वित्तीय प्रबंधन / Financial Management

वित्तीय प्रबन्ध की विशेषताएं | वित्तीय प्रबन्ध की प्रकृति | वित्तीय प्रबन्ध का क्षेत्र

वित्तीय प्रबन्ध की विशेषताएं | वित्तीय प्रबन्ध की प्रकृति | वित्तीय प्रबन्ध का क्षेत्र | Features of Financial Management in Hindi | Nature of Financial Management in Hindi | Area of ​​financial management in Hindi

वित्तीय प्रबन्ध की विशेषताएं एवं प्रकृति

(Features, Nature of Financial Management)

वित्तीय प्रबन्ध की प्रकृति निम्नलिखित है-

(1) निश्चयीकरण का केन्द्र बिन्दु- पूर्व में व्यावसायिक निर्णय व्यवसायी अथवा प्रबन्धकों की अन्तः प्रेरणा के आधार पर लिये जाते थे। व्यवसाय के बढ़ते हुए आकार एवं कठिन प्रतियोगिता के इस युग में अब प्रत्येक व्यवसायी ‘विगत अनुमान’ अन्तः प्रेरणा के साथ-साथ ऐसा वैज्ञानिक विश्लेषण चाहता है जो सांख्यिकीय आंकड़ों एवं तथ्यों के आधार पर किसी अथवा किन्हीं विशिष्ट परिस्थितियों में ‘हानि अथवा लाभ का सही मूल्यांकन’ प्रस्तुत कर सके ताकि उसके अनुरूप निर्णय लेकर जोखिम को न्यूनतम किया जा सके। वित्तीय प्रबन्ध आज एक ऐसा परिपक्व स्वरूप. प्राप्त कर चुका है जो वर्णनात्मक कम तथा विश्लेषणात्मक अधिक है। अब प्रशासनिक निर्णय मोटे अनुमानों पर आधारित नहीं होते हैं। सांख्यिकीय विश्लेषण से सम्बद्ध ऐसे अनेक सूत्र अब वित्तीय विश्लेषण के लिए उपयोगी होते हैं, जिनके द्वारा प्रबन्धक किन्हीं प्रस्तुत आन्तरिक एवं बाह्य परिस्थितियों के सन्दर्भ में अनेक उपलब्ध विकल्पों में से सर्वोत्तम विकल्प का चयन करता है, तथा उच्च स्तर पर प्रबन्धकों द्वारा उचित निर्णय लेने की प्रक्रिया में सहायता प्रदान करता है।

(2) सतत् प्रशासनिक कार्य- आधुनिक अर्थ में वित्तीय प्रबन्ध का कार्य एक सतत् प्रशासनिक प्रक्रिया है, क्योंकि व्यवसाय के सफल संचालन के लिए कोषों के लाभपूर्ण एवं सम्यक् उपयोग का दायित्व भी अब इस क्षेत्र की परिधि में आ जाता है। यही कारण है कि अब वित्तीय प्रवन्धक की भूमिका के महत्व को प्रत्येक व्यावसायिक संगठन में मान्यता दी जाने लगी है। पहले व्यावसायिक प्रबन्ध में वित्त का स्थान अत्यन्त उपेक्षित था। जिसे व्यवसाय के दिन-प्रतिदिन के कार्यकलापों में कोई महत्व प्राप्त नहीं था। अब स्थिति यह है कि वित्त को एक निर्णायक भूमिका प्राप्त है। इस क्षेत्र को पूँजी बजटिंग के साथ- साथ अब कार्यशील पूंजी के प्रबन्ध के कार्य को भी सम्पन्न करना होता है।

(3) कार्य निष्पत्ति का मापक- वित्त व्यवसाय का साधन ही नहीं बल्कि साध्य भी है। वित्त के आधार पर संचालित व्यवसाय का मूल उद्देश्य लाभोपार्जन के द्वारा और अधिक वित्त प्राप्त करना ही होता है अतः वित्तीय परिणामों के आधार पर ही व्यवसाय की कार्य-निष्पत्ति का मूल्यांकन किया जाता है। “वित्तीय-निर्णय, आय की मात्रा तथा व्यावसायिक जोखिम इन दोनों को प्रभावित करते हैं।” ऐसे वित्तीय निर्णय जो जोखिम में वृद्धि करते हैं, फर्म के मूल्यांकन के स्तर को कम कर देते हैं। दूसरी ओर ऐसे वित्तीय निर्णय जो लाभदायकता में वृद्धि करते हैं, फर्म के मूल्यांकन के स्तर को बढ़ा देते हैं। न तो जोखिम के बिना व्यवसाय संचालित हो सकता है और न ही लाभदायकता के बिना व्यवसाय संचालन की कोई सार्थकता प्रतीत होती है। अतः वित्त का कार्य दोनों परस्पर विरोधी कारकों में सन्तुलन स्थापित रखते हुए फर्म के मूल्यांकन के स्तर को यथा-सम्भव उच्च बिन्दु पर बनाये रखना होता है।

(4) व्यावसायिक सम्वय एवं नियन्त्रण (Business co-ordination & Control) – वित्त विभिन्न व्यावसायिक गतिविधियों को एक सूत्र में बाँधता है। एक व्यावसाय के सुचारू रूप से संचालन के लिए इस प्रकार का समन्वय अत्यन्त आवश्यक है। यही नहीं, समन्वय के अभाव में व्यावसायिक लागतों को उचित समय में रखना तथा पूर्व नियोजित लाभ के लक्ष्य को प्राप्त करना सम्भव नहीं होता है। व्यवसाय के विभिन्न क्रिया कलापों के समन्वित संचालन का कार्य बजटरी नियन्त्रण के द्वारा सम्पन्न किया जाता है, जिसके अन्तर्गत विभिन्न कार्यों एवं उत्पादन प्रक्रियाओं के लिए अपेक्षित समय एवं लागतों के प्रमाप निर्धारित किये जाते हैं। इस प्रकार उपलब्ध साधनों का अनुकूलतम ऑबटन एवं उनका अधिकतम उपयोग सम्भव हो जाता है। वित्तीय प्रबन्ध के क्षेत्र का यह एक बड़ा दायित्व है, जिसे पूरा करके ही वह अपने वर्चस्व को बनाये रखता है।

(5) व्यावसायिक सफलता का निर्णायक- उच्च स्तर पर व्यावसायिक प्रबन्ध को सफल बनाने में वित्त-प्रबन्धकों का महत्वपूर्ण योगदान होता है, अपने क्षेत्र के विशेषज्ञों के रूप में इनके द्वारा किये गये विश्लेषण और दिये गये परामर्श पर सर्वोच्च स्तर पर प्रबन्धकों द्वारा पूरा ध्यान दिया जाना अनिवार्य हो जाता है। वित्तीय प्रबन्धक कम्पनी की वित्तीय स्थिति एवं कम्पनी की निर्धारित अवधि के कार्यों की निष्पति के विषय में महत्वपूर्ण तथ्यों एवं आँकड़ों को सर्वोच्च स्तर के प्रबन्धकों के समक्ष इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं कि उनके लिए कम्पनी की प्रगति का मूल्यांकन करना सरल हो जाता है और सिद्धान्तों तथा नीतियों सम्बन्धी उचित निर्णय अब वस्तुतः प्रबन्ध के सर्वोच्च स्तर पर ही लिये जाते हैं। यही नहीं स्वामित्व एवं प्रबन्ध में विच्छेद के कारण व्यावसायिक प्रबन्धक निर्णय प्रक्रिया को इतना परिष्कृत बना देना चाहते हैं कि जिससे जोखिम को नयूनतम कर व्यावसायिक सफलता को सुनिश्चित किया जा सके। आज प्रत्येक निर्णय को गहन जाँच-परख के बाद ही इस अपेक्षा के साथ अन्तिम रूप दिया जाता है कि उसके क्रियान्वयन से बाजार दृष्टि से फर्म के मूल्यांकन में बढोत्तरी होगी।

निष्कर्ष :

स्पष्ट है कि वित्तीय प्रबन्धक का व्यापारिक प्रबन्ध के अन्य क्षेत्रों की भांति ही एक क्षेत्र है, जो आधुनिक सन्दर्भों में अन्य क्षेत्रों की तुलना में कदाचित अधिक महत्वपूर्ण बन गया है। निश्चयीकरण की प्रक्रिया में इसका महत्वपूर्ण योगदान होता है तथा व्यावसायिक निर्णयों को वित्तीय मापदण्डों एवं विधियों की कसौटी पर ही जाँचा परखा जाता है।

वित्तीय प्रबन्ध का क्षेत्र

(Scope of financial Management)

वित्तीय प्रबन्ध के क्षेत्र में अनलिखित क्रियाओं को सम्मिलित किया जाता है-

  1. सम्पत्तियों का प्रभावपूर्ण प्रबन्ध :- स्थिर एवं चल सम्पत्तियों के क्रय सम्बन्धी वित्तीय पहलुओं पर विचार-विमर्श करना और उचित समय पर उसकी पूर्ति की व्यवस्था करना वित्तीय प्रबन्ध के क्षेत्र में ही शामिल हैं। सम्पत्तियों के प्रभावपूर्ण प्रबन्ध के विभिन्न पहलुओं, जैसे स्थिर सम्पत्तियों के प्रबन्ध की नीति, इनवेण्ट्री नीति, विक्रय एवं वसूली नीति, रोकड़ नीति, सेविवर्गीय प्रबन्ध नीति एवं विक्रय-मूल्य निर्धारण आदि पर उच्च स्तरीय प्रबन्धकों मर्श एवं क्रियान्वयन को सक्रिय सहयोग देना भी वित्तीय प्रबन्ध के क्षेत्र में सम्मिलित है।
  2. वित्तीय नियन्त्रण- वित्तीय नियन्त्रण के अभाव में व्यावसायिक लक्ष्यों को प्राप्त करना आवश्यक होता है। अतः यह वित्तीय प्रबन्ध का एक महत्वपूर्ण अंग है। वित्तीय नियन्त्रण के अन्तर्गत आधुनिक विधियों, जैसे- पूँजी रोकड़ बजट, लोचपूर्ण बजट आदि द्वारा वित्तीय व्यवस्था पर नियन्त्रण रखा जाता है।
  3. आय का प्रबन्ध- एक उपक्रम की आय का समुचित रूप से प्रबन्ध करना भी वित्तीय प्रबन्ध के कार्य-क्षेत्र में सम्मिलित किया जाता है। इसके अंतर्गत विभिन्न विवरण-पत्रों, जैसे- तलपट, आय-वितरण, लाभ-हानि खाता आदि का वैधानिक नियमों एवं व्यवसाय में प्रचलित व्यवहार के अनुसार निर्माण तथा विभिन्न व्ययों के समायोजन के पश्चात शुद्ध लाभ की मात्रा निर्धारित करना और तत्पश्चात् लाभांश एवं संचित कोष के रूप में लाभ का निविधान निश्चयीकरण की प्रक्रिया में सक्रिय सहयोग देना सम्मिलित है।
  4. वित्तीय निष्पादन का विश्लेषण एवं मूल्यांकन- भावी नीतियों एवं कार्यविधियों में आवश्यक परिवर्तन लाने के उद्देश्य से वित्तीय विश्लेषण की आधुनिक विधियों, जैसे- अनुपात- विश्लेषण (Ratio Analysis), प्रवृत्ति-विश्लेषण (Trend Analysis), कोष-प्रवाह विश्लेषण (Funds-Flow Analysis), लागत-मात्रा-लाभ विश्लेषण (Cost-column-Profit Analysis), विचारणांश (Variance Analysis) आदि की सहायता से पिछले वर्षों की तुलना में चालू वर्ष की कार्य निष्पत्ति का समीक्षात्मक मूल्यांकन करना भी वित्तीय प्रबन्ध के क्षेत्र में ही आता है।
  5. वित्तीय आयोजन- वित्तीय प्रबन्ध के कार्यक्षेत्र में सर्वप्रथम कार्य वित्तीय योजना बनाना है। वित्तीय योजना के अन्तर्गत इस बात विचार किया जाता है कि उपक्रम की प्रत्येक परियोजना के लिये कितने वित्त की आवश्यकता होगी और पूर्वानुमानित वित्त को किन-किन स्रोतों से उपलब्ध. किया जायेगा। वित्तीय नियोजन के अन्तर्गत वित्त सम्बन्धी उद्देश्यों एवं कार्यविधि का निर्धारण, पूँजीकरण की मात्रा का पूर्वानुमान, वित्तीय संरचना (Capital Structure) का निर्माण, भविष्य में सम्मिलित परिवर्तनों के समायोजन के लिये अग्रिम समायोजन (Advance Planning) की व्यवस्था आदि कार्यों का समावेश होता है।
  6. वित्त प्राप्ति की व्यवस्था- पूर्वानुमानित पूँजीकरण तथा प्रस्तावित पूँजी संरचना के अनुसार विभिन्न स्रोतों से व्यवसाय के कुशल संचालन के लिये आवश्यक पूँजी एकत्र करने से संबंध कार्यों को भी वित्तीय प्रबंध के क्षेत्र में सम्मिलित किया जाता है।
  7. वित्त कार्य का संगठन: वित्तीय प्रबंध के कार्य क्षेत्र के अंतर्गत वित्त विभागों का संगठन, कोषाध्यक्ष (Treasurer) एवं नियंत्रक (Controller) के कार्यों, अधिकारों और दायित्वों को निर्धारण तथा सभी लेखा पुस्तकों के उचित रख-रखाव व्यवस्था करने से संबंध कार्यों का भी समावेश होता है।
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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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