इतिहास / History

1848 से 1870 तक इटली का एकीकरण | इटली के एकीकरण में मेजिन, कावूर तथा गैरीवाल्डी के योगदान | इटली के एकीकरण में कावूर और गैरीबाल्डी के योगदान | इटली के एकीकरण में प्रमुख बाधाएँ | इटली के एकीकरण के विभिन्न चरण

1848 से 1870 तक इटली का एकीकरण | इटली के एकीकरण में मेजिन, कावूर तथा गैरीवाल्डी के योगदान | इटली के एकीकरण में कावूर और गैरीबाल्डी के योगदान | इटली के एकीकरण में प्रमुख बाधाएँ | इटली के एकीकरण के विभिन्न चरण

1848 से 1870 तक इटली का एकीकरण

18वीं शताब्दी के अन्तिम वर्षों में नेपोलियन ने उत्तरी इटली के आस्ट्रियन साम्राज्य के प्रान्तों को विजित कर उनमें दो विशाल गणराज्यों की स्थापना की थी। सम्राट बनने के पश्चात् नेपोलियन ने इटली के गणराज्यों तथा पोप के राज्यों को संयुक्त करके इटली के राज्यों की स्थापना की थी। इस प्रकार अनजाने ही उसने इटली के एकीकरण का कार्य आरम्भ कर दिया। नेपोलियन ने वहाँ शासन सुधार किया तथा ने पोलियन कोड लागू किया। इससे वहाँ के निवासियों में राष्ट्रीयता की भावना जागृत हुई और वे अपना प्राचीन गौरवपूर्ण अतीत याद कर अपने देश को एकीकृत कर पुनः महान् बनाने का विचार करने लगे।

1815 के वियेना समझौते ने इटली को फिर से छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त कर दिया जिनके शासक निरंकुश और स्वेच्छाकारी थे। लोम्बार्डी और वेनेशिया को आस्ट्रियन साम्राज्य का अंग बना दिया गया। पारमा, क्यूका, टस्कनी, मोडेना आदि छोटे-छोटे राज्यों पर आस्ट्रियन राजघराने के व्यक्ति शासन के रूप में थोप दिये गये। नेपिल्स तथा सिसली का शासक बूर्बों वंश का एक राजकुमार बना। रोम में पोप काऔर पीडमाण्ट में विक्टर इमेन्युल का शासन पहले से ही था।

19वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में इटली के देशभक्तों ने देश के एकीकरण के लिए गुप्त समितियों की स्थापना की और आन्दोलन किये। 1830 और 1848 के क्रान्तियों के समय विभिन्न राज्यों में विद्रोह हुए, किन्तु संगठन व निश्चित कार्यक्रम के अभाव और मेटरनिख के दमन-चक्र के कारण ये प्रयास असफल रहे।

इटली के एकीकरण में प्रमुख बाधाएँ

इटली के एकीकरण की प्रमुख बाधाएँ निम्न प्रकार हैं-

  1. विदेशी प्रभुत्व- इटली में विदेशी प्रभुत्व देश के एकीकरण के मार्ग में एक प्रमुख बाधा थी। इटली के अधिकांश राज्यों पर आस्ट्रिया का प्रभुत्व स्थापित था। आस्ट्रिया की दमनकारी नीति के कारण इटली के क्रान्तिकारियों को असफलता का सामना करना पड़ा।
  2. पोप का विरोध- रोम पर पोप का प्रभुत्व था। पोप के राज्य को जीतना कठिन था, क्योंकि इससे यूरोप की रोमन कैथोलिक जनता के नाराज होने का भय था। यूरोप के शक्तिशाली राज्य पोप के समर्थक थे। अतः जब तक पोप सत्तारूढ़ रहा, उसने इटली का एकीकरण नहीं होने दिया।
  3. प्रान्तीयता की भावना- इटली में प्रान्तीयता के कारण व्यापक फूट फैली हुई थी। इटली में राष्ट्रीय एकता की भावना का अभाव था। मेटरनिख कहा करता था, “इटली का एक प्रान्त दूसरे प्रान्त के विरुद्ध है, एक नगर दूसरे नगर के विरुद्ध है, एक गाँव दूसरे गाँव के विरुद्ध है, एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के विरुद्ध हैं।”
  4. विभिन्न राज्यों के राजाओं का वैमनस्य- राजाओं में इटली की एकता के लिए त्याग करने की भावना नहीं थी। सब अपनी निरंकुश सत्ता को बनाये रखना चाहते थे। उनमें इटली के एकीकरण के लिए उत्साह नहीं था।
  5. निश्चित योजना का अभाव- इटलीवासियों के सामने इटली के एकीकरण के लिए कोई निश्चित योजना नहीं थी। एक ओर मेजिनी गणत की स्थापना करना चाहता था तो दूसरी ओर साडीनिया के राजनीतिज्ञ राजतन्त्रीय शासन की स्थापना के समर्थक थे।

1848 से 1870 तक इटली का एकीकरण

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इटली के एकीकरण में गैरीबाल्डी, मेजिनी और कावूर की भूमिका

1848 से 1870 के काल में इटली के एकीकरण में जिन प्रमुख नेताओं ने योगदान दिया, उनमें मेजिनी, कावूर और गैरीबाल्डी हैं। इनका संक्षिप्त परिचय अग्रलिखित है-

  1. मेजिनी- मेजिनी को इटली की स्वतन्त्रता और इसके एकीकरण का पैगम्बर कहा जाता है। वह देश का एकीकरण चाहता था, किन्तु साथ ही वहाँ लोकतन्त्रात्मक गणराज्य भी स्थापित करना चाहता था। विद्यार्थी जीवन के उपरान्त उसने पीडमाण्ट की कार्बोनरी (गुप्त समिति) की सदस्यता ग्रहण की और 1830 के विद्रोह में सक्रिय भाग लिया। उसे छः महीने के लिए बन्दी बनाकर रखा गया और फिर देश से निर्वासित कर दिया गया।

मेजिन ने फ्रांस पहुँचकर वहाँ के प्रख्यातनगर मासेंलीज को अपना स्थायी निवास स्थान बनाया और वहाँ उसने ‘युवा इटली’ नामक संस्था की स्थापना की। इस संस्था द्वारा मेजिनी ने इटली के निवासियों में राष्ट्रीयता, स्वतन्त्रता और प्रजातन्त्र के विचारों का प्रचार किया। सम्पूर्ण इटली प्रायद्वीप में ‘युवा इटली’ की शाखायें स्थापित हो गयीं।1848 की क्रान्ति के समय सम्पूर्ण इटली निवासी आस्ट्रिया के विदेशी शासक और निरंकुशता के विरुद्ध उठ खड़े हुए। ‘युवा इटली’ की लोकप्रियता बढ़ती चली गई और 1833 तक इस संस्था के सदस्यों की संख्या 60 हजार तक पहुंच गई।

युवा इटली के उद्देश्य- युवा इटली के उद्देश्य निम्नलिखित थे-

(1) आस्ट्रिया को इटली से बाहर निकाल दिया जाए।

(2) इटली को स्वतन्त्र कर उसका एकीकरण किया जाए।

(3) इटली में गणतन्त्र की स्थापना हो।

(4) इटली का स्वतन्त्रता संग्राम केवल इटलीवासियों द्वारा चलाया जाए।

इटलीवासियों में राष्ट्रीयता का प्रसार- मेजिन ने इटलीवासियों में राष्ट्रीयता का प्रसार किया। उसने घोषित किया ‘इटली एक राष्ट्र है और राष्ट्र बनकर रहेगा।’ उसे नवयुवकों की शक्ति में पूर्ण विश्वास था। उसने कहा था कि “यदि समाज में क्रान्ति लानी है तो क्रान्ति का नेतृत्व नवयुवकों के हाथ में सौंप दो।” उसने इटलीवासियों में साहस-देशभक्ति, त्याग व बलिदान की भावनाएँ उत्पन्न कर दीं। उसने देशवासियों को प्रेरित करते हुए कहा था कि वे मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दें। उसका कहना था कि “स्वतन्त्रता के वृक्ष तभी फलते-फूलते हैं जब उन्हें खून से सींचा जाता है।” इस प्रकार मेजिनी ने इटलीवासियों में उत्साह, राष्ट्रीयता, देश-प्रेम आदि भावनाओं का संचार किया। उसने इटलीवासियों को तीन नारे दिये- ‘परमात्मा में विश्वास रखो, सब भाइयों को संगठित करो और इटली को मुक्त करो।” हेजन का कथन है कि “मेजिनी ने देशवासियों से कहा कि तुम देश-देश और गाँव- गाँव में स्वतन्त्रता की मशाल ले जाओ, जनता को स्वतन्त्रता के लाभ समझाओं और धर्म के रूप में प्रतिष्ठित करो जिससे लोग उसकी पूजा करने लगें! उनके हृदय में इतना साहस और सहन-शक्ति भर दो कि स्वतन्त्रता देवी की आराधना के लिए उन्हें जो पातनाएँ और कारगार के कष्ट भोगने पड़ें, उनसे वे न घबरायें।”

रोम में गणतन्त्र की स्थापना- मेजिनी ने1848 की क्रान्ति में भाग और1848 में रोम के पोप को गद्दी छोड़कर भागने के लिए विवश कर दिया। रोम में मेजिनी के नेतृत्व में गणतन्त्रवादी सरकार की स्थापना हुई, परन्तु कुछ समय पश्चात् ही फ्रांस के राष्ट्रपति लुई नेपोलियन ने पोप की सहायता के लिए फ्रांसीसी सेनाएँ भेज दी जिनकी सहायता से पोप पुनः रोम की गद्दी प्राप्त करने में सफल हुआ और मेजिनी को रोम छोड़कर भागना पड़ा।

मेजिनी के कार्यों का मूल्यांकन- जब पीडमाण्ड के उदार शासक विक्टर इमेन्युल के नेतृत्व में इटली का एकीकरण सम्पन्न हो गया तो मेजिनी में राष्ट्रीय एकीकरण समारोह में भाग नहीं लिया, क्योंकि वह मेजिनी की कल्पनाओं और आदर्शों में इतना भिन्न था कि उसे कोई प्रसन्नता नहीं हुई। यद्यपि मेजिनी इटली में गणराज्य स्थापित नहीं कर सका, फिर भी उसने देश में जागृत उत्पन्न कर एकीकरण के कार्यों में महान योगदान दिया। उसी धुआँधार प्रचार के कारण इटालियन नवयुवकों को विदेशी शासन का अन्त करने के लिए विद्रोह खड़े करने की प्रेरणा मिली। इसी कारण आज भी मेजिनी को इटली की स्वतन्त्रता के पैगम्बर और राष्ट्र-निर्माता के रूप में स्मरण किया जाता है। विदेश में रहते हुए ही 1872 में इस महान व अद्वितीय देशभक्त की मृत्यु हो गयी। साउथगेट का कथन है कि, “यह मेजिनी ही था जिसने अपने देशवासियों में स्वतन्त्रता के लिए उत्कट भावना उत्पन्न की। यद्यपि वह कावूर की भाँति कूटनीतिज्ञ नहीं था, गैरीबाल्डी की भाँति सेनानायक नहीं था, परन्तु वह एक कवि, आदर्शवादी विचारक और क्रान्ति का अग्रदूत था।”

  1. कावूर- कावूर का जन्म 1810 में एक उच्चवंशीय प्रभावशाली कुलीन के यहाँ हुआ था। उसने कुछ समय सेना में इंजीनियर के पद पर कार्य किया। वह अपनी युवावस्था में राष्ट्रीय विचारधारा से बहुत प्रभावित हुआ था और इंग्लैण्ड जैसी वैध राजसत्तात्मक शासन-प्रणाली को सर्वोच्च समझता था। उसने 1848 में एक पत्र का प्रकाशन किया और धीरे-धीरे पीडमाण्ड और इटली के अभ्य राज्यों में प्रसिद्ध हो गया। वह पीडमाण्ट की विधान परिषद का सदस्य निर्वाचित हुआ, उसने अनेक जनहितकारी कानून पास करवायें। 1850 में उसे मन्त्री नियुक्त किया गया। उसके कार्यों से प्रभावित होकर इमेन्यूल द्वितीय ने 1852 में उसे प्रधानमंत्री नियुक्त किया।

कावूर के कार्य- पीडमाण्ट का प्रधानमंत्री रहते हुए कावूर ने उसे एक आदर्श राज्य बनाने का प्रयास किया। शिक्षा, व्यापार, कृषि, चर्च आदि क्षेत्र में महत्वपूर्ण सुधार किये। उसने सेना की पुनर्व्यवस्था की, सैनिक प्रशिक्षण केन्द्र खोले और आधुनिक शास्त्रास्त्रों की व्यवस्था की। इन सुधारों के परिणाम स्वरूप पीडमाण्ट इटली का सबसे शक्तिशाली राज्य बन गया। वास्तव में कावूर चाहता था कि पीडमाण्ट के नेतृत्व में ही इटली की स्वतन्त्रता और एकीकरण सम्पन्न हो।

कावूर के उद्देश्य- (1) सार्डीनिया- पीडमाण्ड के नेतृत्व में इटली का एककरण किया जाए।

(2) आस्ट्रिया को पराजित किया जाए और इसके लिए यूरोप के शक्तिशाली देशों से सहायता प्राप्त की जाए।

अतः कावूर ने उपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए इंग्लैण्ड, फ्रांस आदि देशों से सहायता प्राप्त करने का प्रयत्न किया।

क्रीमिया युद्ध और कावूर-1854 में रूस और टर्की के बीच क्रीमिया का युद्ध छिड़ गया। इस युद्ध में इंग्लैण्ड तथा फ्रांस ने टर्की का साथ दिया। कावूर ने इंग्लैण्ड तथा फ्रांस की सहायता के लिए अपने 18 हजार सैनिक क्रीमिया भेज दिए। इस युद्ध में रूस की पराजय हुई। 1856 में पेरिस सम्मेलन में कावूर को भी आमन्त्रित किया गया। इस सम्मेलन में इंग्लैण्ड और फ्रांस ने इटली के एकीकरण में कावूर को यथाशक्ति सहायता देने का आश्वासन दिया। इस प्रकार इटली का प्रश्न एक अन्तर्राष्ट्रीय प्रश्न बन गया। पेरिस सम्मेलन में ‘कावूर की यह महान विजय थी, जिसके फलस्वरूप सम्पूर्ण इटली में इसकी प्रतिष्ठा बढ़ गई। अतः उचित ही कहा गया है कि “क्रीमिया के दलदल में इटली रूपी कमल का जन्म हुआ।”

फ्रांस से समझौता- 1858 में कावूर और फ्रांस के सम्राट नेपोलियन तृतीय के बीच एक समझौता हुआ जिसे ‘प्लम्बियर्स का समझौता’ कहते हैं। इस समझौते की मुख्य शर्ते निम्नलिखित थीं-

(1) यदि आस्ट्रिया सार्डीनिया पर आक्रमण करें तो फ्रांस सार्डीनिया की सहायता के लिए दो लाख सैनिक देगा।

(2) इस सहायता के बदले में फ्रांस को सेवाय तथा नीस के प्रदेश दिये जायेंगे।

(3) सार्डीनिया की राजकुमारी क्लोटाइल्ड का विवाह नेपोलियन तृतीय के चचेरे भाई जेरोम बोनापार्ट से कर दिया जायेगा।

(4) अम्ब्रिया और टस्कनी को मिलाकर इटली में एक नया राज्य बनाने और जेरोम बोनापार्ट को उस राज्य का शासक बनाने का भी निश्चय हुआ। नेपल्स और सिसली के राज्य तथा पोप के राज्य को पूर्ववत् बनाये रखा जायेगा।

आस्ट्रिया से युद्ध- 1859 में आस्ट्रिया और सार्डीनिया के बीच युद्ध छिड़ गया। इस अवसर पर फ्रांस के सम्राट नेपोलियन तृतीय ने अपने वचन का पालन करते हुए आस्ट्रिया के विरुद्ध दो लाख सैनिक भेजे । सार्डीनिया तथा फ्रांस की सेनाओं ने आस्ट्रिया की सेनाओं को अनेक स्थानों पर बुरी तरह पराजित किया। जब युद्ध चल ही रहा था, फ्रांस ने अपनी सेनाएँ वापस बुला लीं। फिर भी आस्ट्रिया को ज्यूरिख की सन्धि के अनुसार लोग्बाड़ी का प्रदेश सार्जीनिया को देना पड़ा। इस प्रकार इटली के एकीकरण का प्रथम चरण समाप्त हुआ।

मध्य इटली के राज्यों में विद्रोह- आस्ट्रिया की पराजय से उत्साहित होकर 1860 में परमा, मोडेना तथा टस्कनी की जनता ने विद्रोह कर दिया। इन राज्यों की जनता ने सार्डीनिया में सम्मिलित किये जाने का निश्चय किया। यद्यपि आस्ट्रिया ने इसका विरोध किया, परन्तु कावूर ने इंग्लैण्ड और फ्रांस की सहायता से आस्ट्रिया के विरोध को शान्त कर दिया। अन्त में परमा, मोडेना, टस्कनी, रोमाग्ना की जनता ने भारी बहुमत से साड़ीनिया के राज्य में मिलने का निर्णय किया। परिणामस्वरूप 1860 में ये राज्य सार्जीनिया में मिला लिये गए। यह कावूर की एक महान उपलब्धि थी।

दक्षिणी इटली में विद्रोह- कावूर की गुप्त सहायता प्राप्त करके 1860 में गैरीबाल्डी ने नेपल्स और सिसली पर भी अधिकार कर लिया। इन दोनों राज्यों को भी सार्डीनिया में मिला लिया गया। 6 जून 1861 को कावूर की मृत्यु हुई।

कावूर का मूल्यांकन- कावूर की गिनती 19वीं शताब्दी के महान् कूटनीतिज्ञों में आती है। उसने अपनी कूटनीतिक योग्यता से आस्ट्रिया को यूरोपीय राजनीति से अलग-थलग कर दिया और इंग्लैण्ड, फ्रांस आदि देशों का समर्थन प्राप्त करके अपनी स्थिति को सुदृण बना लिया। उसने इटली के एकीकरण में सर्वाधिक योगदान दिया। केटलबी का कथन है कि “मेजिनी एक अव्यावहारिक आदर्शवादी था तथा गैरीबाल्डी महान् योद्धा था, परन्तु कावूर के बिना मेजिनी का आदर्शवाद तथा गैरीबाल्डी की वीरता निष्पक्ष लड़ाई और निराशा के इतिहास में एक अध्याय और बढ़ा देती। वास्तव में कावूर द्वारा ही इटली का एकीकरण सम्पन्न हुआ। उसने मेजिनी की प्रेरणा को कूटनीतिक शक्ति में बदल दिया।”

डा. मथुरा लाल का कथन है। “कावूर ने इटली के लिए वास्तव में महान कार्य किया। एक राष्ट्र के रूप में इटली कावूर की ही देन है। इटली के एकीकरण के लिए मेजिनी, गैरीबाल्डी आदि देशभक्तों ने भी प्रयल किये थे। किन्तु कावूर की देन इन सबसे भिन्न थी। एक चतुर कूटनीतिज्ञ के रूप में कावूर ने आस्ट्रिया का सामना किया तथा आन्तरिक सुधारों द्वारा उसने सार्डीनिया-पीडमाण्ट को शक्तिशाली राज्य बनाया। वास्तव में कावूर ने मेजिनी की प्रेरणा को कूटनीतिज्ञ शक्ति में बदल दिया। कावूर के बिना सम्भवतः इटली का एकाकरण भविष्य के लिए टल सकता था।

(3) गैरीबाल्डी- गैरीबाल्डी का जन्म 1807 में इटली के नीस नगर में एक साधारण नाविक के यहाँ हुआ था। उसकी पढ़ने-लिखने में विशेष रुचि नहीं थी। वह तटीय व्यापारी में भाग लेने लगा। उसका सम्पर्क राष्ट्रवादियों से हुआ और उस पर मेजिनी का बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा। वह तुरन्त ही ‘युवा इटली’ का सदस्य बन गया। 1834 में विद्रोह में सक्रिय भाग लेने पर सार्डीनिया में उसे प्राणदण्ड की सजा मिली, किन्तु वह किसी तरह वहाँ से दक्षिण अमेरिका भाग गया। 14 वर्षों तक वह दक्षिण अमेरिका में क्रान्तिकारी युद्धों में भाग लेता रहा। इस काल में उसे छापामार युद्ध का अच्छा अनुभव प्राप्त हुआ, जो 1860 में इटली के एकीकरण में सहायक हुआ।

गैरीबाल्डी के कार्य- जब गैरीबाल्डी ने 1848 के विद्रोह के बारे में सुना तो अपने लाल कुर्ती सदस्यों के साथ इटली लौट आया। उसने अपनी सेवायें पीडमाण्ट के शासन को अर्पित की, लेकिन उसने इनकार कर दिया। गैरीबाल्डी ने जब छापामार दल बनाकर लोम्बार्डी के देशभक्तों की सहायता करना शुरू कर दिया। क्रान्ति का दमन हो जाने पर भी गैरीबाल्डी संघर्ष जारी रखा, किन्तु अन्त में उसे विवश होकर फिर दक्षिण अमेरिका भागना पड़ा। 1854 में वह इटली वापस आ गया और सार्डीनिया के निकट एक टापू खरीद कर वहाँ रहने लगा।

यहाँ कावूर ने गैरीवाल्डी को पीडमाण्ट के शासक विक्टर इमेन्युल के नेतृत्व में इटली में वैध राजसत्ता स्थापित करने में सहायता देने के लिए राजी कर लिया। 1859 में जब पीडमाण्ट का आस्ट्रिया से युद्ध हुआ, तो गैरीवाल्डी ने पीडमाण्ड की सैनिक सहायता की। 1860 में गैरीवाल्डी ने अपने लाल कुर्ती सैनिकों की सहायता की और सिसली जीत लिया। नेपिल्स पर भी गैरीवाल्डी का बिना युद्ध के अधिकार हो गया। गैरीवाल्डी की सफलताओं से कावूर भयभीत हो गया, अतः उसने नेपोलियन तृतीय से मिलकर एक सेना गैरीवाल्डी की प्रगति में अवरोध डालने के लिए भेजी, लेकिन देशभक्त गैरीवाल्डी ने सिसली और नेपिल्स के राज्य विक्टर इमेन्युल को अर्पित कर दिये।

जनमत संग्रह के आधार पर नेपिल्स और सिसली के राज्य सार्डीनिया पीडमाण्ट में मिला लिए गए। सार्डीनिया-पीडमाण्ट के राजा विक्टर इमेन्युल ने गैरीवाल्डी को देश सेवा के लिए पुरस्कार और उपाधियाँ देने का प्रस्ताव किया, परन्तु गैरीवाल्डी ने नम्रतापूर्वक इनकार कर दिया। उसने कहा, “देश सेवा स्वयं एक पुरस्कार है। मुझे कोई दूसरी और चीज नहीं चाहिए। स्वतन्त्र इटली अमर रहे।” इसके बाद गैरीबाल्डी वापस अपने गाँव के परेरा चला गया और वहाँ खेती करने लगा।

इटली के एकीकरण की महान् विभूतियों में गैरीवाल्डी की गणना सर्वोच्च स्थान पर की जाती है। उसकी वीरता, संगठन शक्ति, त्याग भावना और देशभक्ति विस्मयजनक थी।

इटली का एकीकरण विदेशी सहायता के परिणामस्वरूप सम्पन्न हुआ- इस कथन में पर्याप्त सत्यता है कि इटली का एकीकरण विदेशी सहायता के परिणामस्वरूप सम्पन्न हुआ। आस्ट्रिया यूरोप का एक शक्तिशाली राज्य था। कावूर ने फ्रांस की सहायता से आस्ट्रिया को अनेक स्थानों पर पराजित किया और लोम्बार्डी का प्रदेश प्राप्त किया। इसी प्रकार परमा मोडेना और टस्कनी के राज्यों ने भी विद्रोह करके विदेशी शासकों को मार भगाया। अतः 1860 तक लोम्बार्डी, परमा, मोडेना और टस्कनी के राज्यों को सार्डीनिया पीडमाण्ट में सम्मिलित कर लिया गया। अतः स्पष्ट है कि फ्रांस के सहयोग से काबूर को इटली के एकीकरण के कार्य में पर्याप्त सफलता प्राप्त हुई।

इटली के एकीकरण के विभिन्न चरण

इटली का एकीकरण चार चरणों में पूर्ण हुआ, जिनका विवरण निम्नलिखित हैं-

  1. प्रथम चरण– कावूर ने फ्रांस के सम्राट नेपोलियन तृतीय को नीस और सेवायें देने का आश्वासन देकर उससे दो लाख फ्रांसीसी सैनिकों की सहायता प्राप्त की। इसके पश्चात् आस्ट्रिया के साथ पीडमाण्ट का युद्ध हुआ, जिसमें दो बार आस्ट्रिया पराजित हुआ। इस प्रकार लोम्बार्डी के प्रान्त से आस्ट्रिया का अधिकार जाता रहा और वह पीडमाण्ट संघ में सम्मिलित कर लिया गया। लोम्बार्डी पर पीडमाण्ट का अधिकार होना इटली के एकीकरण का प्रथम चरण था।
  2. द्वितीय चरण- परमा, मोडेना, टस्कनी और रोमागना आदि उत्तरी इटली के छोटे-छोटे राज्यों की सहमित प्राप्त करके उनको पीडमाण्ट संघ में मिलाने का निर्णय किया गया। आस्ट्रिया ने इसका बड़ा विरोध किया, किन्तु कावूर ने चतुरतापूर्वक इस सम्बन्ध में नेपोलियन तृतीय की सहमति प्राप्त कर ली। जनमत द्वारा यह सिद्ध हो गया कि इन राज्यों की अधिकांश जनता पीडमाण्ट संघ में मिलने के पक्ष में थी। इस प्रकार उत्तरी-इटली के इन छोटे-छोटे राज्यों को भी पीडमाण्ट संघ का सदस्य बना लिया गया। यह इटली के एककरण का द्वितीय चरण था।
  3. तृतीय चरण- सन् 1860 में सिसली की जनता ने नेपिल्स के निरंकुश शासन के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। प्रसिद्ध देशभक्ति, गैरवाल्डी अपने लाल कुर्ती दल के लगभग एक हजार सैनिकों के साथ जन-आन्दोलन की सहायता के लिए सिसली पहुँच गया और वहाँ के दो राजा को बुरी तरह हराकर नेपिल्स पर अधिकार कर लिया। इसके पश्चात् उसने नेपिल्स के राजा पर आक्रमण कर दिया। राजा बिना युद्ध नेपिल्स से भाग गया। इस प्रकार नेपिल्स और सिसली का विशाल राज्य गैरीबाल्डी के अधिकार में आ गया। उधर नेपोलियन तृतीय की सहमति प्राप्त करके विक्टर इमेन्युल द्वितीय ने पोप के राज्य के आम्ब्रिया और माचेंज प्रान्तों को सेना भेजकर अपने अधिकार में ले लिया। अक्टूबर 1860 में गैरीवाल्डी ने अनुपम देशभक्ति और त्याग का परिचय देते हुए सिसली और निपिल्स राज्य पीडमाण्ट के शासक विक्टर इमेन्युल द्वितीय को अर्पित कर दिया। आम्ब्रिया, माचेंज, सिसली और नेपिल्स में जनमत संग्रह की व्यवस्था की गई और भारी बहुमत से उन राज्यों की जनता ने पीडमाण्ट संघ में सम्मिलित होने की सहमति दे दी। इस प्रकार इटली के एकीकरण का तृतीय चरण पूरा हुआ। उस समय तक केवल रोम और वेनिशिया ही पीडमाण्ट संघ के सदस्य बनने को शेष रह गये थे।
  4. चतुर्थ चरण- सन् 1866 में प्रशा और आस्ट्रिया का युद्ध हुआ, जिसमें प्रशा विजयी हुआ। इस विजय का एक यह भी कारण था कि प्रशा के चांसलर बिस्मार्क के इशारे पर विक्टर इमेन्युल द्वितीय ने वेनिशिया और टाइरोल पर आक्रमण कर आस्ट्रिया के विरुद्ध दूसरा मोर्चा स्थापित कर दिया था। इसके फलस्वरूप आस्ट्रिया अपनी समस्त शक्ति का प्रयोग प्रशा पर नहीं कर सका सन्धि के शर्तों के अनुसार, विस्मार्क ने अपने वचन का पालन करते हुए विक्टर इमेन्युल द्वितीय को आस्ट्रिया से वेनिशिया दिलवा दिया। इस प्रकार वेनिशिया भी पीडमाण्ट संघ में सम्मिलित कर लिया गया।

सन् 1870 ई. में फ्रांस और पंशा का युद्ध छिड़ गया। अतः नेपोलियन तृतीय को रोम से अपनी सेना वापस बुलानी पड़ी जिससे रोम की सुरक्षा जाती रही। नेपोलियन का पतन होते ही विक्टर इमेन्युल ने अपनी सेना भेज कर रोम पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार इटली का एकीकरण पूर्ण हो गया और रोम को उसकी राजधानी बनाया। यह इटली के एकीकरण का अन्तिम चरण था।

इस प्रकार 1870 तक इटली का एकीकरण पूर्व हो गया। यह सत्य है कि इस महान कार्य में मेजिनी, काबूर और गैरीवाल्डी का महान योगदान रहा है किन्तु यह भी सत्य है कि इटली के एकीकरण में यूरोप के देश और वहाँ की राजनीति ने बहुत सहायता की। फ्रांस ने प्रत्यक्ष रूप से तथा प्रशा ने अप्रत्यक्ष रूप से इटली के एकीकरण को सम्भव बनाया। इंग्लैण्ड आदि देशों की सहानभूति इटली के देशभक्तों के साथ थी। वहाँ के प्रधानमंत्री लार्ड पामर्टन ने काबूर के लिए कहा था कि “कावूर ने अपना नाम एक दिशा देने के लिए एक गाथा को सुन्दर बनाने के लिये छोड़ा है।” इंग्लैण्ड में रहते हुए मेजिन ने इटली के एकीकरण का प्रबल प्रचार किया। अपने साहस व वीरता से गैरीवाल्डी ने भी इटली के एकीकरण को सम्भव बनाया।

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Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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