अर्थशास्त्र / Economics

कृषि विपणन का अर्थ | भारत में कृषि-विपणन की वर्तमान प्रणाली | कृषि विपणन के दोष | कृषि-विपणन में सुधार हेतु उपाय

कृषि विपणन का अर्थ | भारत में कृषि-विपणन की वर्तमान प्रणाली | कृषि विपणन के दोष | कृषि-विपणन में सुधार हेतु उपाय

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कृषि विपणन का अर्थ (Agricultural Marketing)

कृषि-विपणन से तात्पर्य है कि जब कोई कृषक अपनी उपज को बेचकर उसका मूल्य प्राप्त करता हो, तो यह प्रक्रिया कृषि-विपणन कहलाती है। सामान्य भाषा में कृषि-विपणन में कृषि उपज को बेचकर उपभोक्ताओं तक पहुँचने की क्रिया ही विपणन है।

विस्तृत अर्थ में कृषि-विपणन का अर्थ है कि यह एक प्रक्रिया है जिसमें उपज का एकत्रीकरण, श्रेणीकरण, विधायन, संग्रहण व यातायात आदि अनेक क्रियाएँ सम्पन्न होती हैं। अतः कृषि-विपणन में फसल कटने के बाद उसका उपभोक्ता तक पहुँचना ही विपणन है।

भारत में कृषि-विपणन की वर्तमान प्रणाली

(1) उपज को गाँव में बेचना (Sale of Production in Villages)-

भारत में उपज का विक्रय गांवों में ही प्रचलित है, क्योंकि प्राचीन काल से कृषक उपज को गाँव के ही बाजार, हाट, महाजन, बनिया, घुमन्तू व्यापारियों को बेचता रहा है ।

(2) मेला या हाट में बेचना (Selling in Melas and Hats) –

ग्रामीण क्षेत्रों में मेला एवं हाट प्रचलित है। प्राचीन युग में कई गाँवों के हाट सप्ताह में एक या दो दिन लगते थे, जिससे लोग विनिमय सम्पन्न कर सकें।

(3) मण्डियों में उपज को बेचना (Selling of Produces in Mandies) –

वर्तमान विपणन प्रणाली में कृषि मण्डियों का विशेष स्थान है, क्योंकि शहरी सीमा के निकट मण्डियों या थोक बाजारों की स्थापना हुई है। आज के प्रत्येक शहर, तहसील या कस्बों में मण्डियाँ हैं। सरल अर्थ में मण्डी उस स्थान को कहते हैं, जहाँ थोक मात्रा में अनाज का क्रय-विक्रिय होता है।

(4) सहकारी समितियों द्वारा विक्रय (Sales by Co-operative Societies)-

भारत में सहकारिता का इतिहास पुराना नहीं है। कृषि क्षेत्र में अनेक सहकारी समितियाँ स्थापित हुई हैं, जो गाँवों के कृषकों की सदस्यता के आधार पर गठित हैं। इन समितियों ने कृषि-विपणन में योगदान दिया है।

(5) सहकारी खरीद (Government Purchase)-

वर्तमान समय में सरकारी खरीद हेतु केन्द्र स्थापित हुए हैं जो कृषकों से खाद्यान्न खरीदते हैं। ऐसे केन्द्रों में अनाज का मूल्य निश्चित किया जाता है, जहाँ किसान उत्पादनों को बेच सकते हैं। गाँवों में कृषक इसे ‘लेवी’ कहकर पुकारते हैं। इसका प्रयोग कृषकों को खाद, बीज आदि खरीदते समय अनिवार्य रूप से होता है।

कृषि विपणन के दोष (Defects of Agricultural Marketing)

कृषि-विपणन का सबसे बड़ा दोष मध्यस्थ है, क्योंकि गाँवों से लेकर मण्डियों तक मध्यस्थ के रूप में दलाल, आढ़तिया, फुटकर व्यापारी आदि फैले रहते हैं, जो कृषकों से मधुर व्यवहार के साथ उन्हें अपनी चालाकी का शिकार बनाते हैं । अनुमानतः 50 प्रतिशत विक्रय मूल्य की राशि मध्यस्थों की जेबों में जाती है।

(1) मध्यस्थों की बड़ी संख्या ( Large Number of Middleman)-

भारतीय कृषि-विपणन का सबसे बड़ा दोष मध्यस्थ हैं, क्योंकि गाँवों से लेकर मण्डियों तक मध्यस्थ के रूप में दलाल, आढ़तिया फुटकर व्यापारी आदि फैले रहते हैं, जो कृषको मधुर व्यवहार के साथ उन्हें अपनी चालाकी का शिकार बनाते हैं।

(2) भण्डारण क्षमता का अभाव (Lack of Warehousing Capacity)-

भारत में 60% कृषक गरीबी व ऋण ग्रस्तता में फँसे हैं, जिससे उपज का विक्रय कृषकों की विवशता है। अतः भण्डार क्षमता के लिए कृषकों की आर्थिक दशा उत्तरदायी है।

(3) दोषपूर्ण संग्रहण व्यवस्था (Flawful Accumulation System) –

भारतीय कृषकों के पास संग्रहण की सुविधा नहीं है, फलत: वे उपज को रोकने के लिए विवश होते हैं। इसका लाभ बिचौलियों को मिलता है, क्योंकि कृषकों की दोषपूर्ण संग्रहण व्यवस्था में कुठिला, कच्ची खत्तियाँ या बखारी, गड्ढे आदि होते हैं, जिनमें फसल को दीर्घकाल तक रोकना सम्भव नहीं है।

(4) वित्तीय सुविधाओं का अभाव (Lack of Financial Facilities)-

ग्रामीण क्षेत्रों में वित्तीय सुविधाओं का अभाव है, जिससे कृषकों की आपातकालीन आवश्यकताएँ पूरी नहीं हो पाती हैं। ऐसी परिस्थिति में कृषक फसल का सौदा पकने से पूर्व ही कर लेता है। इसी प्रकार पम्पिंग सेट, ट्रैक्टर, श्रेसर आदि खरीदने के लिए ऋण भी मिलता है, तो ऋण की मासिक, त्रैमासिक किस्त की पूर्ति करना आवश्यक होने के कारण उन्हें उपज शीघ्रातिशीघ्र बेचनी पड़ती है।

(5) परिवहन साधनों का अभाव (Lack of Transport Facilities)-

ग्रामीण क्षेत्र में रेल परिवहन की अनुपलब्धता है, सड़क का भी अभाव है। जल परिवहन शून्य है। ऐसी दशा में खेतों से उपज का घर तक व घर से बाजार (मण्डी) तक ले जाना अत्यन्त कठिन है। इसी कारण नाशवान कृषि पदार्थों के उत्पादन को प्रमुखता नहीं मिल रही है।

(6) दोषपूर्ण तौल व बॉँट (Flawful Weight)-

कृषि विपणन में सबसे बड़ा दोष बाँट व तौल के कारण है। प्रायः ग्रामीण क्षेत्रों में ईंटों, पत्थरों को बॉँट बनाकर प्रयोग होता है, जबकि शहरी मण्डियों में दोषपूर्ण बाँट पाये जाते हैं।

कृषि-विपणन में सुधार हेतु उपाय / सुझाव

(1) मध्यस्थों की समाप्ति (Elimination of Mediators) –

कृषि विपणन में मध्यस्थ चाहे लघु व्यापारी महाजन या साहूकार के रूप में हो, उनका उन्मूलन आवश्यक है। अतः मध्यस्थों की समाप्ति के साथ-खुले उपभोक्ता अनाज केन्द्र स्थापित होने चाहिए।

(2) गाँवों में लघु भण्डार गृहों की स्थापना (Establishment of Small Stores Houses in the Villages)-

यदि सरकार “अनाज भण्डार गृह” का निर्माण प्रत्येक ग्राम में करें तो कृषकों को खत्तियों, कुठिला, खुलें कमरों में खाद्यान्न रखने के दोषों से मुक्ति मिल सकती है। यह व्यवस्था ग्राम पंचायत के अधीन होनी चाहिए। जहाँ कृषक नाशवान कृषि पदार्थों का संग्रहण कर सके।

(3) ऋण की सुविधा (Facilities of Loans) –

कृषकों को कृषि उत्पादन और फसल विक्रय होने तक अनेक कार्यों के लिए ऋण की आवश्यकता है। अतः कृषकों के लिए ऋण की व्यवस्था के साथ पुराने कर्ज माफ होने चाहिए। यदि सरकार गाँवों में बैकिंग शाखा, सहकारी समितियाँ या अन्य संस्थाएँ ऋण हेतु स्थापित करें तो इस समस्या का समाधान भी हो सकता है।

(4) उचित मूल्य नीति (Proper Price Policy)-

ग्रामीण कृषकों को उपज का लाभकारी मूल्य प्राप्त हो यह सरकार व समाज दोनों का उत्तरदायित्व है, क्योंकि कृषि-विपणन की स्वार्थपूरक नीति व्यापारियों व सरकार द्वारा अपनाई जाती है। अतः इस बात की आवश्यकता है कि कृषि उपज की उचित मूल्य नीति शहरी मण्डियां तक सीमित न रहे, बल्कि ग्रामों तक एक ही मूल्य पर विक्रय हो। इससे कृषकों की आय में स्थिरता आयेगी।

(5) परिवहन साधनों का विकास (Development of Transport Means)-

कृषि-विपणन की रीढ़ परिवहन के साधन हैं। इसलिए ग्रामीण क्षेत्रों में सड़के आवश्यक हैं, जो सर्दी, गर्मी व बरसात में परिवहन के योग्य बनी रहें। ग्रामीण क्षेत्रों में टायर की बेलगाड़ियाँ, डीजल व पेट्रोल के ट्रक या ट्रैक्टरों का प्रबन्ध होना चाहिए।

(6) मानक बांटो का प्रयोग (Use of Standard Weigh)-

कृषि-विपणन में सुधार के लिए मानक बांटों का प्रयोग आवश्यक है, इनका निर्माण व चलन सरकार द्वारा निर्धारित होना चाहिए। यदि बांटों में हेर-फेर की शिकायत मिले, तो कड़ी दण्ड व्यवस्था लागू होनी चाहिए, जिससे विपणन में धोखेबाजी न हो सके। इससे विपणन व्यवस्था में ही सुधार नहीं होगा, बल्कि व्यापारियों की बेईमानी की प्रवृत्ति पर अकुश लगेगा।

(7) नियमित मण्डी व्यवस्था (Regular Mandi System) –

कृषि-विपणन में सुधार हेतु सरकारी कानूनों से नियमित मण्डियाँ विकसित होनी चाहिए, जिनका संचालन व्यवस्था मण्डी समिति से नियंत्रित होना चाहिए।

(8) मानकीकरण व श्रेणीकरण (Standardisation and Grading)-

कृषि-विपणन में मूलभूत सुधार हेतु कोर्ट द्वारा खाद्यान्न का श्रेणीकरण होना चाहिए जिससे एक ही अनाज की कोटि के आधार पर कीमत मूल्यांकित हो सके। जैसे- गेहूँ के-68, गेहूँ सोना कल्याणी, देशी गेहूँ आदि।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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