इतिहास / History

इतिहास में वस्तुनिष्ठता का समीक्षात्मक अध्ययन | इतिहास में वस्तुनिष्ठता की आलोचनात्मक समीक्षा

इतिहास में वस्तुनिष्ठता का समीक्षात्मक अध्ययन | इतिहास में वस्तुनिष्ठता की आलोचनात्मक समीक्षा

इतिहास में वस्तुनिष्ठता का समीक्षात्मक अध्ययन

यदि इतिहास को विज्ञान की संज्ञा से अभिहित किया जाय तो वस्तुनिष्ठता, जो कि विज्ञान की केन्द्रीय विशेषता है, का इतिहास में होना आवश्यक है। वस्तुनिष्ठता का वैज्ञानिक अर्थ यह होता है-‘दिये हुए कुछ निर्धारित नियम जिससे कि निष्कर्ष स्वतः और स्वभाविक रूप से निकले एवं जिसे स्वीकार करने में किसी को कोई आपत्ति न हो।’ वास्तव में वस्तुनिष्ठता निष्पक्ष और निर्वैयक्तिक होती है। इसे सामान्य मान्यता प्राप्त होती है तथा यह व्यक्तिगत विचारधाराओं से प्रभावित नहीं होती। यहाँ यह विचारणीय है कि यद्यपि ऐतिहासिक बस्तुनिष्ठता वैज्ञानिक वस्तुनिष्ठता के समान नहीं हो सकती तथापि इसे वैज्ञानिक वस्तुनिष्ठता के अनुरूप होना चाहिए। अतः इसके अन्य वैज्ञानिक नियमों की तरह विचारों की निष्पक्षता होनी चाहिए।

इतिहास को निष्पक्ष रूप से लिखने के सिद्धान्त को ही विश्व में सभी इतिहासकारों ने मान्यता प्रदान की है। व्यक्तिगत पक्षपात के कारण इतिहास के तथ्यों एवं प्रभावों को तोड़- मरोड़कर प्रस्तुत करना वास्तव में इतिहास लेखन की एक निन्दनीय विधा है। लेकिन कतिपय विद्वानों का कहना है कि यदि भौतिक विज्ञान की तरह अवैयक्तिक इतिहास लिखने का प्रयास किया जाय तो इसका कोई तात्पर्यपूर्ण व्यवहार का परिणाम नहीं निकलेगा। इतिहास की संरचना किसी एक निश्चित दृष्टिकोण को लेकर ही की जा सकती है। यदि इतिहास को इस दृष्टिकोण से हटा दिया जाय तो इतिहास बुद्धिग्राह्य विषय नहीं रह जायगा। यह ठीक उसी प्रकार निरर्थक है जैसे किसी को कहा जाय कि वे किसी वस्तु को देखें, पर किसी स्थान को नहीं।

इतिहास में वैज्ञानिक विषयों की अपेक्षा दृष्टिकोण का अधिक महत्त्व है, क्योंकि इतिहास विशेष रूप से चयनात्मक विषय है, जो दो प्रकार से विभक्त है-

  1. सम्पूर्ण अतीत का अध्ययन किसी भी इतिहासकार के लिए असम्भव है, अतः अतीत के किसी विशेष अंक को ही अध्ययन के लिए निर्वाचित करना पड़ता है, और
  2. अपने निर्वाचन क्षेत्र के अन्दर भी उसे अपने को केवल महत्त्वपूर्ण विषय में ही सीमित रखना पड़ता है। इस विषय के निरूपण का सम्पूर्ण उत्तरदायित्व इतिहासकार पर होता है। वह इसका निरूपण अपने दृष्टिकोण से करता है। अतः उसके व्यक्तिगत दृष्टिकोण का प्रभाव इतिहास-रचना पर पड़ना आवश्यक है। इसीलिए इतिहास में वस्तुनिष्ठता की प्रकृति की विवेचना में हमको यह देखना पड़ता है कि इतिहास के दृष्टिकोण का निर्माण किस उत्पादन से होता है तथा वह दृष्टिकोण वस्तुनिष्ठता से किस प्रकार सामंजस्य रखता है? इन उत्पादनों को चार वर्गों में विभक्त किया जा सकता है-

(क) व्यक्तिगत रुचि तथा अरुचि,

(ख) पक्षपात-दृष्टिकोण का अवलम्बन,

(ग) ऐतिहासिक तथ्यों के प्रतिवेदन के विभिन्न सिद्धान्त, और

(घ) आधार रूप में विभिन्न भौतिक विकास।

इन चारों उपादानों के समीक्षोपर्यन्त हम कह सकते हैं कि इतिहास लेखन के समय इतिहासकार को अपने व्यक्तिगत विचारों पर रोक लगानी चाहिए, परन्तु कुछ बातें इतिहास में ऐसी भी होती हैं जिनमें स्वयं को इतिहासकार रोक नहीं सकता। साथ ही यदि वह अपने विचारों को रोकने का प्रयास करता है तो इतिहास के प्रति अन्याय करता है। इतिहास की अनेक परिकल्पनाओं के अनुसार यह भी कहा जा सकता है कि इतिहासकार को अपना मत प्रतिपादित करना चाहिए। इस विषय में प्रथमतः यह विचार प्रस्फुटित होता है कि हमने अभी तक जो भी इस दृष्टिकोण की विवेचना की है उसे वैयक्तिक मानकर किया है। इस सन्दर्भ में कोई भी तर्क देना व्यर्थ है तथा यह अतीत के सत्यान्वेषण के प्रति एक प्रकार से रोक का कार्य होगा। द्वितीय यह भी निष्कर्षित होता है कि इतिहास में विज्ञान की सी वस्तुनिष्ठ नहीं है। इतिहास को वास्तव में वस्तुनिष्ठ तभी माना जा सकता है जब वह सच्चाई को प्रस्तुत करने का प्रयास करे तथा विभिन्न इतिहासकारों के द्वारा लिखा गया इतिहास एक-दूसरे का विरोधी नहीं अपितु परिपूरक हो। अन्ततः हम कह सकते हैं कि यदि प्रत्येक इतिहासकार अपने मत का प्रतिपादन सही रूप से करे तो एक दिन ऐसा आयगा कि उसकी समष्टि से सार्वभौम ऐतिहासिक नियम की परिकल्पना सम्भव हो सकेगी।

इतिहास में वस्तुनिष्ठता का प्रश्न बहुत ही जटिल है। किसी इतिहासकार को इतिहास लेखन के लिए साक्ष्यों का संग्रह, चयन, जाँच, सजाना, व्याख्या करना, आवश्यक है। इन सभी कार्यों में इतिहासकार की स्वतंत्रता एवं निर्णय लेने की आवश्यकता होती है। इतिहासकार के व्यक्तित्व का प्रभाव उसके निर्णय या इतिहास पर पड़ता है। अब प्रश्न उठता है कि इतिहास वस्तुनिष्ठ है या व्यक्तिनिष्ठ? इतिहास के विवरण में वस्तुगत सत्यता है या इतिहासकार की मानसिक उपज? यदि इतिहास में वस्तुनिष्ठता है तो उसकी प्रकृति या परिणाम क्या है ? इतिहास में वस्तुनिष्ठता की प्रकृति या परिभाषा का विवेचन निम्नांकित आधार पर किया जा सकता है-

  1. गणित एवं भौतिकी की भाँति इतिहास में वस्तुनिष्ठता नहीं है, क्योंकि वस्तुनिष्ठ ज्ञान सदैव एक प्रकार का होता है। उसके मत की भिन्नता नहीं होती, जब तक कि वस्तु में परिवर्तन न हो। वस्तुनिष्ठ ज्ञान पर स्थान, काल का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इसका उदाहरण गणित है।
  2. इतिहास का समय इतिहास के व्यक्तित्व पर निर्भर करता है। इस प्रकार इतिहासकार की व्यक्तिवादी छाप उसके इतिहास पर पड़ती है। अतः वाल्श के अनुसार, ‘इतिहासकार के लिए अपनी रचना से अपने व्यक्तिगत को निकाल पाना उतना ही असम्भव है, जितना उसके लिए अपने आपको त्वचा से बाहर निकालना।
  3. इतिहास में मतैक्य नहीं है। अतः ऐतिहासिक विवरण सर्वमान्य नहीं होते। जबकि वस्तुनिष्ठ ज्ञान में एकरूपता होती है। इस प्रकार में वस्तुनिष्ठता की परिभाषा कम प्रतीत होती है।
  4. ऐतिहासिक विवरण ऐतिहासिक तत्व या पात्रों या उसकी भित्रता से प्रभावित होते हैं।
  5. ऐतिहासिक निर्णय स्वतः नहीं निकल पाता है।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि इतिहास में पूर्ण वस्तुनिष्ठता नहीं है। यहाँ यह प्रश्न सहज ही उपस्थित हो जाता है कि क्या इतिहास व्यक्तिनिष्ठ ज्ञान है? यदि ऐसा होता है तो साक्ष्य की कोई आवश्यकता नहीं होती और किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता। अतः यह पूर्णरूपेण व्यक्तिनिष्ठ भी नहीं है। अतः इतिहास की व्याख्या वस्तुनिष्ठता एवं व्यक्तिनिष्ठता के मध्य की जा सकती है। यद्यपि दृष्टिकोण के प्रभाव से ऐतिहासिकों के मतों की भिन्नता होती है तथापि इसके वस्तुनिष्ठता के प्रभाव से निषेध नहीं किया जा सकता। दृष्टिकोण का प्रभाव विज्ञान पर भी पड़ सकता है। साक्ष्यों एवं मतों की अधिकता इतिहास के लिए उचित है। गलत अवधारणा के कारण जान-बूझकर फेर-बदल करना गलत इतिहास है और इस प्रकार का इतिहास वस्तुनिष्ठ नहीं होता। विज्ञान वस्तुनिष्ठ ज्ञान होता है, लेकिन विज्ञान की प्रत्येक शाखाओं में भी समान वस्तुनिष्ठता नहीं होती। गणित में पूर्ण वस्तुनिष्ठता होती है, लेकिन अन्य विज्ञानों में क्रमशः कम हो जाता है। यदि जियोलोजी, पैलियोपोटोमी, पैलियोजूलाजी को वस्तुनिष्ठ ज्ञान कह सकते हैं तो इतिहास को भी वस्तुनिष्ठ ज्ञान कह सकते हैं। लेकिन जब साक्ष्य पूर्ण रूप से उपलब्ध न हो तो इतिहास उतना वस्तुनिष्ठ नहीं रह जाता, क्योंकि इतिहासकारों को स्वयं ‘रिकन्स्ट्रक्शन’ करना पड़ता है, एवं ऐतिहासिक दृष्टिकोण इतिहासकार की मानसिक अवधारणा पर निर्भर करता है। इसलिए इतिहास में संयम की आवश्यकता होती है।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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