इतिहास / History

इतिहास में विवेक | इतिहास में विवेक का समावेश होता है- हीगल | बोध ही सत्य है तथा सत्य ही बोध है

इतिहास में विवेक | इतिहास में विवेक का समावेश होता है- हीगल | बोध ही सत्य है तथा सत्य ही बोध है

इतिहास में विवेक

हीगल ने 1822-23 में इतिहास-दर्शन पर अपने व्याख्यान दिए, उसके इतिहास-दर्शन में पहली बार इतिहास दार्शनिक विचार के स्तर को प्राप्त करता है। वह एक नए प्रकार का इतिहास प्रस्ताविक करता है जिसे इतिहास का दर्शन कहा जाना चाहिए, उसकी चिन्तना में इतिहास- दर्शन इतिहास के ऊपर दार्शनिक चिन्तन मात्र नहीं है अपितु स्वयं इतिहास को एक उच्चतर शक्ति से संयुक्त बनाया गया है तथा तत्परिणामस्वरूप जो दार्शनिक स्वरूप वाला हो गया है। इतिहास के सम्बन्ध में उसके विचार एक असाधारणतया सर्वव्यापी दर्शन में सन्निविष्ट हैं। साथ ही उसका इतिहास-सिद्धान्त उसके राजनीतिक दर्शन के साथ घनिष्ठरूपेण संलग्न है और यह राजनीतिक दर्शन स्वयं मन अथवा चेतना के एक समष्टिरूप दर्शन का एक आवश्यक अङ्ग है। हीगल के अनुसार, इतिहास के ऊपर चिन्तन में प्रवृत्त दार्शनिक का प्रमुख कर्त्तव्य अतीतकाल में घटित घटनाओं में निहित ‘विवेकपूर्णता’ को ढूँढना है; ‘विवेक अथवा बुद्धि ही विश्व का सार्वभौम शासक है; और इस कारण विश्व हमारे सामने एक विवेकपूर्ण प्रक्रिया प्रस्तुत करता है।’ इतिहास के उपयुक्त दार्शनिक विवेचन के लिये यह अपेक्षित है कि वह विवेक को घटनाओं की प्रक्रिया में क्रियाशील रूप में खोजे; इसे ये दोनों बातें स्पष्ट करनी चाहिए-जिसकी उपलब्धि हो रही है और साथ ही साथ यह उपलब्धि कैसे हुई। इतिहास का ‘चेतना के जीवन से सम्बन्ध है। चेतना की मुख्य विशिष्टता आत्म-गति अथवा स्वातन्त्र्य है। इसके ही आधार पर अन्य आध्यात्मिक विशिष्टताओं का अस्तित्व बनता है। इस स्वातन्त्रय का बोध ही इतिहास का ‘लक्ष्य’ है। इस लक्ष्य की प्राप्ति ‘इच्छा-शक्ति’ द्वारा होती है।

हीगल के अनुसार, मनुष्य-वे चाहे अथवा नहीं-एक विवेकपूर्ण लक्ष्य की ओर बढ़ते रहते हैं, उनके कर्म ‘एक उच्चतर तथा अधिक व्यापक उद्देश्य के साधन तथा उपादान होते हैं जिसके विषय में वे स्वयं भी अनभिज्ञ होते हैं।’ यह बात केवल जन-समूह के लिए ही नहीं अपितु उन जननायकों पर भी लागू होती है जो इतिहास में समय-समय पर महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं वे भी अपने कार्यों के प्रच्छन्न निहितार्थों को नहीं समझते। वे भी अपने वैयक्तिक लक्ष्यों की प्राप्ति का प्रयास करते हैं जो केवल स्वातन्त्र्य के विकास की अपेक्षाओं से संगत बैटता है। व्यक्तियों को ध्यान में रखकर यह नहीं जाना जा सकता कि किस प्रकार विवेक विश्व पर शासन करता है। वस्तुतः मनुष्य को अपनी स्वतन्त्रता के लिये ‘राज्य’ की सामाजिक संस्था की अपेक्षा होती है। हीगल का राज्य ‘जन-जीवन के अन्य सभी मूर्त तत्त्वों-कला, विधि, नैतिकता, धर्म, विज्ञान का आधार तथा केन्द्र है’, यह ‘नैतिक अभीष्ट’, ‘स्वातन्त्र्य की यथार्थता’, ‘चेतना की वस्तुनिष्ठात्मकता है; यह ‘पृथ्वी पर अस्तित्वमान दैवी प्रत्यय’ है।)

विवेक स्वयं को पूर्ण स्वतन्त्रता में निर्धारित करने वाला विचार है।…..विश्व-इतिहास चेतना के क्षेत्र में विकसित होता है।…..चेतना के स्वभाव को इसके विरोधी भूतद्रव्य के अवलोकन से समझा जा सकता है। भूतद्रव्य का सार गुरुत्व है जबकि चेतना का सार स्वातन्त्र्य है। दर्शन हमें सिखाता है कि चेतना के सभी अनुधर्म स्वातन्त्र्य के माध्यम से ही अस्तित्वभान होते हैं। ये सभी स्वातन्त्रय की प्राप्ति के साधनमात्र है; सभी केवल इसी को पाने का प्रयास करते हैं, उत्पन्न करते हैं। स्वातन्त्र्य ही चेतना का एकमात्र सत्य है। भूतद्रव्य मूलतः संघटनात्मक होता है जिसके सभी भाग एक दूसरे का बहिष्कार करते हैं। इसका केन्द्रबिन्दु इसके बाहर होता है। चेतना का केन्द्रबिन्दु स्वयं इसके अन्दर स्थित होता है। इसकी एकता इसके बाहर नहीं होती अपितु इसके अपने अन्दर होती है। चेतना का स्वतः अन्तर्विष्ट अस्तित्व होता है। किन्तु, वस्तुतः यह ही स्वातन्त्र्य है। क्योंकि किसी अन्य पर निर्भर होने पर मैं स्वयं को उसके प्रति सन्दर्भित करता हूं। मैं तभी स्वतन्त्र हूँ जबकि मैं स्वयं के अन्दर रहूँ। चेतना का स्वतः अन्तर्विष्ट-अस्तित्व आत्म-बोध है, आत्मा का बोध है।

बोध में इन दो पृथक् वस्तुओं में विभेद करना चाहिए। प्रथम यह कि मैं जानता हूं तथा, दूसरा मैं क्या जानता हूँ। आत्म-बोध में ये दोनों ही मिली हुई होती हैं क्योंकि चेतना स्वयं को जानती है। इस अमूर्त परिभाषा के अनुसार यह कहा जा सकता है कि विश्व-इतिहास स्वयं अपने स्वभाव का ज्ञान पाने का प्रयास करने वाली चेतना का प्रदर्शन है। जिस प्रकार बीज में वृक्ष का संपूर्ण स्वभाव, इसके फल का स्वाद तथा आकार, अन्तर्भूत होता है उसी प्रकार वस्तुतः चेतना के प्रश्न चिन्हों में ही संपूर्ण इतिहास अन्तर्विष्ट होता है।….विश्व-इतिहास स्वातन्त्रय के बोध का विकास है।

दर्शन का दायित्व हमें यह अन्तर्दृष्टि प्रदान करता है कि वास्तविक विश्व वैसा ही है जैसा कि होना चाहिए था, कि वास्तविक श्रेयस्, सार्वभौमिक देवी विवेक स्वयं को सत्यान्वित कर सकने में समर्थ शक्ति है। यह श्रेयस्, यह विवेक अपने सर्वाधिक मूर्त स्वरूप में ईश्वर है। ईश्वर जगत का शासक है। इसके शासन का वास्तविक कार्यसंचालन, उसकी योजना का परिचालन ही विश्व का इतिहास है। दर्शन इस योजना को जानने का प्रयास करता है क्योंकि केवल वही जिसका परिचालन इसके अनुरूप हुआ है यथार्थ है, जो इसके संगत नहीं है उसका केवल निरर्थक अस्तित्व है। विवेक के परम उद्देश्य की सिद्धि किस वस्तु में होती है? सर्वप्रथम यह वस्तु स्वयं व्यक्ति, मानवीय इच्छाएँ, सामान्यतः वैयक्तिकता स्वयं है। मानवीय ज्ञान तथा इच्छा को आधार बना कर तर्कबुद्धि अस्तित्व में आती है। सीमित भावसंवेगों में वैयक्तिक इच्छा के रूप में यह परतन्त्र होती है तथा अपनी विशिष्ट इच्छाओं को इस परतन्त्रता के अन्दर ही संतुष्ट कर सकती है। किन्तु वैयक्तिक इच्छा का एक वास्तविक जीवन या यथार्थ भी होता है, जहाँ कि यह मूल सत्ता के क्षेत्र में विचरण करती है तथा इस मूल को ही अपने अस्तित्व के लक्ष्य के रूप में प्राप्त करती है; यह नैतिक समष्टि अथवा राज्य है। यही वास्तविकता है जिसमें व्यक्ति स्वतन्त्रता को पाता है और इसका आनन्द भोग करता है। व्यक्ति का कामचार स्वतन्त्रता नहीं है। नियम, नैतिकता, राज्य ही वास्तविक यथार्थ है और स्वातन्त्र्य को निश्चित बनाते हैं इस प्रकार विश्व-इतिहास का निश्चित विषय राज्य है। इसमें ही स्वतन्त्रता अपनी वस्तुनिष्ठता की उपलब्धि करती है और इस वस्तुनिष्ठता के आनंदभोग में निवास करती है। नियम चेतना की वस्तुनिष्ठता है, यह ही अपने वास्तविक रूप में इच्छा है। केवल यही इच्छा स्वतन्त्र है जो कि इसका आज्ञापालन करती है क्योंकि ऐसा करते हुए वह स्वयं का आज्ञापालन करती है तथा स्वयं में होने के कारण स्वतन्त्र होती है।

इतिहास स्वयं में वस्तुनिष्ठात्मक एवं विषयपरक दोनों पक्षों को सन्निविष्ट करता है। इसका अर्थ है घटनाएँ तथा घटनाओं का विवरण दोनों (‘गेशेहेन’ तथा ‘गेशिश्ते’ दोनों) इन दोनों अर्थों के संबंध को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण समझना चाहिए। हमें यह मानना चाहिए कि इतिहास का विवरण तथा ऐतिहासिक कर्म एवं घटनाएँ साथ ही घटित होते हैं, एक उभयनिष्ठ आन्तरिक सिद्धान्त दोनों को साथ लाता है।

चेतना मुख्यतः अपने ही कार्य व्यापार का परिणाम है। इसका कार्य-व्यापार वर्तमानतः प्रदत्त के परे गमन है, इसका निषेध तथा फिर स्वयं में प्रत्यागमन है। विश्व के इतिहास को केवल चेतना का प्रकाशन मानते हुए हम वस्तुतः सदैव वर्तमान से संबद्ध रहते हैं हमारे सर्वेक्षण का विषय अतीत चाहे जितना लम्बा क्यों न हो (क्योंकि कोई भी समय एकसा नहीं है जिसमें चेतना का अस्तित्व नहीं रहा है अथवा नहीं रहेगा, यह न तो था, न इसे होना है, यह सदैव ही विद्यमान है)। ‘प्रत्यय’ सदैव विद्यमान है, चेतना अनश्वर है। इसका यह आशय है कि चेतना की वर्तमान अवस्था में सभी अतीतकालिक अवस्थाएँ अन्तर्विष्ट हैं। विभिन्न अवस्थाएँ यह स्वयं में जो है उसका विकास है। सदैव विद्यमान चेतना का जीवन एक ओर साथ-साथ सहअस्तित्व वाली किन्तु दूसरी ओर, गतकाल हो गई प्रतीत होने वाली अवस्थाओं का एक चक्र है। वे क्षण जिनके विषय में ऐसा लगता है कि चेतना ने इन्हें पीछे छोड़ दिया है, इसके वर्तमान की गहराई में सदैव बने रहते हैं।

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Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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