इतिहास / History

मध्य गंगा घाटी की नवपाषाणकालीन संस्कृति | Neolithic Culture of the Middle Ganga Valley in Hindi

मध्य गंगा घाटी की नवपाषाणकालीन संस्कृति | Neolithic Culture of the Middle Ganga Valley in Hindi

मध्य गंगा घाटी की नव पाषाणिक संस्कृति

मध्य-पूर्वी नव पाषाणिक संस्कृति का प्रसार गंगा नदी के उत्तर की ओर स्थित उत्तरी बिहार में माना जाता है। बिहार का उत्तरी क्षेत्र गंगा तथा उसकी सहायक घाघरा, गण्डक तथा कोसी आदि द्वारा लाई हुई मिट्टी से बना हुआ है। मध्य गंगा घाटी में अभी तक इस संस्कृति से सम्बन्धित एकमात्र उत्खनित पुरास्थल चिरांड है। चिरांड उत्तरी बिहार के सारन जिले में स्थित है। यहाँ पर सर्वप्रथम सन् 1962-63 में बिहार के पुरातत्त्व विभाग और पटना विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास एवं पुरातत्त्व विभाग की ओर से उत्खनन कार्य आरम्भ किया गया। सन् 1968 तक इसे ताम्र-पाषाणिक पुरास्थल माना जाता था किन्तु 1969-70 में और इसके बाद यहाँ पर जो उत्खनन हुए उनके फलस्वरूप यहाँ पर नव पाषाणिक संस्कृति से सम्बन्धित अत्यन्त महत्त्वपूर्ण साक्ष्य उपलब्ध हुए चिरांड के उत्खनन से प्राप्त पुरावशेषों को ध्यान में रखते हुए यहां कुल छः सांस्कृतिक काल माने गये हैं जिनमें से प्रथम सांस्कृतिक काल नव पाषाणिक है। इस काल का 3.50 मीटर मोटा सांस्कृतिक निक्षेप है। इस काल से नव पाषाणिक काल के ओपदार प्रस्तर उपकरण, हड्डी तथा शृंग के बने उपकरण तथा मृद्भाण्डों के ठीकरे प्राप्त हुए हैं।

आवास

चिरांड के नव पाषाण काल के लोग सम्भवतः बाँस-बल्लियों से निर्मित झोपड़ियों में रहते थे जिनका संकेत बाँस तथा नरकुल की छाप से युक्त जली हुई मिट्टी के टुकड़ों से मिलता है। सीमित क्षेत्र में शैर्षिक-उत्खनन के कारण मकानों की रूपरेखा के विषय में कोई विशेष जानकारी नहीं मिल पाई है।

मिट्टी के बर्तन

चिरांड की नव पाषाणिक संस्कृति में कई प्रकार के मृद्भाण्डों का प्रचलन था। अधिकांश मृद्भाण्ड हस्त-निर्मित थे किन्तु कुछ पात्र धीमी गति वाले चाक पर सम्भवतः बनाये गये थे। प्रमुख मृद्भाण्ड लाल, काले, सलेटी अथवा धूसर तथा कृष्ण-लोहित हैं। कुछ पात्रों को पकाने के पूर्व चमकाया गया था। सलेटी और कृष्ण-लोहित मृद्भण्डों में पकाने के बाद गैरिक रंग की चित्रकारी की गई थी। अलंकरण-अभिप्रायों में पाँच से सात-तिरछी रेखाएँ, संकेन्द्रिक अर्द्धवृत्त एवं वृत्त, लहरिया रेखाएँ आदि प्रमुख हैं। चिपकवाँ (Applique) तथा उत्कीर्ण अलंकरण बनाने की भी परम्परा थी। प्रमुख पात्र-प्रकारों में कटोरे, तसले, कलश, घड़े और टोंटीदार बर्तनों का उल्लेख किया जा सकता है

उपकरण

चिरांड के उत्खनन से नव पाणाषिक प्रस्तर के उपकरण बहुत कम संख्या में प्राप्त हुए हैं। छोटे आकार एवं गोल समन्तान्त वाली कतिपय कुल्हाड़ियाँ प्रस्तर के प्रमुख औजार हैं। अन्य प्रस्तर उपकरणों में सिल-लोढ़े, हथौड़े, गोफन-पाषाण आदि का उल्लेख किया जा सकता है जो क्वार्ट्जाइट, बेसाल्ट तथा ग्रेनाइट पत्थरों के हैं। लघु पाषाण उपकरणों में ब्लेड, खुरचनी, चान्द्रिक, बाण, छिद्रक तथा बेधक आदि चर्ट, चाल्सेडनी, अगेट और जैस्पर आदि पर बने हुए हैं। दन्तुर-कटक ब्लेंडों का अभाव है।

चिरांड की नव पषाणिक संस्कृति की एक प्रमुख विशेषता हड्डी तथा शृंग (Antlers) पर बने हुए उपकरणों को माना जा सकता है। इन औजारों में खुरचनी, छेनी, बरमे, बेधक, बाण, पुच्छल एवं खाँचेदार बाण, हथौड़े, कुदाल बाण सीधा करने के उपकण तथा हड्डी के बने हुए लटकन (Pendants), नाकेदार सुइयाँ एवं चूड़ियाँ आदि उल्लेखनीय हैं। विभिन्न आवश्यकताओं के अनुसार इन उपकरणों का उपयोग किया जाता रहा होगा।

कृषि तथा पशु पालन

चिरांड की नव पाषाणिक संस्कृति के लोग धान, मूंग, जौ, गेहूँ तथा मसूर की खेती करते थे। यहाँ से मवेशियों, हाथी, बारहसिंघा, हिरण तथा गैंडे की हड्डियाँ प्राप्त हुई हैं। अनुमान किया जाता है कि इनमें से गाय-बैल तथा भैंस पालतू पशु रहे होंगे। शेष जानवरों का शिकार किया जाता रहा होगा। हड्डी और बारहसिंघा तथा हिरण के श्रृंगों के बने हुए औजार भी इस बात के परिचायक हैं कि आखेट का इनके जीवन में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रहा होगा।

कालानुक्रम

चिरोड की नव पाषाणिक संस्कृति के विभिन्न स्तरों से 9 रेडियो कार्बन तिथियाँ प्राप्त हैं जिनके आधार पर इसका कालानुक्रम 1,800-1,200 ई०पू० माना जा सकता है लेकिन नव पाषाण काल के निचले स्तरों से रेडियो कार्बन तिथियाँ उपलब्ध नहीं हैं। इस आधार पर ऐसी सम्भावना व्यक्त की जा सकती है कि नव पाषाणिक संस्कृति के आरम्भ की तिथि कम से कम 2,500 ई०पू० प्रस्तावित की जा सकती है।

सादृश्य तथा उत्पत्ति

भारत के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित अधिकांश नव पाषाणिक पुरास्थल पर्वतीय अथवा पठारी क्षेत्रों में स्थित हैं। चिरांड के पुरास्थल मध्य गंगा घाटी के मैदानी भाग में स्थित है। विन्ध्य क्षेत्र के नव पाषाणिक पुरास्थलों से प्राप्त स्थलों से प्राप्त पुरानिधियों तथा पुरावशेषों से चिरांड के पुरावशेषों की तुलना करने पर कतिपय महत्त्वपूर्ण तथ्य ज्ञात होते हैं। दोनों ही क्षेत्रों में गोल समन्तान्त वाली ओपदार प्रस्तर-कुल्हाड़ियाँ तथा लघु पाषाण उपकरण मिले हैं। कृष्ण-लोहित पात्र-परम्परा में कटोरे तथा कलश दोनों क्षेत्रों में मिलते हैं। टोंटीदार पात्र भी दोनों क्षेत्रों में मिलते हैं। लेकिन विन्ध्य की डोरी-छाप पात्र-परम्परा का चिरांड में अभाव है। विन्ध्य क्षेत्र की नव पाषाणिक संस्कृति में हड्डी के औजारों का अभाव है जबकि चिरांड में इनका आधिक्य है। इसी प्रकार चिरांड से ककुदमान बैल, नाग तथा चिड़ियों की मृण्मूर्तियाँ मिली हैं। मृण्मय-चूड़ियाँ, हड्डी की बनी हुई चूड़ियाँ तथा अच्छी किस्म के पत्थर के मनके भी प्राप्त हुए हैं। विन्धय और पूर्वोत्तर भारत की नवपाषाणिक संस्कृतियों में इन तत्त्वों का पूर्ण अभाव दृष्टिगोचर होता है। ऐसी स्थिति में यह प्रतीत होता है कि मध्य-पूर्वी नव पाषाणिक संस्कृति का संघटन (Format) स्वतंत्र रूप से निर्मित हुआ।

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Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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