अर्थशास्त्र / Economics

वालरस के प्रमुख आर्थिक विचार | सीमान्त उपयोगिता सिद्धान्त | Economic Thoughts of Walras

वालरस के प्रमुख आर्थिक विचार | सीमान्त उपयोगिता सिद्धान्त | Economic Thoughts of Walras

वालरस के प्रमुख आर्थिक विचार

वालरस एक फ्रांसीसी अर्थशास्त्री था, जो जैवन्स तथा मेंजर का समकालीन था। उसने अपनी शिक्षा इंजीनियरिंग व्यवसाय के लिए आरम्भ की थी, किन्तु बाद में उसे त्यागकर उसने पत्रकार का व्यवसाय अपनाया। सन् 1870 में उसने लौजेन विश्वविद्यालय में “पोलिटिकल इकोनोमी” के प्रोफेसर के पद को ग्रहण किया। उनकी मुख्य रचनाएँ ‘Elements of Pure Economics’, ‘Theory of Exchange’, ‘Theory of Production’, Mathematical Theory of Social Wealth’, ‘Studies in Social Economics और Studies in Applied Economics थी। उसके अनुसार अर्थशास्त्र के अध्ययन को तीन भागों में विभाजित करना चाहिए अर्थात शुद्ध अर्थशास्त्र, व्यावहारिक अर्थशास्त्र और सामाजिक अर्थशास्त्र । गौसन की भाँति वह भी अर्थशास्त्र को एक विशुद्ध विज्ञान के रूप में विकसित करना चाहता था। उसको सामान्य सन्तुलन अर्थशास्त्र का जन्मदाता कहा जा सकता है। क्योंकि वह पहला व्यक्ति था जिसने आर्थिक सन्तुलन के क्षेत्र में गणितीय विश्लेषण का प्रयोग किया। उसने परम्परावादी अर्थशास्त्रियों की आलोचना इसलिए की थी कि वे सही अर्थ में एक सामाजिक विज्ञान का विकास नहीं कर पाये थे। कू। की अपेक्षा उसकी रचनाएँ अधिक क्रमवद्ध तथा विस्तृत थी और इस दृष्टि से उसको गणितीय सम्प्रदाय का जनक कहा जा सकता है। जैवन्स की अपेक्षा उसने आधुनिक गणितीय सम्प्रदाय को अधिक प्रभावित किया था।

सीमान्त उपयोगिता सिद्धान्त-

जैवन्स तथा मेंजर के प्रभाव से दूर रहकर वालरस ने स्वतन्त्र रूप से सीमान्त उपयोगिता नियम को सन् 1874 में प्रतिपादित किया था। इस सम्बन्ध में उसके विचार हमें उसकी पुस्तक ‘Elements of Pure Economics’ में मिलते हैं । इस पुस्तक  के दो भाग हैं- विनिमय सिद्धान्त और उत्पादन सिद्धान्त।

जैवन्स और मेंजर की भाँति उसका भी यही विचार था कि विनिमय मूल्य, उपयोगिता तथा पूर्ति द्वारा निर्धारित होता है। उसने ‘rarete’ शब्द का प्रयोग किया है जिसका अर्थ वही है जो जैवन्स के उपयोगिता के अन्तिम अंश का था गौसन के अन्तिम एएम के मूल्य का था और आधुनिक लेखक जिस अर्थ में सीमान्त उपयोगिता को लेते हैं। विनिमय मूल्य ‘raretc’ के अनुपात में निर्धारित होता है। उसने यह भी बताया कि एक वस्तु का मूल्य अन्य वस्तुओं की कीमत पर निर्भर करता है। दूसरे शब्दों में, किसी भी बाजार में जहां बहुत-सं वस्तुओं का क्रय-विक्रय होता है जब एक या एक से अधिक विनिमय करने वालों की उपयोगिता और आवश्यकता को मात्रा बदलती रहती है जिसके कारण ‘rarete’ भी भिन्न- भिन्न होती है तो अन्य वस्तुओं के सम्बन्ध में उस वस्तु का मूल्य अथवा कीमत भी बदलती रहेगी। उसने अपने विचार को गणित की सहायता से स्पष्ट किया और यह बताने का प्रयत्न किया कि बाजार में चाहे किसी समय पर कितनी ही वस्तुएँ क्यों न हों उनके पारस्परिक मूल्यों में निर्धारण की समस्या सरलता से सुलझायी जा सकती है यदि पर्याप्त आँकड़े उपलव्य हो जायें। उसने आगे बताया कि इस उद्देश्य के लिए उन्हीं आँकड़ों का उपयोग किया जा सकता है जिनका उपयोग अर्थशास्त्री अपने मूल्य विश्लेषण में करते हैं, और समस्या में अज्ञात वस्तुओं की संख्या के बराबर हो समीकरण बनाये जा सकते हैं। इसलिए सैद्धान्तिक दृष्टि से विशेष समय पर अनेक वस्तुओं के सापेक्षिक मूल्य निर्धारण की समस्या निश्चित की जा सकती है और गणित की सहायता से सुलझायी जा सकती है। किन्तु स्वयं वालरस ने यह स्वीकार किया था कि इन समीकरणों को बनाने के लिए पर्याप्त आँकड़े उपलब्ध नहीं थे और यदि ये आँकड़े मिल भी जाये तो भी एक बड़े आधुनिक बाजार में विभिन्न वस्तुओं का पारस्परिक मूल्य निर्धारण को दर्शाने के लिए सभी समीकरणों को हल करना गणित की शक्तियों से परे है।

वास्तव में, वालरस उन आँकड़ों को प्राप्त करना चाहता था जिनसे यह जाना जा सके कि किसी भी बाजार में किसी भी सम्भव मूल्य पर कोई भी व्यक्ति वस्तु की कितनी मात्रा खरीदेगा। यदि सभी सूचना प्राप्त हो जाय तो बाजार में हर वस्तु तथा हर व्यक्तिगत क्रेता के सम्बन्ध में एक माँग सारणी तैयार की जा सकेगी। पूर्ति सारणी के सम्बन्ध में भी ठीक यही विधि लागू की जायेगी। इन सारणियों के आधार पर समीकरण बनाये जा सकते हैं जिनसे प्रत्येक वस्तु की बेची गयी तथा खरीदी गयी कुल मात्रा का ज्ञान हो सकता है। अतः यह मालूम करना बड़ा सरल प्रतीत होता है कि व्यक्तिगत क्रेताओं तथा विक्रेताओं ने किस मूल्य पर किस वस्तु को कितनी मात्रा बेची तथा खरीदी। यदि इस सूचना को प्रारम्भ में एकत्र की गयी सूचना में जोड़ दिया जाय तो यह सरलता से मालूम किया जा सकता है कि विक्रय की समाप्ति के बाद किस व्यक्ति के पास किस प्रकार की वस्तुएँ शेष रह गयीं। किन्तु, केवल यह स्थिर दशाओं में ही सम्भव हो सकता है अर्थात् जब वस्तुओं की मात्रा सीमित हो, समय अवधि सीमित हो और वस्तुओं का क्रय-विक्रय पूर्ण प्रतियोगिता की दशाओं में हो रहा हो।

अतः स्पष्ट है कि वालरस का सिद्धान्त वास्तविक जीवन की परिस्थितियों के अनुकूल नहीं है। सीमान्त उपयोगिता सम्बन्धी विचार को सामान्य सन्तुलन विश्लेषण से सम्बन्धित करने की जिज्ञासा में वालरस ने अनेक समीकरणों का सहारा लिया है। इन समीकरणों को तैयार करते समय विनिमय की राशियों के स्थान पर कीमतों को स्वतन्त्र परिवर्तनशील घटक माना है और इस दृष्टि में उसकी विधि जैवन्स द्वारा अपनायी गयी विधि बिल्कुल विपरीत है। अपने विश्लेषण की कीमत से आरम्भ करके उसने कहा था कि एक निश्चित मूल्य पर प्रत्येक व्यक्ति उस समय तक वस्तुओं का विनिमय करता रहेगा जब तक दोनों वस्तुओं की सीमान्त उपयोगिता का अनुपात उनके विनिमय अनुपात के बराबर नहीं हो जाता। स्पष्ट है कि समस्या को गणित की सहायता से सुलझाने की जिज्ञासा के कारण वालरस द्वारा प्रस्तुत किया गया विश्लेषण अस्पष्ट हो गया है। यह आधुनिक जीवन की समस्याओं को सुलझाने में सहायक सिद्ध नहीं होता, किन्तु वालरस अपने समकालीन विचारकों को उतना प्रभावित नहीं कर सका जितना सैद्धान्तिक दृष्टि से यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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