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काव्य की परिभाषा | काव्य के भेद | काव्य भाषा की परिकल्पना तथा स्वरूप | काव्य के मूलभूत लक्षण

काव्य की परिभाषा | काव्य के भेद | काव्य भाषा की परिकल्पना तथा स्वरूप | काव्य के मूलभूत लक्षण

काव्य की परिभाषा

संस्कृत और हिन्दी दोनों भाषाओं के आचार्यों तथा समालोचकों ने काव्य की अनेक परिभाषाएँ प्रस्तुत की हैं। उनमें आचार्य विश्वनाथ की परिभाषा सर्वश्रेष्ठ और मान्य है। वह परिभाषा इस प्रकार है-

‘वाक्यं रसात्मकं काव्यम्।’

(अर्थात् रसात्मक वाक्य ही काव्य होता है।)

यहाँ वाक्य का तात्पर्य कर्ता, कर्म, करण, क्रिया आदि से निर्मित सार्थक अक्षर समूह से नहीं है। यहाँ वाक्य का तात्पर्य रचनाकार के कथ्य की समाप्ति से है। जिस वाक्य को काव्य कहा गया है, वह संस्कृत की वाल्मीकि ‘रामायण’ तथा ‘महाभारत’ को और हिन्दी के ‘रामचरितमानस’ को भी अपने में समाविष्ट करने की क्षमता रखता है।

काव्य के परम्परागत रूप से प्रबन्ध और मुक्तक दो भेद माने जाते हैं। प्रबन्ध के भी दो भेद किये गये हैं महकाव्य और खण्डकाव्य। संस्कृत के आचार्यों ने गद्य और पद्य दोनों के रूप में मिश्रित विरचित काव्य को चम्यू नाम दिया है। चम्पू का लक्षण भी यही है

‘गद्य-पद्य मयं काव्यं चम्पूइत्यभिधीयते।’

संस्कृत भाषा में विरचित अनेक चम्पू ग्रन्थ प्राप्त होते हैं। हिन्दी भाषा में प्राप्त होने वाले चम्पू काव्यों की संख्या कम है।

काव्य के भेद/प्रकार

काव्य के भेदों अथवा प्रकारों का सामान्य परिचय प्रस्तुत है—

(क) महाकाव्य

बन्ध अर्थात् एक सुनिश्चित क्रम के आधार पर रचित भाव-प्रधान तथा विषय प्रधान काव्य के दो प्रमुख भेद माने जाते हैं-प्रबन्ध काव्य और मुक्तक-काव्य प्रबन्ध-काव्य के भी दो भेद माने जाते हैं— महाकाव्य एवं खंडकाव्य। ‘महाकाव्य’ शब्द ‘महत्’ और ‘काव्य’ दो शब्दों से मिलकर बना है। इनमें पहला शब्द विशेषण और दूसरा विशेष्य है। महाकाव्य शब्द में विशेष्य का अधिक महत्व होता है। अतः इस शब्द में भी ‘काव्य’ ही प्रमुख हैं और दोनों शब्दों का अर्थ होता है बड़ा काव्य’ क्योंकि ‘महत् से विशाल’, ‘ उत्कृष्ट’ का भी भाव प्रकट होता है। इसे यों भी कहा जा सकता है कि महाकाव्य जीवन के महत् का विवेचन होता है।

महाकाव्य का ‘महा’ शब्द- काव्य के लिए महत्’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम ‘वाल्मीकि रामायण’ में हुआ है। जो संग में अपनी कथा का वर्णन सुनने के बाद लव-कुश से कहा- इस विशाल आकार वाले काव्य के कर्ता कौन है—

‘किम् प्रमाणमिदम् काव्यम् का प्रतिष्ठा महात्मनः।

कर्ता कान्यस्य हतः हव चासौ मुनि पुगनः ॥’

लोक में यह तो स्वतः ध्वनित है कि इसमें किसी महान् व्यक्तित्व के चरित्र की प्रतिष्ठा होती है।

महाकाव्य का स्वरूप- महाकाव्य के स्वरूप पर भारतीय और पाश्चात्य दोनों ही आचार्यों ने विचार किया है। यहाँ संक्षेप में उनके मतों की समीक्षा करना उपयुक्त रहेगा-

भारतीय आचार्यों के मत-

(क) आचार्य भामह के अनुसार-भामह सर्वप्रथम भारतीय आचार्य है, जिन्होंने महाकाव्य के लक्षणों पर विचार किया है। उनके अनुसार महाकाव्य-

(1) सर्गबद्ध होना चाहिए और महान् चरित्रों से संबद्ध होना चाहिए।

(2) उसका आकार भी बड़ा होना चाहिए।

(3) वह ग्राम्य-शब्दों से रहित तथा अर्थ-सौष्ठव-सम्पन्न अलंकारयुक्त हो।

(4) वह सत्पुरुष आश्रित हो।

(ख) खण्डकाव्य

संस्कृत आचार्यों ने महाकाव्य पर पर्याप्त विस्तार से विचार किया है, परन्तु खण्ड-काव्य पर केवल छुट-पुट चर्चा ही हो सकी है।

(क) आचार्य रुद्रट- इन्होंने प्रबन्धों के दो भेद किये-महान् और लघु। इन्होंने इनका अन्तर इस प्रकार किया है-

“तत्र महान्तो येषु चवितस्तेध्वभिधीयते चतुर्वर्गः सर्वे रसाः क्रियते काव्य-स्थानानि सर्वाणितेलघवो-विज्ञेया तेष्ण्वन्यतमो भवेच्चतुर्वर्गात, असमग्रानेकम् रसाये च समग्रैक रसयुक्ताः ।’

(अर्थात् महाकाव्य में चतुर्वर्ग-धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का वर्णन होता है एवं सभी रसों को प्रमुख अर्थात आश्रित रूप में प्रतिनिधित्व प्राप्त होता है, इसके विपरीत लघु-काव्य में चतुर्वर्ग में से किसी एक का और रसों में से किसी एक का समावेश होता है।)

(क) आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र- ‘महाकाव्य के ही ढंग पर जिस काव्य की रचना होती है, पर जिसमें पूर्ण जीवन न ग्रहण करके खण्ड-जीवन ही ग्रहण किया जाता है, उसे खण्डकाव्य कहते हैं। यह खण्ड जीवन इस प्रकार व्यक्त किया जाता है, जिससे वह प्रस्तुत रचना के रूप में स्वतः पूर्ण होता है।

(ख) डॉ० शम्भूनाथ सिंह- ‘सीमित दृष्टिपथ से जीवन का जितना दृश्य दिखाई पड़ता है, उसी का चित्रण कहानी और खण्ड-काव्य-दोनों में होता है।’

(ग) मुक्तक-काव्य

‘बंध की दृष्टि से प्राचीन भारतीय समीक्षकों ने श्रव्य-काव्य के दो भेद माने हैं-प्रबन्ध और मुक्तका प्रबन्ध में कथा होने से पूर्वापर-सम्बन्ध रहता है, परन्तु मुक्तक में पूर्वापर सम्बन्ध का निर्वाह आवश्यक नहीं रहता, क्योंकि इसका प्रत्येक छंद स्वतंत्र रहता है और प्रबन्ध-काव्य की भाँति इसमें कोई कथा नहीं होती। हाँ, कुछ मुक्तक अवश्य ऐसे होते हैं, जिनका प्रत्येक छंद स्वतंत्र अथवा अपने आप में पूर्ण भी होता है और उनमें एक कथासूत्र भी अनुस्यूत होता है। सूर का ‘भ्रमर-गीत’, तुलसी की विनय पत्रिका’ एवं ‘गीतावली’ इसके उदाहरण हैं।

  1. मुक्तक का स्वरूप- आधुनिक समीक्षकों के अनुसार काव्य के दो भेद होते हैं- व्यक्तित्व प्रधान अर्थात् विषयीगत (Subjective) तथा विषय-प्रकृत (Objective)। इन्हें क्रमशः भाव-प्रधान और विषयः प्रधान भी कहते हैं। इस दृष्टि से मुक्तक भाव-प्रधान काव्य की श्रेणी में आता है। भाव-प्रधान कविता में कवि की वैयक्तिक अनुभूतियों, भावनाओं और आदर्शों की प्रधानता रहती है, भाव-प्रधानता के कारण इसमें गीतात्मकता का विशेष स्थान रहता है। हेमचन्द्र ने ‘शब्दानुशासन’ में ‘अनिबद्ध मुक्तादि’ कहकर यह भाव व्यक्त किया है कि मुक्तादि अनिबद्ध होते हैं।

(घ) नाटक

काव्य से प्राय: और साधारण रूप से पद्य का ही बोध होता है। संस्कृत के आचार्यों ने नाटकों को भी काव्य के अन्तर्गत स्थान दिया है। संस्कृत काव्यशास्त्र से सम्बन्धित यह उक्ति अत्यधिक प्रचलित है—

‘काव्येषु नाटकं रम्यम्, तत्र रम्या शकुन्तला।’

(काव्यों में नाटक रमणीय है और नाटकों में शकुन्तला अर्थात् कालिदास द्वारा रचित ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ रमणीय है।)

संस्कृत के नाटकों में जो संवाद होते थे, उनमें पद्यों की अधिकता के कारण उन्हें काव्य में सम्मिलित किया गया था। कुछ संवाद तो दो-दो, तीन-तीन पद्यों वाले होते थे।

हिन्दी-साहित्य में रीति-काल तथा आधुनिक काल के आरम्भ में जो नाटक लिखे गये, उनके   सम्वाद या तो पूर्णतः पद्यात्मक थे अथवा संवादों में गद्य के साथ पर्यों को भी स्थान दिया गया था। जयशंकर प्रसाद के अधिकांश नाटकों में गीतों की अधिकता भी नाटक को काव्य के अन्तर्गत मानने को विवश करती है। प्रसादजी के समकालीन एवं उनसे पूर्ववर्ती नाटककारों ने साहित्य-सेवा काव्य-रचना के रूप में आरम्भ की। इस कारण उन्हें मधुर और रसमय गीतों की रचना में कोई असुविधा नहीं हुई। इस प्रकार नाटक में गीतों का निर्वाह भी हो गया और उनको अपने कवित्व के प्रदर्शन का अवसर भी प्राप्त हो गया। जब हिन्दी के नाटककार अंग्रेजी नाटकों से प्रभावित हुए तो नाटकों में से गीत निकाल दिये गये।

भरतमुनि ने नाटक को दृश्य-काव्य माना है। श्रव्य-काव्य को रूपक कहा गया है। रूपक के अनेक भेदों में से नाटक प्रमुख है। भरतमुनि ने नाटक शब्द का प्रयोग न करके ‘नाट्य’ शब्द का प्रयोग किया है। उन्होंने नाटक में अभिनय को प्रधानता देते हुए नाट्य को अवस्था का अनुकरण कहा है-

‘अवस्थानुकृतिनाट्यम्।’

(अर्थात् अभिनय वास्तव में उस पात्र की अवस्था का अनुकरण ही होता है।) महाकवि कालिदास के अनुसार-

‘त्रैगुण्योद्भवमत्र लोकचरितम् नानारसम् दृश्यते ।

नाट्यं भिन्नरुचेर्जनस्य बहुधा रुचये समाराधनम्॥

नाटक में तीन गुणों (सत्, रज, तम) का उद्भव, नाना प्रकार के स्वभाव तथा चरित्रों के व्यक्तियों का वर्णन एवं विविध रसों का चित्रण होता है। अतः भिन्न-भिन्न रुचि के व्यक्तियों को समान रूप से आनन्द देने का एक साधन नाटक है।

(ड.) रूपक और उपरूपक

रूपक

रूपक अलंकार के लिए प्रयुक्त होता है। एक बस्तु में अन्य वस्तु के आरोप को रूपक कहते हैं। ‘नाट्यशास्त्र में— अभिनेयता या नट के ऊपर पात्रों के रूप, अवस्था का …तत्व का आरोप किया जाता है, क्योकि नाटक के विकास में अनुकरण वृत्ति ही प्रधान रही है। … में मानव या मानवेतर प्रकृति का … कर उसके द्वारा रसोदबोध होता है। दशरूपककार के अनुसार-

‘अवरधानुकृतिनाट्या

(अर्थात् अवस्था के अनुकरण को ही नाट्य कहते हैं।)

अवस्थानुकरण से तात्पर्य है-चाल-ढाल, वेश-भूषा, अलाप-प्रलाप आदि के द्वारा पात्रों की प्रत्येक अवस्था का अनुकरण इस ढंग से किया जाय कि नटों में पात्रों की तादात्म्य-अनुभूति हो जाये। जैसे—नट दुष्यन्त की प्रत्येक प्रवृत्ति की ऐसी अनुकृति

(अनुकरण) करे कि सामाजिक

(दर्शक) उसे दुष्यन्त ही समझे, अभिनय में यह भेद लुप्त हो जाए।

नाट्य को ही रूप और रूपक कहा जाता है। नाट्य ‘रूपक’ इसलिए कहलाता है, क्योंकि वह दृश्य होता है-

‘रूपं दृश्यतयोच्यते’

नाट्य केवल श्रव्य न होकर रंगमंच के ऊपर अभिनीत भी होता है, अतः यह दृश्य है अर्थात् देखा जा सकता है। हम अपनी नेत्र-इन्द्रिय के विषय को ‘रूप’ कहते हैं। इस प्रकार नेत्रों से ग्राह्या होने के कारण नाट्य को रूप या रूपक कहा जाता है।

उपरूपक

उपरूपक से तात्पर्य रूपक के उपभेदों से है अर्थात् रूपक के जो दस भेद किये गये हैं, वे ही उपरूपक हैं। इनके भी भेद माने गये हैं-

(1) नाटिका- इसकी कथावस्तु कल्पित एवं चार अंकों की होती है। इसमें दो नायिकाएँ होती हैं। ज्येष्ठा नायिका देवी या महारानी होती है। कनिष्ठ-नायिका के साथ नायक का मिलन बड़े कष्ट से होता है। यह संगम ज्येष्ठा के अधीन होता है। कनिष्ठा राजवंश की होकर भी मुग्धा और अत्यधिक रूपवती होती है।

(2) मोदक- इसमें विषम अंकों की योजना होती है (सात, नौ, पाँच)। इसके पात्र देवता या मनुष्य होते हैं। यह शृंगार रस-प्रधान होता है और प्रत्येक अंक में विदूषक की योजना होती है।

(3) गोष्ठी- इसमें नौ या दस पुरुष पात्र तथा पाँच या छः स्त्री पात्र होते हैं। इसे एकांकी भी कह सकते हैं। इसमें शृंगार की प्रधानता रहती है।

(4) सट्टक- इसकी रचना प्राकृत में होती है और अद्भुत रस की प्रधानता होती है। यह नाटिका से मिलता-जुलता है।

(5) नाट्य रासक- यह एकांकी ताल और लय-प्रधान होता है। इसका नायक उदात्त तथा नायिका वासकसजा होती है।

(6) स्थानक- यह दो अंक तथा दस नायकों बाला उपरूपक है, जिसका उपनायक हीन. व्यक्ति होता है और नायिका दासी।

(7) इस दिव्य कथा के साथ धीरोदात नायक होता है और चार नायिकाएँ होती हैं। इसमें श्रृंगार, हास्य और करुण रसों का प्रयोग होता है। इसका अंक एक ही होता है।

(8) काव्य- हास्य रस-प्रधान, उदात्त नायक और नायिका से युक्त, गीतिवाहुल्य रूपक ही काव्य माना गया है-

(9) रासक- एकांकी, पाँच पात्रों वाला, मूर्ख नायक और प्रसिद्ध नायिका से युक्त रूपक को ही रासक कहा जाता है।

(10) प्रेखण- इसमें एक ही अंक होता है और प्रायः नायकहीन पात्र होते हैं। इसमें युद्ध का वर्णन होता है।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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