समाज शास्‍त्र / Sociology

धर्म का अर्थ | धर्म की परिभाषाएं | धार्मिक शिक्षा के उद्देश्यों का वर्णन | धार्मिक शिक्षा की विधि

धर्म का अर्थ | धर्म की परिभाषाएं | धार्मिक शिक्षा के उद्देश्यों का वर्णन | धार्मिक शिक्षा की विधि

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व्यापक अर्थ में धर्म का अर्थ कुछ और ही हैं, इस आशय से हृदय एवं चरित्र की पवित्रता, नैतिकता, जनसेवा, जनकल्याण एवं आध्यात्मिक विकास. ही सच्चा धर्म है। इससे स्पष्ट है कि धर्म वास्तव में किसी मन्दिर, मस्जिद, गिरजाघर तथा गुरुद्वारे तक ही सीमित नहीं बल्कि उसका सम्बन्ध मानव के सम्पूर्ण जीवन और मानवहित से है। धर्म के अन्तर्गत वे सभी उत्कृष्ट विचार, आदर्श एवं मूल्य आते हैं जो किसी राष्ट्र के विद्वानों ने मानव तथा उसके परमात्मा के सम्बन्धों को स्पष्ट करने के लिए संग्रहित किया है। सक्षेप में कहा जा सकता है कि व्यापक अर्थ के अनुसार मानवीय जीवन में आध्यात्मिक मूल्यों को विकसित करना तथा प्रत्येक आत्मा को एक दूसरी आत्मा से और अन्त में आत्मा को परमात्मा से सम्बन्धित कर देना, सच्चा धर्म है।

धर्म की परिभाषाएं (Definitions of Religion)

विभिन्न शिक्षाशास्त्रियों ने धर्म की परिभाषाएं अपने अनुसार प्रस्तुत की हैं।

  1. किलपैट्रिक के अनुसार, “धर्म एक सांस्कृतिक ढांचा है जो अलौकिक या असाधारण से सम्बन्ध रखता है जैसा कि उसमें आस्था रखने वाले विशिष्ट व्यक्तियों के द्वारा विचार किया जाता है।”
  2. कॉट के अनुसार, “धर्म का सार मूल्यों के धारण करने में विश्वास को कहते हैं।”
  3. ए. एन. व्हाइट के अनुसार, “धर्म से अभिप्राय है एक दिव्य शक्ति को देखना जो हमसे परे है, हमारे पीछे है एवं हमारे अन्दर है।”
  4. हेराल्ड हॉफडिन के अनुसार, “धर्म का महत्वपूर्ण पक्ष मूल्यों के संरक्षण में आस्था रखना है।”
  5. गिस्बर्ट के अनुसार, “धर्म ईश्वर और देवताओं के प्रति जिनके ऊपर मनुष्य अपने को निर्भर अनुभव करता है गतिशील विश्वास और आत्म सम्पर्क है।”

धार्मिक शिक्षा के उद्देश्य (The aim of religious education)

धार्मिक शिक्षा के अन्तर्गत निम्नलिखित उद्देश्यों का निर्धारण किया गया है।

  1. आध्यात्मिक तथा नैतिक मूल्यों का विकास,
  2. व्यापक दृष्टिकोण का विकास,
  3. चारित्रिक विकास,
  4. संस्कृति का सरक्षण एवं हस्तातरण,
  5. बालक का सर्वांगीण विकास,
  6. मूल प्रवृत्तियों का मार्गान्तीकरण एवं शोधन,
  7. विद्यालय में लोकतान्त्रिक वातावरण का सृजन करना।

धार्मिक शिक्षा की विधि (Method of religious education)

धार्मिक शिक्षा के लिए समय-समय पर धार्मिक भाषण आदि को शामिल करके उन्हें व्यावहारिक रूप दिया जाना चाहिए। साथ ही छात्रों के समक्ष ऐसे वातावरण का सृजन किया जाना चाहिए कि वे अपने व्यवहारिक जीवन में धार्मिक और नैतिक मूल्यों का अनुसरण कर सकें। शिक्षा की शुरुआत आार्थना से की जानी चाहिए। छात्रों को धार्मिक पुरुषों की जीवनियां और जीवन वृत्तान्त सुनाया जाना चाहिए, उनमें समस्त धर्मों के प्रति आदर भाव उत्पन्न किया जाना चाहिए।

विद्यालय में धार्मिक शिक्षा की व्यवस्था करते समय सावधानियां (Precautions while introducing religious education in schools)-

विद्यालयों में धार्मिक शिक्षा देते समय कुछ बातों का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए। भारत एक धर्म निरपेक्ष राज्य है अतः इस दृष्टि को ध्यान में रखते हुए मुदालियर आयोग ने अपना सुझाव देते हुए कहा कि, “संविधान के अनुसार विद्यालयों में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जा सकती, वे केवल ऐच्छिक आधार पर और स्कूल की पढ़ाई के. घन्टों के अतिरिक्त धार्मिक शिक्षा दे सकते हैं। ऐसी शिक्षा विशेष धर्म के बालकों ओर अभिभावकों तथा स्कूल प्रबन्धकों की इच्छा से ही दी जा सकती है। इस सुझाव को प्रस्तुत करने से हम यह बताना चाहते हैं कि स्कूल में भेदभाव, द्वेष, धार्मिक घृणा तथा कट्टरता को प्रोत्साहन न दिया जाए।”

आयोग का यह भी विचार था कि धर्म-निरपेक्ष का आशय यह है कि राज्य की तरफ से शिक्षा के क्षेत्र में धर्म का कोई स्थान या हस्तक्षेप नहीं होगा। यह बात व्यक्तियों के ऊपर छोड़ देनी चाहिए कि वह स्वेच्छा से किसी भी धर्म को मानें । हमारे राज्य का अपना कोई निजी धर्म नहीं है। इसका धर्म तो केवल जनतन्त्र की सत्यता है जो स्वयं ही एक महान धर्म है। अंतः इससे स्पष्ट है कि विद्यालय में शिक्षा देते समय अग्र बातों का ध्यान दिया जाना चाहिए-

  1. संकीर्ण धार्मिक शिक्षा न दी जाए। छा्रों में व्यापक धार्मिक भावना का विकास किया जाए।
  2. धार्मिक शिक्षा अनिवार्य नहीं की जानी चाहिए।
  3. इस शिक्षा के माध्यम से यह प्रयास किया जाना चाहिए कि छात्र विभिन्न धर्मों में समानता देखें और वैमनस्य से दूर रहें।
  4. धार्मिक शिक्षा नैतिक शिक्षा के आधार पर दी जानी चाहिए। इस सन्दर्भ में गांधीजी का मानना था कि, “नैतिकता के सिद्धान्त सभी धरमों में समान हैं। इस सबका ज्ञान बालकों को अवश्य दिया जाना चाहिए।”
  5. धार्मिक शिक्षा के अन्तर्गत विश्व के विभिन्न धर्मों की महान् विभूतियों से एवं महान ग्रन्थों से छात्रों को परिचित कराया जाना चाहिए।
  6. छात्रों को धार्मिक शिक्षा इस प्रकार से दी जानी चाहिए कि छात्रों के व्यक्तित्व का स्वाभाविक और सर्वांगीण रूप से विकास हो सके।
  7. छात्रों की आलोचनात्मक चिन्तन शक्ति का विकास किया जाना चाहिए जिससे वह धार्मिक विश्वासों एवं मूल्यों का अन्धानुकरण न करें उन पर विचार कर सकें।
  8. अध्यापक का व्यवहार धार्मिक पक्षपात से दूर होना चाहिए।
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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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