इतिहास / History

शेरशाह के सैनिक अभियान | शेरशाह का हुमायूँ के विरुद्ध अभियान | शेरशाह का राजपूताना अभियान | शेरशाह का बुंदेलखण्ड अभियान

शेरशाह के सैनिक अभियान | शेरशाह का हुमायूँ के विरुद्ध अभियान | शेरशाह का राजपूताना अभियान | शेरशाह का बुंदेलखण्ड अभियान

शेरशाह के सैनिक अभियान (Military Campaigns of Sher shah)

हुमायूँ के विरुद्ध अभियान-

कुनौज के युद्ध में हुमायूँ को पराजित कर शेरशाह ने कन्नौज पर अधिकार कर लिया। हुमायूँ कोज से आगरा की तरफ बढ़ा। शेरशाह कनौज की व्यवस्था करने के लिए स्वयं वहीं कुछ समय तक रुक गया। उसने सेना की तीन टुकड़ियाँ तीन दिशाओं में भेजी। सुजान खाँ को ग्वालियर एवं नासिर खां को संभल की विजय के लिए भेजा गया। तीसरा दल बरमजीद या ब्रह्मजीत गौड़ के नेतृत्व में) हुमायूँ का पीछा कर उसे भारत से बाहर खदेड़ने को भेजा गया। अफगान सेना ने आगरा पहुचकर अनेक मुगलों की हत्याएं की। अफगान सेना की नृशंसता एवं शेरशाह के आगरा पहुंचने की सूचना पाकर भयभीत हुमायूं भागकर लाहौर चला गया। शेरशाह ने आगरा पहुंचकर सेना की एक अन्य टुकड़ी को भी खवास खाँ के नेतृत्व में हुमायूं का पीछा करने को भेजा। हुमायूं लाहौर में ही रुककर अपनी शक्ति संगठित करने का प्रयास करने लगा। इस अवसर का लाभ उठाकर शेरशाह दिल्ली की व्यवस्था कर पंजाब की सीमा तक आ धमका। बाध्य होकर हुमायूँ को लाहौर से हटना पड़ा। वह सिंघ की तरफ बढ़ा। खवास खां ने हुमायूं का पीछा झेलम नदी के किनारे तक किया। इसी समय शेरशाह सरहिंद से लाहौर होता हुआ खुशाब तक जा धमका और हुमायूँ का पीछा जारी रखने का आदेश दिया। फलतः खवास ख़ां ने उच्छ के पश्चिम पंचनद तक हुमायूं का पीछा किया। जब हुमायू ने भारत की सीमा छोड़कर ईरान का मार्ग पकड़ा, तब खवास खाँ हुमायूँ का पीछा छोड़कर शेरशाह के पास लौट गया। इस प्रकार, कम-से-कम शेरशाह के जीवन काल तक हुमायूँ जैसे बदनसीब मुगल बादशाह की भारत से विदाई हो गई। हुमायूँ शेरशाह की मृत्यु के बाद ही पुनः भारत वापस आ सका।

सीमांत प्रदेश की सुरक्षा-व्यवस्था-

एक योग्य शासक और दूरदर्शी राजनीतिज्ञ की तरह हुमायूं को भारत से खदेड़कर ही शेरशाह निश्चित नहीं हो गया। वह इस बात को अच्छी तरह समझता था कि जब तक उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रदेश की सुरक्षा की व्यवस्था नहीं की जाती, तब तक दिल्ली आगरा का राज्य सुरक्षित नहीं है। हुमायूं के पलायन के बाद भी सीमांत प्रदेश से मुगलों के आक्रमण का खतरा बना हुआ था। इस खतरे को सदा के लिए समाप्त करने के उद्देश्य से शेरशाह बोलन दरें और पेशावर से भारत आने वाले मार्ग को अपने नियंत्रण में रखना चाहता था। इसलिए, उसने सीमांत प्रदेश पर अपना प्रभाव जमाने का निश्चय किया। सबसे पहले खुशाब में ही रहते हुए उसने प्रमुख बलूची सरदारों (इस्लाम खां, फतेह खां, गाजी खाँ इत्यादि) को अपने पक्ष में मिला लिया।

सीमांत प्रदेश में शेरशाह को सबसे अधिक विकट समस्या थी गक्खरों पर विजय प्राप्त करना। गक्खरों की हमदर्दी मुगलों के साथ थी। अतः उनके नेता सारंग ने अफगानों की अधीनता स्वीकार करने से इनकार कर दिया। क्रुद्ध शेरशाह ने गक्खरों के अनेक ठिकानों को नष्ट करवा दिया एवं अनेक को मौत के घाट उतार दिया। इसके बावजूद, शेरशाह गक्खरों को अपने प्रति पूर्णरूपेण स्वामिभक्त नहीं बना सका। उसने उनकी शक्ति तोड़ दो, परंतु उन्हें नष्ट नहीं कर सका। शेरशाह ने इतना अवश्य किया कि गक्खरों पर अंकुश रखने के लिए उसने सीमांत प्रदेश में पश्चिमी रोहतास नामक एक सुदृढ़ किले की नींव रखी। यह दुर्ग शेरशाह की मृत्यु के बाद ही पूरा हो सका, परंतु इस दुर्ग ने अनेक वर्षों तक मुगलों को भारत की तरफ पांव बढ़ाने की हिम्मत नहीं दी।

शेरशाह को सीमांत प्रदेश के स्वतंत्र अफगान सरदारों और जाटों की समस्या को भी सुलझाना पड़ा। अफगानों ने शेरशाह की अधीनता तो स्वीकार कर ली, परंतु बलूचियों के विरुद्ध शिकायत की। शेरशाह ने अफगानों की समस्याओं को सुलझाने के लिए अपने भतीजे हैबत खाँ को नियुक्त किया। परंतु, उसके दुव्यवहारों से क्षुब्य होकर बलूचियों ने उसकी हत्या कर दी। फलतः एक अन्य सरदार को बलूचियों के दमन का कार्य सौंपा गया। उसने सफलतापूर्वक इस कार्य को किया। समस्त प्रदेश में शेरशाह की सत्ता स्थापित की गई।

बंगाल में विद्रोह और उसका दमन-

हुमायूँ का पीछा करने और सीमांत प्रदेश की व्यवस्था करने की वजह से शेरशाह लंबे समय तक राजधानी से दूर रहा। उसकी अनुपस्थिति का लाभ उठाकर बंगाल के गवर्नर खिज्र खाँ ने अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित करने का प्रयास जारी कर दिया। उसने बंगाल के मृत और पूर्व सुलतान महमूद की पुत्री से अपना विवाह कर अपनी स्थिति अत्यधिक सुरक्षित कर ली। अब वह वस्तुतः एक स्वंतत्र शासक की हैसियत से बंगाल पर शासन कर रहा था। जिस समय शेरशाह गक्खरों के विरुद्ध अभियान में संलग्न था, उसी समय उसे यह सूचना मिली। अतः उसने सीमांत का कार्य अपने योग्य और विश्वसनीय साथियों पर छोड़ दिया और स्वयं तेजी से बंगाल की तरफ बढ़ा।

शेरशाह जून,1541 में बंगाल की राजधानी गौड़ पहुंचा। विद्रोही खिज्र खाँ को अपदस्थ कर गिरफ्तार कर लिया गया। बंगाल के प्रशासन के लिए नई व्यवस्था स्थापित की गई। नई व्यवस्था के अनुसार, समस्त बंगाल की प्रशासनिक व्यवस्था को एक सैनिक गवर्नर के हाथों सुपुर्द करने की जगह पर समान अधिकार और स्थितिवाले अनेक पदाधिकारियों के जिम्मे कर दिया गया। ‘संपूर्ण बंगाल को विभिन्न संस्कारों’ (जिलों) में विभक्त कर ‘शिकदारों’ (सैनिक पदाधिकारी) की देख-रेख में दे दिया गया। उन्हें पर्याप्त सैनिक एवं प्रशासनिक‌ अधिकार दिए गए। सभी शिकदारों की स्थिति समान थी। उनकी नियुक्ति शेरशाह स्वयं करता था तथा वे सभी सीधे सुलतान के प्रति उत्तरदायी थे। इन शिकदारों में आपसी तारतम्य बनाए रखने, आपसी मतभेदों को सुलझाने का काम अमीर-ए-बंगाल अथवा काजी फजीलत को सौंपा गया। सुलतान के प्रतिनिधि के रूप में बंगाल के पूरे प्रशासन पर उसकी निगरानी रहती थी। इस नई व्यवस्था द्वारा शेरशाह ने बंगाल में होने वाले विद्रोहों पर नियंत्रण स्थापित किया। बंगाल में शांति-व्यवस्था स्थापित कर वह जनवरी, 1542 में आगरा वापस लौटा।

मालवा पर अधिकार-

आगरा पहुँचने के पश्चात् शेरशाह ने मालवा विजय की योजना बनाई। शेरशाह द्वारा मालवा पर आक्रमण करने के अनेक कारण थे। सबसे पहली बात तो यह थी कि मालवा को हुमायूँ ने विजित किया था। अतः शेरशाह के लिए यह स्वाभाविक ही था कि वह हुमायूं के सभी इलाकों पर अपना नियंत्रण स्थापित करे। मालवा एवं उसके निकटवर्ती क्षेत्रों में राजपूत शासक पूरनमल भी अपना प्रभाव बढ़ा रहा था। सबसे बड़ी बात यह थी कि मालवा का तत्कालीन शासक मल्लू खाँ शेरशाह की अधीनता स्वीकार करने को तैयार नहीं था। वह मूलत: गुजरात के बादशाह बहादुरशाह का एक सूबेदार था । बहादुरशाह के बाद उसने कादिरशाह नाम से अपनी स्वतंत्र सत्ता की घोषणा कर दी। उसने मांडू, उज्जैन, सारंगपुर, रणथंभौर इत्यादि पर अधिकार कर लिया, अपने नाम के सिक्के ढलवाए एवं ‘खुतबा, में अपना नाम पढ़वाया। उसकी शक्ति इतनी अधिक बढ़ गई कि वस्तुतः समस्त मालवा प्रदेश उसके प्रभाव में गया। वह अपने आपको शेरशाह से बड़ा शासक मानता था। शेरशाह उसके व्यवहार से क्रुद्ध था। उसके द्वारा उचित समय पर सहायता नहीं दिए जाने की वजह से ही शेरशाह के पुत्र कुतुब खाँ की हत्या 1540 ई० में कालपी के निकट हिंदाल और अस्करी (हुमायूँ के भाई) के हाथों हुई थी। अतः शेरशाह मालवा पर अपना अधिकार करने को व्यग्र था। शेरशाह को यह भी भय था कि कहीं कादिरशाह की दुर्बलता का लाभ उठाकर हुमायूँ सिंघ से वापस मालवा नहीं आ जाए।

अप्रैल, 1542 में शेरशाह का मालवा अभियान आरंभ हुआ। वह ग्वालियर के मार्ग से मांडू की तरफ बढ़ा। शेरशाह के आगमन की सूचना पाकर ग्वालियर के किलेदार अब्दुल कासिम ने किला शेरशाह को सौंप दिया। सुजात खों और राजा राम प्रसाद के प्रयासों से ग्वालियर के राजा पूरनमल ने भी शेरशाह की अधीनता स्वीकार कर ली । उसने 6000 राजपूत सैनिकों की टुकड़ी एवं अपने भाई चतुर्भुज को शेरशाह की सेवा में सुपुर्द कर दिया।

ग्वालियर से शेरशाह सारंगपुर पहुंचा। भयभीत होकर कादिरशाह भी शेरशाह से मिलने सारंगपुर पहुंचा। शेरशाह ने उसके साथ सौम्यतापूर्ण व्यवहार किया एवं उज्जैन की तरफ बढ़ा। उज्जैन पहुंचकर उसने वहाँ अपना अधिकार स्थापित कर लिया। कादिरशाह को लखनौती (बंगाल) के गवर्नर के रूप में अपने परिवार के साथ जाने की आज्ञा दी गई। शेरशाह के इरादों से सशंकित होकर कादिरशाह रात्रि में अपने परिवार और धन के साथ गुजरात भाग गया। तत्पश्चात् शेरशाह ने संपूर्ण मालवा पर अधिकार कर लिया। सतवास पर भी अफगानों का अधिकार हुआ। वापस लौटते समय रणथम्भौर पर भी शेरशाह ने कब्जा कर लिया।

शेरशाह ने मालवा प्रदेश के विजय के साथ-साथ इसकी व्यवस्था के भी समुचित उपाय किए। सुजात खा को सतवास का एवं हाजी खाँ को मालवा का प्रबंधक बनाया गया। उज्जैन, सारंगपुर, रायसीन, भिलसा, चंदेरी में भी उसने अपने प्रतिनिधियों को शासक नियुक्त किया। हाजी खाँ समस्त मालवा का फौजी शासक बना। उसका प्रशासनिक केन्द्र धार को बनाया गया। बाद में इस क्षेत्र में अफगानों की सत्ता को पलटने का प्रयास हुआ,जिसे सुजात खाँ ने विफल कर दिया। अतः, प्रसन्न होकर शेरशाह ने सुजात खाँ को ही मालवा का प्रांतपति नियुक्त किया।

रायसीन की विजय-

1542 ई० में जब शेरशाह ने मालवा अभियान आरंभ किया था तब रायसीन के राजा पूरनमल ने शेरशाह की अधीनता स्वीकार कर ली थी। फलतः, शेरशाह ने उसे अपने प्रतिनिधि शासक के रूप में शासन करने की अनुमति दी थी, परंतु अनेक कारणों से शेरशाह रायसीन को अपने कब्जे में लेना चाहता था। कुछ इतिहासकारों ने शेरशाह पर यह आरोप लगाया है कि उसने धर्मांधता के वशीभूत होकर मुल्लाओं के प्रभाव में आकर रायसीन पर आक्रमण किया। कहा जाता है कि पूरनमल ने चंदेरी की विजय के पश्चात् मुसलमानों पर अत्याचार किए। उसने अनेक उच्चवर्गीय महिलाओं के नाचने-गाने का पेशा अपनाने पर मजबूर कर दिया था। इसलिए, शेरशाह को पूरनमल को दंड देने के लिए उकसाया गया। वस्तुस्थिति यह थी कि रायसीन एक समृद्ध राज्य था। यहाँ का राजा भी वीर एवं प्रभावशाली था। शेरशाह उसे स्वतंत्र छोड़कर अपने लिए खतरा मोल नहीं ले सकता था। प्रो० कानूनगो शेरशाह पर घमांधता से प्रभावित होकर रायसीन पर आक्रमण किए जाने के तर्क का विरोध करते हैं। उनका कहना है कि शेरशाह पर धर्माधता का आरोप नहीं लगाया जा सकता। रायसीन पर आक्रमण करने के लिए राजनीतिक कारण ही पर्याप्त थे। एक अविजित दुर्ग ही समस्त राज्य का तख्ता पलट सकता था। अतः, उसने राजपूत प्रभाव को नष्ट करने और अपनी सुरक्षा करने की व्यवस्था की।

1543 ई० में शेरशाह रायसीन के अभियान पर निकला। रायसीन पहुंचकर उसने दुर्ग को घेर लिया। पूरनमल ने प्राणपण से किले की रक्षा की और शेरशाह को इस पर अधिकार करने से रोके रखा। बाध्य होकर शेरशाह ने चालाकी से काम लिया। उसने पूरनमल को आश्वासन दिया कि अगर वह किला शेरशाह को सौंप दे और जाँच के पश्चात् उसे निर्दोष पाया गया तो शेरशाह उसकी सारी जागीर उसे वापस कर देगा। शेरशाह ने राजा के परिवार और उसके संबंधियों की सुरक्षा का भी आश्वासन दिया। फलतः, पूरनमल दुर्ग छोड़कर शेरशाह द्वारा बनवाए गए शिविर में चला गया। शेरशाह ने उसके साथ विश्वासघात किया एवं उस पर आक्रमण कर दिया। राजपूतों ने वीरता से अफगानों का सामना किया परंतु युद्ध में वे सभी मारे गए। यद्यपि रायसीन पर शेरशाह का अधिकार हो गया, तथापि रायसीन की विजय उसके चरित्र पर एक धब्बा है। रायसीन को शाहनाज खाँ शेरवानी के सुपुर्द कर दिया।

सिंध तथा मुल्तान पर आधिपत्य-

हुमायूँ का पीछा करता हुआ शेरशाह जिस समय सीमांत प्रदेश में पहुंचा था, उसी समय उसने इस क्षेत्र को प्रभावशाली ढंग से अपने नियंत्रण में लाने का प्रयास किया था। उसने गक्खरों की शक्ति को कुचल दिया था, परंतु बंगाल में विद्रोह की सूचना पाकर वह हैबत खाँ नियाजी के जिम्मे सीमांत प्रदेश की देखभाल छोड़कर बंगाल चला गया था। नियाजी ने इस क्षेत्र के जाट सरदार फतेह खाँ जाट को पराजित कर गिरफ्तार कर लिया। फलस्वरूप, लाहौर और दिल्ली का मार्ग अब आरक्षित नहीं रहा। इसी प्रकार, उसने मुलतान के स्वतंत्र शासक बख्शू लंगाह को भी पराजित किया। फलस्वरूप 1543 ई० तक सिंध और मुलतान पर भी शेरशाह का सीधा नियंत्रण स्थापित हो गया। इन क्षेत्रों पर अधिकार हो जाने से कांधार से भारत आने का मार्ग अव शेरशाह के नियंत्रण में आ गया और उसे अब हुमायूँ के वापस आने का खतरा नहीं रहा।

शेरशाह का राजपूताना अभियान-

शेरशाह के सामने सबसे बड़ी समस्या राजपूताना के विभिन्न राजपूत रिसायतों पर अधिकार करने की थी। राजपूताना में इस समय अनेक स्वतंत्र और शक्तिशाली शासक थे। उनसे अफगानों को किसी समय भी खतरा उत्पन्न हो सकता था। इनमें से कुछ राज्यों की हमदर्दी तो मुगलों के साथ भी थी। इन राज्यों में सबसे प्रमुख मारवाड़ और मेवाड़ के शासक थे। अत: शेरशाह ने एक सोची-समझी योजना के अंतर्गत इन राजपूत शासकों को परास्त करने का निश्चय किया।

शेरशाह ने सबसे पहले मारवाड़ के शासक मालदेव की तरफ अपना ध्यान दिया। राणा सांगा की मृत्यु के बाद राजस्थान में मारवाड़ के राज्य की शक्ति अत्यधिक बढ़ गई थी। अपने पिता की हत्या कर 1532 ई० में मालदेव मारवाड़ का शासक बना था। उसने कुछ ही वर्षों के अंदर अपनी शक्ति एवं राज्य की सीमा का काफी विस्तार कर लिया था। उसके प्रभाव में बीकानेर, जोधपुर और जयपुर के राज्य भी थे। उसकी विस्तारवादी एवं आक्रामक नीति अफगानों के लिए कभी भी खतरनाक बन सकती थी। मालदेव के राज्य की सीमा वस्तुतः अफगान राज्य की सीमा के निकट तक पहुंच गई थी। शेरशाह द्वारा मालदेव पर आक्रमण किए जाने के अन्य कारण भी थे। उसने शेरशाह के पुत्र कुतुब खाँ को युद्ध के अवसर पर सहायता नहीं की थी। फलतः, वह हुमायूं के भाइयों के हाथों मारा गया था। इतना ही नहीं, उसने दुर्दिन में हुमायूँ की सहायता की एवं उसे अपने यहाँ शरण दी। इन सब कारणों से क्रुद्ध होकर शेरशाह ने मालदेव पर आक्रमण करने का निश्चय किया। इसी वीच शेरशाह को आक्रमण करने का एक बहाना भी मिल गया। राजस्थान के कुछ असंतुष्ट सामंतों एवं निष्कासित शासकों-जिनमें प्रमुख थे मेड़ता के राजा वीरमदेव और बीकानेर के राजा राव कल्याणमल के मंत्री नागराज ने शेरशाह से मालदेव के विरुद्ध सहायता की मांग की। फलतः, 1544 ई० में शेरशाह मालदेव के विरुद्ध अभियान पर निकला।

अजमेर के निकट दोनों सेनाएँ लंबे समय तक डटी रहीं। कोई भी पक्ष पहले आक्रमण नहीं करना चाहता था। शेरशाह के लिए प्रतीक्षा कठिन हो रही थी। इसलिए उसने धोखा देकर एक जाली पत्र द्वारा मालदेव के सामंतों में फूट पैदा कर दी। मालदेव पर अपना विश्वास दिखाने के लिए उसके कुछ सामंतों ने मालदेव के मना करने पर भी शेरशाह पर आक्रमण कर दिया। वे वीरतापूर्वक अफगानों से लड़े, परंतु पराजित हुए। उनकी वीरता से प्रभावित होकर शेरशाह को स्वीकार करना पड़ा था, एक मुट्ठी बाजरा के लिए दिल्ली का राज्य लगभग खो दिया।” मालदेव को वाध्य होकर पीछे भागना पड़ा। शेरशाह ने एक-एक कर अजमेर, जोधपुर, नागौर, मेड़ता और अन्य सभी महत्वपूर्ण किलों एवं नगरों पर अधिकार कर लिया। मालदेव के पास मारवाड़ के शक्तिशाली राज्य का एक छोटा और महत्वहीन भाग ही बच गया।

मारवाड़ के पश्चात् मेवाड़ की बारी आई। मेवाड़ की राजनीतिक स्थिति उस समय अत्यंत दुर्बल थी। आंतरिक संघर्षों एवं षड्यन्त्रों ने अल्पवयस्क उदय सिंह को नाममात्र का शासक बना रखा था। शेरशाह ने इस स्थिति का लाभ उठाया। जोधपुर से वह मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़ पहुंचा। राजपूत अफगानों का मुकाबला करने की स्थिति में नहीं थे। इसलिए, उन लोगों ने बिना युद्ध किए ही समर्पण कर दिया।

शेरशाह ने राजपूत राज्यों के प्रति उदारतापूर्ण नीति अपनाई। उसने पराजित शासकों को अपदस्थ नहीं किया, बल्कि उनसे अपनी स्वामिभक्ति स्वीकार करवाकर उन्हें पुनः अपने राज्य में बना रहने दिया । उदाहरणस्वरूप मेड़ता और बीकानेर क्रमश वीरमदेव और कल्याणमल को वापस सौंप दिए गए। इसके साथ-साथ मेवात को केंद्र बनाकर राजस्थान में अफगान शक्ति की स्थापना भी की गई । तथापि शेरशाह को इस नीति से अफगानों को कोई स्थायी लाभ नहीं हुआ। शेरशाह की मृत्यु के साथ ही मालदेव और अन्य राजपूत शासक इस क्षेत्र में पुनः सक्रिय हो उठे।

शेरशाह का बुंदेलखण्ड अभियान-

राजस्थान के पश्चात् शेरशाह बुंदेलखंड अभियान पर निकला। इस क्षेत्र में चंदेलों का शासन था। चंदेल राजपूत अफगानों के हितैषी नहीं थे, बल्कि उनकी सहानुभूति मुगलों के साथ थी। अतः, शेरशाह के लिए बुंदेलखंड की विजय आवश्यक थी। शेरशाह द्वारा बुंदेलखंड पर आक्रमण किए जाने के अन्य कारण भी थे। बुंदेलखंड का सबसे अधिक शक्तिशाली राज्य कालिंजर का था। यहाँ पर कोरत सिंह चंदेला शासन कर रहा था। शेरशाह से मनमुटाव का कारण यह था कि कीरत सिंह ने भट के शासक वीरभानू को, जिसने हुमायूँ की सहायता की थी, अपने राज्य में शरण दी थी। शेरशाह ने कीरत सिंह से मांग की कि वह वीरभानू को उसके पास भेज दे, परंतु कीरत सिंह ने शेरशाह का यह प्रस्ताव ठुकरा दिया। क्रोधित होकर शेरशाह ने कालिंजर विजय की योजना बनाई। कीरत सिंह पर आक्रमण करने का एक अन्य कारण यह भी था कि कालिंजर का दुर्ग अत्यंत मजबूत था। इसका सामरिक महत्व भी बहुत अधिक था। पुनः चंदेलों की शक्ति नष्ट कर शेरशाह अपने राज्य की सुरक्षा करना चाहता था। अत:, उसने कालिंजर विजय की योजना बनाई।

नवंबर, 1544 में शेरशाह एक बड़ी सेना के साथ कालिंजर पहुंचा। उसने दुर्ग का घेरा डाल दिया। दुर्ग को रसद पहुँचाने का मार्ग बंद कर दिया गया। महीनों तक दुर्ग पर घेरा डाले रहने के बावजूद शेरशाह को सफलता नहीं मिल रही थी। अतः, उसने किले की दीवारों को बारूद से उड़ाने की आज्ञा दी। इसी प्रक्रिया में बारूद के ढेर में आग लग गई, जिसमें शेरशाह बुरी तरह जख्मी हुआ। शेरशाह ने जखमी अवस्था में भी आक्रमण जारी रखने का आदेश दिया। फलतः, अफगान सैनिकों ने असाधारण वीरता का परिचय देकर दुर्ग पर अधिकार कर लिया। विजय को सूचना प्राप्त कर शेरशाह ने शांतिपूर्वक 22 मई, 1545 को इस दुनिया से विदाई ली। इस प्रकार, एक महान सेनानायक एवं राज्यनिर्माता के जीवन का अंत हुआ। अपनी सैनिक प्रतिभा और कूटनीति के आधार पर वह एक छोटे से जागीरदार से हिंदुस्तान का सम्राट बन बैठा था। पाँच वर्षों की छोटी सी अवधि में हो उसने एक विशाल और शक्तिशाली राज्य की स्थापना कर ली। संभवतः, मुहम्मद बिन तुगलक के पश्चात् शेरशाह का राज्य ही सबसे अधिक शक्तिशाली और विशाल था। उसका राज्य सिंधु नदी से बंगाल तक विस्तृत था। उसके राज्य में पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत, सिंध, पंजाब, विहार, राजपूताना, मालवा और बुंदेलखंड के इलाके सम्मिलित थे।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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