राजनीति विज्ञान / Political Science

तुलनात्मक राजनीति के आधुनिक दृष्टिकोण की विशेषताएँ | तुलनात्मक राजनीति की वर्तमान स्थिति | तुलनात्मक राजनीति का आधुनिक दृष्टिकोण

तुलनात्मक राजनीति के आधुनिक दृष्टिकोण की विशेषताएँ | तुलनात्मक राजनीति की वर्तमान स्थिति | तुलनात्मक राजनीति का आधुनिक दृष्टिकोण

तुलनात्मक राजनीति का आधुनिक दृष्टिकोण (Modern Approach)-

आधुनिक युग में राजनीति में सामाजिक, आर्थिक, भौगोलिक तथा शैक्षिक परिवर्तनों में विभिन्न परिवर्तन हुए। अत: तुलनात्मक राजनीति का परम्परागत दृष्टिकोण निरर्थक हो गया। आधुनिक दृष्टिकोण के उदय में विभिन्न क्षेत्रों में हुए परिवर्तनों के साथ साथ परम्परागत दृष्टिकोण की अयोग्यता का भी मुख्य हाथ रहा है। डेविस तथा लेविस ने आधुनिक दृष्टिकोण के विषय में कहा है-“वर्तमान में तुलनात्मक राजनीति के अध्ययनकर्ता के समक्ष समस्या विचारों की दुर्लभता नहीं वरन् उसके क्षेत्र में पालियों की विभिन्नता है।” इस प्रकार स्पष्ट है कि परम्परागत दृष्टिकोण के पास आधुनिक राजनैतिक विविधताओं से भरी व्यवस्थाओं की तुलना करने वाली विधियों का अभाव था।

तुलनात्मक राजनीति के आधुनिक दृष्टिकोण की विशेषताएँ –

आधुनिक दृष्टिकोण की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित प्रकार हैं:-

(1) आधुनिक दृष्टिकोण में अध्ययन की वैज्ञानिक विधि को अपनाया गया है। इस विधि मैं ‘कार्य-कारण’ तथा ‘क्रिया-प्रतिक्रिया’ के सिद्धान्तों के आधार पर व्यवस्थित व्याख्या की जाती है। वास्तव में आधुनिक युग वैज्ञानिक युग है तथा जीवन एवं ज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र में वैज्ञानिकता का समावेश है। इसीलिए वर्तमान युग में तुलनात्मक राजनीति के क्षेत्र में वैज्ञानिक विधि प्रयुक्त की जाती है।

(2) आधुनिक युग में तुलनात्मक राजनीति के अध्ययन के लिए अपनाया गया दृष्टिकोण राजनैतिक संस्थाओं का अध्ययन सामाजिक आधार पर करता है, क्योंकि मनुष्य पहले सामाजिक प्राणी है। अतः समाज में रहते हुए ही राजनैतिक संस्थाओं का अध्ययन किया जाना चाहिए।

(3) यह दृष्टिकोण विस्तृत तथा विश्लेषणात्मक है। आधुनिक युग में राजनीति का अध्ययन विश्लेषणात्मक हो गया है। परिकल्पनाएँ करने के पश्चात् ही परीक्षण किए जाते हैं और आँकड़े एकत्रित करके सामान्य नियमीकरण के लिए विश्लेषण तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य में किया जाता है। इसलिए विश्लेषणात्मक विधि तुलनात्मक राजनीति में अब बहुत महत्वपूर्ण नहीं रही है।

(4) आधुनिक दृष्टिकोण के अन्तर्गत मुख्य रूप से राजनैतिक व्यवस्था का अध्ययन किया जाता है। विभिन्न परीक्षणों के आधार पर यह सिद्ध हो चुका है कि प्रत्येक राजनैतिक व्यवस्था के मूल में-राज्य-सत्ता, शक्ति का एकाधिकार तथा शक्तितन्त्र तीन शक्तियाँ कार्य करती हैं। इनके आधार पर ही अनेक राजनैतिक व्यवस्थाओं की परिभाषा की गई है और यही एक या दो शक्तियाँ मिलकर किसी राजनैतिक व्यवस्था का औचित्य या अनौचित्य सिद्ध कर सकती हैं।

संसार के समस्त संविधानों तथा राजनैतिक व्यवस्थाओं में उक्त तीनों शक्तियों में से एकक्षअथवा तीनों के आधार पर एडमंण ने उनका आधुनिक वर्गीकरण किया है। विभिन्न देशों में निम्नलिखित राजनैतिक व्यवस्थाओं का वर्णन प्राप्त होता है।

(i) तुलनात्मक राजनीति में सर्वप्रथम उन राजनैतिक व्यवस्थाओं की तुलना की जाती है जो पश्चिमी देशों में पायी जाती है और कुछ राजनैतिक आदर्शों या मान्यताओं तथा संस्थाओं के विषय में एकमत हैं।

(ii) यूरोप में कुछ राजनैतिक व्यवस्थाएँ इंग्लैण्ड और अमेरिका से मिली हैं तथा अन्य यूरोपीय देशों ने उनको अपनी देशगत बनस्था के रूप में अपना रखा है। तुलनात्मक राजनीति में व्यवस्थाएँ बहुत महत्वपूर्ण हैं।

(iii) उन देशों की राजनैतिक व्यवस्थाओं के महत्व में तुलनात्मक राजनीति में वृद्धि हो रही है, जहाँ कि विकासक्रम अभी प्रारम्भ हुआ है। इस तरह की सामाजिकतापूर्ण व्यवस्थाओं में परस्पर विभिन्न मतों वाली व्यवस्था के साथ-साथ खिंचाव तथा तनाव भी होता है।

(iv) तुलनात्मक राजनीति में अधिनायकतन्त्र और सैनिक-शासन आदि राजनैतिक व्यवस्थाओं का अपना विशेष स्थान है। इन व्यवस्थाओं के अनुसार समस्त राजनैतिक सत्ता एक ही व्यक्ति के हाथों में केन्द्रित होती है। सैनिक शासन-व्यवस्था वह व्यवस्था है जिसमें एक ही व्यक्ति का शासन होता है तथा वह व्यक्ति सत्ता का प्रयोग करने वाली संस्था सैनिक- अधिकारियों में से होता है। इस प्रकार तुलनात्मक राजनीति में सैनिकीय व्यवस्थाओं तथा अधिनायकीय व्यवस्थाओं का विशेष स्थान होता है।

आधुनिक दृष्टिकोण में उक्त समस्त राजनैतिक व्यवस्थाओं के विस्तृत विश्लेषणात्मक तथा व्याख्यापूर्ण अध्ययन द्वारा उनकी तर्कसंगत तुलना करके सामान्य नियमों को निर्मित किया जाता है।

(v) आधुनिक दृष्टिकोण संरचनात्मक तथा कार्यमूलक दृष्टिकोण होता है। वर्तमान युग की स्पष्ट धारणा के अनुसार राजनैतिक व्यवस्थाओं तथा संस्थाओं की संरचना तथा कार्यों में निकट तथा रचनात्मक सम्बन्ध होता है। इस प्रकार तुलनात्मक राजनीति में राजनैतिक संस्थाओं का अध्ययन आधुनिक दृष्टिकोण के अनुसार इन दोनों के आधार पर होना चाहिए। उदाहरणार्थ किसी संस्था के विषय में ज्ञान प्राप्त करने या तुलना के लिए उसके रूप स्वरूप जानने के साथ- साथ संस्था की रचना, संगठन तथा कार्य में वास्तविक सम्बन्ध भी जानना चाहिए। प्राचीन मत अब परिवर्तित हो चुका है कि राजनैतिक व्यवस्थाओं तथा संस्थाओं की संरचना और कार्यों में ऐसा सम्बन्ध है जो एक-दूसरे के लिए नियामक है और सावयव एकता दोनों में व्याप्त है।

इस मत को और भी स्पष्ट करते हुए कहा है कि प्रत्येक संस्था और व्यवस्था में दो प्रकार के कार्य होते हैं-आन्तरिक तथा बाह्य । एक प्रसिद्ध लेखक के अनुसार एक संस्था या राजनैतिक व्यवस्था द्वारा आन्तरिक कार्य निम्नलिखित प्रकार से किए जाते हैं:-

(1) सर्वप्रथम राजनैतिक संस्थाएँ राज्यों के व्यक्तिगत हितों को एकत्रित करती हैं और उनको सामाजिकता प्रदान करके उपादेयता स्पष्ट की जाती है।

(2) राजनैतिक संस्थाओं अथवा दल का एक महत्वपूर्ण कार्य एक लेखक के अनुसार राजनैतिक सम्प्रेषण है। इसके अनुसार जनता की राजनैतिक मान्यताओं, आस्थाओं, सिद्धान्तों, आदर्शों तथा निष्कर्षों को सरकार तक पहुँचाना और राजनीतिक प्रशासन द्वारा अपनायी गयी नीतियों तथा योजनाओं को जनता के समक्ष रखना।  इस प्रकार ये अनेक संस्थाएँ शासन तथा जनता में एक-दूसरे के दृष्टिकोणों और कार्यों को समझने एवं उसी के अनुसार कार्य करने के लिए प्रेरित करती हैं।

(3) राजनैतिक संस्थाओं का एक कार्य राजनैतिक मान्यताओं के समाजीकरण द्वारा अपने सिद्धान्तों की ओर जनसमूह को आकर्षित करना भी है। राजनैतिक मान्यताओं के समाजीकरण की गति समाज की परिस्थितियों तथा सदस्यों पर निर्भर करती है।

राजनैतिक व्यवस्था द्वारा बाह्य कार्य निम्नलिखित प्रकार से किए जाते हैं-

(1) प्रत्येक राजनैतिक संस्था तथा व्यवस्था जनसमूह या अपने सदस्यों की मान्यताओं के आधार पर ही अपनी सार्वजनिक नीति निर्मित करती है। वास्तव में जनता की माँग के आधार पर नीति निर्धारित करना ( या सत्तारूढ़ दल द्वारा कानून बनवाकर सार्वजनिक सामूहिक राजनैतिक मान्यता प्रदान करना राजनैतिक संस्था का महत्वपूर्ण कार्य है।

(2) राजनैतिक संस्थाएँ नीति तथा कानूनों के निर्माण के साथ-साथ उनको क्रियावित भी करती हैं।

(3) प्रत्येक राजनैतिक व्यवस्था के लिए जनसमूह की आकांक्षाओं के आधार पर सार्वजनिक नीति निर्धारित करना, क्रियान्वित करना तथा नीति का मूल्यांकन करना भी आवश्यक है। इसी आधार पर उस व्यवस्था की महत्ता या लोकप्रियता निर्भर करती है।

तुलनात्मक राजनीति की वर्तमान स्थिति

(Present Position of Comparative Politics)

प्रसिद्ध राजनीतिशास्त्री हैरो एक्सटीन के अनुसार-“तुलनात्मक राजनीति की वर्तमान स्थिति को ज्ञात करने के लिए सर्वप्रथम उन आधारभूत प्रश्नों को जानना आवश्यक है जो राजनैतिक व्यवस्थाओं के विश्लेषण की प्रक्रियाओं तथा उद्देश्यों को अनुशासित करते हैं।” ये प्रश्न बहुत अधिक तथा विविध प्रकार के हैं। अत: केवल कुछ प्रश्नों को उदाहरणस्वरूप देकर तुलनात्मक राजनीति की वर्तमान स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है। इस प्रकार के कुछ प्रश्न निम्नलिखित प्रकार हैं:-

(1) कार्य-विधि सम्बन्धी प्रश्न (Procedural Questions)- तुलनात्मक राजनीति के समकालीन छात्र सर्वप्रथम कार्य-विधि सम्बन्धी प्रश्न उठाते हैं। वे तुलनात्मक विधि की प्रकृति तथा स्वरूप और उसके प्रयोग के विषय में पूछते हैं तथा किस प्रकार का अध्ययन तुलनात्मक है और किस प्रकार का नहीं। तुलनाओं से क्या सीखा जा सकता है? क्या तुलनात्मक विधि सामाजिक विज्ञानों के क्षेत्र में प्राकृतिक विज्ञानों की प्रयोगात्मक विधि का समुचित स्थानापन्न है? क्या राजनीतिशास्त्र के क्षेत्र में इसका प्रयोग किया जा सकता है? क्या तुलनात्मक विधि किसी सीमित क्षेत्र में लाभप्रद रहेगी?

(2) अवधारणाओं के प्रयोग से सम्बन्धित प्रश्न (Questions about the use of Concepts)-  हैरो एक्सटीन ने इस प्रकार के प्रश्नों को दो श्रेणियों में विभक्त किया है- (i) राजनीतिक व्यवस्थाओं के वर्गीकरण से सम्बन्धित प्रश्न तथा (ii) राजनीतिक व्यवस्थाओं के तत्वों से सम्बन्धित प्रश्न।

राजनीतिक व्यवस्थाओं की वर्गीकृत योजना से सम्बन्धित सूची से अनेक प्रश्न उत्पन्न होते हैं तथा यह जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि कौन-सी योजना अपने किस उद्देश्य के कारण लाभदायी है तथा किस योजना का कितना लाभ है ? इन योजनाओं के समुचित निर्माण तथा अच्छी योजना को सिद्धान्त रूप में बुरी योजना से अलग करने से सम्बन्धित विचार भी उठता है।

इसी प्रकार राजनीतिक व्यवस्थाओं के तत्वों के विषय में प्रश्न उठते हैं। इस प्रकार के मुख्य तत्व हैं-विद्यार्थी, कार्यकारी तथा न्यायिक संरचना और कार्य परन्तु बाद में वैकल्पिक तत्व भी सम्मिलित किये गये हैं।

(3) आधारभूत प्रश्न- राजनीतिक अध्ययन में विश्लेषण की किस इकाई का प्रयोग किया जाना चाहिए । ‘रोल्स’ जैसी निर्वैयक्तिक इकाइयों का प्रयोग किया जाना चाहिए या व्यक्तिपरक इकाइयों का। परम्परा के अनुसार औपचारिक संवैधानिक संरचना के अध्ययन पर बल देना चाहिए अथवा समूह-सिद्धान्त, संरचनात्मक प्रकार्यात्मक विश्लेषण, निर्णयकारी दृष्टिकोण, संचार सिद्धान्त आदि का प्रयोग करना चाहिए।

उपर्युक्त प्रश्नों द्वारा तुलनात्मक राजनीति की वर्तमान स्थिति के विषय में पता चलता है। विद्वान इन प्रश्नों के विषय में एकमत नहीं हैं।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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