अर्थशास्त्र / Economics

भारत में आर्थिक नियोजन की सफलता | भारत में आर्थिक नियोजन की असफलता

भारत में आर्थिक नियोजन की सफलता | भारत में आर्थिक नियोजन की असफलता

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आर्थिक नियोजन की सफलता (भारत में आर्थिक नियोजन की सफलता) (Achievements of Economic Planning)-

भारतीय आर्थिक नियाजन की प्रमुख सफलता निम्नलिखित है-

(1) राष्ट्रीय आय में (Increase in National Income)-

आर्थिक नियजन से राष्ट्रीय आय में विशेष अभिवृद्धि हुई है, इसका प्रत्यक्ष प्रभाव राष्ट्रीय आय पर पड़ रहा है। स्वतंत्रता के पश्चात् 1951 ई0 में भारत की राष्ट्रीय आय केवल 8,938 करोड़ रु) (चालू मूल्य निर्देशांक के आधार पर) थी, जो 1999-2000 के तत्कालीन मूल्यों पर सकल घरेलू उत्पाद 15,97,416 करोड़ रु0 हो गयी ।

(2) प्रतिव्यक्ति आय में वृद्धि (Increase in Per Capita Income)-

भारत की प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि आय में हुई, जो 1999-2000 में बढ़कर 1468.23 रु() हो गई। अब तक भारत में व्यक्ति आय 18 गुनी बढ़ गयी है।

(3) औद्योगिक प्रगति (Industrial Progress) –

आर्थिक नियोजन में औद्यागिक इकाइयों की स्थापना एवं उत्पादकता में वृद्धि एक अभूतपूर्व उपलब्धि है, क्योंकि बड़े-बड़े सार्वजनिक उद्योग जैसे लोहा इस्पात उद्योग, इन्जीनियरिंग उद्योग, रसायन उद्योग आदि भारतीय अर्थव्यवस्था के मेरुदण्ड हैं। इस प्रकार नियोजन ने देश को ऐसे उद्योग दिये हैं, जिनकी स्थापना निजी क्षेत्र में सम्भव नहीं थी।

(4) कृषि का विकास-

आर्थिक नियोजन प्रारम्भ में कृषि में कोई विशेष योगदान नहीं दे सका, लेकिन 1973 ई0 से आर्थिक नियोजन कृषि क्षेत्र के लिए वरदान सिद्ध हो रहा हहै सिंचाई सुविधाएँ बढ़ीं हैं, क्योंकि नहरें, ट्यूब-वैल्स एवं निजी पम्पिंग सेट्स में विशेष वृद्धि हुई है। अतः खाद्यान्न का उंत्पादन जो 1951 ई0 के 50.8 लाख टन से बढ़कर 1998-99 ई0 तक 203 मिलि0 टन हो गया। वर्तमान समय में कृषि को व्यावसायिक फसलों की ओर उन्मूख किया जा रहा है।

(5) बचत एवं विनियोग में वृद्धि-

भारत में स्वतंत्रता पूर्व बचत एवं विनियोग का स्तर अत्यन्त निम्न था, लेकिन आर्थिक नियोजन काल में शुद्ध घरेलू बचतों में विशेष प्रगति हुई है, क्योंकि प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि के साथ-साथ बचत स्तर में निरन्तर वृद्धि हो रही है। इसी प्रकार विनियोग दर में वृद्धि हो रही है, फलतः 1951 ई0 की विनियोग दर जो 5.5% थी. वह वर्ष 1999 तक बढ़कर 26.7 प्रतिशत हो गई है।

(6) सार्वजनिक क्षेत्र की व्यापकता (Pervasiveness of Public Sector) –

नियोजन काल की सबसे प्रमुख उपलब्धि सार्वजनिक क्षेत्र की व्यापकता है। इससे एकाधिकारी शक्तियाँ नियंत्रित हुई हैं, उत्पादन में वृद्धि हुई है तथा ऐस उत्पादन सम्भव हो सके हैं, जो पूंजीवादी व्यवस्था में सम्भव न थे। स्वतंत्रता के बाद सन् 1951 तक कवल 5 सार्वजनिक उपक्रम थे, जो सन् (1996-97) तक बढ़कर 1340 हो गय है, जिनम 26 कराड़ रु0 के स्थान पर 10,2600 करोड़ रु) विनियोग हुए।

(7) परिवहन क्षेत्र में प्रगति (Progress in Transport Sector)-

स्वतंत्रता केपश्चात् थल यातायात के (रेल व सड़क) जल यातायात व वायु यातायात के अन्तर्गत क्रमशः सड़कों, रेलमार्ग का निर्माण हुआ है, तो जलयानों के निर्माण में विशेष योगदान दिया है। इसी प्रकार वायुयान के निर्माण में प्रतिमान स्थापित किया है। 951 ई० तक भारत में 4 लाख किमी0 लम्बी सड़के थीं, जो 1999 ई0 तक बढ़कर 35.15 लाख किमी0 हो गयी हैं। रेलवे मार्ग जो 1951 तक 5300 किमी0 था, 1999 ई0 तक बढ़कर 62,809 किमी0 हो गया। वायुयानों की संख्या एयर इंडिया में 4 से बढ़कर 28 हो गयी है और इंडियन एअर लाइन्स के विमान 5 से बढ़कर 62 हो गये हैं, जिनमें 32 एअर बस व 50 बोईग हैं। जलयानों की संख्या भी निरन्तर बढ़ रही है, देश की कुल 52 जहाज कम्पनियों के पास 1990 ई) तक 630 जलपोत है।

आर्थिक नियोजन के लिये समस्यायें/असफलतायें

(1) मन्द आर्थिक विकास-

भारतीय अर्थव्यवस्था में राष्ट्रीय आर्थिक विकास मन्द गति से चल रहा है, क्योंकि आर्थिक विकास दर आठवीं योजना में 7 तक पहुँचा है, जिसमें राष्ट्रीय आय की वृद्धि 9% तक रहेगी। इसी प्रकार प्रति व्यक्ति आय की मात्रा में वृद्धि अवश्य हो रही है।

(2) बेकारी विस्फोटक कगार पर-

भारतवर्ष में बेरोजगारी की संख्या में तीव्र गति से वृद्धि हुई है। यह तथ्य विकास प्रक्रिया में कमियों की ओर ध्यानाकर्षित करता है। परन्तु व्यावहारिक तौर पर योजना की कार्य पद्धति प्रतिकूल ही समझ में आती है जिससे वर्तमान भारत बेकारी की विस्फोटक कगार पर पहुँच रहा है। इससे योजना के अनुत्पादक व्यय, प्रशासनिक अकुशलता के साथ-साथ युद्ध, प्राकृतिक विपत्तियों से आशानुकूल प्रगति नहीं हो सकी। उसके ऊपर जनसंख्या वृद्धि ने श्रम शक्ति में वृद्धि करके बेकारी को बढ़ावा दिया है। प्रत्येक पंचवर्षीय योजना के उपरान्त बेकारी में निरन्तर वृद्धि होना इसी बात का प्रमाण है।

(3) आर्थिक असमान वितरण-

भारतवर्ष में आर्थिक असमान वितरण को लगभग सभी पंचवर्षीय योजनाओं में स्वीकारा गया है क्योंकि धनी परिवार धनी हुए हैं और गरीब अत्यन्त गरीब। धनवान परिवारों में टाटा की सम्पत्ति 1,102 करोड़ रु0 वहीं बिड़ला परिवार की सम्पत्ति 1,171 करोड़ रु0, जबकि दूसरी ओर गरीबी की रेखा के नीचे निवासित जनसंख्या का जीवन स्तर ऊँचा करने के लिए स्वप्न खोखले रहे हैं।

(4) जनसंख्या नियंत्रण हेतु कारगर उपाय नही (No Adequate Steps to Control Population)-

भारतीय आर्थिक नियोजन में जनसंख्या की तीव्र वृद्धि दर्शाती है कि जनसंख्या नियंत्रण हेतु इन योजनाओं के प्रारम्भिक चरण में जनसंख्या वृद्धि को आर्थिक समस्या नहीं समझा गया जिस कारण आज जनसंख्या का बीभत्स रूप भारतीय आर्थिक विकास को निगल रहा है। आज देश में जनसंख्या की तीव्र वृद्धि होकर 1981 में 69.30 करोड तक जनसंख्या पहुँची। वर्ष 1991 में जनसंख्या बढ़कर 84.6 हो गई एवं जनगणना 2001 में जनसंख्या 102.70 करोड़ हो गई है।

(5) संसाधनों का उचित विदोहन नहीं (Improper Utilization of Resources)-

आर्थिक नियोजन की असफलताओं का मूल्यांकन प्राकृतिक संसाधनों के विदोहन की कमी को देखकर सहज रूप में किया जा सकता है। भारतवर्ष प्राकृतिक संसाधनों का अत्यन्त धनी देश है, परन्तु उचित विदोहन के अभाव में राष्ट्र अदध-विकसित समझा जा रहा है। राष्ट्र के वन, जल, पहाड़ व खनिज आदि साधनां का विकास न होने से देश पिछड़ रहा है।

(6) विदेशी सहायता दोषपूर्ण (Flawful Foreign Aids)-

भारतीय आर्थिक नियोजन में वित्तीय व्यवस्था हेतु विदेशी सहायता व त्रहणा की व्यवस्था पर अंकुश नहीं लग सका। संसाधनों से आत्मबल व स्वाभिमान को जन्म मिलता है, जबकि विदेशी पूँजी से राष्ट का स्वाभिमान ही कम नहीं होता है, अपितु मुद्रा स्फीति में भी वृद्धि होती है।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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