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लोंजाइनस का उदात्त सिद्धान्त | उदात्त का स्वरूप | उदात्त के तत्त्व | काव्य में उदात्त-तत्त्व

लोंजाइनस का उदात्त सिद्धान्त | उदात्त का स्वरूप | उदात्त के तत्त्व | काव्य में उदात्त-तत्त्व

लोंजाइनस का उदात्त सिद्धान्त

काव्य में उदात्त-तत्त्व पर पाश्चात्य विचारकों ने विस्तार से विचार किया है। उदात्तता पर मुख्य रूप से विचार लोजाइनस ने किया है, पर कैकिलिडस तथा ब्रेडले आदि ने भी इस पर विचार किया है। यद्यपि प्रत्येक के विचार एक-दूसरे से सम्बद्ध हैं, फिर भी प्रत्येक का अपना स्वतन्त्र अस्तित्व है। कैकिलिडस ने इस पर अपने विचार समग्रता से नहीं दिये हैं और न ही उन्होंने आधारभूत तत्त्वों को ही ठीक से पकड़ा है। उन्होंने तो अनेकानेक उदाहरणों द्वारा ‘उदात्त’ के स्वरूप का ही विवेचन किया है। उन्होंने इस बात का विवेचन कि हम अपनी स्वाभाविक क्षमता को औदात्य के किसी निश्चित स्तर तक किस प्रकार उन्मादित कर सकते हैं, अनावश्यक समझकर छोड़ दिया है।

लोजाइनस और ब्रेडले ने उदात्त तत्त्व पर विस्तार से विचार किया है। अब हम इनके आधार पर उदात्त के स्वरूप और तत्त्वों पर विचार करेंगे।

उदात्त का स्वरूप

लोंजाइनस ने उदात्त को स्वतः स्पष्ट मानकर वैसे ही छोड़ दिया है, उनकी परिभाषा नहीं दी है। मनोवैज्ञानिक और व्यावहारिक दोनों ही प्रकार की दृष्टि होने के कारण उन्होंने उदात्त के अन्तरंग और बहिरंग दोनों ही पक्षों पर विचार किया है। लोजाइनस के अनुसार, ‘अभिव्यंजना की श्रेष्ठता और विशिष्टता का नाम उदात्तता है।’

‘Sublimity is a certain distinction and excellence in expression.”

उदात्त के आधार पर ही कवियों को यश और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। इसलिए उन्होंने उदात्त के लिए पाँच बातों को आवश्यक माना है-

(i) महान् धारणाओं की क्षमता या विषय की गरिमा;

(ii) भावावेश की तीव्रता;

(iii) समुचित अलंकार-योजना;

(iv) उत्कृष्ट भाषा तथा

(v) गरिमामय रचना-विधान। इसमें से प्रथम दो तो जन्मजात हैं और बाद की तीन कलागत।

प्रथम दो बातें तो उदात्त के अन्तरंग पक्ष के अन्तर्गत आती हैं और जो कलागत हैं, वे काव्य के बहिरंग पक्ष में आती हैं। इनके साथ ही उन्होंने अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए उन तत्वों का भी उल्लेख किया है, जो आदात्य के विरोधी है।

इस प्रकार उदात्त से स्वरूप विवेचन के तीन पक्ष हो जाते हैं-

(i) अन्तरंग तत्त्व,

(ii) बहिरंग तत्त्व और

(iii) विरोधी तत्त्व |

  1. अन्तरंग तत्त्व- उदात्त के स्वरूप का विवेचन करते समय सार्त्र ने जिन पाँच बातों को आवश्यक माना है, उनमें महान् धारणाओं की गरिमा और भावावेश की तीव्रता को अन्तरंग तत्त्व के अन्तर्गत लिया गया है। क्योंकि इनका सम्बन्ध काव्य की भावनाओं से है।
  2. उदात्त विचार या धारणाओं की गरिमा- कवि की कोई भी कृति तब तक महान् नहीं हो सकती, जब तक उसमें महान् धारणाओं की क्षमता नहीं होती। उदात्त विचारों का पोषण आत्मा के द्वारा होता है। अतः यह गुण अर्जित न होकर स्वाभाविक ही होता है। इसे प्रतिभा द्वारा सिद्ध भी कर सकते हैं। कवि को क्षुद्र और हीन विचारों से मुक्त होकर महान् व उदात्त भाव का निस्सरण ही करना चाहिए। श्रेष्ठ रचना के लिए विषय का विस्तृत होना आवश्यक है। डॉ० नगेन्द्र ने भी इसके विषय में लिखा है—’विषय ऐसा होना चाहिए जो पाठक-श्रोता पर स्थायी प्रभाव डाले जिससे प्रभावित न होना कठिन ही नहीं, लगभग असम्भव हो जाय और जिसकी स्मृति इतनी प्रबल और गहरी हो कि मिटाये न मिटे ।’

विचारों की भव्यता और उदात्तता के सम्बन्ध में लोजाइनस के मत को इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है—

(क) विचारों की भव्यता के बिना महान् एवं अमर रचना सम्भव नहीं।

(ख) विचारों की भव्यता से तात्पर्य मन की ऊर्जा से है।

(ग) विचारों की भव्यता प्रायः प्रकृति की देन होती है।

(घ) विचारों की भव्यता स्वाभाविक रूप में उदात्त शैली में अभिव्यक्ति पा जाती है।

(ङ) विचारों की भव्यता महान् कृतियों के अनुशीलन द्वारा भी प्राप्त की जा सकती है।

(च) विचारों की भव्यता के अन्य साधन हैं-रचना में महत्त्वपूर्ण ब्योरों के चुनाव और उसके संगठन द्वारा एकता तथा विशद् बिम्बों की योजना जिससे पाठक अथवा श्रोता पर उत्कट तथा स्थायी प्रभाव पड़े।

  1. उदात्त भावावेग अथवा भावों की तीव्रता- उदात्त का दूसरा तत्त्व जो उसके अन्तर्गत तत्त्व से सम्बद्ध है, उद्दाम और प्रेरणाप्रसूत भव्य आवेग है। कोई रचना तभी महान् होगी जब उसमें आवेगों की भव्यता होगी। लोजाइनस का इस सम्बन्ध में स्पष्ट विचार है, ‘जो आवेग उन्माद, उत्साह के साथ उद्दाम वेग से फट पड़ता है और एक प्रकार से वक्ता के शब्दों में विक्षेप से परिपूर्ण कर देता है, उसके यथा-स्थान व्यक्त होने से स्वर में जैसा औदात्य आता है, वह अत्यन्त दुर्लभ हैं।’

आवेग के दो भाग किये गये हैं-

(i) भव्य आवेग और

(ii) निम्न आवेगा

जिस आवेग से आत्मा ऊपर उठकर हर्ष और उल्लास से भर जाती है, वह ‘भव्य आवेग होता है और जिस आवेग से आत्मा में करुणाजन्य निराशा और हताशा आदि आती है, वह निम्न आवेग होता है। इसमें दया, शोक, भय आदि विकार आते हैं और पहले में ओज, शौर्य, रति, हास्य आदि भाव आते हैं। पहले प्रकार के आवेग से आत्मा का उत्कर्ष और दूसरे प्रकार के आवेग से आत्मा का अपकर्ष होता है। उदात्त के लिए भव्य आवेग को आवश्यक और प्रभावकारी माना गया है।

लोजाइनस हर्ष, उल्लास, आदर और विस्मय को उदात्त के लिए बहुत आवश्यक मानते हैं। इनसे पाठक की चेतना अभिभूत हो जाती है।

  1. बहिरंग तत्त्व- उदात्त तत्त्व के अन्तर्गत लोंजाइनस ने भाषा-शैली आदि पर विचार किया है। ये तत्त्व भाषा-शैली, रचना-विधान आदि के द्वारा पुष्ट होते हैं। उन्हें लॉजाइनस ने ‘कला की उपज’ माना है। ये तत्व तीन हैं-

(1) समुचित अलंकार योजना,

(2) उत्कृष्ट भाषा और

(3) गरिमामय रचना-विधान।

  1. समुचित अलंकार योजना (Formation of Figures)- उदात्त शैली के लिए अलंकारों का प्रयोग आवश्यक माना गया है, इसलिए उस युग में अलंकारों का निर्बाध प्रयोग होता था। पर इसे कोई मनोवैज्ञानिक आधार प्राप्त नहीं था, परन्तु अलंकारों का प्रयोग उचित होना चाहिए। अतः मात्र चमत्कार प्रदर्शन के लिए उनका प्रयोग उन्हें भान्य न था। वह अलंकार को तभी उपयोगी मानते थे, जब वह जहाँ प्रयुक्त हुआ है, पाठक को वह मात्र चमत्कृत ही न करे, अपितु आनन्दं भी प्रदान करे। अलंकारों की अभिव्यक्ति स्वाभाविक होनी चाहिए, सप्रयास या यूँसी हुई वह ज्ञात न होनी चाहिए। लोजाइनस ने स्पष्ट लिखा है कि ‘अलंकारों का प्रयोग इस कुशलता से होना चाहिए कि इस बात पर किसी का ध्यान न जाय कि वह अलंकार है। इससे स्पष्ट है कि वह अलंकारों को काव्य के उत्कर्ष का हेतु मानते हैं, अर्थात् अलंकार साधन हैं, साध्य नहीं।’

जहाँ तक उदात्त के पोषक अलंकारों के निर्देश का प्रश्न है, लोंजाइनस ने अनेक अलंकारों का विवेचन किया है, जिनमें विस्तारणा, शपथोक्ति, प्रश्नालंकार, विपर्यय, व्यतिक्रम, पुनरावृत्ति, ‘छिन्नवाक्य, प्रत्यक्षीकरण, संचयन सार, रूप परिवर्तन, पर्यायोक्ति, रूपक आदि मुख्य हैं।

  1. उत्कृष्ट भाषा (Noble Diction)- उदात्त की अभिव्यक्ति भाषा के माध्यम से होती है, अतः भाषा ही उदात्त का मूलाधार है। लोजाइनस ने भाषा के उत्कृष्ट होने पर विशेष बल दिया है। वह उत्कृष्ट भाषा के अन्तर्गत रूपक, शब्द-चयन, भाषा की सज्जा आदि लेते हैं। पद-विन्यास और विचार एक-दूसरे के आश्रित हैं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि उदात्त गरिमामयी भाषा से ही अभिव्यक्त हो जाता है। इसलिए शब्द-विन्यास का सुन्दर होना बहुत आवश्यक है। डॉ० नगेन्द्र के शब्दों में, ‘सुन्दर, शब्द ही वास्तव में विचार को विशेष प्रकार का आलोक प्रदान करते हैं।’ शब्द-विन्यास के दो पक्ष होते हैं-ध्वनि-पक्ष और अर्थ-पक्ष। इन दोनों के उचित समन्वय से ही काव्य में मोहकता, आकर्षण व माधुर्य उत्पन्न होता है। अनुकूल ध्वनि के शब्दों का चयन करने से मोहकता और मादकता आ जाती है। वह अनुभूति की तीव्रता की अभिव्यक्ति भाषा के माध्यम से ही मानते हैं। भाषा के लिए साथ में यह भी ध्यान में रखना है कि वह सर्वत्र गरिमामयी हो और शब्दयोजना भी संगीतात्मक प्रभाव के अनुरूप होनी चाहिए।
  2. गरिमामय रचना-विधान (Dignified & Elevated Composition) – रचना- विधान के अन्तर्गत शब्दों, विचारों, कार्यों, सुन्दरता तथा राग के अनेक रूप आदि आते हैं। इसका मूलाधार सामंजस्य है, अर्थात् भाषा का सामंजस्य। इससे उदात्त शैली की सृष्टि होती है। लोजाइनस इन सबके समन्वय से ही रचना-विधान की पूर्णता मानते हैं। इनके लिए वह शरीर- विधान से रचना-विधान की तुलना करते हैं कि जैसे शरीर के विभिन्न अवयवों के अकेले रहने पर कोई महत्व नहीं, सबके मिलने पर ही सम्पूर्ण शरीर की रचना होती है, । वैसे ही उदात्त शैली के सभी तत्त्व मिलकर कृति को गरिमामय बनाते हैं।

कल्पना तत्त्व (Element of Imagination)-  इन तत्त्वों के साथ ही लोंजाइनस ने एक और तत्त्व-कल्पना तत्त्व की ओर भी संकेत करते हुए कहा है कि कल्पना तत्त्व की भी उदात्त में अत्यधिक उपादेयता है। यद्यपि इसकी उन्होंने प्रत्यक्ष चर्चा नहीं की है, केवल बिम्बों का वर्णन किया है, पर बिम्बों से उनका अभिप्राय कल्पना से ही है। उनके अनुसार कल्पना वह शक्ति है, जो पहले कवि को मानसिक रूप में वर्ण्य-विषय का साक्षात्कार करा देती है और फिर उसकी सहायता से कवि भाषा में चित्रात्मकता द्वारा वर्ण्य विषय को इस तरह प्रस्तुत करता है कि वह सहृदय के समक्ष जीवन्त और प्रत्यक्ष ही उठता है। लोजाइनस की कल्पना सम्बन्धी यह धारणा आजकल की कल्पना सम्बन्धी धारणा से पृथक् नहीं है।

III. विरोधी तत्त्व- उदात्त के स्पष्टीकरण के लिए लोंजाइनस ने उदात्त के विरोधी तत्त्व पर भी विचार किया है, जिससे श्रेष्ठ कलाकार इनसे बचकर अपने काव्य की सर्जना कर सके। लोजाइनस ने बालेयता (Childishness) की उदात्त को प्रथम विरोधी तत्त्व माना है। असंयत वाग्विस्तार, अस्त-व्यस्त पद-रचना तथा हीन अर्थवाले शब्दों का प्रयोग वह उदात्त. शैली के अपकर्ष का कारक मानते हैं। वागाडम्बर भी उदात्त का अन्य विरोधी तत्त्व है। भावाडम्बर तथा शब्दाडम्बर भी उदात्त के लिए हानिकारक है। इसी तरह भाषा का असंयत प्रयोग भी विरोधी तत्त्व है, साथ ही अभिव्यक्ति की क्षुद्रता, अत्यन्त संक्षिप्तता, अनावश्यक साज-सज्जा, संगीत व लय की अधिकता से भी भाषा की गरिमा चली जाती है। कुत्सित व क्षुद्र अर्थवाले शब्दों के प्रयोग से भाषा हीन हो जाती है और तब विषय की गरिमा जाती रहती है। वह लिखते हैं-

‘Extreme conciseness cramps and cripples the thought; whereas brevity in the true sense is effective because of its economy and directness.’

पाश्चात्य विचारकों ने सौन्दर्यशास्त्र तथा काव्यशास्त्र में उदात्त को बहुत महत्त्व दिया है। उन्होंने चार रस माने हैं जिनमें सर्वश्रेष्ठ रस उदात्त को ही माना है। शेष तीन रस- सुन्दर, करुण और हास्य हैं।

ब्रेडले ने ‘On the sublime’ में उदात्त की व्याख्या करते हुए उसे बहुत विराट माना है और असीम क्षमता को इसका प्रमुख तत्त्व माना है। उदात्त के आधार पर ब्रेडले ने सुन्दर के पाँच भेद किये हैं—उदात्त, भव्य, सुन्दर, मनोरम और ललित। इनमें सुन्दर की स्थिति मध्यवर्ती है।

निष्कर्ष-

इस विवेचन से यह स्पष्ट है कि उदात्त का स्वरूप जो पाश्चात्य आलोचकों ने दिया। है, उनमें लोजाइनस का विशेष महत्त्व है। उसका भी अनुसरण परवर्ती आलोचकों ने किया है। डॉ० शान्तिस्वरूप गुप्त के अनुसार, ‘भावोत्कटता, अलौकिक, कल्पना-ऐश्वर्य और उत्कट प्रभाव क्षमता आदि जिन गुणों का उल्लेख लोंजाइनस ने किया है।’ ब्रेडले ने भी, असीम शक्ति के अन्तर्गत उन्हें स्वीकार किया है।

बेन जॉनसन भी विचार और भाषा के सम्बन्ध में इसी तरह के विचार अभिव्यक्ति करते हैं; यथा— ‘in all speech words and sense are as the body and soul.’

डॉ० नगेन्द्र भी ‘काव्य में उदात्त तत्त्व’ में उदात्त के स्वरूप और उसके औचित्य पर विचार करते समय लिखते हैं कि ‘भाषा का प्रयोग संयत होना आवश्यक है अन्यथा असंगत भाषा का प्रयोग छोटी-छोटी बातों को बड़ी-बड़ी और भारी-भरकम संज्ञा देना किसी छोटे से बालक के मुंह पर पूरे आकारवाला त्रासद अभिनय का मुखोटा लगा देने के समान है। इस उदात्त के लिए सून्दर का समावेश आवश्यक है। क्योंकि तभी पाठक की भावना का किसी कृतिकार की रचना से तादात्म्य हो पाता है।’

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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