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धर्म निरपेक्षता के आवश्यक तत्व | भारत में धर्म निरपेक्षता की आवश्यकता एवं महत्व | धर्म निरपेक्षता व शिक्षा के उद्देश्य

धर्म निरपेक्षता के आवश्यक तत्व | भारत में धर्म निरपेक्षता की आवश्यकता एवं महत्व | धर्म निरपेक्षता व शिक्षा के उद्देश्य

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Contents

धर्म निरपेक्षता के आवश्यक तत्व-

  1. धर्म के क्षेत्र में लचीलापन- धर्मनिरपेक्ष राज्य में व्यक्ति को किसी धर्म को अपनाने की स्वतन्त्रता होती हैं। धार्मिक क्षेत्र में राज्य का कोई दखल नहीं होता है। धर्म निरपेक्षता में बदलती हुयी परिस्थितियों और दशाओं के साथ अनुकूल का गुण विद्यमान होता है। एक धर्मनिरपेक्ष राज्य में नागरिकों का व्यवहार उनके विवेक से प्रभावित होता है न कि रूढ़िवादिता और कट्टरता से।
  2. समानता व बन्धुत्व- धर्म निरपेक्षता एक ऐसा दृष्टिकोण है जिसके अनुसार सभी धर्मों को मानने वालों को एक समान समझा जाता है तथा विकास के समान अवसर प्रदान किये जाते हैं। सबके साथ भाईचारे की भावना रखकर सभी को अपने धर्म को मानने की छुट होती है। इस तरह धर्म निरपेक्षता की धारणा के साथ समानता और स्वतन्त्रता के मूल्य जुड़े हुये है।
  3. बुद्धिवाद का महत्व- धर्म निरपेक्ष राज्य में बुद्धिवाद को बहुत महत्व दिया जाता है। कोई भी मान्यता या नियम चाहे वह किसी भी धर्म का हो यदि तर्कसम्मत है या बुद्धि की कसौटी पर खरे हैं तो उसे मानने से इंकार नहीं किया जा सकता है।
  4. धार्मिक सहिष्णुता- एक धर्म निरपेक्ष राज्य में सभी व्यक्ति अन्य धर्मों के प्रति उदारता एवं सहिष्णुता का भाव रखते हैं। कुछ लोग धर्म निरपेक्षता को नागरिकता वाली स्थिति समझते हैं जो कि एकदम गलत और भ्रम की स्थिति है। धर्म निरपेक्षता सभी धर्मों का आदर तथा सह-अस्तित्व की वकालत करता है। धर्म निरपेक्षता में धार्मिक संकीर्णता का कोई स्थान नहीं है तथा यह अन्धविश्वासों के स्थान पर व्यावहारिक अनुभवों को महत्व देती है। इस तरह से धर्म निरपेक्षता धार्मिक कट्टरता के अवगुण का शोधन करके राज्य में उपयोगितावादी दृष्टिकोण को प्रत्साहन देती है।

धर्म निरपेक्षता व शिक्षा के उद्देश्य

भारतीय समाज के धर्म निरपेक्षस्वरूप के कारण यहाँ शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्यों को स्वीकार किया गया है, ये उद्देश्य इस प्रकार हैं-

(1) प्रजातांत्रिक नागरिकता का विकास करना- प्रजातंत्र के स्थायित्व के लिए शिक्षा आवश्यक है। एक प्रजातांत्रिक समाज ही धर्म निरपेक्ष हो सकता है। प्रजातांत्रिक मूल्यों के विकास के उद्देश्य को अपनाकर बालकों के दृष्टिकोण को धर्म निरपेक्ष एवं उदार बनाने का प्रयास करता है क्योंकि प्रजातंत्र जिन मूल्यों को स्वीकार करता है वही मूल्य धर्म निरपेक्षता के मूल आधार हैं।

(2) मानवीय मूल्यों का विकास- भारतीय समाज में धर्म निरपेक्ष स्वरूप का ही- प्रभाव है। आज हम शिक्षा के माध्यम से बच्चवों में प्रेम, सहयोग सहानुभूति प्रभुत्व तथा परोपकार जैसे मानवीय मूल्यों का विकास करना चाहते हैं जिससे उनका चारित्रिक विकास हो सके।

(3) राष्ट्रीय एकता- भारतीय संविधान में भारत को एक धर्म निरपेक्ष राज्य घोषित किया गया है पर यहाँ लोगों में जागरुकता उत्पन्न नहीं हो पा रही है। देश के विभिन्न प्रान्तों में अक्सर कहीं न कहीं कुछ न कुछ हिसा की घटना घटित होती रहती है। अतः घर के वातावरण सम्बन्धी दोषों को जन शिक्षा द्वारा दूर किया जाये।

भारत में धर्मनिरपेक्षता की आवश्यकता व महत्व

धर्म निरपेक्षता शिक्षा क्री जीवन क्या आवश्यकता है? इस सन्दर्भ में कुछ विचार है, जो इस प्रकार हैं-

(1) प्रजातन्त्र को सुदृढ़ बनाना- शिक्षा प्रजातन्त्र का आधार है, शिक्षा द्वारा उत्तम गुणों एवं आदतों का निर्माण कर समानता, न्याय स्वतन्त्रता की भावना को विकसित करना आवश्यक है यह सब भारतीय समाज को धर्म निरपेक्ष स्वरूप दिए बिना सम्भव नहीं है।

(2) राष्ट्रीय एकता के लिए- राष्ट्र के पुनन्निमाण हेतु सामाजिक एवं राष्ट्रीय एकता आवश्यक है। स्पष्ट है कि राष्ट्र-निर्माण के लिए राष्ट्रीय एकता स्थापित करना आअति आवश्यक है। यह कार्य धर्म निरपेक्ष व्यवस्था द्वारा ही सम्भव है।

(3) सामाजिक न्याय के लिए- सामाजिक न्याय एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है। जिसकी प्राप्ति केवल धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा के द्वारा ही संभव है। सबको स्वेच्छा से किसी भी धर्म को मानने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। धर्म निरपेक्ष व्यवस्था ही अपने राष्ट्र के नागरिकों के ऐसे न्याय की व्यवस्था करवा सकती है।

(4) संस्कृति एवं सभ्यता का संरक्षण के लिए- धर्म और नैतिकता भी भारतीय संस्कृति के अभिन्न अंग हैं। संस्कृति के इन तत्वों की सुरक्षा के लिए भारतीय समाज को धर्मनिरपेक्ष स्वरूप प्रदान किया जाना चाहिए। इसकी अवहेलना नहीं की जा सकती अतः भारतीय धर्म निरपेक्ष राज्य में धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा का स्वरूप क्या हो उसके लिए धर्म और नैतिक शिक्षा का आयोजन करना चाहिए।

(5) राष्ट्रीय विकास के लिए- राष्ट्रीय विकास राष्ट्र के प्रत्येक नागरिक के विकास के साथ सम्बन्ध रखता है। यह कार्य शिक्षा द्वारा व्यक्तियों में सामाजिक एवं राष्ट्रीय भावना भरकर पूर्ण किया जा सकता है। इसके लिए समाज को धर्म निरपेक्ष स्वरूप प्रदान करना आवश्यक था जिससे नए राष्ट्र के उद्देश्य की प्राप्ति में सहायक हो सके।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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