इतिहास / History

फ्रांसीसी राज्य-क्रान्ति के कारण | 1789 की फ्रांसीसी क्रांति के राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक कारण

फ्रांसीसी राज्य-क्रान्ति के कारण | 1789 की फ्रांसीसी क्रांति के राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक कारण

‘फ्रांसीसी राज्य-क्रान्ति के कारण’

किसी भी देश में होने वाली क्रान्ति के बीज उस देश की जनता की स्थिति और मनोदशा में निहित रहते हैं। असंतोष को जन्म देने वाली भौतिक परिस्थितियाँ क्रांति हेतु आवश्यक पृष्ठभूमि तैयार करती हैं तथा बौद्धिक चेतना बहुजन को उन परिस्थितियों से मुक्ति पाने हेतु प्रेरित करती है। ऐसी स्थिति में जब भी सरकार अथवा शासन के लिए पुरानी लीक पर चलना कठिन हो जाता है और वह सफल सुधार योजना द्वारा समयानुकूलन या पथ खोजने में असफल हो जाती है तथा असंतुष्ट वर्ग को अपनी ताकत का अहसास हो जाता है, तो देश में क्रान्ति का होना अनिवार्य हो जाता है। फ्रेंच क्रान्ति भी उक्त नियम का अपवाद नहीं है।

रेग्जेम्योर के विचारानुसार- “फ्रांसीसी क्रान्ति सामंतवाद् की जीर्ण-शीर्ण सामाजिक व्यवस्था, वर्गीय विशेषाधिकार, निरंकुश शासन और नौकरशाही के विरोध तथा मनुष्यमात्र की समानता के दावे और अधिकार के नवीन सिद्धान्तों के आधार पर मानव-समाज के नव निर्माण के प्रयत्न का साकार रूप था।” फ्रांस की राज्य क्रान्ति के आरम्भ के साथ यूरोप का इतिहास एक राष्ट्र, एक घट्ना और एक पुरुष के इतिहास में मिलकर एक हो जाता है। वह राष्ट्र है ‘फ्रांस’, वह घटना है ‘फ्रांसीसी क्रान्ति’ और वह व्यक्ति है ‘नेपोलियन बोनापार्ट ।

अठारहवीं शताब्दी में कुछ अपवादों को छोड़कर प्रायः सभी यूरोपीय देशों में एक सी राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक तथा आर्थिक दशा थी परन्तु फ्रांस में एक महान् बौद्धिक वातावारण की उपस्थिति के कारण ही यह क्रान्ति सर्वप्रथम फ्रांस में हुई। फ्रांसीसो क्रान्ति के विस्फोट के पूर्व फ्रांस की दशा का अवलोकन करते हुए हम फ्रांसीसी क्रान्ति के कारणों को मुख्यतया 6 भागों में विभक्त कर सकते हैं, (1) राजनीतिक कारण, (2) सामाजिक कारण, (3) आर्थिक कारण, (4) बौद्धिक कारण, (5) अमेरिकी व ब्रितानी क्रान्तियों का प्रभाव, (6) तात्कालिक कारण।

राजनीतिक कारण-

फ्रांस की राजनीतिक व्यवस्था निरंकुश वंशानुगत दैवी अधिकारों पर आधारित राजतंत्र थी। फ्रांसीसी शासक निरंकुशता व दैवी अधिकारों के सिद्धान्त का पोषक था व अपने को ईश्वर के प्रति न कि जुनता के प्रति उत्तरदायी समझता था। उनकी दृष्टि में राष्ट्र की अपेक्षा राजवंश प्रधान था और राजवंशीय गौरव या उत्थान ही राष्ट्र का गौरव या उत्थान था। फ्रांसीसी शासक प्रजा को राष्ट्र के रूप में नहीं बस अधिकार विहीन प्रजा के रूप में समझता था ।उसकी इच्छानुसार विधि निर्माण राजस्व का संग्रह और राजकीय आय का व्यय होता था। उसकी इच्छानुसार ही युद्ध या संधि होती थी, राजवंशीय हितों की पुष्टि की जाती थी। परन्तु राष्ट्र हित या प्रजाहित का ध्यान नहीं रखा जाता था। फ्रांस में संसद जैसी कोई सच्ची व प्रभावशाली प्रतिनिधि संस्था न थी। पुरानी सामंतीय संस्था (Estates general) मृत-प्राय हो चुकी थी। राजा की स्वेच्छाचारिता को कुछ अंशों में नियंत्रित करने वाली (Parlement) वस्तुतः सर्वोच्च अदालत थी। पार्लेमां के सदस्यों का पद् वंशानुगत हो गया था। न्याय के अतिरिक्त नये राज्य देशों, या कानूनो के पंजीबद्ध करने के जो विशेषाधिकार पालेमां को प्राप्त थे वे भी शनैः शनैः समाप्त हो गए थे। सर्वसाधारण वर्ग को किसी प्रकार की व्यक्तिगत स्वतंत्रता (लेखन, भाषण तथा प्रकाशन) प्राप्त न थी। ये सभी अधिकार राजा की अनियंत्रित राजशक्ति से नियंत्रित थे। राजा व उसके प्रियपात्र ‘विशेष मुद्रावाले पत्रों (Letters-de-Cachel) की सहायता से जिसे चाहे कैद कर सकते थे व बिना मुकदमा चलाये दण्ड दे सकते थे। इस मुद्रांकित पत्र के प्रयोग के कारण व्यक्तियों की स्वतंत्रता का लोप हो चुका था। समस्त प्रशासन शिथिल व अव्यवस्थित था। न्यायिक पदों को बेचने की परम्परा से न्यायिक व्यवस्था बद्तर हो गयी थी। लुई पन्द्रहवें और सोलहवें के शासन काल में शासन-कार्य स्वार्थी और लोभी सरदारों या प्रेमिकाओं के परामर्श से चलता था। अतः प्रशासन में लोकहित की भावना या दक्षता का सर्वथा अभाव था।

वर्साई का राजप्रासाद आमोद-प्रमोद तथा शान-शौकत का केन्द्र था। राजधानी सिर्फ वैभव और विलासिता केन्द्र बन कर रह गयी थी। राजवंशीय पारिवारिक अपव्ययों, राजदरबारियों और कृपापात्रों को पेंशनों तथा पारितोषिक के रूप में अत्यधिक धनराशि व्यय की जाती थी। फ्रांस के राजाओं की शान-शौकत एवं विलासिता पर कोई अंकुश न था। राजतंत्र किसी निश्चित नियम या व्यवस्था पर आधारित न था। शासनतंत्र नौकरशाही पर अवलम्बित था, जिसके अधिकार क्षेत्र अनिश्चित थे। गवर्नरों के पद दायित्वहीन होकर केवल अलंकार की वस्तु रह गए थे। प्रान्तीय गवर्नर और उसके अधीनस्थ कर्मचारी जनता में अत्यधिक अप्रिय थे। प्रशासकीय एकता या एकरूपता का घोर अभाव था। देश में भिन्न-भिन्न प्रकार के कानून, रीति-रिवाज, सिक्के और तौल इत्यादि थे। फ्रांस में प्रचलित कानूनों की भिन्नता के संबंध में प्रसिद्ध प्रबुद्धवादी विचारक वाल्तेयर ने कहा था- “किसी व्यक्ति को फ्रांस में यात्रा करते समय सरकारी कानून उसी प्रकार बदलते हुए मिलते हैं, जिस प्रकार उसकी गाड़ी के घोड़े बदलते हैं। वहाँ कौन सा कानून होगा कोई नहीं जानता था। क्रान्ति से पूर्व फ्रांस की शासन प्रणाली असम, अव्यवस्थित, भ्रष्ट और खर्चीली थी। शासक भी अयोग्य थे। लुई चौदहवें के काल में फ़्रांस में निरंकुश राजतंत्र अपने गौरव एवं शक्ति को पराकाष्ठा पर पहुँच गया था। उसने “मैं ही राज्य हूँ” कहकर अपनी निरंकुश सत्ता का परिचय दिया। निरंकुश शासन की सफलता शासक की योग्यता एवं कुशलता पर निर्भर रहती है। किन्तु लुई चौदहवें का उत्तराधिकारी लुई पन्द्रहवां (1715-1774) अकर्मण्य था। शासनतंत्र को सुधारने के बजाय वह आमोद-प्रमोद एवं विलासितापूर्ण जीवन में डूबा रहा। स्वयं पन्द्रहवें लुई ने अपनी मृत्यु के समय कहा था- “मेरे मरने के बाद प्रलय होगी।” ऐसी निराशाजनक स्थिति में लुई सोलहवाँ गद्दी पर बैठा। उसमें नेतृत्व की क्षमता न थी।

राजकीय अर्थव्यवस्था-

बूर्वो शासकों के निरंकुश राजतन्त्र में राजा को व्यक्तिगत सम्पत्ति और राजकोष के सार्वजनिक धन में कोई अंतर नहीं था। राजा अपनी इच्छानुसार राजकोष से धन खर्च कर सकता था। राजपरिवार का सारा खर्च बिना किसी लेखा-जोखा के राजकोष से होता था और इस कार्य में किसी तरह का कहीं से प्रतिबन्ध नहीं था। राजा और उसके दरबारियों को राज्य की सही आर्थिक स्थिति की जानकारी नहीं थी। राज्य का खर्च बढ़ रहा था, जबकि विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के कर नहीं देने के कारण राज्य की आय का स्रोत घट रहा था। तू|, नेकर और मिराबो लोगों ने जब उचित सलाह देकर राज्य को आर्थिक संकट से निकालना चाहा तो राजा के सुविधा प्राप्त सामंतों, पदारियों और रानी की सलाह पर उनकी बातों को अनदेखी कर दिया गया।

प्रशासनिक अराजकता-

तत्कालीन फ्रांस में प्रशासनिक केहीकरण पर जोर दिया गया था, लेकिन केंद्रीय सरकार कमजोर थी। ऐसी हालत में स्थानीय प्रशासन में अराजकता आ गई थी। प्रांतों पर केन्द्र का नियन्त्रण बोला पड़ गया था। पूरा देश पार्मिक, प्रशासकीय, शैक्षणिक आदि इकाईयों में विभक्त था। फांसको सोपानों पर के हाल में फांस में मिलाएं गए प्रांतो, यथा-वितानी, पोवास आदि के कानूनों और संस्थानों आदि में विशेष परिवर्तन नहीं किया गया था और अलग-अलग प्रांतों को ऐतिहासिक भिन्नता बनी रही। तत्कालीन फ्रांस में लगभग 285 स्थानीय विधि-पणालियाँ प्रचलित थी। व्यापारिक दुरिकोण से भी देश में एकता नहीं थी। जगह-जगह चुंगी वसूलने का प्रावधान था। विभिन्न तरह के नियम-कानून सारे राज्य में व्याप्त थे, जो एक-दूसरे के विरोधी थे। एक कानून एक क्षेत्र में वैध तथा दूसरे में अवैध था। कानूनी एकरूपता का अभाव था और भार शासनतंत्र बुर्जुआ वर्ग के लिए विशेषकर और सम्पूर्ण समाज के लिए सामान्यतः कारदायक था।

भ्रष्ट नौकरशाही तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अभाव-

सरकारी उच्च पद योग्यता के आधार पर नहीं बल्कि पैसे की बदौलत खरीदे जाते थे। परिणामतः सरकारी अधिकारी भ्रष्ट और अयोग्य होते थे। व्यक्तिगत स्वतंत्रता को उपेक्षा की जाती थी। लेद काशे’ (एक प्रकार का वारंट) जारी कर किसी व्यक्ति को कभी भी गिरफ्तार किया जा सकता था और बिना मुकदमा चलाए ही उसे जेल में रखा जा सकता था। कानून का कोई महत्व नहीं रह गया था।

इस प्रकार, हम पाते हैं कि फांस की क्रांति के पूर्व राजतंत्र न केवल अयोग्य और निरंकुश था, बल्कि प्रष्ट एवं अकुशल नौकरशाही द्वारा शासन करने की कोशिश कर रहा था। इस शासन-प्रणाली में व्यक्तिगत स्वतंत्रता का नामोनिशान नहीं था। इस समय फ्रांस में सामाजिक परिवर्तन हो रहा था और बुर्जुआ वर्ग में सामाजिक एवं राजनीतिक चेतना आ रही थी, लेकिन तत्कालीन निरंकुश राजतंत्र आँखें बन्द कर सुधारों के प्रति लापरवाह था और किसी राजनीतिक सुधार के पक्ष में नहीं था।

सामाजिक कारण-

फ्रांसीसी समाज के विभाजन का आधार पुरानी सामंतशाही व्यवस्था थी। फ्रांसीसी समाज विषम एवं विघटित था। वह सामंतवादी पद्धति पर असमानता और विशेषाधिकार के मूलभूत सिद्धान्तों पर आधारित था। समाज मुख्यतः तीन वर्गों में विभक्त था-कुलीन वर्ग, पादरी और सर्वसाधारण वर्ग। उच्च पादरी (पथम एस्टेट) एवं कुलीन (द्वितीय एस्टेट) सुविधा प्राप्त वर्ग थे और कृषक मजदूर तथा मध्य श्रेणी के लोग (तृतीय एस्टेट) सुविधाहीन वर्ग में थे। प्रत्येक वर्ग के भीतर विभिन्न श्रेणियों के बीच अधिकार एवं सुविधाओं को दृष्टि से भारी विषमतायें थीं। केटेल्वी के अनुसार “फ्रांस की, सामाजिक व्यवस्था का आधार कोई विधान या कानून नहीं वरन् विशेषाधिकार, रियायतें और छूट थीं।” इस प्रकार की व्यवस्था के फलस्वरूप जनजीवन में संशय, अविश्वास एवं असंतोप ही पनप सकता था। फ्रांस की कुल जनसंख्या के अनुपात में विशेषाधिकार प्राप्त उच्च वर्गों की संख्या एक प्रतिशत से अधिक नहीं थी। इतनी कम जनसंख्या होते हुए भी उच्च वर्ग के लोग अधिकारों, सुविधाओं एवं जीवन स्तर की दृष्टि से शेष 99 प्रतिशत देशवासियों से बहुत आगे थे। अनुमान लगाया गया है कि जागीरदारों एवं चर्च के धर्माधिकारियों में प्रत्येक के पास फ्रांस की समस्त सम्पत्ति का पाँचवा भाग था। फिर भी ये दोनों कर से मुक्त थे और साधनहीन तुतीय वर्ग के लोगों को करों से लाद दिया गया था। इन दोनों वर्गों को प्रदत्त विशेषाधिकारों ने जनसामान्य को विरोधी बना दिया। इतिहासकार मेरियट का मत है कि “वास्तव में जब क्रान्ति हुई तो वह मुख्यतः राजा के निरंकुश एकत्र के विरुद्ध नहीं वरन् विशेषाधिकारों से युक्त वर्गो-कुलीनों व पुरोहितों के विरुद्ध थी और क्रान्तिकारियों ने आरम्भ में ही उनको समाप्त कर दिया।”

फ्रांस में कैथोलिक चर्च का काफी प्रभाव था। उसके पास अतुल सम्पत्ति थी और वह राज्य के करों से मुक्त था। इसके साथ ही शिक्षा जन्म-मृत्यु के आंकड़े, विवाह एवं अन्य सामाजिक और धार्मिक संस्कारों आदि पर पादरियों का एकाधिकार सा था। उसे पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं के सैंसर करने का भी अधिकार था। चर्च के पृथक न्यायालय और कानून थे। उसके व्यापक अधिकारों एवं प्रभाव के कारण ही मेरियट ने लिखा है कि फ्रांस का चर्च “राज्य के अंदर राज्य” था। फ्रांस की सम्पूर्ण जागीरी भूमि की बीस प्रतिशत भूमि चर्च के अधीन थी, जिससे चर्च को बहुत आय होती थी। इसके अलावा चर्च किसानों से सब प्रकार की फसलों पर धर्माश (Tithe: एक प्रकार का धार्मिक कर) भी वसूल करता था। अनुमानतः चर्च की वार्षिक आय राजकीय आय से आधी थी। परन्तु पादरियों द्वारा धार्मिक कर्तव्यों की उपेक्षा के कारण जनता में असंतोष था। असंतोष का अन्य कारण, चर्च के सामंतीय अधिकार तथा उनका कठोरता से लागू किया जाना था। पादरियों में भी दो श्रेणियाँ थीं- उच्च पादरी तथा सामान्य पादरी। उच्च पादरी वर्ग में आर्कबिशप, ऐने आदि पद थे। ये प्रायः कुलीनों के पुत्र होते थे। इस उच्च पुरोहित वर्ग के पास अतुत सम्पदा यो। यह उच्च पुरोहित वर्ग अपने धार्मिक कर्तव्यों से विमुख होकर भ्रष्ट एवं विलासमय जीवन व्यतीत कर रहा था, जिससे जनता में उनके प्रति श्रद्धा के स्थान पर असंतोष एवं विरोध की भावना बढ़ रही थी। यह वर्ग सामान्य पादरियों को हेय समझता था। सामान्य पादरी वर्ग में हजारों स्थानीय गिरजाघरों के छोटे पादरी थे, जो प्रायः निम्न वर्ग या कृषक वर्ग से आते थे। इनकी आर्थिक दशा खराब थी। यह वर्ग उच्च पादरी वर्ग से इसी कारण नाराज था।

इसी कारण निम्न पादरी वर्ग ने क्रान्तिकारियों का साथ दिया। इतिहासकार लियो गरशॉय का मत है कि “उच्च तथा निम्न पादरियों में अभिमान और शत्रुता का संबंध था। निम्न पाद्री उच्च पादरियों के उनके प्रति बेइज्जतीपूर्ण व्यवहार का विरोध करते थे। उच्च पादरी उन्हें एक भद्दी, गंदी तथा अज्ञानी अलग जाति से सम्बन्धित समझते थे। इसीलिए निम्न पादरियों ने अपने पादरी वर्ग का परित्याग करके 1789 में तृतीय वर्ग (Third Estate) का साथ दिया।”

यद्यपि कार्डिनल रिशलू और बाद में लुई चौदहवें ने सामंतों की शक्ति का अंत करके उन्हें बहुत से अधिकारों से वंचित कर दिया था, फिर भी इस वर्ग को अभी भी बहुत सुविधायें तथा अधिकार प्राप्त थे। राज्य, चर्च, सेना व प्रशासन के सभी उच्च पद इसी वर्ग के हाथों में थे और फ्रांस की समस्त भूमि का पाँचवाँ भाग उनके अधिकार में था। परन्तु इस वर्ग में भी एकात्मकता एवं समरूपता का अभाव था। वंश को प्राचीनता, सामाजिक कार्यों का स्वरूप, राजदरबार के साथ संबंध आदि के आधार पर कुलीन वर्ग अनेक उपवर्गों में विभाजित था, जिनमें आपस में द्वेष था। आर्थिक दृष्टि से भी सामंत समान नहीं थे। कुछ बहुत अमीर थे, तो कुछ गरीब । परन्तु एक बात दोनों में समान थी। दोनों ही किसानों का शोषण करते थे। इस सन्दर्भ में हेज और मून माडर्न हिस्ट्री में लिखते हैं कि यद्यपि वैधानिक रूप से सामंत पद्धति का अंत हो चुका था तथापि अभी भी किसान को अपने स्वामी की चुक्की पर ही अनाज पिसवाने, उसी के प्रेस में अपने अंगुर का रस निकलवाने, अनेक कर देने,बेगार करने तथा अनेक अरुचिकर सामाजिक परम्पराओं के आगे सिर झुकाने के लिए बाध्य होना पड़ता था। कुलीन किसानों से घृणा करते थे और किसान कुलीनों से। स्थिति भयानक थी क्योंकि फ्रांस की जनसंख्या का बहुमत किसान थे। भूमि क्रय-विक्रय पर कुल मूल्य का पाँचवाँ भाग जमींदार प्राप्त कर लेते थे। उन्हें न्याय संबंधी भी अधिकार प्राप्त थे। वे जुर्माने लगाकर अपनी आय में वृद्धि भी करते थे। उनको शिकार करने का विशेषाधिकार प्राप्त था। इस वर्ग द्वारा निम्न वर्ग पर अनेक प्रकार का अत्याचार किया जाता था। इससे निम्न वर्ग में भारी असंतोष था, जिससे क्रान्ति को बल मिला। थियर्स (फ्रांसीसी राजनीतिज्ञ) का यह मत उल्लेखनीय है- “बगावत राजगद्दी के विरूद्ध कम तथा कुलीन वर्ग के अत्याचारों के विरुद्ध अधिक थी। दूसरी ओर कुलीन वर्ग पुनः अपने उन अधिकारों को प्राप्त करना चाहता था, जिसे लुई चौदहवें के काल में समाप्त कर दिया गया था। अतः यह वर्ग पुनः उन राजनीतिक अधिकारों को प्राप्त कर शक्तिशाली बनने के लिए लालायित था। अतः इस वर्ग को राजनैतिक महत्वाकांक्षा ने भो निम्न वर्ग को निरंकुश राजतंत्र के विरुद्ध संघर्ष हेतु प्रेरणा दी। इतिहासकार गुंडविन के मतानुसार- “फ्रांस को राज्य क्रान्ति के कारण किसानों को दयनीय दशा अथवा मध्यम वर्ग के राजनीतिक असंतोष में नहीं; वरन् फ्रांस के प्रतिक्रियावादी व विशेषाधिकारों से सम्पन्न सामंत वर्ग की महत्वाकांक्षा में निहित है।”

साधारण वर्ग-

देश की लगभग 94 प्रतिशत जनसंख्या सर्वसाधारण वर्ग से सम्बद्ध थी। यह वर्ग विशेषाधिकारों एवं अन्य सुविधाओं से वंचित था, परन्तु इस वर्ग में भारी असमानता थी और सामाजिक तथा आर्थिक दृष्टि से इस वर्ग के विभन्न अंगों में व्यापक अंतर था। मोटे तौर पर इस सामाजिक वर्ग में मध्य वर्ग, जिसे बुर्जुआ कहा गया, दस्तकार एवं मजदूर और किसान थे।

मध्यम वर्ग में साहूकार, व्यापारी, शिक्षक, वकील, डाक्टर, लेखक, कलाकार, सरकारी कर्मचारी आदि सम्मिलित थे, जो उद्योग, व्यवसाय एवं पेशे से संबंधित थे तथा जिन्हें शारीरिक श्रम नहीं करना पड़ता था। संख्या की दृष्टि से इस वर्ग के सदस्य अल्पमत थे! शासन के उच्च पदों को गेड़कर सभी पद इन्हीं लोगों के हाथों में थे। फ्रांस के मध्य वर्ग के संबंध में मुख्य बात यही थी कि फ्रांस में मामीण एवं शहरी जनता के बीच कोई स्थाई विभेद नहीं था और इसी कारण नगरों में रहते हुए भी मध्यम वर्ग किसान एवं जनता से घनिष्ठ संबंध रखता था और इसीलिए क्रान्ति के दौरान उनका समर्थन पा सका।

क्रांति से पूर्व फ्रांस के मध्यम वर्ग में काफी असंतोष व्याप्त था। सारी योग्यताओं व क्षमताओं के बावजूद समाज में उनको वह स्थान नहीं मिल पा रहा था जिसका वे हकदार समझते थे। समझदार, कर्मठ, शिक्षित एवं धनी होने के उपरान्त भी देश की राजनैतिक संस्थाओं में उनका कोई प्रभाव न था। वे इसके लिए पुरातन् व्यवस्था को दोषी मानते थे। यह वर्ग विवेक एवं बुद्धि पर आधारित समाज की संरचना हो। इतिहासकार डेविड थामसन का मत है कि फ्रांस की क्रान्ति फ्रांसीसी समाज के दो परस्पर विरोधी गुटों के संघर्ष का परिणाम थी। एक तरफ राजनीतिक दृष्टिकोण से प्रभावशाली और दूसरी तरफ आर्थिक दृष्टिकोण से प्रभावशाली वर्ग था। देश की राजनीति और सरकार पर प्रभुत्व कायम करने के लिए इन दोनों वर्गों में संघर्ष एक तरह से अनिवार्य था।

दस्तकारों व मजदूरों की दशा अच्छी न थी। इनको वेतन कम मिलता था तथा काम का समय बहुत ज्यादा था। वे मध्यम वर्ग के पूंजीपतियों की दया पर निर्भर थे। कृषक लोगों की संख्या सर्वाधिक थी। फ्रांस में कृषकों के दो वर्ग थे- प्रथम स्वतंत्र किसान तथा द्वितीय अद्रर्ध दास। स्वतंत्र किसान अपनी भूमि का मालिक था किन्तु अर्द्ध दास किसान अपनी इच्छा से अपने मालिक जमींदार की भूमि को त्याग कर बाहर नहीं जा सकता था। इनकी दशा सबसे अधिक खराब व शोचनीय थी। दोनों वर्गों के किसान कुलीनों के शोषण के शिकार थे। ये कुल संख्या के अस्सी प्रतिशत थे।

आर्थिक कारण-

देश की आर्थिक स्थिति दयनीय थी। इस दयनीय अवस्था के लिए सरकार की फिजूल खर्ची के अतिरिक्त उसको कर व्यवस्था बहुत अधिक जिम्मेदार थी। वास्तव में राजकीय वित्तीय नीति ही गलत थी। प्रो० हेजन ने लिखा है कि “सरकार आय के अनुसार व्यय करने बजाय व्यय के अनुसार आय को निश्चित करती थी।” राजा की व्यक्तिगत आय और राष्ट्र की आय में कोई अंतर नहीं किया जाता था। फलतः राजा को अपने व्यक्तिगत कार्यों पर सरकारी कोष से धन व्यय करने का मनमाना अवसर मिल जाता था। राजा की विलासिता पर कोई अंकुश न था। खर्चीले युद्धों ने देश को स्थिति को और कमजोर बनाया। लुई चौदहवें ने मरते समय अपने उत्तराधिकारी को युद्ध न करने की सलाह दी थी किन्तु लुई पन्द्रहवें ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। क्रान्ति से पूर्व फ्रांस को प्रत्येक वर्ष लगभग ढाई करोड़ डालर का घाटा हो रहा था, जिसकी पूर्ति भारी व्याज पर ऋण लेकर की जा रही थी। क्रान्ति से पूर्व कुल राष्ट्रीय आय का आधा भाग केवल ब्याज चुकाने में ही खर्च होने लगा। अंत में यह नौबत आ गयो कि लोग सरकार को कर्ज देने में आनाकानी करने लगे।

देश की कर प्रणाली अव्यवस्थित एवं दोषपूर्ण थी। फ्रांस में विशेषाधिकारों की परम्पराओं ने समाज के सबसे सम्पन्न लोगों को कर मुक्त कर रखा था। करीब तीन लाख सामंतों और पादरियों के बीच समाज की अधिकांश सम्पत्ति बँटी हुई थी। परन्तु वे लगभग कर-मुक्त थे। कर दो प्रकार थे। प्रत्यक्ष और परोक्ष । भूमि कर, आय कर, जायदाद पर कर प्रत्यक्षकरों की श्रेणी में आते थे। मुख्यरूप से करों का भार कृषकों एवं सामान्य जनता पर ही पड़ता था। परोक्ष करों में मुख्य नमक, शराब, तम्बाकू आदि पर लिए जाने वाले कर थे। इनमें से नमक कर (गेबल) सबसे अधिक दुखदायी थी। नमक का अवैध व्यापार करने वालों को मृत्यु दण्ड तक की सजा दी जाती थी। जनसाधारण विशेषतः किसानों को कई प्रकार के कर सामंतों को देने पड़ते थे। सामंतों की भूमि में पड़ने वाले पुलों को पार करने के लिए एक निश्चित राशि देनी पड़ती थी। चर्च को उसे “टाइथ” नामक धार्मिक कर देना होता था जो उपज का दसवाँ भाग होता था। करों के अतिरिक्त किसानों को समय-समय पर उपहार भी देने पड़ते थे। लगान हित कृषक की पैदावार का अस्सी प्रतिशत भाग कर के रूप में चला जाता था। कर वसूलने का कार्य भी बड़ा दोपपूर्ण था। करों को ठेके द्वारा वसूल करने की प्रथा थी। ठेकेदार किसानों से मनमानां कर वसूलते थे और राजस्व का एक भाग स्वयं हडप जाते थे। कर प्रणाली इस दृष्टि में भी दोप पूर्ण थी कि करों की दरें विभिन्न प्रान्तों में भिन्न-भिन्न थीं। सरकार की वाणिज्य व व्यापार नीति भी दोषपूर्ण थी। इस प्रकार क्रान्ति से पूर्व फ्रांस की आर्थिक व्यवस्था अव्यवस्थित, खर्चीली एवं अन्यायपूर्ण थी। यह कहावत् चरितार्थ हो चली थी कि “सामंत लड़ता है, पादरी पूजा करता है और सामान्य जन कर देता है। सामान्य जन करों के भार से दवा था। राज्य की आर्थिक स्थिति दिवालिएपन की थी। अदूरदर्शी शासकों ने आर्थिक व्यवस्था को उस कगार पर लाकर छोड़ दिया, जहाँ उसके सुधार का कोई उपाय नहीं हो सकता था।

बैद्धिक कारण-

अठारहवीं सदी में फ्रांस में वैचारिक स्तर पर परम्परागत विचारों का त्याग कर विवेकपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया जा रहा था। जनता जागरूक हो रही थी। देश में व्याप्त बुराइयों का पर्दाफाश किया जा रहा था। जागृति का यह कार्य फ्रांस के प्रबुद्ध वर्ग ने किया जिनमें मांटेस्क्यू, वाल्तेयर, रूसो, दिदरो, क्वेस्ने तुगौडी एलम्बर्ट आदि प्रमुख हैं। इन विचारकों ने स्वतंत्र चिन्तन की प्रेरणा दी। इनकी लेखनी ने असमानता, शोषण तथा अत्याचार, धार्मिक असहिष्णुता, भ्रष्ट तथा निरंकुश राजतंत्र, आर्थिक नियंत्रण तथा निम्न वर्ग की विपन्नता, प्रशासनिक एवं न्यायिक दोषों को उजागर किया। इन्होने विशेषाधिकारों एवं अन्याय पर आधारित धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक संस्थाओं पर कई प्रश्न चिन्ह खड़े किए। मानव मस्तिष्क को पुराने विचारों से मुक्त करने का आवाहन इन लेखकों द्वारा किया जा रहा था। लेखक फ्रांसीसी समाज के असंतोप को और उभाड़ रहे थे। केटेल्वी ने लिखा है, “वे जनता को प्रेरणा दे रहे थे, उसके असंतोप को व्यक्त कर रहे थे, उसकी शिकायतों को सामने रख रहे थे, उसे नेतृत्व और विश्वास दे रहे थे। संसद विहीन देश में साहित्यकार ही राजनीतिज्ञ हो गए थे। उन्होंने फ्रांस की संख्याओं के खोखलेपन को हजारों तरह से प्रकट किया-व्यंग्य तथा हास्य द्वारा, आलोचना और तुलना द्वारा, वैज्ञानिक व्याख्या द्वारा, समाजशास्त्रीय विचारधारा द्वारा और स्पष्ट निन्दा द्वारा।” यह प्रश्न विवादास्पद है कि बौद्धिक आंदोलन फ्रांस की राज्य क्रान्ति के लिए कहां तक उत्तरदायी था। प्राय: बौद्धिक चेतना को क्रान्ति की आत्मा कहा जाता है और क्रान्ति का श्रेय दार्शनिकों, लेखकों एवं प्रबुद्ध वर्ग को दिया जाता है। स्वयं नेपोलियन का कथन था कि यदि रूसो न हुआ होता तो फ्रांसीसी क्रान्ति सम्भव न होती। अपनी लेखनी के बल से लोगों को इन राजनैतिक, सामाजिक आर्थिक तथा धार्मिक बुराइयों के प्रति जागरूक करने का काम फ्रांसीसी लेखकों एवं दार्शनिकों ने ही किया अन्यथा बुराईयाँ तो पहले भी व्याप्त थीं तब क्रान्ति क्यों न हुई।

तात्कालिक कारण-

क्रान्ति का तात्कालिक कारण देश की शोचनीय आर्थिक दशा थी। फ्रांस का कर्जा निरन्तर बढ़ता जा रहा था। 1788 में राज्य पर इतना कर्ज हो गया था कि उसकी आमदनी से अधिक धन व्याज के रूप में चला जाता था। देशा धीरे-धीरे दिवालिया होता जा रहा था, जिसकी चिन्ता सरकार को कतई नहीं थी और जब स्थिति काबू से बाहर हो गयी तथा देश का खजाना खाली हो गया तब लुई को विवश होकर इस ओर ध्यान देना पड़ा । लुई ने देश की आर्थिक दशा को सुधारने के लिए कई योजनायें आरम्भ की, परन्तु उन्हें पूरा होने से पूर्व ही त्याग दिया जिसके कारण जनता का असंतोष बढ़ा । लुई ने एक के बाद एक अर्थ मंत्री बदले । तुर्गो नेकर तथा केलोन को क्रमशः वित्त मंत्री बनाया गया। केलोन के बाद रानी के कृपापात्र विपेन को 1781 में वित्त मंत्री बनाया गया। उसने आर्थिक स्थिति सुधारने के काफी प्रयास किए। उसने राजा को सभी वर्गों पर एक समान भूमि कर तथा नया टैक्स “स्टाम्प टैक्स” लगाने को कहा। विशिष्ट व्यक्तियों की सभा ने विन के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। राजा ने इस सभा को भंग कर दिया और विपेन के प्रस्तावों को पंजीकरण करने के लिए पेरिस की पालेमां के पास भिजवा दिया। पालेमां ने नये करों को दर्ज करने से इन्कार कर दिया। साथ ही उसने यह भी घोषणा की कि नवीन करों को लगाने का अधिकार केवल एस्टेट्स जनरल को है और किसी को नहीं। इसी आधार पर उसने राजा से एस्टेट्स जनरल के अधिवेशन बुलाने की मांग की। अंत में विवश, होकर राजा को एस्टेट्स जनरल की बैठक बुलानी पड़ी। एस्टेट्स जनरल का अधिवेशन 5 मई 1989 को होना निश्चित हुआ। 1788 में एस्टेट्स जनरल का चुनाव हुआ। एस्टेट्स जनरल के तीन सदन थे- पहले में सामंत, दूसरे में पादरी और तीसरे में सर्वसाधारण प्रतिनिधि बैठते थे। राजा ने इस चुनाव में तृतीय सदन की सदस्य संख्या पहले से दुगुनी कर दी थी। 5 मई, 1789 को एस्टेट्स जनरल का अधिवेशन वर्साय के शानदार महल में आरम्भ हुआ। यहीं से क्रान्ति की शुरुआत होती है। तृतीय सदन के प्रतिनिधि मांग करते हैं कि तीनों सदनों की सम्मिलित बैठक हो और निर्णय सब प्रतिनिधियों के बहुमत से किए जावे। शुरू में राजा नहीं मानता, परन्तु बाद में उसे झकना पड़ता है। टोकेविले ने ठीक ही लिखा है, “किसी देश में क्रान्ति तब नहीं होती जब खराब दशा अधिक खराब हो जाय। जिस समय क्रान्ति होती है उस समय की स्थिति निश्चय ही उससे पहले की स्थिति से अच्छी होती है। अनुभव से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि खराब सरकार के लिए सबसे अधिक संकट का समय तब होता है जब वह सुधार का कार्य प्रारम्भ करती है।”

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Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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