इतिहास / History

हुमायूँ की कठिनाइयों की समीक्षा | हुमायूँ की प्रारम्भिक कठिनाइयाँ | क्या हुमायूँ स्वयं अपना शत्रु था?

हुमायूँ की कठिनाइयों की समीक्षा | हुमायूँ की प्रारम्भिक कठिनाइयाँ | क्या हुमायूँ स्वयं अपना शत्रु था?

हुमायूँ की कठिनाइयों की समीक्षा

नासिरुद्दीन हुमायूँ का जन्म काबुल में 6 मार्च 1508 ई० को हुआ था। वह बाबर के चार पुत्रों में सबसे बड़ा था तथा उसकी माता का नाम माहिम बेगम था। माहिम बेगम शिया धर्म को मानने वाली थी। ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण हुमायूँ की शिक्षा-दीक्षा का उत्तम प्रबन्ध किया गया था। इससे हुमायूँ ने तुर्की, अरबी, फारसी तथा हिन्दी भाषा का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया था। इसके अतिरिक्त उसने गणित, दर्शनशास्त्र तथा ज्योतिष की भी शिक्षा प्राप्त की थी। बाबर ने हुमायूँ के लिए उचित सैनिक शिक्षा का भी प्रबन्ध किया था। 18 वर्ष की अवस्था से ही हुमायूँ ने युद्धों का संचालन प्रारम्भ कर दिया था। पानीपत एवं खानवा के युद्ध में भी उसने सैन्य संचालन किया था। इसके बाद उसे हिसार, फिरोजा, बदख्शा, सम्भल आदि जागीरों का प्रशासन संभालने का दायित्व दिया गया था। इन दायित्वों को हुमायू ने बखूबी निभाया। इससे प्रसन्न होकर बाबर ने रोगग्रस्तता की स्थिति में ही उसने अपनी जीवन काल में ही उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। बाबर ने हुमायूँ के रोगग्रस्त होने पर उसे जीवन के लिए खुदा से प्रार्थना की तथा बदले में अपना जीवन लेने के लिए कहा। संभवतः खुदा ने उसकी पुकार सुन ली। हुमायूँ तो ठीक हो गया किन्तु बाबर 26 दिसम्बर 1530 ई० को परलोक सिधार गया।

यद्यपि हुमायूँ का अर्थ होता है भाग्यशाली किन्तु मुगल इतिहास का वह सर्वाधिक बदकिस्मत बादशाह था। उसकी कठिनाइयां उसके राज्यारोहण के पूर्व से ही प्रारम्भ हो गयी थीं । बाबर को मृत्यु 26 दिसम्बर को हुई थी और हुमायूँ का राज्यारोहण 30 दिसम्बर को हुआ था। इस चार दिन के मध्य उसे गद्दी से हटाने और मेहंदी ख्वाजा को राजगद्दी सौंपने का षड्यन्त्र रचा गया था। इस षड्यन्त्र का कर्ता प्रधानमंत्री निजामुद्दीन अली मुहम्मद खलीफा था जो बाबर की मृत्यु से पूर्व ही यह षड्यन्त्र अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया था, किन्तु इसके कार्यान्वित होने के पूर्व ही खलीफा ने अपना निर्णय बदल दिया। इस प्रकार षड्यन्त्र का अन्त हो गया और हुमायूँ का राज्याभिषेक 30 दिसम्बर 1530 ई. को सम्पन्न हो गया।

हुमायूँ की प्रारम्भिक कठिनाइयाँ-

हुमायूँ ने राजसिंहासन को काँटों के सेज के रूप में प्राप्त किया था। मुगल साम्राज्य जिसमें मध्य एशिया के बल्ख, कुन्दुज और बदख्शां प्रान्त सम्मिलित थे और भारत में पंजाब, मुल्तान, आधुनिक अवध और उत्तर प्रदेश, बिहार, ग्वालियर, धौलपुर, बयाना और चन्देरी सम्मिलित थे एक असंगठित साम्राज्य के रूप में था। इस प्रकार कठिनाइयाँ उसे अपने पिता से विरासत के रूप में प्राप्त हुई थीं। कुछ समस्याएँ हुमायूँ के सम्बन्धी मिर्जाओं और भाइयों ने खड़ी की थी। लेकिन उसकी सबसे बड़ी कठिनाई उसके अफगान शत्रु थे जो उस समय भी मुगल वंश को भारत से बाहर निकालने के लिए प्रयत्नशील थे। इन कठिनाइयों के साथ ही साथ हुमायूँ का अपना व्यक्तिगत चरित्र भी कठिनाइयों का बर्धक ही रहा। हुमायूँ की कठिनाइयों को निम्नलिखित शीर्षकों में रखा जा सकता है-

(1) हुमायूँ को बाबर से विरासत में प्राप्त समस्याएँ- निःसन्देह बाबर ने मुगल साम्राज्य की स्थापना की थी, जो अत्यन्त विशाल था। भारत के अतिरिक्त मध्य एशिया के प्रान्त भी उसमें शामिल थे। परन्तु वह उस साम्राज्य की जड़ों को दृढ़ न कर सका था। शासन की सुन्दर व्यवस्था करने में बाबर असमर्थ था। इतिहासकार मेलीसन ने लिखा है-“जब बाबर की मृत्यु हुई तो पूर्वकालीन मुसलमान राजवंशों की भाँति मुगल राजवंश की जड़े भी भारतीय भूमि में जम नहीं सकी थीं। बाबर ने अपनी प्रजा के हृदय पर विजय पाने का प्रयत्न नहीं किया था। प्रजा अभी मुगलों को विदेशी आक्रान्ता के रूप में ही देख रही थी। उसकी अनुचित और अनावश्यक उदारता के कारण शाही खजाना खाली हो चुका था, जिससे आरम्भ से ही हुमायूँ को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। सैनिक जागीरों की व्यवस्था द्वारा अनेक बड़े-बड़े सरदार उठ खड़े हुए थे जो नये सम्राट को आसानी से स्वीकार करने को तैयार नहीं थे उसके इशारों पर चलने को तैयार नहीं थे, क्योंकि वे जानते थे कि राजा निर्बल और अस्थिर चित्त का व्यक्ति था। हुमायूँ के कानों में उसके पिता का यह अन्तिम उपदेश भी गूंजा करता था कि चाहे उसके भाई अच्छे व्यवहार के योग्य हों या न हों, उनके साथ अच्छा व्यवहार ही किया जाना चाहिए। आज्ञाकारी एवं कर्त्तव्यपरायण पुत्र होने के कारण उसने अपने पिता के उपदेश की अवहेलना कभी नहीं की, जबकि इस उपदेश के पालन में उसे सदैव हानि उठानी पड़ी। इस प्रकार हुमायूँ को असंगठित साम्राज्य मिला था। अत: अपने विशाल साम्राज्य को संगठित कर वहाँ सक्षम व कार्यकुशल प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित करना हुमायूँ के लिए आवश्यक था, किन्तु यह कार्य सरल न था। इतिहासकार लेनपूल ने ठीक ही लिखा है-“It was no easy throne that Babar left to his son nor was Humayun a man enough to fit.”

(2) हुमायूँ के बन्धु-बान्धव- हुमायूँ के तीन भाई भी थे जिनसे उसे सहयोग की जगह संघर्ष करना पड़ा। पहला भाई कामरान था, जो हुमायूँ से छ: वर्ष छोटा था। पहले से ही काबुल और कंधार उसके अधिकार में थे। दिल्ली के राजसिंहासन पर उसकी कुटिल दृष्टि लगी हुई थी। दूसरा भाई अस्करी हुमायूँ से आठ वर्ष छोटा था। तीसरा हिन्दाल था जो अस्करी से दो वर्ष छोटा था। ये लोग भी बड़े झगड़ालू, उपद्रवी एवं महत्वाकांक्षी थे, किन्तु असाधारण योग्यता एवं चरित्रबल का इनमें नितान्त अभाव था। लेनपूल का यह कथन उचित प्रतीत होता है कि “सदा से निर्बल और अस्थिर होने के कारण अस्करी और हिन्दाल महत्वाकांक्षी व्यक्तियों के हाथ के यन्त्र होने के कारण खतरनाक हो गये थे।”

(3) हुमायूँ के रिश्तेदार एवं मिर्जावर्ग- हुमायूँ को अपने सम्बन्धियों से भी अत्यधिक कठिनाई का सामना करना पड़ा। इनमें मिर्जा लोग प्रमुख थे जो तैमूर वंशी थे और बाबर से अपने रक्त सम्बन्ध का दावा करते थे। इनमें प्रमुख मुहम्मद जमान मिर्जा था। वह हिरात सुल्तान हुसैन बैकरा का पोता था और हुमायूँ की सौतेली बहन मासूमा बेगम से उसने विवाह किया था। वह एक अनुभवी सैनिक था, साथ ही वह महत्वाकांक्षी था तथा दिल्ली के राजसिंहासन के लिए लालायित था। दूसरा प्रमुख मिर्जा मुहम्मद सुल्तान था । वह भी तैमूरी वंश परम्परा में था अतः दिल्ली के सिंहासन को लालायित था। तीसरा मेहंदी ख्वाजा था। यह बाबर का बहनोई था। इसे बाबर के प्रधानमंत्री ने राज्याधिकार के लिए चुन लिया था, आत्मनिर्णय के अभाव के कारण अवसर को खो चुका था। फिर भी राज्य सैन्य विभाग का प्रमुख एवं बाबर का निकट सम्बन्धी होने के कारण उसने स्वयं को हुमायूँ के बराबर समझ लिया था। कुछ अन्य उच्चाधिकारी भी थे जो चुगताई तुर्क थे और मुगल राजवंश से इनका सम्बन्ध था। बड़ी-बड़ी जागीरें प्राप्त होने के कारण ये अत्यन्त महत्वाकांक्षी थे और अपने को हुमायूँ का समकक्षी मानते थे। अतः इनका उचित प्रबन्ध करना हुमायूँ के लिए समस्या थी।

(4) अफगानों की समस्या- हुमायूँ को प्रारम्भिक कठिनाइयों में सर्वप्रमुख एवं प्रत्यक्ष समस्या अफगानों की थी। वे यह नहीं भूल सके थे कि कुछ वर्षों पहले ही दिल्ली पर उनका आधिपत्य था। इस कारण उनमें से कई दिल्ली को पुनः अफगानों के अधीन लाना चाहते थे। इब्राहीम लोदी का भाई महमूद लोदी भागकर बिहार चला गया था जहाँ सभी विद्रोही अफगान सरकार एकत्रित हो रहे थे। बंगाल का शासक खुले तौर से उनकी सहायता कर रहा था। गुजरात का शासक बहादुर शाह न केवल जवान था बल्कि शक्तिशाली और महत्वाकांक्षी भी था। उसके पास एक बड़ी सेना, एक अच्छा तोपखाना और गुजरात जैसे धनाढ्य सूबे की आर्थिक शक्ति थी। मालवा को उसने जीत लिया था और राजस्थान पर उसका दबाव बढ़ता चला जा रहा था। फतह खाँ, कुतुब खाँ, आलम खाँ, लोदी जैसे अफगान उसके यहाँ संरक्षण प्राप्त किये हुए थे। शेरखाँ और बंगाल के शासक से उसका पत्र व्यवहार था । हुमायूँ का प्रत्येक शत्रु और विद्रोही बहादुर शाह से मदद चाहता था। शेरखाँ सूर अफगानों को एक शक्तिशाली सम्प्रदाय के रूप में ढालने का अवसर ताक रहा था, ताकि उनकी सहायता से वह एक स्वतन्त्र राज्य का निर्माण कर सके। इसके अतिरिक्त बिब्बन और बायजीद जिनको उनके राज्यों से निकाल दिया गया था। पुन: अपने राज्यों पर अधिकार करने की प्रतीक्षा में बैठे हुए थे।

(5) दोषपूर्ण सैन्य संगठन- मुगल सेना का संगठन दोषपूर्ण था उसमें उजबेग, मुगल, तुर्क, ईरानी, अफगान, भारतीय आदि सम्मिलित थे जो अपनी ही जाति के सरदारों की अधीनता में थे। ऐसी सेना में एकता के स्थान पर ईर्ष्या और द्वेष की संभावना अधिक थी। जब तक बाबर राजगद्दी पर बैठा रहा अपनी योग्यता के कारण वह सेना को अनुशासित व संगठित रखे रहा किन्तु हुमायूँ के शासक बनते ही स्थिति में परिवर्तन होने लगा। अतः राष्ट्रीय सेना के अभाव में हुमायूं को प्रारम्भ से ही महान कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

(6) साम्राज्य का विभाजन- बाबर ने अपनी मृत्यु से कुछ समय पूर्व हुमायूँ से कहा था, “हुमायूँ” मेरे आदेश का सारांश यह है कि अपने भाइयों के साथ कोई बुराई मत करना चाहे वे इसके योग्य ही हों।” बाबर ने हुमायूं से साम्राज्य को भाइयों में विभाजित करने के लिए भी कहा था। अतः हुमायूँ ने बाबर की इच्छा के अनुसार साम्राज्य को अपने भाइयों में विभाजित कर दिया था। डा. ए. एल. श्रीवास्तव ने इसे हुमायूँ की सबसे बड़ी भूल माना है। अपने द्वेषी और प्रतिद्वन्द्वी भाइयों पर कड़ा नियन्त्रण रखने के बजाय उसने उन्हें अपने राज्य का भागीदार बना दिया। सुलेमान मिर्जा को बख्शा में स्थायी पद दे दिया गया। हिन्दाल को बदख्शां से लौटने पर मेवात का विस्तृत क्षेत्र जागीर में दे दिया गया, जिसमें आधुनिक अलवर, गुडगाँव, और मथुरा के जिले तथा आगरा का कुछ भाग सम्मिलित था, और एक शक्तिशाली सेना का सरदार बनाकर उसे मेवात की राजधानी अलवर भेज दिया।

सम्भल का जिला अस्करी के नाम कर दिया गया। यह भी मेवात की तरह घना बसा हुआ विस्तृत प्रदेश था। कामरान को जो कि खुला विद्रोह कर रहा था, काबुल और कन्धार का न केवल स्थायी अधिकारी बना दिया गया बल्कि पंजाब और हिसार फिरोजा के जिलों पर बलात् अधिकार कर लेने दिया गया। पंजाब और हिसार के अपहरण को स्वीकार करके हुमायू ने अपने पिता के साम्राज्य संगठन की जड़ काट दी। काबुल, कंधार और सिंघ के क्षेत्र कामरान के अधिकार में चले जाने से सेना के लिए रंगरूटों की भर्ती का सबसे अच्छा क्षेत्र हाथ से निकल गया था। नुगल मध्य एशिया से अपनी सेना में सैनिकों की भर्ती किया करते थे। कामरान के पंजाब और अफगानिस्तान का वास्तविक शासक बन जाने की स्थिति में हुमायूँ का सम्पर्क मध्य एशिया से टूट गया और उसे सिन्धु के पार रंगरूटों की भर्ती करने से वंचित होना पड़ा। हिसार पर अधिकार करने से कामरान ने पंजाब और दिल्ली के बीच की मुख्य सड़क पर भी अपना अधिकार सुरक्षित कर लिया। सैनिक अधिकारियों को बहुत अधिक मात्रा में भूमि वितरित करने की घातक नीति के दुष्परिणामों को समझने में वह असमर्थ रहा जिसके लिए उसका पिता भी उत्तरदायी था। हुमायूँ ने इतनी ही भूल नहीं की बल्कि उसने अपने प्रत्येक सरदार की जागीर में भी अभिवृद्धि कर दी, जिसका परिणाम यह हुआ कि उच्च मुगल अधिकारियों को स्वच्छन्द होने का प्रोत्साहन मिला।

परन्तु डा० आर० पी०. त्रिपाठी हुमायूँ के उपरोक्त कार्य को उसकी विवशता बताते हैं। उनके अनुसार हुमायूँ ने उपरोक्त कार्य प्राचीन तुर्क-मंगोल परम्परा के कारण बाध्य होकर किया था। यदि वह ऐसा न करता तो चारों भाइयों में गृह युद्ध की संभावना थी। किन्तु डा० ईश्वरी प्रसाद ने साम्राज्य के विभाजन को हुमायूँ की भूल माना है। उनके अनुसार, ये सुविधाएँ देना हुमायूँ की भूल थी क्योंकि उन्होंने उसे अफगान पहाड़ियों के परे के भू-क्षेत्रों से पृथक कर दिया।” अतः स्पष्ट है कि इस विभाजन का कारण चाहे हुमायूँ की उदारता हो और चाहे उसकी बाध्यता, परन्तु हुमायूँ की यह भूल अवश्य थी।

(7) राजपूत समस्या- बाबर ने खानवा के युद्ध में राणा साँगा को परास्त करके राजपूतों की शक्ति को चकनाचूर कर दिया था, किन्तु राजपूत पुनः धीरे-धीरे संगठित होते जा रहे थे। इस बार राजपूतों का नेता राणा सांगा का पुत्र रत्न सिंह था जो मुगलों को भारत से निष्कासित करने के लिए दृढ़ संकल्प था।

(8) हुमायूँ की व्यक्तिगत दुर्बलताएँ- हुमायूँ 23 वर्ष की अवस्था में गद्दी पर बैठा था, फिर भी उसमें योग्यता का अभाव था। यद्यपि वह बौद्धिक योग्यता एवं साहित्यिक अभिरुचि का धनी था फिर भी उसमें सैनिक योग्यता एवं इच्छाशक्ति का अभाव था। राजनीतिक तथा शासन व्यवस्था के मामलों में वह बुद्धिमत्ता से काम न लेता था। इसके अतिरिक्त वह क्रियाशील अध्यवसायी पुरुष न गा। किसी बात को शीघ तय करने और शीघ्र उसे निष्पादित कर देने की क्षमता उसमें न थी। इतिहासकार लेनपूल ने लिखा है कि-“उसमें चारित्रिक बल और संकल्प शक्ति का अभाव था। डटकर प्रयल करना उसकी शक्ति के बाहर था। विजय प्राप्ति के थोड़ी देर बाद वह अपने हरम में जाकर आनन्द से पड़ा रहता था और अपने अमूल्य समय को अफीम के नशे में नष्ट कर देता था। इधर उसके शत्रुओं का गर्जन उसके द्वार पर सुनायी दे रहा था। स्वभाव से ही दयालु होने के कारण जहाँ उसे दण्ड देना चाहिए था, वहाँ वह क्षमादान करता था। नम्र स्वभाव तथा मिलनसार होने के कारण वह ऐसे नाजुक वक्त में भी खाने-पीने में मौज करता नजर आता था, जबकि उस समय उसे युद्ध क्षेत्र में होना चाहिए था। उसके चरित्र में आकर्षण तो है, लेकिन कोई प्रभाव नहीं। जीवन में वह प्रसन्नचित्त था और उसकी वृत्तियाँ शुद्ध थीं तथा उसका सम्पूर्ण जीवन भलमनसाहत से भरा था, किन्तु बादशाह के रूप में वह असफल रहा।”

क्या हुमायूँ स्वयं अपना शत्रु था?

डा० आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव लिखते हैं कि- “यद्यपि नाम उसका हुमायूँ था, जिसका अर्थ होता है भाग्यशाली किन्तु दरअसल था वह एक बदकिस्मत बादशाह। दूसरों के प्रति उदार, सहदय और भला व्यवहार करने के बावजूद वह एक शासक के रूप में असफल ही सिद्ध हुआ।” स्पष्ट है कि हुमायूँ की असफलताओं के लिए जितना उसका चरित्र दोषी था उतना ही उसका दुर्भाग्य। हुमायूँ की असफलताओं के कारणों का विवेचन निम्नलिखित है-

विभिन्न भूलें जो हुमायूँ ने अपने शासन के आरम्भ में कीं, वे अन्त में हुमायूँ की पराजय और असफलता के लिए उत्तरदायी हुई। इस सम्बन्ध में हुमायूँ के प्रति डा० आर० पी० त्रिपाठी का दृष्टिकोण सबसे उदार है। उनके अनुसार हुमायूँ की असफलता के लिए उसके भाइयों के विरोध और उसके चरित्र के दोषों को बहुत महत्व दिया गया है जो अनुचित और अन्यायपूर्ण है। उसे अपने भाइयों में साम्राज्य का विभाजन प्राचीन तिमूरी परम्परा के कारण करना पड़ा था अन्यथा गृहयुद्ध का भय था। उसने गुजरात को जीतने के पश्चात् मॉडू में और बंगाल को जीतने के पश्चात् गौड़ में जो समय व्यतीत किया उसका कारण ऐशों आराम अथवा आलस्य न था बल्कि विजित प्रदेशों की व्यवस्था करने की आवश्यकता थी। उसके भाइयों में से कामरान ने आरम्भ के दस वर्षों में उसके विरुद्ध कोई कार्य नहीं किया। कन्नौज के युद्ध के पश्चात् कामरान को अपने भाई की योग्यता में विश्वास नहीं रह गया और उसने अपने अधीन क्षेत्रों को बचाने की भावना से उसने अपना मार्ग हुमायूँ से पृथक कर लिया। अस्करी ने हुमायूं के विरुद्ध कभी भी विद्रोह नहीं किया बल्कि वह प्रायः सभी बड़े युद्धों में हुमायूँ के साथ रहा। जब कामरान हुमायूँ से अलग हुआ तो अस्करी भी कामरान के साथ चला गया, क्योंकि वे एक माँ के पुत्र थे। तब भी उसने चालाकी से हुमायूँ को ईरान भागने में सहायता दी और उसके बच्चे अकबर की देखभाल और सुरक्षा की। सबसे छोटा भाई हिन्दाल दुर्बल बुद्धि का था और शीघ्र ही दूसरों के प्रभाव में आ जाता था। इस कारण उसने हुमायूँ के विरुद्ध विद्रोह तो किये परन्तु संकोचपूर्ण हृद्य से। कई अवसरों पर उसने भूलें तो की परन्तु तब भी उसके सम्बन्ध हुमायूँ से प्रेम के रहे और अन्त में वह हुमायूँ की तरफ से युद्ध में लड़ता हुआ मारा गया। निःसन्देह यदि कामरान और हिन्दाल ने समय रहते हुए चौसा के युद्ध से पहले हुमायूँ को सहायता पहुंचा दी होती तो हुमायूँ का भाग्य बच जाता परन्तु उस समय भी इसका कारण उनकी दुर्भावना नहीं बल्कि भूल थी। जिस समय हुमायूँ युद्ध में पराजित होकर वापस आया उस समय उन्होंने उसकी दुर्बलता से कोई लाभ नहीं उठाया।

व्यक्तिगत चरित्र के विषय में डा० आर० पी० त्रिपाठी का कथन है-व्यक्तिगत चरित्र की दृष्टि से भी हुमायूँ में कोई ऐसी दुर्बलता न थी जिससे वह एक सफल शासक न होता । वह एक साहसी सैनिक और अनुभवी सेनापति था। उसका अफीम का नशा बाबर के विभिन्न नशों की तुलना में बहुत कम था। बाबर की सफलता हुमायूँ की तुलना में कम होती यदि उसने पानीपत के युद्ध को न जीता होता अथवा उसका मुकाबला शेरशाह से होता। इस कारण हुमायूँ की असफलता के कारण ये न थे। हुमायूँ की पराजय का कारण यह था कि उसके शत्रुओं के पास अच्छा तोपखाना था जो बाबर के शत्रुओं के पास न था और शेरशाह हुमायूं की तुलना में निःसन्देह अधिक अनुभवी और योग्य था। हुमायूँ की एक दुर्बलता उसकी दुर्बल आर्थिक व्यवस्था था। बाबर की भाँति वह अपव्ययी और उदार था। हुमायूँ के चरित्र की यह दुर्बलता भी उसके लिए हानिकारक थी कि वह दूसरे के शब्दों पर अत्यधिक विश्वास कर लिया करता था। हुमा अपने भाग्य का भी शिकार था। तार्दीवेग का अस्करी की सहायता न करना गुजरात और मालवा के खो जाने का कारण बना, बंगाल का शासक महमूदशाह कुछ महीने भी अपनी रक्षा न कर सका और कन्नौज के युद्ध के अवसर पर घनघोर वर्षा हो गयी जो हुमायूँ की पराजय का मुख्य कारण बनी। उसके राजनीतिक निर्णय भी दोषपूर्ण थे। वे यह सिद्ध करते हैं कि वह मनुष्य और उनके उद्देश्यों को परखने का पारखी न था और न वह राजनीतिक परिस्थितियों और प्रशासकीय समस्याओं को ही ठीक प्रकार से समझता था।

डा० एस० आर० शर्मा ने हुमायूँ के विषय में इस प्रकार टिप्पणी की है-हुमायूँ का अपने साम्राज्य के उत्तर-पश्चिम के भाग को कामरान के हाथों में छोड़ना, अपनी अर्थव्यवस्था को ठीक न करना, समय पर चित्तौड़ की सहायता न करना तथा राजपूतों की सहानुभूति पाने के अवसर को खो देना, दोहरिया के युद्ध के पश्चात् चुनार को अपने आधिपत्य में न करना, मालवा और गुजरात की विजय के पश्चात् अपनी विजय को संगठित न करना और उसके पश्चात् ऐशो-आराम में डूब जाना उसकी असफलता के कारण थे। हुमायूं के चरित्र की अत्यधिक उदारता, सैनिक परिस्थितियों को ठीक प्रकार समझना, निर्णय लेने की शक्ति का अभाव आदि दुर्बलताएँ भी उसकी असफलता के कारण थे।

डा० एस० एल० श्रीवास्तव के अनुसार, “हुमायूँ का अपने भाइयों में राज्य का बँटवारा, रचनात्मक कार्यों को करने के स्थान पर आरम्भ से युद्ध की नीति को अपनाना, उसका कालिंजर अभियान शेरशाह की शक्ति का ठीक अनुमान न करना, 1532 ई० में चुनार का घेरा डालने के पश्चात् अधूरी सन्धि करके वापस आ जाना, बहादुरशाह एवं शेरशाह के पारस्परिक सहयोग को न समझना, चित्तौड़ के आक्रमण के समय ही बहादुरशाह पर आक्रमण न करना, गुजरात एवं मालवा को जीतकर उसका उचित संगठन न करना, बिहार में शेरखाँ की शक्ति समाप्त किये बिना बंगाल चले जाना, कन्नौज के युद्ध के अवसर पर अपनी सेना को नीची भूमि पर रखना आदि उसकी असफलता के कारण थे। इसके अतिरिक्त नेतृत्व का अभाव, संगठनकर्ता की कमी, धन का अपव्यय समय-समय पर विलासिता में फंस जाना और दृढ़तापूर्वक निरन्तर कार्य करने की क्षमता का न होना आदि चारित्रिक दोष भी उसकी असफलता के कारण थे।”

इतिहासकार लेनपूल ने लिखा है, “हुमायूँ का सबसे बड़ा दुश्मन वह स्वयं था। इसमें कोई भी सन्देह नहीं है। हुमायूँ ने कभी स्थिति के अनुकूल कार्य नहीं किया। चौसा के युद्ध में नीचे स्थान पर शिविर होने के कारण जब वर्षा का पानी उसके शिविरों में भर गया जिसकी वजह से उसे हारना पड़ा तो इससे सबक लेते हुए उसे बिलग्राम (कन्नौज) के युद्ध में ऊंचे स्थान पर शिविर लगाना चाहिए था किन्तु ऐसा नहीं हुआ और एक बार पुनः उसे उसी समस्या का सामना करना पड़ा। इसी प्रकार चौसा के युद्ध से सबक लेकर उसे कन्नौज के युद्ध के समय महीनों इंतजार न करके तुरन्त शेरशाह पर आक्रमण करना चाहिए था, किन्तु हुमायूं ने कभी भी अपनी भूलों को सुधारने का प्रयास न किया। इसके अतिरिक्त उसकी व्यक्तिगत दुर्बलताएँ भी उसके पतन का कारण बनी। हुमायूँ अफीमची व विलासी स्वभाव का व्यक्ति था। लेनपूल ने लिखा है-“हुमायूँ जमकर काम करने वाला व्यक्ति न था। क्षणिक विजय के उल्लास में ही वह स्वयं को अन्तःपुरी को विलासिता में डुबो देता था तथा वह अफीमची की दुनिया में खो जाता था।”

“He was incapable of sustained efforts, and after a movement of triumph would bury himself in his HAREM and dream away of precious hours in the opium eater’s paradise.” -Lanepoole

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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