शिक्षाशास्त्र / Education

स्मृति क्या है | स्मरण का तात्पर्य | स्मृति की परिभाषा | स्मृति की प्रक्रिया | स्मृति और व्यक्तित्व का सम्बन्ध | स्मृति में सुधार कैसे हो?

स्मृति क्या है | स्मरण का तात्पर्य | स्मृति की परिभाषा | स्मृति की प्रक्रिया | स्मृति और व्यक्तित्व का सम्बन्ध | स्मृति में सुधार कैसे हो?

स्मृति क्या है

अधिगम एक अर्जित प्रक्रिया है जिसका सर्वेक्षण अध्यापक द्वारा होता है। परन्तु अधिगम तभी सफल होता है जब शिक्षार्थी जो कुछ अर्जित करता है उसे ग्रहण करे और स्थायी रूप से मस्तिष्क में धारण किए रहे। धारण की गई सामग्री में सार्थकता लाना तभी सम्भव होता है जब बालक उनमें एक सम्बन्ध स्थापित कर लेता है। जहाँ पर इस प्रकार का सम्बन्ध बनता है। यहाँ मनुष्य की स्मृति पाई जाती है और जहाँ सम्बन्ध नहीं बन पाता है वहाँ विस्मृति होती है। अतएव स्मृति या विस्मरण तथा विस्मृति या विस्मरण अधिगम के उत्पाघ स्वरूप बौद्धिक संक्रिया कहा जा सकता है।

स्मृति या स्मरण का तात्पर्य

स्मृति मनुष्य की एक बौद्धिक क्षमता एवं उसे प्रयोग करने की क्रिया भी है। व्यक्ति अपने वातादरण से बहुत प्रभाव या संस्कार संचित करता है क्योंकि संचय शक्ति प्रत्येक प्राणी के मन में जन्म से ही पाई जाती है। ये प्रभाव और संस्कार अनुभव के फलस्वरूप हुआ करते हैं ऐसी दशा में जो भी अनुभव चेतना या अचेतन रूप में हम करते हैं उन सब का संस्कार मन में बन जाता है। ये संस्कार परिस्थिति के उपस्थित होने पर मनुष्य द्वारा पुनः चेतनस्तर पर प्रकट किए जाते हैं। पुराने अनुभवों से प्राप्त संस्कारों को फिर से चेतन करने की क्रिया को स्मृति या स्मरण करते हैं। प्रो० मोर्स एवं विगो ने इसे एक बौद्धिक संक्रिया कहा है। इसका तात्पर्य यह है कि इसमें मानसिक क्रियाएँ ही पाई जाती हैं, शारीरिक क्रिया नहीं होती है।

स्मृति किस प्रकार मानसिक प्रक्रिया है ? यह साधारण से उदाहरण से समझा जा सकता है। मान लीजिए कोई व्यक्ति बरसात में फिसल कर गिर पड़ा, इसे हमने देखा, हमें इसका प्रत्यक्षण हुआ। प्रत्यक्षण का प्रभाव मस्तिष्क पर पड़ा और उसने उसकी प्रतिमा ले ली। इसे धारण करने के लिए इसे सूक्ष्म रूप दिया जाता है और प्रतिमा का सम्बन्ध गिरने, बरसात, स्थान आदि से जोड़ा जाता है। इस दृष्टि से समझने पर हमें कई मानसिक क्रियाएँ स्मरण के साथ मिलती हैं-निरीक्षण, प्रत्यक्षण, प्रतिमा एवं संप्रत्यय निर्माण और अन्त में सम्बन्ध एवं साहचर्य। इससे स्पष्ट है कि सरण एक दौद्धिक संक्रिया या कुछ अन्य मनोविज्ञानियों के अनुसार एक मानसिक प्रक्रिया होता है।

स्मृति की परिभाषा

(क) प्रो० स्टान्ट- स्मृति प्रत्यायात्मक पुनरावृत्ति है। जिससे बीते अनुभव की चीजें जहाँ तक सम्भव हैं अपनी मूल घटना के क्रम एवं तरीके से पुनस्थापित की जाती हैं।

(ख) प्रो० स्नीर्डस- स्मृति अधिगम के समान समायोजन की आधारभूत प्रक्रिया है।

(ग) प्रो० ड्रेवर- स्मृति जीवित प्राणियों का अनुभव है जिसके कारण जो कुछ वे अनुभव करते हैं बाद में प्रभाव छोड़ते हैं जो भविष्य के अनुभव और व्यवहार को संपरिवर्तित करते हैं जिसके परिणामस्वरूप उनका एक इतिहास होता है और वह इतिहास उनमें स्वयं अभिलिखित हो जाता है।

(घ) प्रो० रॉस- स्मृति एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें स्ववृत्तियों का संस्थापन, उनका धारण, तथा उन अनुभवों को प्रत्यभिज्ञा जिन्होंने अपने पीछे स्ववृत्ति छोड़ी है सभी शामिल होते हैं।

(ङ) प्रो० जेम्स- स्मृति चेतना से अलग होने के पश्चात् मन की पूर्व दशा का ज्ञान है, या यह एक घटना या तथ्य का ज्ञान है जिसके सम्बन्ध में हम बीच के समय में सोचते भी नहीं रहते, एवं साथ ही यह एक अतिरिक्त चेतना भी है कि हमने उसे पहले सोचा एवं अनुभव किया है।

स्मृति की प्रक्रिया

स्मृति में निम्न चार क्रियाएँ शामिल की जाती हैं :-

(क) स्मरण करना या अनुभव लेना।

(ख) धारण करना।

(ग) पुनः स्मरण करना।

(घ) प्रत्यभिज्ञान।

(1) स्मरण करना- कुछ लोग इसे अधिगम या सीखना कहते हैं परन्तु दोनों भिन्न क्रियाएँ हैं यद्यपि दोनों में अन्तर बहुत कम पाया जाता है। स्मरण करने की क्रिया में एक प्रकार से अनुभव करने या प्रभाव अथवा संस्कार लेने की क्रिया होती है। मान लें आपने पेड़ से फूल गिरते देखा, आपको इस घटना का अनुभव हुआ या आपके चेतन मन पर फल गिरने का संस्कार या छाप पड़ गया। यह क्रिया स्मरण करना होती है। सीखना भी लगभग यही क्रिया होती है परन्तु उसमें सीखने वाला अपने को परिस्थिति के अनुकूल बनाता है और परिस्थिति के प्रति अनुक्रिया करता है। इस प्रकार की अनुक्रिया के बाद स्मरण करना होता है। अतएव मनोवैज्ञानिक तौर पर अधिगम की क्रिया के बाद स्मरण करना होता है। इसी दशा में कुशल स्मरण प्रभावकारी अधिगम के फलस्वरूप होता है ऐसा प्रो० गिलफोर्ड का मत है।

(2) धारण करना- स्मृति का दूसरा महत्वपूर्ण अंग धारण होता है। इसमें प्राप्त संस्कारों को सुरक्षित रखा जाता है। वास्तव में जो भी अनुभव व्यक्ति करता है उसका स्मृति-चिन्ह मस्तिष्क पर पड़ता है। ये चिन्ह अमिट होते हैं। पहले ये चिन्ह चेतन पर रहते हैं पुनः अचेतन स्तर पर। वस्तुस्थिति की उत्तेजना से ये चिन्ह पुनः चेतन स्तर पर आ जाते हैं। अतः इसी को प्रयोग करके स्मरण की क्रिया पूरी की जाती है। धारण को पुष्ट बनाने के लिए कई बातें ध्यान में रखनी पड़ती हैं (i) सामग्री का स्वरूप, (ii) उत्तेजक की स्पष्टता, तीव्रता, सघता, अर्थपूर्णता, (iii) उत्तेजना की सीमा, अवधि, (iv) सरण की मात्रा, (v) मस्तिष्क की रचना तथा प्रभावों की ग्रहण शक्ति, (vi) स्मरण करने की विधियाँ। धारण करने की क्षमता जन्मजात पाई जाती है क्योकि मस्तिष्क की संरचना पर यह आधारित होती हैं। धारण स्मृति का रहा है और इसे निकाल देने से स्मृति का कोई महत्व नहीं रह जाता है।

(3) पुनः स्मरण करना- वास्तव में स्मृति की क्रिया में पूर्व अनुभवों को पुराने क्रम में पुनः उपस्थित करना पड़ता है और इसे पुनः स्मरण करना कहा जाता है। इसमें पूर्व संचित संस्कार फिर से चेतन स्तर पर लाए जाते हैं। यह एक प्रकार का पुनरुत्पाद है। विभिन्न प्रयोगो से ज्ञात होता है कि पनः स्मरण करना एक प्रकार से संचित संस्कारों का परिस्थिति की उत्तेजनानुरूप संगठन है। ऐसा विचार प्रो० कुलमान का है। अभ्यास के द्वारा स्मृति चिन्ह स्थायी बनते हैं और स्थायी स्मृति चिन्ह की सहायता से ही पुनः स्मरण करना सम्भव एवं शीघ्र होता है।

(4) प्रत्यभिज्ञान- स्मृति का चौथा अंग प्रत्यभिज्ञान होता है। इसमें पुनः स्मरण किए गए अनुभव को पहचानते हैं कि वे ही अनुभव हैं जो पहले हुए थे या उनसे कुछ भिन्न है या विरोधी है। इसमें चेतना का प्रयोग करते हैं तभी पूर्व घटित संस्कार स्मृति होते हैं। जहाँ पूर्णरूप से ये पूर्व प्रतिमाएँ फिर से उभरती हैं और धीरे-धीरे स्पष्ट होती हैं। जहाँ पूर्णरूप से ये पूर्व प्रतिमाएँ प्रकट हो जाती हैं वहाँ प्रत्यभिज्ञान की क्रिया पूरी हो जाती है। पूर्व अनुभवजनित संस्कारों को पहचानने की क्रिया में मन की तुलनात्मक विवेचना करना पड़ता है जिसके लिए साहचर्य से सहायता ली जाती है। समग्रवादी मनोविज्ञानी प्रत्यभिज्ञान में पूर्वानुभव जनित संस्कारों की सम्पूर्ण उपस्थिति बताते हैं। प्रो० एलेक्जेण्डर ने इसे भूत तथा वर्तमान के बीच स्थापित होने वाला अनवरत क्रम कहा है। इसलिये इसमें चेतना का अधिक प्रयोग पाया जाता है। यह अव्यक्त और स्पष्ट ढंग से होता है।

स्मृति और व्यक्तित्व का सम्बन्ध

स्मृति के आधार पर व्यक्तित्व का वर्गीकरण किया जाता है। जैसे अच्छी स्मृति वाले और क्षीणस्मृति वाले इसके अलावा स्मृति के कारण व्यक्तित्व का संगठन एवं निर्माण होता है। स्मृति से अच्छी बातों को समझा एवं धारण किया जाना सम्भव होता है। इससे चरित्र का विकास होता है। चरित्र का विकास अच्छे व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक होता है। स्मृति मनुष्य की एक मानसिक क्षमता एवं क्रियाशीलता है और व्यक्तित्व के मानसिक पक्ष को स्पष्ट करती है। अतः स्मृति एवं व्यक्ति में घनिष्ठ सम्बन्ध होता है।

स्मृति में सुधार कैसे हो?

स्मृति एक जन्मजात है फिर भी कुछ उपायों से उसमें सुधार किया जा सकता है। यह सुधार एक प्रकार से प्रशिक्षण के द्वारा सम्भव होता है। प्रशिक्षण के लिए हमें निम्नलिखित बातों को करना चाहिए यदि हम स्मृति में सधार लाने की इच्छा रखते हैं-

(i) दोहराना- जो कुछ पढ़ा-पढ़ाया जावे उसे तत्काल दोहराने से स्थायी रूप से स्मरण रहता है।

(ii) सह-सम्बन्धन- जो कुछ सीखा-सखाया जावे उसे सह सम्बन्धित करते रहने से स्मरण-शीघ्र और स्थायी भी होता है।

(iii) क्रियात्मकता- क्रियात्मक ढंग से याद करने से अच्छी तरह स्मरण रहता है।

(iv) स्पष्टीकरण- स्पष्ट रूप से समझा देने पर स्थायी रूप से याद हो जाता है।

(v) सत्वर शोधन- जहाँ भूलना हो वहाँ तुरन्त ठीक-ठीक बता देने से भी स्मरण में सुधार होता है।

(vi) विश्राम- थोड़ा स्मरण कर लेने के बाद विश्राम करने से मन में उसके स्थायी संस्कार बनते हैं। इसलिए स्सरण में विश्राम से सुधार होता है।

(vii) सार्थकता- स्मरण सामग्री यदि जीवन में काम आने वाली होती है वह हमेशा याद रखी जाती है। अतएव जिसे स्मरण करता है स्पष्ट रूप से उसकी सार्थकता बता दी जावे।

(viii) अवधान- स्मरण करते समय वस्तु की ओर ध्यान रखना जरूरी है। इससे स्मरण करना सरल एवं शीघ्र होता है। अतः स्मृति में सुधार भी होता है ।

(ix) स्मृति प्रतिमा का उपयोग- जो भी संस्कार बनें और उनके मन में जो प्रतिमाएँ तैयार की जावें उनका उपयोग अन्य स्थितियों में किए जाने से भी स्मृति में सुधार होता है।

(x) स्मृति नियमों का अनुप्रयोग- ऊपर जो मनोवैज्ञानिक नियम स्मरण के सम्बन्ध में दिए गए हैं उन्हें काम में लाना जरूरी है। इसमें भी स्मृति में सुधार होता है।

(xi) प्रोत्साहन का प्रयोग- इससे भी बालकों को स्मरण करने की रुचि और इच्छा होती है । फलस्वरूप उनकी स्मृति का सुधार होता है।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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