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विद्यापति के काव्य में श्रृंगार का संयोग पक्ष | विद्यापति के काव्य में श्रृंगार का वियोग-पक्ष

विद्यापति के काव्य में श्रृंगार का संयोग पक्ष | विद्यापति के काव्य में श्रृंगार का वियोग-पक्ष

विद्यापति के काव्य में श्रृंगार का संयोग पक्ष

विद्यापति के काव्य में श्रृंगार का संयोग तथा वियोग-पक्ष

विद्यापति की पदावली का प्रधान प्रतिपाद्य श्रृंगार रस है। कवि ने पदावली में श्रृंगार के दोनों पक्षों का अत्यन्त मार्मिक निरूपण प्रस्तुत किया है। यदि कवि ने संयोग के वर्णन में अपनी रुचि दिखाई है तो वियोग में भी वह अपनी मार्मिकता को छोड़ नहीं सका है। इस प्रकार पदावली में श्रृंगार का निरूपण अपने पूर्ण परिपाक पर है। सर्वप्रथम विद्यापति के संयोग तथा वियोग- वर्णन का पृथक्-पृथक् निरूपण किया जा रहा है, तत्पश्चात् इनका तुलनात्मक विवेचन प्रस्तुत किया जायेगा।

संयोग श्रृंगार- विद्यापति संयोग शृंगार के कवि हैं। संयोग ‘शृंगार में रूप-वर्णन प्रधान होता है। रूप-वर्णन में नख-शिख, वेश-भूषा, आकृति, सुकुमारता आदि का विवेचन होता है। डॉ. दीक्षित ने लिखा है – “नख-शिख, वर्णन ‘शिख-नख’ वर्णन में भी परिवर्तित हो जाया करता है। ‘नख-शिख’ का सम्बन्ध अलौकिक आलम्बनों से होता है और ‘शिख-नख’ का लौकिक से। विद्यापति ने क्योंकि कुछ अलौकिकता भी रखी है, अतः ‘नख-शिख’ वर्णन भी प्रशंसनीय है और ‘शिख-नख’ का वर्णन भी। विद्यापति के ‘नख-शिख’ वर्णन की विशेषता- बिम्ब प्रस्तुत करने में हैं। उनका ‘नख-शिख’ वर्णन कहीं सामान्य रहा है, कहीं अलंकृत किन्तु अलंकृत वर्णनों में उनका मन बहुत रमा है, जिससे बड़े चमत्कारपूर्ण बिम्ब उभरे हैं। एक उदाहरण लीजिए –

पल्लवराज चरन-जुग सोभित गति गजरात के भाने।

कनक कदलि पर सिंह समारल ता पर मेरु समाने।

मेरु उपर दुइ कमल फलायल नाल बिना रुचि पाई।

विद्यापति ने लज्जाशील सौन्दर्य का वर्णन किया है। उन्होंने लज्जा के द्वारा सौन्दर्य के आकर्षक चित्र प्रस्तुत किये हैं। चूंघट काढ़े हुए मिलने के लिए उत्सुक राधिका की मोनहर छवि का यह चित्र उदाहरणार्थ प्रस्तुत हैं –

नील बसन तन घेरलि सजनि गे सिर लेल घूंघट सारि।

लग-लग पहु के चलइत सजनि गे सकुचल अकम नारि॥

प्रेम-प्रसंग में लज्जा के साथ ही मान का भी महत्व है। मान-प्रसंग में आभ्यन्तर भाव-चित्रण भी आ जाता है। कवि ने राधा के मान-प्रसंग में उसकी हार्दिक अनुभूतियों का चित्रण किया है।

विद्यापति ने राधा के रूप-चित्रण के साथ ही कृष्ण के सौन्दर्य का भी चित्रण किया है। कृष्ण में पुरुष सौन्दर्य का प्रभाव वर्णित करते हुए कवि ने राधा को उनके प्रति आकृष्ट दिखाया है। वह कृष्ण को देखकर आकृष्ट तो होती हैं, किन्तु लजा जाती हैं। रूप के जादू से कामासक्त होकर वह अपने मन को खो बैठती हैं। शरीर पसीना-पसीना हो जाता है, पुलक से कंचुकी फट जाती है, वलय म्हंग हो जाते है और हाथ कांपने लगते हैं, मुख में गद्गद-भरा बोल अवरुद्ध हो जाता है। देखिए –

अवनत आनन कए हम रहलिहुँ बारल लोचन चोर।

पिय-मुख-रुचि पिबए धाओल, जनि से चाँद चकोर।।

विरह वर्णन

विद्यापति का विरह-वर्णन भी संयोग-वर्णन की भाँति मार्मिक है। डॉ. आनन्दप्रकाश दीक्षित ने लिखा है – “विद्यापति के विरह-चित्रण में भाव और कल्पना का, अनुभूति और तन्मयता का ऐसा अद्भुत सामंजस्य है कि पाठक सहज ही सुध-बुध भूलकर तन्मय हो जाता है। भावों की विविधता, व्यग्रता, परिवर्तनशीलता, दीनता, अनुरोध, वेदना-निवदेन, प्रेम का घातक प्रहार और उससे उत्पन्न पश्चाताप, उपालंभ, विवशता, याचना आदि इतने अनेकरूपी भाव अन्यत्र दुर्लभ हैं।”

विरह का आश्रय नायिका और आलम्बन नायक होता है। विद्यापति ने नायक के विरह का भी वर्णन किया है। विरह’चित्रण में प्रकृति बड़ी सहायता करती है। उन्होंने प्रकृति के उद्दीपन रूप का भी चित्रण किया है। उन्होंने विरह की सभी स्थितियों और दशाओं का वर्णन किया है। उन्होंने शास्त्रीय परम्परा के अनुरूप स्मृति, गुण-कथन, अभिलाषा, चिन्ता, उद्वेग, प्रलाप, उन्मदा, जड़ता, मूर्छा, मरण आदि विरह-दशाओं का वर्णन किया है-

कत दिन चाँद कुसुम हम मेलि।

कत दिन कमल भ्रमर करु केलि।। स्मृति

पहिल पिया मोर सुमुख हेरिति, पलक छोड़त न अंग।

अपरुब प्रेम पास दानु बाँधल, अब तेजल मोर संग। गुण-कथन

कत दिन पिय मोर पुजब बात।

कबहूँ पयोधर रहेब हाथ। अभिलाषा

सो राम है? सो किय बिछुरिन जाय।

करि धरि माथुर अनुमति माँगलि ततहि पड़लि मुरझाय।। मूर्च्छा

सतनी, के कह आओब, मधाई।

विरह पयोधि पार किअ पाओब, मोर मन नहिं परिआई।। उद्वेग

कह तु कह सखि बोल तु बोल तु रे।

हमर पिया कौन देस रे॥ प्रलाप

राधा की आकुलता का कवि ने अत्यन्त मार्मिक चित्रण किया है। चकवी-चकवा जैसी उसकी जोड़ी बिछुड़ गयी तो वह जलकर मर जाना चाहती है –

बिनती करओं सहलोलिनि रे, मोहि देह अगिहर साजि।

प्रकृति का उद्दीपन दिन-प्रतिदिन विरहाग्नि को भड़का रहा है –

चौदसि भमर भम, कुसुम-कुसुम रम नीरस माजरि नीबइ।

मंद पवन चल, निक कुह-कुह सुनि विरहिनि कइसे जीवइ॥

अब तो प्रियतम स्वप्न में भी नहीं आता। राधा के विरह की अजर-सीमा का यह वर्णन देखिए-

सपनेहु संगम पाओल रंग बढ़ाओल रे।

से मोर बिहि विध्य ओल निंदओ हेटा एल रे॥

राधा का प्रलाप और उन्मदा इतना बढ़ जाता है कि वह –

अनुखन माधव माधव सुमरहत सुन्दरि भेलि मधाई।

किन्तु राधा माधव बनकर भी विरह से छुटकारा नहीं पाती, क्योंकि अपने को माधव समझकर राधा-राधा रटने लगती है।

तुलना- “विद्यापति के शृंगार में नवोदित यौवन की यिकासमान छवि, अनूठा अनुपम अंग-सौष्ठव, उसका दोनों ओर प्रिय और प्रेमी पर पड़ने वाला आकर्षक प्रभाव, अभिजात श्रृंगार-सज्जित सौन्दर्य, सुरत के चित्र और अनुभूतियाँ, विरीह की व्यथा, मन्मथाविष्ट कामिनियों के निःशक अभिसार, साखियों द्वारा प्रेमिकाओं के सौन्दर्य की कलात्मक प्रशंसा और उन्हें कामकेलि की शिक्षाएँ आदि भावों को उपनिबद्ध किया गया है। इसमें ऐसा कोई भव नहीं है जो विद्यापति से पूर्व संस्कृत साहिीत्य के श्रृंगार और नायिका-भेद में गृहीत न हुआ हो, फिर भी विद्यापति की अनुभूतियाँ और उनकी अभिव्यक्ति अनूठी है। उसका कारण है कवि की वैयक्तिकता का इनसे सम्बन्ध। कवि के सब भाव शास्त्रों को सनुकर नहीं लिखे गये, स्वयं अनुभव किये गये हैं। जो रूप या परिस्थिति चित्रित हुई है, वह भी कवि की आँखों-देखी है। इसलिए वह अपनी कल्पना और सहृदयता के बल पर उसे रूपायित करने में, उसका सजीव चित्र उतार देने में सफल हो गया है।”

विद्यापति का भावक्षेत्र सीमित है। उन्होंने संयोग शृंगार का वर्णन अधिक किया है। विरह- वर्णन में उनकी रुचि अधिक नहीं रमी है। यद्यपि उन्होंने जितना विरह-वर्णन किया है, वह अत्यन्त मार्मिक बन पड़ा है। विद्यापति की दृष्टि अन्तर्जगत् की ओर उतनी नहीं रही है, जितनी बहिर्जगत् की ओर।

निष्कर्ष-

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि विद्यापति संयोग श्रृंगार और वियोग श्रृंगार-दोनों के चित्रण में सफल रहे हैं। उन्हें दोनों क्षेत्रों में समान रूप से सफलता मिली है। संयोग में अन्तर्वृत्तियों के चित्रण में उतनी गहराई नहीं रहती, जितनी वियोग दशा में। विद्यापति का वियोग-वर्णन अत्यन्त मार्मिक है। हाँ, यह बात तथ्यपूर्ण है कि विद्यापति की पदावली में संयोग श्रृंगार का जितना वर्णन मिलता है, उसकी अपेक्षा वियोग श्रृंगार का वर्णन बहुत कम है। इसी बात को लक्षित करके कुछ समीक्षकों ने विद्यापति को संयोग श्रृंगार का कवि घोषित किया है। वियोग-श्रृंगार के निरूपण में अन्तर्वृत्तियों के उद्घाटन का अधिक अवकाश था, किन्तु विद्यापति ने इस अवसर का उपयोग किया है। फिर भी, यह तो स्पष्ट परिलक्षित है कि विद्यापति को संयोग और वियोग दोनों के निरूपण में समान सफलता मिली है। ये रस-सिद्ध कवि हैं और मूलतः श्रृंगारी कवि हैं। इनकी पदावली का मुख्य भाव श्रृंगार है। इसमें उनकी अनुभूति की मार्मिकता, सरलता और निश्छलता एवं कल्पना और कला की श्रेष्ठता दर्शनीय है।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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