शिक्षाशास्त्र / Education

जनतंत्र का अर्थ | जनतंत्र के मूलतत्व | जनतंत्र की विशेषताएँ

जनतंत्र का अर्थ | जनतंत्र के मूलतत्व | जनतंत्र की विशेषताएँ

प्राचीन समय से आज तक जनतंत्र, लोकतंत्र अथवा प्रजातंत्र एक प्रिय शासन व सामाजिक संगठन रहा है जिसमें जनता के हित एवं कल्याण की भावना लेकर समाज तथा राज्य और राज्य की शिक्षा, उसके जीवन सभी को संगठित किया गया। आधुनिक समय में जनतंत्र की व्यापकता और प्रभावशीलता इतनी बढ़ी कि जॉन डीवी जैसे दार्शनिक एवं शिक्षाशास्त्री ने कह दिया कि ‘आधुनिक जीवन का अर्थ है जनतंत्र” (Modern life means democracy.-John Dewy) । यदि शिक्षा और जीवन एक ही है जैसा जॉन डीवी ने ही कहा है तो निश्चय ही आधुनिक शिक्षा और जनतंत्र में आत्मीयता का घनिष्ठ सम्बन्ध होगा।

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जनतंत्र का अर्थ-

जनतंत्र का अर्थ कई दृष्टिकोणों से किया जाता है जिन पर विचार करना जरूरी है तभी इसके बारे में स्पष्ट ज्ञान होगा। इसे नीचे दिया जा रहा है-

(अ) राजनैतिक दृष्टिकोण से- राजनैतिक दृष्टिकोण से जनतंत्र एक प्रकार की शासन व्यवस्था है जिसमे जन या जनता नियंत्रण या शासन करती है (जन + तंत्र)। अंग्रेजी का शब्द डिमोक्रेसी भी इसी तरह से बना है। (Demos=जनता, Kratein= शासन)। इससे स्पष्ट है कि जिस देश में जनता राज करती है वहाँ जनतंत्र का शासन होता है जैसा कि डायसी महोदय ने लिखा है :”जनतंत्र सरकार का वह रूप है जिसमें प्रशासकीय वर्ग सम्पूर्ण राष्ट्र का एक बहुत बड़ा भाग होता है।” जनतंत्र में बहुमत शासन भी कहते हैं।

अब्राहम लिंकन के अनुसार “जनतंत्र वह सरकार है जो जनता की, जनता के द्वारा और जनता के लिए होती है।” इस विचार से जहाँ लोग अपने आप रहने-सहने एवं सुरक्षा के लिए शासन करते हैं, कोई दूसरा बीच में नहीं होता है वहाँ जनतंत्र होता है। जनतंत्र में सभी शासक और शासित एक समान होते हैं और सभी स्वतंत्र मत वाले होते हैं। इन विचारों से स्पष्ट है कि “जनतंत्र वह शासन है जिसकी स्थापना किसी देश के सभी पुरुष और स्त्री मिलकर अपने हित के लिए करते हैं और उस शासन में सभी को भाग लेना पड़ता है, प्रत्येक मामले का निर्णय वे अपने मतदान से करते हैं जिसमें समानता और स्वतंत्रता का प्रयोग करते हैं।”

(ब) सामाजिक दृष्टिकोण से- राजनैतिक या शासन की दृष्टि से जनतंत्र का अर्थ हमने समझ लिया। अब हमें सामाजिक दृष्टिकोण से जनतंत्र का अर्थ समझाना चाहिए। इस विचार बिन्दु से जनतंत्र का एक सामाजिक संगठन है जिसमें जन्म, धर्म, जाति, यौन, भाषा, वर्ग, आदि का कोई भेदभाव नहीं होता है, सभी सदस्यों को समान रूप से सभी सुविधाएँ मिलती हैं जिनसे ये अपनी उन्नति कर सकें। इस सम्बन्ध में आई० एल० कैण्डेल ने बताया कि “एक आदर्श के रूप में जनतंत्र व्यक्ति की स्वतन्त्रता और जिम्मेदारी आधारित समाज में रहने का एक तरीका है।”

तात्पर्य यह है कि स्वतन्त्रता और समानता तथा जिम्मेदारी के साथ जब समाज में रहते हैं और आगे बढ़ते हैं तो उस जीवन को जनतंत्र कहते हैं।

एक दूसरे ढंग से इसी भावना को जॉन डीवी ने भी लिखा है। उनके विचार में “जनतंत्र सहयोगी जीवन है।” वास्तव में मिलजुल कर रहने में समीपता के कारण समानता और स्वतन्त्रता की भावना पाई जाती है। इसी भाव को भारतीय विद्वान् डॉ० डी० पी० वर्मा ने प्रकट किया है- “जनतंत्र सामूहिक ढंग से राजनैतिक और सामाजिक प्रगति करने की एक प्रक्रिया है।”

दूसरे भारतीय विद्वान् प्रो० भाटिया ने लिखा है कि “सामाजिक जनतंत्र वर्ग जन्म या सम्पत्ति पर आधारित सभी भेदों का अभाव है।”

(स) जीवन शैली की दृष्टि से- जनतंत्र एक आदर्श के रूप में समाज में रहने का एक तरीका है यह विचार कैण्डेल का है। इससे संकेत मिलता है कि जनतंत्र जीवन की एक शैली है, रहन-सहन का एक नया संगठन है। प्रो० ब्याएड बोड ने इस संदर्भ में बताया है कि “जनतंत्र एक जीवन शैली है और जीवन शैली का तात्पर्य है जीवन के प्रत्येक प्रमुख क्षेत्र में प्रभाव को निश्चित करना।“

इस सम्बन्ध में आर०एम० मैकआईवर ने भी लिखा है कि “सच्चा जनतांत्रिक आदर्श औसत मनुष्य का नहीं बल्कि साधारण मनुष्य का भी आदर करता है, व्यक्तित्व का नैतिक मूल्य और स्वतन्त्रता, एकनिष्ठता, तथा सम्मान करने की शक्ति का आदर करता है।”

इस कथन से यह संकेत मिलता है कि जनतंत्र जीवन की एक शैली के रूप में स्वतंत्रता, व्यक्तित्व, नैतिकता और एकनिष्ठता को प्राप्त करने का प्रयत्न है, तरीका है।

प्रो० डब्ल्यू० एम० रायबर्न ने इस सम्बन्ध में लिखा है कि “जनतंत्र ऐसी प्रणाली है जिसमें समुदाय के सभी व्यक्ति साथ-साथ रहते हैं जिससे कि प्रत्येक सदस्य समुदाय की अधिकतम सेवा कर सके और समुदाय प्रत्येक सदस्य की अधिकतम सेवा कर सके।”

इस कथन  स्पष्ट है कि जनतंत्र व्यक्ति और समुदाय के बीच परस्पर सेवा करने की जीवन प्रणाली या शैली है।

(द)आर्थिक दृष्टिकोण से- आर्थिक दृष्टिकोण से जनतंत्र का अर्थ होता है समाज की सम्पत्ति का स्वतन्त्र एवं समान रूप से उपभोग करना जैसा कि रूस, चीन और अन्य साम्यवादी देशों में पाया जाता है। ऐसे जनतंत्र की प्रणाली में सभी लोगों को धन कमाने की पूरी सुविधा दी जाती है जिससे कि वह स्वाश्रित होकर जीवन में आगे बढ़े। इससे सामाजिक संगठन सहकारिता, सहयोग, बन्धुत्व की भावना पर किया जाता है। इस सम्बन्ध में प्रो० वी० डी० भाटिया ने लिखा है कि “आर्थिक जनतंत्र का अर्थ है आर्थिक शक्ति का सम्पूर्ण रूप से जनता के हाथों में होना, न कि कुछ योड़े से पूंजीपतियों या विशेष वर्ग के हाथ में होना ।”

(इ) कुछ शिक्षाशास्त्रियों के विचार- जनतंत्र के अर्थ को अच्छी तरह से समझने के लिए हमें उसके सम्बन्ध में कहे गए प्रचलित कथनों पर भी ध्यान देना चाहिए। ऐसे कथन उपर्युक्त कथनों के अलावा हैं-

  1. अरस्तू- “जनतंत्र बहुतों की सरकार है।”
  2. सीली- “जनतंत्र वह सरकार है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को भाग लेना पड़ता है।”
  3. राधाकृष्णन- “जनतंत्र जीवन का एक तरीका है न कि केवल राजनैतिक व्यवस्था है।”
  4. मैजिनी- “सच्चे जनता का अर्थ है सबसे योग्य तथा सबसे अच्छे नेतृत्व में सभी के द्वारा उन्नति।”
  5. इन्साईक्लोपीडिया अमरीकाना- “जनतंत्र सामाजिक संगठन का एक रूप है जिसमें समूह की क्रियाओं के विभिन्न पहलुओं में प्रत्येक व्यक्ति भाग लेने के लिए कृत्रिम बन्धनों से मुक्त है…..!”.

जनतंत्र के मूल तत्व और विशेषताएँ

जनतंत्र की स्थापना और प्रचलन के मूल तत्व और विशेषताएँ निम्नलिखित कही गई हैं-

(अ) स्वतंत्रता- जनतंत्र में स्वतन्त्रता सबसे प्रधान तत्व है। अधिकतर विद्वानों ने इसे जनतंत्र की जान अथवा आत्मा कहा है। स्वतन्त्रता के आधार पर ही व्यक्ति अपना सर्वांगीण विकास कर पाता है। जनतंत्र के प्रत्येक सदस्य को अपने धर्म, कर्म, विचार, प्रकाशन एवं इधर-उधर जाने-आने की स्वतंत्रता होती है। जीवन के सम्बन्ध में निजी ढंग से कार्य करने, समस्या पर विचार करने, लिखने-पढ़ने, भाषण करने, सलाह लेने-देने की स्वतन्त्रता होने से जीवन की शैली ही स्वतन्त्र होती है। स्वतन्त्रता स्वार्थपूर्ण उच्छृंखलता, निरंकुशता और अनियंत्रण नहीं है बल्कि दूसरों के हितों का पूरा ध्यान भी रखना जरूरी है, अतएव स्वतन्त्रता कर्तव्य से युक्त होती है।

(ब) समानता- जनतंत्र का संगठन जाति, यौन, रंग-रूप, धर्म, वर्ग: आदि के विभेद को दूर करके किया जाता है। ऐसे संगठन के सभी सदस्य एक समान अधिकार रखते हैं और आपस में एक साथ उठते बैठते, रहते कार्य करते हैं। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी योग्यता एवं आवश्यकतानुसार समान अवसर मिलता है जिस उसकी योग्यता, क्षमता, रुचि का पूर्ण विकास होता है। एक व्यक्ति दूसरे के मार्ग में बाधक न होकर सहायक होता है। अतएव हर व्यक्ति समानता का अधिकार रखता है।

(स) भ्रातृता- जनतंत्र का तीसरा मूल तत्व भातृता या बन्धुत्व है। यदि स्वतन्त्रता प्राण या आत्मा है तो समानता शरीर है और भ्रातृता उसकी कुन्नी है। डीवी ने लिखा है कि जनतंत्र सहयोगी एवं सहयुक्त रूप से रहने का तरीका है। यह तभी सम्भव होता है जब सभी सदस्य परस्पर भाई-भाई की तरह रहते हैं और सभी कामों में बराबर भाग लेते हैं तथा यथाशक्ति योगदान करते हैं, कंधे से कंधा मिला कर चलते हैं। ऐसी ही क्रियाशीलता से जनतंत्र का संगठन सफल होता है।

(द) सामाजिक न्याय- प्रायः जनतंत्र के तीन आधार स्तम्भ-स्वतंत्रता, समानता, भ्रातृता (Liberty, Equality and Fraternity) को माना गया है फिर भी आधुनिक समय में सामाजिक न्याय को भी एक मूलतत्व कहा जाता है। इसमें समाज के कानून के सामने सभी लोग बराबर हैं और समान अधिकार तथा कर्तव्य रखते हैं। स्त्री-मर्द बराबर है। गरीब-धनी बराबर हैं, ऊँच-नीच में कोई अन्तर नहीं है। समाज के न्याय के कारण ही ऐसा संतुलित संगठन सम्भव होता है।

(य) व्यक्ति का सम्मान- जनतंत्र में प्रत्येक व्यक्ति सम्मान का अधिकारी होता है क्योंकि समाज का वह एक महत्वपूर्ण अंग होता है। अतएव हरेक व्यक्ति दूसरे का सम्मान भी करता है और दूसरे के मार्ग में बाधक नहीं बनता प्रत्युत बह दूसरे को अपना पूर्ण सहयोग देकर आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहन देता है तभी लोग बरादर आगे बढ़ते रहते हैं।

(फ) सहनशीलता- जनतंत्र की प्रणाली में विश्वास रखने वाले व्यक्ति दूसरों के विचारों, सलाहों और संकेतों को मानते हैं न कि उसे गलत कहते हैं। इस प्रकार से वे सहनशीलता प्रकट करते हैं । यदि इस प्रकार की सहनशीलता लोगों में न हो तो जनतंत्र में स्वतंत्रता का मूल्य और महत्व नहीं रहेगा। आधुनिक विचारधारा में इसे “जीओ और जीने दो” (Live and let live) की भावना से भी सम्बोधित किया जाता है।

(ह) परिवर्तन में विश्वास होना-जनतंत्र के सदस्य परिवर्तन को जीवन मानते हैं। अमरीका का प्रयोजनवाद इस दिशा में परिवर्तन को एक महान आवश्यकता समझना है और प्रयोजनवाद का विकास जनतंत्र में हुआ है। जनतंत्र का नागरिक किसी स्थायी चीज में विश्वास नहीं रखता फलस्वरूप नये-नये तथ्यों की खोज में लगा रहता है। जीवन के मूल्य शाश्वत एवं स्थिर नहीं होतें, वे बदलते रहते हैं। अतएव परिवर्तन में विश्वास होना, आवश्यक भी हैं।

(व) तर्कयुक्त परिवर्तन करना-सच्चे जनतंत्र में लीग तर्कयुक्त हुआ करते हैं और जो भी परिवर्तन होते हैं उन पर विचार विनिमय होता है | सभी के सामने तर्क रखे जाते हैं और उन्हें समझा-बुझाकर परिवर्तन की ओर अग्रसर किया जाता है। सर्वसम्मति से पारित प्रस्तावों के अनुकूल ही परिवर्तन किया जाता है, मनमाना नहीं।

(श) सेवा-भावना- विद्वानों ने सेवा-भावना को जनतंत्र का मूलमंत्र कहा है। यदि जनतंत्र सभी लोगों का सभी के द्वारा संगठन है तो निश्चय है कि वह सभी लोगों के लिए भी होगा। इस आधार पर सभी सदस्यों की सेवा करने के लिए तत्पर रहना पड़ता है। ऐसी सेवा निःशुल्क होती है और स्वेच्छा से होती है बलात् नहीं। सेवा और सहयोग दोनों साथ-साथ चलते हैं। इसीलिए रायबर्न महोदय ने लिखा है कि “जनतंत्र ऐसी प्रणाली है जिसमें समुदाय के सदस्य साथ-साथ रहते हैं, जिससे कि प्रत्येक सदस्य समुदाय की अधिकतम सेवा कर सके और समुदाय प्रत्येक व्यक्तिगत सदस्य को अधिकतम सेवा दे सके।” बात बिल्कुल सही है सेवा के साथ त्याग की भावना लोगों में पाई जाती है।”

(ल) प्रगतिशीलता- जनतंत्र व्यक्ति एवं समुदाय की प्रगतिशीलता से सम्बद्ध होता है। अतएव जनतंत्रीय संगठन में व्यक्ति समाज की ओर समाज व्यक्ति की प्रगति एवं उन्नति में प्रयत्नशील होता है। सच्चे अर्थ में जनतंत्र वहाँ पाया जाता है जहाँ व्यक्ति और समाज दोनों प्रगतिशील होते हैं। व्यक्ति समाज के हितार्थ सेवा करे और समाज व्यक्ति को सभी सुविधा प्रदान करे तभी दोनों प्रगति-पथ पर आगे बढ़ेंगे।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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