोते थे। आम, महुआ, बेर, खीरा, खरबूजा, कुम्हड़ा आदि खाते थे। ये पशु मांस भी खाते थे। लाल किले से मछली पकड़ने के जाल निमज्जक (Net sinker) मिले थे। चीड़, शीशम, साल तथा बबूल के वृक्षों से भी परिचित थे।

गाय, बैल, घोड़े आदि पालते थे। बैल का उपयोग भार वाहन खेती के कार्यों के लिए किया जाता था।

साही की धारणा है कि इन लोगों का व्यापारिक सम्बन्ध अन्य तत्कालीन लोगों से रहा होगा। लोथल से मानवाकृति एवं जोर्वे-नेवासा से तांबे के कड़े, प्राप्त हुए हैं,जो इस बात की पुष्टि करते हैं। ये वाणिज्य व्यापार भी करते थे। सम्भवतः ताम्बे के छल्ले तथा चाँदी की प्लेटों का उपयोग इसी के लिए करते थे। यातायात के लिए बैलगाड़ी तथा नावों का प्रयोग करते थे।

जोर्वे-नेवासा से प्राप्त ताम्र-कड़ों के रासायनिक परीक्षण से ज्ञात होता है कि वे भी गंगा- घाटी के ताम्र उपकरणों के समान शुद्ध थे। साही का अनुमान है कि विभिन्न प्रकार के कड़े सम्भवतः वस्तुओं के आदान, प्रदान में माध्यम के समान प्रयुक्त होते थे।

सराय नाहर राय (अक्षांश 259, 48′ उ० देशान्तर 81°50′ पू०) नामक मध्य पाषाणिक पुरास्थल प्रतापगढ़ के जनपद मुख्यालय से 15 किमी दक्षिण पश्चिम दिशा में उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में सूखी हुई एक गोखुर झील के किनारे पर स्थित है। यद्यपि झील लगभग पूरित हो गई है तथापि इसकी रूपरेखा स्पष्टतः दृष्टिगोचर होती है। इस पुरास्थल की खोज सन् 1969 में उत्तर प्रदेश शासन के पुरातत्त्व विभाग के तत्कालीन निदेशक स्वर्गीय के० सी० ओझा ने किया था। सन् 1970 में उत्तर प्रदेश के पुरातत्त्व विभाग ने भारतीय नृतत्त्व सर्वेक्षण केपी० सी० दत्त के सहयोग से एक मानव कंकाल का उत्खनन कराया था। तत्पश्चात् इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग ने उत्तर प्रदेश शासन के वित्तीय सहयोग से सन् 1971-72 तथा 1972-73 के अपेक्षाकृत बड़े पैमाने पर सराय नाहर राय का उत्खनन कराया था। स्वर्गीय जी०आर०शर्मा के निर्देशन में आर०के०वर्मा, वी०डी०मिश्र आदि ने उत्खनन कार्य संचालन किया था।

सराय नाहर राय का पुरास्थल लगभग 1800 वर्ग मीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। इस प्रवास-क्षेत्र में लघु पाषाण उपकरण और जानवरों की हड्डियाँ बिखरी हुई थीं। पानी के बहाव के फलस्वरूप ऊपरी सतह के कट जाये के कारण मानव कंकाल भी झाँकते हुए मिले हैं। सराय नाहर राय में कुल 11 मानव समाधियों तथा 8 गर्त्त-चूल्हों (Fire Pits) का उत्खनन इलाहाबाद विश्वविद्यालय की ओर से किया गया था। एक समाधि का उत्खनन उत्तर प्रदेश के पुरातत्त्व विभाग ने कराया था। इनके अलावा पुरास्थल पर अन्वेषण के फलस्वरूप चार अन्य मानव-समाधियों और तीन गर्त्त-चूल्हों के विषय में जानकारी प्राप्त हुई जिनका उत्खनन नहीं किया गया है।

सराय नाहर राय की कळे (समाधियाँ) आवास-क्षेत्र के अन्दर स्थित थीं। कब्रे छिछली तथा अण्डाकार थीं। सिरहाने के रूप में 3-4 सेमी मोटी मिट्टी की पर्त देकर मृतकों को पश्चिम-पूर्व दिशा में चित लिटा कर विस्तीर्ण रूप में दफनाया गया था। प्रायः सभी कंकालों का एक हाथ शरीर समानान्तर था और पुरुषों का दाहिना हाथ तथा स्त्रियों का बायाँ हाथ (जिन कंकालों के विषय में ऐसे साक्ष्य उपलब्ध थे) पेट पर रखा हुआ मिला था। उत्खनित 12 समाधियों में से ।। में एक-एक मानव कंकाल मिले थे। एक समाधि ऐसी थी जिसमें चार मानव-कंकाल एक साथ दफनाए गए थे। ऐसा प्रतीत होता है कि एक पुरुष तथा एक स्त्री के शव को कब में रखने के बाद पुनः पुरुष के ऊपर एक अन्य पुरुष तथा स्त्री के ऊपर दूसरी स्त्री का शव रख कर दफनाये गए थे। कब्रों को खोदते समय निकली मिट्टी तथा चूल्हों की मिट्टी एवं राख आदि से इन्हें भरा गया था। अन्त्येष्टि सामग्री के रूप में केवल लघु पाषाण उपकरण मिले थे। कंकालों के साथ जो बड़े-बड़े कंकड़ मिले थे, उन्हें प्रारम्भ में भ्रमवश घोंघा (Shell) समझ लिया गया था। भारतीय नेतृत्व सर्वेक्षण के पी०सी०दत्त ने अपने निबन्धों में हस्त-निर्मित कुण्डलित मृदभाण्ड(Coiled pottery) के रूप में इनका उल्लेख किया है। यह बिल्कुल गलत है। वस्तुतः मध्य गंगा घाटी में स्थित मध्य पाषाण काल के किसी भी उत्खनित पुरास्थल से मृद्भाण्ड के अवशेष अभी तक नहीं मिले हैं।

सराय नाहर राय से प्राप्त कुल 15 मानव कंकालों में से 11 कंकालों के लिंग (Sex) की पहिचान की जा चुकी है सात कंकाल पुरुषों तथा चार स्त्रियों के थे। चार कंकालों के लिंग की पहिचान करना संभव नहीं है। यहाँ से जो मानव कंकाल मिले हैं वे हृष्ट-पुष्ट तथा सुगठित शरीर वाले मानव समुदाय के प्रतीत होते हैं। हाथ-पैर की हड्डियों के अस्थिकरण, कपाल (Skull) की संधि-रेखाओं के विलयन तथा स्थायी दाँतों आदि के आधार पर कंकालों की आयु मृत्यु के समय 16 वर्ष से 34 वर्ष के बीच आँकी गई है तथा औसत आयु 17-31 वर्ष निर्धारित की गई है। स्त्रियों की मृत्यु 15 से 35 वर्ष की आयु में हुई। स्त्रियों की आयु का औसत 16 से 32.5 वर्ष के बीच आता है। सराय नाहर राय के पुरुष तथा स्त्रियाँ दोनों ही अपेक्षाकृत लम्बे कद के थे।

दमदमा का मध्य गंगा घाटी के मध्य पाषाण काल के उत्खनित पुरास्थलों में सबसे महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि यह एक सुरक्षित पुरास्थल है और इसका उत्खनन अपेक्षाकृत विस्तार से किया गया है। महदहा से लगभग 5 किमी उत्तर-पश्चिम में प्रतापगढ़ जिले की पट्टी तहसील के बारीकलां नामक गाँव के पास दमदमा का मध्य पाषाणिक पुरास्थल स्थित है। सई नदी की एक सहायक सरिता पीली नदी में मिलने वाले तम्बूरा नाले की दो धाराओं के संगम पर स्थित दमदमा का पुरास्थल मध्य पाषाणिक सामग्री को अपने आँचल में समेटे हुए लगभगक्ष8,750 वर्ग मीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। इस पुरास्थल की खोज सन् 1978 में हुई थी। पूर्ण रूप से सुरक्षित पुरास्थल होने के कारण इसको एक सुनियोजित योजना के अनुसार उत्खनन के लिए चुना गया जिससे मध्य गंगा घाटी के मध्य पाषाण काल के लोगों के जीवन के विभिन्न पक्षों के विषय में सम्यक् जानकारी प्राप्त की जा सके। सन् 1982-83 1986- 87 तक दमदमा के उत्खनन का संचालन इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग के आर०के०वर्मा, वी०डी०मिश्र, जे०एन०पाण्डेय तथा जे०एन०पाल के द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। पाँच वर्ष तक लगातार हुए उत्खनन के फलस्वरूप मध्य गंगा घाटी के मध्य पाषाण काल की संस्कृति पर नवीन प्रकाश पड़ा है।

उत्खनन के लिए पूर्वी, मध्यवर्ती एवं पश्चिमी इन तीन क्षेत्रों में दमदमा को विभाजित किया गया है। इन तीनों क्षेत्रों से मध्य पाषाणिक पुरावशेष समान रूप से मिले हैं किन्तु मानव शवाधान अभी तक पूर्वी क्षेत्र से नहीं मिले हैं। मानव शवाधान मध्यवर्ती तथा पश्चिमी क्षेत्रों से ही प्रकाश में आये हैं। उत्खनन से उपलब्ध प्रणामों से दमदमा का 1.50 मीटर मोटा सांस्कृतिक जमाव प्रकाश में आया है जिसे 10 स्तरों में विभाजित किया गया है। सबसे ऊपरी स्तर को छोड़कर शेष सभी 9 स्तर मध्य पाषाण काल से सम्बन्धित हैं। ऊपरी स्तर से विविध प्रकार के पुरावशेष आपस में मिले हुए प्राप्त हुए हैं। मध्य पाषाण काल के सम्पूर्ण सांस्कृतिक जमाव को 9 उपकालों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक उपकाल से मध्य पाषाण काल के लोगों के रहने के उल्लेखनीय साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। इस सन्दर्भ में मिट्टी के कई पर्त वाले लेप से युक्त तथा बिना लेप वाले गर्त चूल्हों, जली हुई मिट्टी के प्लास्टर युक्त फर्श, वन्य-पशुओं की हड्डियों, लघु पाषाण उपकरणों, शृंग के बने हुए उपकरणों एवं आभूषणों और मानव शवाधानों आदि का विशेष रूप से उल्लेख किया जा सकता है। स्तरीकरण और पुरावशेषों की दृष्टि से सभी 9 स्तर अविच्छिन्नता द्योतित करते हैं। इस पुरास्थल पर सर्वप्रथम बसने के लिए आने-वाले मध्य पाषाण काल के लोगों ने प्राकृतिक पीली गाद मिट्टी (जलोढ़क मिट्टी) के ऊपर अपना आवास बनाया था। उन लोगों ने उस पीली मिट्टी को ही खोद कर मृतकों के लिए शवाधान बनाये तथा पशुओं का माँस भूनने के लिए गर्त्त-चूल्हों का निर्माण किया था।

दमदमा में लगातार पाँच वर्षों तक किये गये उत्खनन के फलस्वरूप पश्चिमी तथा मध्यवर्ती क्षेत्रों में कुल मिलाकर 41 मानव शवाधान ज्ञात हुए हैं जो मध्य पाषाणिक शवाधान प्रणाली के विषय में उल्लेखनीय जानकारी प्रदान करते हैं। पूर्वी क्षेत्र से अभी तक कोई मानव शवाधान नहीं मिला है। स्तरीकरण के प्रमाण के आधार पर इन शवाधानों को 9 उपकालों में विभाजित किया गया है।

इन शवाधानों में से 5 शवाधान (शवाधान संख्या VI, XVI, XX, XXX एवं XXXVI) युग्म शवाधान हैं और एक शवाधान (संख्या XVIII) में 3 मानव कंकाल एक साथ दफनाए हुए मिले हैं। शेष शवाधानों में एक-एक कंकाल मिले हैं। अधिकांश कंकाल पश्चिम-पूर्व दिशा में, सिर को पश्चिम दिशा में रख कर दफनाये हुए मिले हैं लेकिन कतिपय कंकालों के सिर पूर्व अथवा उत्तर या दक्षिण दिशा में रखे हुए मिले हैं। अधिकांश मानव- कंकालों को पीठ के बल सांगोपांग लिटा कर दफनाया गया था लेकिन दो मानव कंकालों को पेट के बल और दो को पैर मोड़ कर दफनाया गया था। शृंग के बने हुए बाण तथा आभूषण और पशुओं की हड्डियाँ अन्त्येष्टिं सामग्री के रूप में रखी गई थीं। अधिकांश कंकाल वयस्क स्त्री-पुरुषों के थे जिनकी आयु का औसत 18-35 वर्ष के बीच आँका जा सकता है। बच्चों के कंकाल यहां से नहीं मिले हैं।

दमदमा के उत्खनन से बहुसंख्यक लघु पाषाण उपकरण मिले हैं जिनमें से ब्लेड, फलक, क्रोड, माइक्रो-ब्यूरिन के अतिरिक्त विभिन्न कार्यों में उपयोग के प्रमाण से युक्त ब्लेड, पुनर्गढ़ित ब्लेड, समानान्तर एवं कुण्ठित पार्श्व वाले ब्लेड, समद्विबाहु तथा विषम बाहु त्रिभुज, समलम्ब चतुर्भुज, विभिन्न प्रकार की खुरचनियाँ, छिद्रक, चान्द्रिक आदि सम्मिलित हैं। इन उपकरणों का निर्माण चाल्सेडनी, चर्ट, क्वार्ट्ज, अगेट, कार्नेलियन आदि माणिक्य कोटि के प्रस्तरों पर किया गया है। पाषाण उपकरणों के अतिरिक्त शृंग के उपकरण तथा आभूषण भी मिले हैं। इनमें बाणान तथा मुद्रिकाएँ प्रमुख हैं। बलुअर पत्थर के सिल के टूटे हुए टुकड़े, लोढ़े, हथौड़े, निहाई आदि प्राप्त हुए हैं।

महदहा के उत्खनन के फलस्वरूप जिन 28 समाधियों की जानकारी प्राप्त हुई उनको चार उपकालों में विभाजित किया गया है। महदहा के प्रथम उपकाल से तीन मानव समाधियाँ मिली हैं जिनमें चार कंकाल प्राप्त हुए हैं क्योंकि प्रथम समाधि एक युग्म-समाधि है। इस युग्मित समाधि से दो कंकाल मिले हैं जिसमें पुरुष को दाहिनी ओर तथा स्त्री को बायीं ओर लिटाकर दफनाया गया था। सभी कंकाल पश्चिम की ओर सिर करके दफनाये गए। अन्य दो समाधियों से एक-एक कंकाल मिले हैं। इस उपकाल के चार में से दो पुरुष कंकाल और दो स्त्री कंकाल थे। सभी कंकाल वयस्क लोगों के थे।

दूसरे उपकाल से दो समाधियाँ मिली हैं जिनमें से एक समाधि में पुरुष का एक कंकाल तथा दूसरी युग्म-समाधि में एक स्त्री तथा एक पुरुष के कंकाल मिले हैं। युग्म-समाधि में पुरुष के कंकाल के ठीक ऊपर स्त्री का कंकाल दफनाया हुआ मिला है। सभी कंकाल पश्चिम-पूर्व की ओर लिटा कर दफनाये गए थे। द्वितीय उपकाल की दोनों समाधियों में अन्त्येष्टि सामग्री रखी हुई मिली है। एकाकी पुरुष कंकाल हिरण के शृंगों की बनी पाँच मुद्रिकाओं की एक माला गले में पहने हुए था। युग्म समाधि का पुरुष शृंगों की बनी हुई 12 मुद्रिकाओं की एक माला गले में पहने हुए था तथा बायें कान में शृंग का बना हुआ एक गोल कुण्डल धारण किये हुए था।

महदहा के तीसरे उपकाल से 10 समाधियाँ मिली हैं जिनमें से प्रत्येक में एक-एक मानव- कंकाल मिला है। इसमें से छः कंकालों के लिंग की पहिचान करना संभव है-चार स्त्रियाँ और दो पुरुष। चार कंकालों के लिंग की पहिचान नहीं की जा सकी है। सात कंकाल पश्चिम-पूर्व दिशा में दफनाए हुए मिले हैं जिनके सिर पश्चिम की ओर थे। दो में भिन्नता थी। एक कंकाल पूर्व-पश्चिम तथा दूसरा पूर्व-पूर्व दक्षिण से पश्चिम-पश्चिम-उत्तर की ओर सिर करके दफनाया गया था। दो समाधियों से अन्त्येष्टि सामग्री मिली है। एक महिला कंकाल के साथ सींग की बनी हुई दो गुरियाँ तथा सींग का एक बाण मिला है तथा दूसरी महिला के साथ कछुआ की खोपड़ी का एक टुकड़ा रखा हुआ मिला है।

महदहा के चौथे उपकाल से सबसे अधिक 13 समाधियाँ मिली हैं जिनमें से प्रत्येक में एक-एक मानव कंकाल दफनाया हुआ मिला है। एक मुड़े हुए कंकाल को छोड़कर शेष सभी 12 विस्तीर्ण शवाधान हैं। तेरह कंकालों में से 11 के लिंग की पहिचान की जा सकी है जिनमें से 7 महिलाएं तथा 4 पुरुष हैं। दो कंकालों की पहिचान नहीं की जा सकी है। तेरह में से दस कंकाल वयस्क लोगों के थे, एक वयोवृद्ध व्यक्ति का तथा दो बच्चों के कंकाल थे। तेरह में से छः का सिर पश्चिम की ओर तथा पाँच का सिर पूर्व दिशा की ओर करके दफनाया गया था। दो कंकालों का दिक्-स्थापना किसी सीधी दिशा में नहीं था बल्कि थोड़ा तिरछा था। दो महिलाओं तथा एक पुरुष के साथ अन्त्येष्टि-सामग्री रखी हुई मिली है।

महदहा के लगभग सभी कंकाल नहर के चौड़ा करने के फलस्वरूप कट गए थे इसलिए उनकी वास्तविक लम्बाई की नाप करना संभव नहीं है तथापि अनुमान है कि स्त्री-पुरुष लम्बे कद के हृष्ट-पुष्ट थे। अधिकांश लोग स्वस्थ थे।

महदहा के उत्खनन से 35 गर्त्त-चूल्हे मिले हैं। कतिपय गर्त्त-चूल्हों के भीतरी भाग को लीप-पोत कर चिकना बनाया गया था। गर्त्त-चूल्हों से राख, जली हुई मिट्टी तथा पशुओं की जली हुई हड्डियाँ मिली हैं। महदहा के एक गर्त्त-चूल्हे में भैंसे का सींग युक्त पूरा सिर मिला है। मांस को भून कर खाने के विषय में ये अत्यन्त महत्त्वपूर्ण साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं।

महदहा के गर्त्त-चूल्हों तथा गोखुर झील से वन्य-पशुओं की हड्डियां मिली हैं। सांभर, चीतल, बारहसिंघा, जंगली सुअर, गैंडा, हाथी आदि पशुओं का शिकार ये लोग करते थे। कछुआ, मछली आदि जलचरों का भी शिकार किया जाता था। पक्षियों के पकड़ने के भी संकेत मिलते हैं।

महदहा मध्य पाषाणिक पुरास्थल प्रतापगढ़ कस्बे से पूर्वोत्तर दिशा में 31 किमी और पट्टी कस्बे से 5 किमी उत्तर, प्रतापगढ़ जिले की पट्टी तहसील के महदहा गाँव के पूर्व दिशा में लगभग 1 किमी की दूरी पर स्थित है। सन् 1978 में शारदा सहायक नहर परियोजना की जौनपुर नहर की शाखा को चौड़ी करने की प्रक्रिया में इस पुरास्थल की जानकारी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग को अपने भूतपूर्व छात्र और पट्टी तहसील के तत्कालीन परगनाधिकारी लाल बिहारी पाण्डेय के सौजन्य से प्राप्त हुई। यहाँ पर यह उल्लेखनीय है कि सन् 1953 में जब जौनपुर नहर की शाखा की खुदाई हुई उस समय उस पुरास्थल का काफी बड़ा भाग नष्ट हो गया था। सूचना मिलने पर सन् 1978 एवं 1979 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग ने ‘बचाव उत्खनन’ (Salvage Excavation) के रूप में यहाँ पर कार्य किया जिसका संचालन वी०डी०मिश्र एवं जे०एन०पाल ने किया।

लगभग 8,000 वर्ग मीटर के क्षेत्र में फैला हुआ महदहा का पुरास्थल एक ‘गोखुर झील’ के पश्चिमी सीमान्त पर स्थित है। पुरानी नहर के पश्चिम में ‘आवास-क्षेत्र’ स्थित है जिसमें मानव समाधियाँ मिली हैं। इस नहर की पूर्व दिशा में वन्य-पशुओं की अधजली एवं खण्डित हड्डियाँ, सींग, शृंग तथा दाँत इत्यादि मिले हैं जिसकी वजह से इसको ‘वध-स्थल’ अथवा बूचड़खाना (Butchering Area) कहा गया है। इस सन्दर्भ में यह उल्लेखनीय है कि जंगली पशुओं के शिकार करने वाले आवास-क्षेत्र के समीप पशुओं को प्रायः नहीं काटते हैं। अधिक संभावना इस बात की है कि यह उच्छिष्ट हड्डियों की क्षेपण-भूमि (Dumping ground) है।

महदहा के आवास-क्षेत्र के उत्खनन के फलस्वरूप 60 सेमी मोटा सांस्कृतिक जमाव प्रकाश में आया है जिसे विभिन्न स्तरों की संरचना तथा रंग आदि के आधार पर चार उपकालों में विभाजित किया गया है। महदहा के आवास क्षेत्र में कुल मिला कर 28 समाधियों और 35 गर्त्त-चूल्हों का उत्खनन किया गया है। महदहा के आवास-क्षेत्र के पूर्व दिशा में स्थित ‘गोखुर-झील’ का भी उत्खनन किया गया है जिसके 10 स्तरों में से नवें एवं आठवें स्तर मध्य पाषाण काल से सम्बन्धित हैं। महदहा के मध्य पाषाणिक मानव जानवरों के माँस को खाने के बाद उच्छिष्ट हड्डियों आदि को झील में फेंक दिया करते थे। जल-मग्न रहने के कारण काफी हड्डियाँ सुरक्षित रूप में बच गई हैं। उत्खनन के फलस्वरूप प्रकाश में आईं। झील के नवें-आठवें स्तरों से एकत्र किये गए नमूने पुरापुष्प-पराग से युक्त हैं जिनका प्राथमिक विश्लेषण इलाहाबाद विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के डी० डी० पन्त ने किया है। इस विश्लेषण से घास के पुरापुष्प-परागों के अस्तित्व का पता चला है।

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Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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