इतिहास / History

हुमायूँ के निर्वासन का जीवन | हुमायूँ का पुनर्स्थापन | हुमायूँ का प्रतिस्थापन | हुमायूँ की पुन: दिल्ली में सत्ता प्राप्त करने की प्रक्रिया

हुमायूँ के निर्वासन का जीवन | हुमायूँ का पुनर्स्थापन | हुमायूँ का प्रतिस्थापन | हुमायूँ की पुन: दिल्ली में सत्ता प्राप्त करने की प्रक्रिया

हुमायूँ के निर्वासन का जीवन (Humayun in Exile : 1540-55)

कन्नौज (बिलग्राम) के युद्ध के पश्चात् विजयी शेरशाह दिल्ली एवं आगरा की ओर बढ़ा। उसके आगमन की खबर पाकर हुमायूँ आगरा से भाग चला। वह लाहौर, अपने भाई कामरान के पास पहुंचा।

लाहौर में कामरान का व्यवहार-

लाहौर पहुँचकर हुमायूँ अपने भाइयों एवं अन्य मुगल सरदारों से विचार-विमर्श कर शेरशाह के विरुद्ध अपनी योजना बनाना चाहता था, लेकिन उसके भाइयों ने उसे इस कार्य में सहयोग नहीं दिया। शेरशाह हुमायूँ का पीछा करता हुआ पंजाब आ धमका। हुमायूँ ने उससे पंजाब छोड़ देने का अनुरोध किया और वचन दिया कि वह शेरशाह के राज्य पर आक्रमण नहीं करेगा, परंतु शेरशाह ने उस पर ध्यान नहीं दिया। उसने हुमायूँ को काबुल वापस जाने को कहा। कामरान स्वयं शेरशाह को अपने पक्ष में मिलाकर पंजाब पर अधिकार बनाए रखना चाहता था। ऐसी परिस्थिति में हुमायूँ मिर्जा हैदर की सलाह पर कश्मीर जाने का उपक्रम करने लगा। हिंदाल और यादगार मिर्जा चाहते थे कि वह सिंध की तरफ बढ़े । शेरशाह के पंजाब पर आक्रमण से घबड़ाकर हुमायूं कश्मीर की तरफ बढ़ा मगर कामरान ने उसका मार्ग अवरुद्ध कर दिया। उसका बदख्शा जाने का प्रयास भी कामरान ने विफल कर दिया,क्योंकि उसे काबुल खोने का भय था। हिंदालु हुमायूँ का साथ छोड़कर सिंध और मिर्जा दुगलत कश्मीर चले गए थे । अतः बाध्य होकर हुमायूँ को सिंध जाना पड़ा। मार्ग में हिंदाल भी उससे मिल गया। इधर कामरान अस्करी के साथ काबुल चला गया।

हुमायूँ सिंध में शरण की खोज में-

हुमायूँ सिंध के शासक शाह हुसैन अरगुन के पास सहायता के लिए पहुंचा। शाह ने उसे कोई भी सहायता नहीं दी। सिंध में वह एक जगह से दूसरी जगह घूमता रहा। पातर नामक स्थान में जब वह हिंदाल के साथ ठहरा हुआ था, वहीं उसने हमीदा बानू बेगम से अगस्त, 1541 में विवाह किया। शाह के व्यवहार से क्षुव्य होकर हुमायू ने सिंध विजय की योजना बनाई। उसने थट्टा पर आक्रमण किया एवं सेहवान विजय की योजना बनाई, लेकिन विफल रहा। सेहवान की चढ़ाई मिर्जा यादगार नासिर के विश्वासघात से व्यर्थ हो गई। हुमायूँ की सेना के अनेक सैनिकों और हिंदाल ने भी कठिनाइयों से ऊबकर हुमायूँ का साथ छोड़ दिया। हिंदाल हुमायूँ की अवज्ञा कर कांधार चला गया।

हुमायूँ राजपूताना में-

हुमायूं भक्खर में जब दुर्दिन में घिरा हुआ था, उसी समय उसे मारवाड़ के राजा मालदेव का निमंत्रण मिला। अतः वह राजपूतों की सहायता से अपना खोया राज्य प्राप्त करने की आशा लेकर मारवाड़ की राजधानी जोधपुर की तरफ बढ़ा। मार्ग में जैसलमेर के स्थानीय शासक ने हुमायूँ को घेरने का प्रयास किया। इस आक्रमण को विफल कर हुमायूं जोधपुर के निकट पहुंचा। उसने मालदेव के पास अपना दूत भेजा। इस बीच मालदेव ने शेरशाह के भय और प्रलोभन में फंसकर हुमायूँ को गिरफ्तार करने की योजना बनाई । फलतः हुमायूँ को पुनः वहाँ से भागना पड़ा।

अमरकोट से सिंघ और भारत से पलायन-

मारवाड़ से भागकर हुमायूँ पुनः सिंध के एक छोटे राज्य अमरकोट के राणा बीरसाल के पास पहुँचा। उसने हुमायूँ को सहायता देने का वचन दिया। अमरकोट में ही अक्टूबर, 1542 में अकबर का जन्म हुआ। अनेक कठिनाइयों के बावजूद हुमायूँ ने थट्टा और भक्खर पर अधिकार करने की योजना बनाई जो विफल रही। अतः, उसने शाह हुसैन अरगुन से संधि करने का निश्चय किया। शाह ने भी उसे फंसाने की योजना बनाई । उसने हुमायूं को अफगानिस्तान वापस जाने की सलाह दी एवं मार्ग के खर्च के लिए धन एवं सुरक्षा के लिए एक सैनिक टुकड़ी भी दी। जैसे ही जुलाई, 1543 में हुमायू कांधार की तरफ बढ़ा, उसने अस्करी और कामरान को इसकी गुप्त सूचना भेज दी। दोनों ने मिलकर हुमायूँ को गिरफ्तार करने की योजना बनाई । बैरम खाँ ने अस्करी पर तत्काल आक्रमण करने का सुझाव दिया, परंतु हुमायू ने अपने भाई का खून बहाना उचित नहीं समझा। उसने मक्का जाने की योजना बनाई, लेकिन अपने अमीरों के दबाव में आकर उसने फारस के शाह तहमास्प के यहां शरण लेने का निश्चय किया। अतः कांधार का मार्ग छोड़कर हुमायूँ ने फारस का मार्ग पकड़ा।

ईरान के शाह की शरण में-

दिसंबर, 1543 में हुमायूँ ने शाह के पास सहायता की याचना भेजी। फरवरी, 1544 में शाह की स्वीकृति प्राप्त कर वह शाह के पास पहुंचा। रास्ते भर शाह ने उसके स्वागत की भरपूर व्यवस्था की लेकिन, ईरान पहुँचने पर बैरम खाँ के व्यवहार से क्षुब्ध होकर उसने हुमायूँ को अपमानित करना आरंभ किया। हुमायूँ इन्हें बर्दाश्त करता रहा। अंततः वह कुछ निश्चित शतों के बदले शाह की सहायता पाने में सफल हुआ। शाह ने उसे 14,000 सैनिकों की सहायता दी। उसने हुमायूँ को अपने भाईयों से सावधान रहने और अफगानों के विरुद्ध राजपूतों का सहयोग प्राप्त करने की भी सलाह दी। इन सबके बदले हुमायूं को शिया मत स्वीकार करना पड़ा । भारत में शिया मत को राज्यधर्म बनाने का और कांधार शाह को सौंपने का वादा करना पड़ा।

हुमायूँ का पुनर्स्थापन

(Restoration of Humayun)

ईरान के शाह की सहायता हुमायूँ के लिए एक वरदान सिद्ध हुई। उसने अपना खोया हुआ धैर्य एवं शक्ति पुनः प्राप्त कर ली। एक बार फिर वह भारत में भाग्य आजमाने को लालायित हो उठा, लेकिन इसके पूर्व उसके लिए मध्य एशिया में अपनी शक्ति संगठित करना एवं विद्रोही भाइयों को वश में लाना आवश्यक था। इसलिए सबसे पहले उसने कांधार विजय की योजना बनाई।

कांधार की विजय- ईरान से चलकर हुमायूँ कांधार की तरफ बढ़ा। कांधार पर उसका भाई अस्करी कामरान के प्रतिनिधि की हैसियत से शासन कर रहा था। कामरान, जो हमेशा ही हुमायूँ के विरुद्ध षड्यन्त्र रचता रहता था, ने अस्करी को हुमायूँ का मुकाबला करने का आदेश दिया। हुमायूँ ने अस्करी को समझाने की कोशिश की, परंतु उसके नहीं मानने पर हुमायूँ ने कांधार का दुर्ग घेर लिया। अस्करी को सितंबर, 1545 में दुर्ग सौंप देना पड़ा। अस्करी को नजरबंद कर लिया गया। कांधार ईरान के शाह को सौंप दिया गया परंतु शीघ्र ही कांधार के ईरानी गवर्नर (एक ईरानी राजकुमार) की मृत्यु के बाद हुमायूँ ने इसे अपने अधिकार में ले लिया बैरम खाँ को वहाँ का शासक नियुक्त किया गया।

काबुल एवं बदख्शों पर अधिकार- काबुल पर कामरान का आधिपत्य था। हुमायूँ जिस समय काबुल पर आक्रमण की योजना बना रहा था उसी समय हिंदाल और मिर्जा यादगार कामरान का साथ छोड़कर हुमायूँ से आ मिले। कामरान ने हुमायूँ का मुकाबला किया, पंरतु वह हार गया। काबुल से वह गजनी भाग गया। हुमायूं ने हिंदाल को उसका पीछा करने को भेजा। 15 नवंबर, 1545 को विजयी हुमायूँ ने काबुल में पुनः प्रवेश किया। काबुल के पश्चात् उसने मिर्जा सुलेमान को परास्त कर बदख्शा पर भी अधिकार कर लिया। काबुल और कामरान पर हुमायूँ की विजय अस्थायी सिद्ध हुई। कामरान अभी भी अपने भाई को परेशान करने की कोशिश कर रहा था। जिस समय हुमायूँ बदख्शा में था कामरान ने पुनः 1546 ई० में काबुल एवं गजनी पर अधिकार कर लिया। अतः, हुमायूँ को पुनः काबुल अभियान पर निकलना पड़ा। 1547 ई० में हुमायूँ ने काबुल विजय की। कामरान भागकर बल्ख और बदख्शां चला गया, परंतु अगले ही वर्ष वह पुनः काबुल पर आ धमका। 1548 ई० में हुमायूँ ने उसे पराजित कर क्षमा प्रदान की। इतने पर भी कामरान अपनी नीचता से बाज नहीं आया। उजबेगों की सहायता से 1549-50 में उसने पुनः काबुल पर आक्रमण किया। कामरान इस बार फिर से हुमायूँ के हाथों पराजित होकर इस्लामशाह की शरण में भारत पहुंचा। उसने इस्लामशाह की सहायता से हुमायूँ को परास्त करने की योजना बनाई, परंतु उसे वहाँ निराशा ही हाथ लगी। अतः, वह वापस काबुल की तरफ लौटा। मार्ग में सुलतान अहमद गक्खर ने जो हुमायूँ का हितैषी था. उसे पकड़कर हुमायूँ के पास भेज दिया। हुमायू इस बार भी उसे क्षमादान देने को तैयार था, परंतु अपने सरदारों के दबाव में आकर उसने कामरान को अंधा करवा दिया। बाद में हुमायूँ की अनुमति से वह मक्का चला गया। वहीं अक्टूबर 1557 में उसकी मृत्यु हुई। इस बीच अस्करी भी 1551 ई० में मक्का भाग गया था। वहीं उसकी मृत्यु हुई। हिंदाल भी एक युद्ध में मारा जा चुका था। इस प्रकार, 1553 ई० तक हुमायूँ आंतरिक विद्रोहों पर नियंत्रण प्राप्त कर चुका था। काबुल, कांधार, गजनी, बदख्शां पर उसकी सत्ता स्थापित हो चुकी थी। अतः, वह पुनः भारत विजय के लिए तैयार हुआ।

पंजाब पर आक्रमण- 1553 ई. तक हुमायूँ अपने भाइयों के विरोध, शाह-तहमास्प के आक्रमण के भय से और भारत के अफगान सुलतान इस्लाम शाह के डर से पंजाब पर आक्रमण नहीं कर सका यद्यपि पंजाब में इस समय सुलातन के विरुद्ध विद्रोह हो रहे थे। नवंबर, 1553 में इस्लाम शाह की मृत्यु ने अफगानों की शक्ति अधिक कमजोर कर दी। गद्दी के अनेक दावेदार उठ खड़े हुए। भारत पर आक्रमण करने का यह सर्वथा उपयुक्त अवसर था। इसलिए, हुमायूँ ने पंजाब और अंततः दिल्ली-आगरा विजय के लिए अभियान आरंभ किया।

नवंबर, 1554 में हुमायूँ पंजाब की तरफ रवाना हुआ। शीघ्र ही वह पेशावर पहुँच गया। सिंधु पारकर वह लाहौर की तरफ बढ़ा। इस बीच बैरम खाँ भी अपनी सेना के साथ कांधार से आकर हुमायूँ से मिल गया था। अतः, हुमायूँ ने बिना किसी प्रतिरोध के फरवरी, 1555 में लाहौर पर अधिकार कर लिया। लाहौर के पश्चात् सरहिंद, हिसार और दीपालपुर पर भी मुगलों ने अधिकार कर लिया।

मच्छीवाड़ा में अफगानों की पराजय- मुगलों के आगमन एवं पंजाब पर उनके अधिकार की सूचना पाते ही अफगान सुलतान सिंकदर सूर ने अपने योग्यतम सेनापतियों तातार खाँ और हैवात खाँ को सेना के साथ मुगलों को रोकने के लिए भेजा। लुधियाना के निकट मच्छीवाड़ा नामक स्थान पर मुगलों एवं अफगानों की मुठभेड़ हुई । मुगल तोपचियों के आगे अफगान धनुर्धर टिक नहीं पाए। 15 मई, 1555 को अफगान प्राजित होकर भाग खड़े हुए। इस विजय के परिणामस्वरूप संपूर्ण, पंजाब, सरहिन्द, हिसार-फिरोजा और दिल्ली के कुछ सीमावर्ती क्षेत्र पर भी मुगलों का आधिपत्य स्थापित हो गया।

सरहिंद का युद्ध- मच्छीवाड़ा में पराजय के पश्चात् स्वयं सिकंदर सूर एक विशाल सेना के साथ सरहिंद पर अधिकार करने के लिए दिल्ली से चला। बैरम खाँ, हुमायूँ और अल्पायु अकबर ने भी इस युद्ध में भाग लिया। 22 जून, 1555 को सरहिंद के निकट मुगलों और अफगानों की मुठभेड़ हुई। अफगानों की विशाल सेना मुगलों के सामने टिक नहीं पाई। अनेक अफगान सैनिक मारे गए। सिकंदर सूर भाग खड़ा हुआ। सरहिंद के युद्ध ने अफगानों की सत्ता समाप्त कर दी। जिस प्रकार पानीपत के प्रथम युद्ध में इब्राहीम की पराजय ने भारत में मुगलों की सत्ता स्थापित की थी, उसी प्रकार सरहिंद के युद्ध में सिकंदर सूर की पराजय ने भारत में मुगल सत्ता की पुनर्स्थापना कर दी। इस युद्ध ने अफगानों के भाग्य का फैसला कर दिया। दिल्ली का सिंहासन उनके हाथों से निकल गया।

हुमायूँ का प्रतिस्थापन

(The Restoration of Humayun)-

सरहिंद के युद्ध के पश्चात् हुमायूँ के लिए दिल्ली का मार्ग प्रशस्त हो गया। सरहिंद से हुमायूँ समाना गया । उसने सिकंदर खान उजवेग को दिल्ली पर अधिकार करने को भेजा । मुगल सेना के आगमन की खबर पाकर अफगान बिना विरोध किए ही दिल्ली छोड़कर भाग खड़े हुए। दिल्ली पर मुगलों का पुनः अधिकार हुआ। 23 जुलाई, 1555 को विजेता हुमायूँ ने दिल्ली में प्रवेश किया। एक बार फिर उसका अभिषेक हुआ। ‘खुतबा’ पढ़ा गया एवं हुमायूँ के नाम के सिक्के ढलवाए गए। मुगल अमीरों को इनाम बांटे गए।

हुमायूँ के अंतिम दिन और मृत्यु- हुमायूँ ने बहुत कठिन परिश्रम से विपत्तियों से जूझते हुए अंततः अपना खोया हुआ राज्य वापस पाया था। उसने अपना शेष समय आराम करने में व्यतीत किया। वह अन्य भागों की विजय और प्रशासनिक व्यवस्था की योजनाएँ बनाने में व्यस्त रहा, परंतु दुर्भाग्य ने एक बार पुनः हुमायूँ पर प्रहार किया। 24 जनवरी, 1556 को अपने पुस्तकालय की सीढ़ियों से गिरकर वह गंभीर रूप से घायल हो गया। उपचार के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका। 26 जनवरी, 1556 को हुमायूँ को मृत्यु हो गई। हुमायूं के दुर्भाग्य पर व्यंग्य करते हुए इतिहासकार लेनपूल ने ठीक ही लिखा है, “हुमायूँ जीवन भर ठोकरें खाता रहा और ठोकर खाकर ही उसके जीवन का अंत हुआ।”

हुमायूँ के कार्यों का एक मूल्यांकन

(An Estimate of Humayun’s Works)-

हुमायू का व्यक्तित्व और चरित्र विवादास्पद है। ताबकात-ए-अकबरी का लेखक निजामुद्दीन और इतिहासकार फरिश्ता हुमायूँ के व्यक्तिगत चरित्र और मानवीय गुणों की प्रशंसा करते हैं। वह दयालु, विद्याप्रेमी, साहित्य, कला एवं विज्ञान में अभिरुचि रखनेवाला था परंतु उसमें अनेक चारित्रिक दुर्बलताएँ भी थीं। वह आलसी, सुस्त और अदूरदर्शी था। इसीलिए, उसे अपना राज्य खोकर वर्षों तक भगोड़े का जीवन व्यतीत करना पड़ा। हुमायूँ की सबसे प्रशसनीय बात यह है कि घोर निराशा की परिस्थिति में भी उसने कभी धैर्य और साहस नहीं खोया। प्रतिकूल परिस्थितियों से वह सदैव जूझता रहा और अतंतः सफल हुआ। यद्यपि वह बाबर की ही तरह अपने उत्तराधिकारी के लिए निरापद विरासत नहीं छोड़ सका, तथापि उसने मुगलों के शासन के लिए मार्ग अवश्य प्रशस्त कर दिया। उसने प्रशासन की एक रूपरेखा भी बनाई। समस्त राज्य को विभिन्न प्रांतों में विभक्त करने की योजना बनी। प्रशासन को चार विभागों के सुपुर्द किया गया- अस्ति (सैनिक विभाग से संबंद्ध) हवाई (महल की आंतरिक व्यवस्था), अबी (जल एवं नदी से संबद्ध) तथा खाकी (कृषि एवं भूमि से संबद्ध)। प्रत्येक विभाग की देखभाल के लिए अलग-अलग मंत्री बहाल किए गए। उसने सप्ताह के दिनों को निश्चित कार्यों के लिए तय किया। शनिवार और बृहस्पतिवार का दिन विद्वानों एवं धार्मिक व्यक्तियों से मुलाकात के लिए तय किया गया। रविवार और मंगलवार को वह राजकीय पदाधिकारियों से मिलता एवं प्रशासनिक कार्य करता। बाकी दिन वह आराम और व्यक्तिगत कार्यों में व्यतीत करता। हुमायूँ की प्रशासनिक रूप-रेखा को उसके उत्तराधिकारी अकबर ने संशोधित एवं परिवर्धित कर मुगल राज्य की जड़ सुदृढ़ की। इस तरह हुमायूँ जीवन में असफल नहीं रहा। हां, वह भाग्यहीन अवश्य था। वस्तुतः हुमायूँ दया का पात्र है घृणा का नहीं।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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