शिक्षाशास्त्र / Education

शैक्षिक तकनीकी का इतिहास एवं विकास | History & Development of Educational Technology in Hindi

शैक्षिक तकनीकी का इतिहास एवं विकास | History & Development of Educational Technology in Hindi

शैक्षिक तकनीकी का इतिहास एवं विकास

(History & Development of Educational Technology)

औद्योगिक क्रान्तिकाल-

शैक्षिक तकनीकी का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। 19वीं शताब्दी के आरम्भ में जब औद्योगिक क्रान्ति हुई और मशीनों का आविष्कार हुआ, तब भी शिक्षा के क्षेत्र में अधिक परिवर्तन नहीं हुआ। इस प्रकार शैक्षिक तकनीकी का विकास 19वीं शताब्दी में अपनी शैशवावस्था में था, किन्तु इसका प्रयोग स्पष्ट रूप से 1926 ई० में अमरीका के ओहियो विश्वविद्यालय में एक शिक्षण की मशीन द्वारा सिडनी प्रेसी नामक व्यक्ति द्वारा किया गया। इसके पश्चात् 1930-40 ई० के लगभग लुम्सडेन तथा ग्लेजर आदि तकनीकी वेत्ताओं ने विशेष प्रकार की पुस्तकों, कार्डों तथा बोर्डों को प्रस्तुत करके शिक्षण को यन्त्रवत् बनाने का प्रयास किया। शैक्षिक तकनीकी शब्द का इंग्लैण्ड में सर्वप्रथम प्रयोग ब्राइनमर (Brynmor) प्रतिवेदन में प्रयुक्त किया गया। बी०एफ० स्किनर जैसे सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक ने लगभग 1954 में जानवरों पर अनेक परीक्षण किये, उनके परीक्षणों का उपयोग शिक्षा के क्षेत्र में सीखने के लिए किया गया। इस प्रकार अभिक्रमित अधिगम (Programmed Learning) पद्धति का विकास हुआ जिसे शिक्षा तकनीकी का महत्वपूर्ण पक्ष माना जाता है। सन् 1960 से पूर्व शैक्षिक तकनीको विषय सामान्यतः दृश्य-श्रव्य उपकरणों से सम्बद्ध थै जो शिक्षण को प्रभावशाली बनाने के लिए कक्षा के अन्तर्गत शिक्षक द्वारा प्रयुक्त किये जाते थे। अमेरिका तथा रूस की औद्योगिक क्रान्ति के कारण अन्य देशों में भी शिक्षा तकनीको के क्षेत्र में विशेष उन्नति हुई। स्टेनले एडवर्ड ने ‘अभिक्रमिक अध्ययन’ के अन्तर्गत सृजनात्मक रुचि पैदाकर शिक्षण तकनीकी का प्रसार किया। स्किनर व एडवर्ड के संयुक्त प्रयास से ‘अभिक्रमित अध्ययन’ व्यावहारिक योग्यता शिक्षा के क्षेत्र में स्वीकार की गई है। धीरे-धीरे शैक्षिक तकनीकी के लिए अनुदेशन (Instruction) तकनीकी, शिक्षण तकनीकी, अनुदेशन विज्ञान एवं अनुदेशन मनोविज्ञान आदि सभी नाम प्रयोग में लाये जाने लगे 1 1960 में अनेक शोधकार्म इस क्षेत्र में होने लगे तथा इसका क्षेत्र शिक्षा तक ही सीमित न रहकर शिक्षा के विभिन्न विषयों के पाठ्यक्रम संशोधन तक पहुंचा। तदुपरान्त शिक्षा की तकनीकियों हेतु अनेक वैज्ञानिक शोषकार्य भी होने लगे। इस प्रकार मशीनो काल का आगमन हुआ।

मशीनी काल (Automation Period)-

विकासशील देशों में 1950-60 ई० के बीच तकनीकी क्षेत्र में हुई क्रान्ति के फलस्वरूप शिक्षा के क्षेत्र में भी हर प्रकार की मशीनें बन चुकी थीं। ऐसा प्रतीत होने लगा जैसे इंसान को कोई काम हाथ से करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, इसे पूर्ण ‘ऑटोमेशन काल’ कहा गया। इन्हीं दिनों अमरीकी सरकार ने शिक्षा के विकास में धन खर्च करने का भी निर्णय किया। इन सबके कारण अमरीकी शिक्षा के क्षेत्र में बहुत तेजी से  परिवर्तन लाये गये। अमेरिका में तान प्रकार के तकनीकी प्रभाव शिक्षा के क्षेत्र में देखने को मिले। J.D. Finn ने अपने शोध-पत्र Technology and the Instructional Process’ में इन तीन तरीकों को स्पष्ट किया:

(अ) तकनीशियों का विकास,

(ब) तकनीकी की सामान्य शिक्षा तथा

(स) तकनीकी का अनुदेशन प्रक्रिया में प्रयोग।

जब इन देशों के विकास हेतु अधिक योग्य एवं कुशल वैज्ञानिक इंजीनियरों एवं तकनीशियनों की आवश्यकता पड़ी, तब शिक्षा के समक्ष यह समस्या उत्पन्न हुई कि इन्हें कैसे प्रशिक्षित किया जाये? सामान्य शिक्षा की व्यवस्था किस प्रकार की जाए ? तथा भिन्न आधुनिकतम आविष्कारों का प्रयोग कैसे किया जाये ? इन प्रश्नों के उत्तर खोजने हेतु शिक्षा के क्षेत्र में नवीन चिन्तन प्रारम्भ हुआ जिसे ‘शिक्षा तकनीकी’ की संज्ञा दी गई। इस काल के आते-आते शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति के चरण उस बिन्दु पर पहुँच गये, जहाँ शिक्षाशास्त्री शिक्षा के प्रत्येक व्यवहार को मशीनी क्रिया की भाँति नियन्त्रित करने पर गम्भीरता से विचार करने लगे, अतः शिक्षा में तकनीको की प्रधानता हो गई।

सन् 1964 में अमेरिका में एक राष्ट्रीय संगठन ‘एसोसियेशन फॉर सुपरविजन एण्ड करीकुलम डेवलेपमेंट’ (ASCD) की स्थापना हुई और शिक्षण तकनीकी पर पाठ्यक्रम निर्माण के सम्बन्ध में विचार किया गया। सन् 1964 में इसी संगठन पर एक आयोग नियुक्त हुआ जिसको पाठ्यक्रम निर्माण के संदर्भ में शिक्षणसिद्धान्तों एवं शिक्षण तकनीकी पर विचार करने तथा अपने सुझाव देने को कहा गया। 1967 तक इस आयोग ने कार्य किया तथा अनुदेशन सिद्धान्त के सम्बन्ध में अवमूल्य सुझाव दिये। सन् 1966 में अमेरिका के विश्वविद्यालयों में शिक्षा मनोविज्ञान एवं विज्ञान विभागों द्वारा शिक्षा तकनीकी की एक राष्ट्रीय परिषद (N.C.E.T.) की स्थापना की गई। एन० सी० ई०टी० ने विभिन्न कार्य करते हुए 1969 में शिक्षा तकनीकी की विस्तार से व्याख्या की। इसके अनुसार, ‘मानव अधिगम की प्रक्रिया, विनियोग प्रणाली के मूल्यांकन, प्रविधियों एवं सहायक सामग्रियों के माध्यम से विकसित करना ही शैक्षिक तकनीकी है।’ उन्होंने शिक्षण में कम्प्यूटर के महत्व को दर्शाया। 1969 में उनका एक Working Paper शिक्षा के लिए कम्प्यूटर को प्रकाशित किया गया, जिसमें ‘कम्प्यूटर आधारित अधिगम’ पर जोर दिया गया।

इस प्रकार सन् 1969 तक अभिक्रमित अनुदेशन, छात्र-अध्यापक अन्तःक्रिया, शैक्षिक संचार साधन, शैक्षिक तकनीकी तथा अनुदेशन तकनीकी का बहुत हद तक विकास हुआ तथा इन क्षेत्रों में शोषकार्य प्रारम्भ हुए जिसके परिणामस्वरूप मनोवैज्ञानिक शैक्षिक अभिकल्पों का निर्माण किया गया तथा बन्द सर्किट दूरदर्शन (CCTV), वीडियो टेप, वीडियो कैसेट्स, ऑडियो टेप, वीडियो हिस्क, वीडियो डैक तथा संगणक (Computer) आदि दृश्य-श्रव्य साधनों का प्रयोग शिक्षा के क्षेत्र में अधिकाधिक किया जाने लगा।

आजकल उपर्युक्त कठोर उपागमों के साथ-साथ कोमल उपागमों के प्रयोग में भी काफी विकास हुआ है। इसके परिणामस्वरूप प्रणाली विश्लेषण, अन्तक्रिया विश्लेषण, व्यवहार तकनीकी, अनुदेशन की रूपरेखा, शिक्षक प्रतिमान इत्यादि का प्रयोग विदेशों में बहुत प्रचलित है।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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