विपणन प्रबन्ध / Marketing Management

विपणन नियन्त्रण की तकनीकें | विपणन नियन्त्रण के प्रकार | Techniques of Marketing Control in Hindi | Types of Marketing Control in Hindi

विपणन नियन्त्रण की तकनीकें | विपणन नियन्त्रण के प्रकार | Techniques of Marketing Control in Hindi | Types of Marketing Control in Hindi

विपणन नियन्त्रण की तकनीकें तथा प्रकार

(Techniques and Types of Marketing Control)

फिलिप कोटलर के अनुसार, “विपणन नियन्त्रण का कार्य किसी एक स्तर पर किया जाने वाला कार्य नहीं है।”न का कार्य विपणन संगठन से लेकर किसी एक विपणन प्रयास की जाँच, कमियों का पता लगाना व उनके सुधार हेतु किया जा सकता है ताकि पूर्व निर्धारित प्रमापों को प्राप्त किया जा सके। विपणन नियन्त्रण की निम्न तीन तकनीकें बतायी गयी हैं-

(I) सामरिक नियन्त्रण तकनीक

(Strategic Control Technique)

इस प्रकार के नियन्त्रण से हमारा अभिप्राय एक ऐसे नियन्त्रण से है जिसके द्वारा फर्म में सम्पन्न की जाने वाली आधारभूत क्रियाओं की बदलते हुए वातावरण व अवसरों के संदर्भ में समीक्षा की जा सके और जाँचा जा सके कि क्या फर्म के विपणन उद्देश्य व क्रियाएँ उसके बाजारों, उत्पादों तथा वितरण वाहिका सम्बन्धी विपणन अवसरों के शोधन हेतु उपयुक्त हैं? यह एक उच्च स्तरीय जिम्मेदारी है जिसे एक फर्म के शीर्ष प्रबन्ध द्वारा सम्पन्न किया जाता है। यह नियन्त्रण विपणन अंकेक्षण तकनीक द्वारा लागू किया जा सकता है। विपणन अंकेक्षण के सम्बन्ध में फिलिप कोटलर ने कहा है कि, “विपणन अंकेक्षण एक कम्पनी के सम्पूर्ण विपणन प्रयत्न या किसी विपणन गतिविधि विशेष से सम्बन्धित उद्देश्यों, कार्यक्रमों, निष्पादन एवं संगठन का ऐसा स्वतन्त्र परीक्षण है, जिसके तीन उद्देश्य हैं- (1) यह निश्चित करना कि क्या हो रहा है? (2) जो हो रहा है उसका‌ मूल्यांकन करना व (3) इसकी सिफारिश कि भविष्य में क्या होना चाहिए।”

(II) वार्षिक योजना नियन्त्रण तकनीक

(Annual Plan Control Techniques)

यह तकनीक शीर्ष व मध्य प्रबन्धकों द्वारा अपनायी जाती है जो संस्था की वार्षिक योजना की प्रगति की जाँच करते हैं तथा यदि किसी अधिकारी का कार्य कम होता है तो उसके कारण ढूंढें जाते हैं तथा सुधार हेतु कार्य किये जाते हैं। इस प्रकार के नियन्त्रण में निम्न चार तकनीकें प्रयोग में लायी जाती हैं –

  1. विक्रय विश्लेषण (Sales Analysis)- इस विश्लेषण में अपेक्षित बिक्री की वास्तविक बिक्री से तुलना की जाती है, उसके अन्तरों का पता लगाया जाता है व सुधार हेतु उपाय किये जाते हैं। इसके लिए दो तकनीकें काम में लायी जाती हैं – (1) विक्रय विचरण विश्लेषण (Sales Variance Analysis) व (2) सूक्ष्म विक्रय विश्लेषण (Micro Sales Analysis)। विक्रय विचरण विश्लेषण में विशिष्ट वस्तुओं, क्षेत्रों व विक्रयकर्त्ताओं आदि की कुल बिक्री में जो कमी आयी है उसके कारणों का पता लगाया जाता है जिसके लिए प्रतिवेदनों का गहन अध्ययन किया जाता है, सूक्ष्म विक्रय विश्लेषण में सूचनाएँ एकत्रित की जाती हैं व उनका विश्लेषण किया जाता है। तत्पश्चात् भावी सुधार हेतु उपाय सुझाये जाते हैं।
  2. बाजार अंश विश्लेषण (Market Share Analysis)- बाजार अंश विश्लेषण से आशय इस बात का पता लगाने से है कि वस्तु के पूरे बाजार में संस्था का क्या हिस्सा है, यह बढ़ रहा है या घट रहा है। यदि घट रहा है तो क्यों घट रहा है? इसके कारण कौन-कौन से हैं? इन कारणों का पता लगाकर सुधार हेतु प्रयास किये जा सकते हैं।
  3. विक्रय व्यय अनुपात (Sales Expenses Ratio)- वार्षिक योजना नियन्त्रण का उद्देश्य न केवल विक्रय निष्पादनों की कमियों का पता लगाना है बल्कि यह भी जाँचना है कि फर्म द्वारा किया गया विक्रय उचित है। इसके लिए (1) सकल लाभ व बिक्री का अनुपात (2) विज्ञापन व्यय व बिक्री का अनुपात (3) विक्रय शक्ति व्यय व बिक्री का अनुपात को मालूम किया जाता है। यदि कहीं व्यय अत्यधिक हैं तो उन्हें कम करने का प्रयास करते हैं।
  4. रुख का अध्ययन (Attitude Study)- विपणन नियन्त्रण करने का एक तरीका ग्राहकों के रुख का समय-समय पर अध्ययन करते रहना है जिससे कि माहकों के बारे में पहले से ही पताचल जाये कि वे क्या चाहते हैं। यदि बिक्री में गिरावट आने का आभास होता है तो उसे रोकने के लिए तत्काल कदम उठाये जाने चाहिए।

(III) लाभदेयता नियन्त्रण तकनीक

(Profitability Control Technique)

इस तकनीक के  द्वारा लाभदेयता सम्बन्धी जानकारी प्राप्त की जाती है और जहाँ कमी है उसे दूर कर लाभ बढ़ाने का प्रयास किया जाता है और उन विपणन प्रयासों को त्यागा जा सकता है जिनके द्वारा फर्म की बिक्री की लाभदायकता में रुकावट आती है। इसके लिए निम्न दो विधियाँ अपनायी जाती है

  1. विपणन लागत विश्लेषण (Marketing Cost Analysis) – विपणन लागत विश्लेषण एक फर्म के सम्पूर्ण वितरण लागत ढाँचे का विस्तृत अध्ययन है। वर्तमान विपणन प्रयासों में किस विपणन प्रयास को त्यागा जाये व किसे जोड़ा जाये, इस सम्बन्ध में जानकारी के लिए विपणन लागत का विश्लेषण अत्यधिक उपयोगी होता है। यहाँ विपणन लागत से अभिप्राय बिक्री प्राप्त करने की लागतों, आदेश पूर्ण करने की लागतों तथा विक्रय को बनाये रखने की लागतों के जोड़ से हैं। इस प्रकार के विश्लेषण से विक्रय क्षेत्र, विक्रेता, उत्पाद, ग्राहक समूह, आदेश का आकार व वितरण वाहिका सम्बन्धी निर्णयों के लिए महत्वपूर्ण सूचनाएँ प्राप्त होती हैं। इन लागतों के विश्लेषण के लिए अग्र तरीका अपनाया जाता है –

(क) विपणन लागतों की पहचान करना (Identifying Marketing Cost)- इसके अन्तर्गत पहले लाभ-हानि विवरण में शामिल विपणन लागतों का पता लगाया जाता है। इसके लिए वस्तुओं को बेचने, उनका विज्ञापन करने, उनका पैकिंग व वितरण करने में जो व्यय होते हैं उनका पता लगाया जाता है और फिर उनके ऊपर होने वाले प्रशासनिक व्ययों की गणना की जाती है।

(ख) विपणन इकाइयों में व्ययों का आवंटन (Allocation of Functional Expenses to Marketing Units)- इसके अन्तर्गत यदि कोई संस्था कई वस्तुओं का निर्माण व विक्रय कर रही हैं तो फिर उन व्ययों को उन वस्तुओं में बांटा जाता है जैसे यदि कोई संस्था चार वस्तुओं का निर्माण व विक्रय कर रही है तो उन व्ययों को इन चारों वस्तुओं में बांट दिया जाता है।

(ग) उत्पाद के अनुसार लाभ-हानि विवरण तैयार करना (Preparing Profit and Loss Statement Product-wise)- अब प्रत्येक उत्पाद के लिए लाभ हानि विवरण तैयार किया जाता है। इससे यह ज्ञात हो जाता है कि फर्म को किस उत्पाद की बिक्री से अधिक लाभ है और किस उत्पाद की बिक्री घाटा हो रहा है।

इस प्रकार उपरोक्त तरीकों से विपणन लागतों का पता लगा लेते हैं। जिस वस्तु के बारे में विपणन लागत अधिक आती है उसे कम करने का प्रयास करते हैं। इससे विपणन व्ययों पर नियन्त्रण बना रहता है।

  1. लागत एवं लाभ विश्लेषण (Cost and Profit Analysis) – विपणन प्रयत्नों की लाभदेयता का पता लगाने के लिए लागत एवं लाभ विश्लेषण को अपनाया जाता है। इसमें प्रत्येक वस्तु के लाभ व उस पर होने वाले व्ययों का पता लगाते हैं, जिसके लिए एक विश्लेषण तालिका बनायी जाती है जिसमें एक ओर वस्तु, दूसरी ओर उसका कुल लाभ में हिस्सा व तीसरी ओर कुल व्ययों में उसका हिस्सा लिख लेते हैं। इसका उदाहरण निम्न है।

वस्तु  (Product)

लाभ में हिस्सा (Share in Profit)

कुल व्ययों में हिस्सा (Share in Total Exp.)

A

60%

40%

B

20%

30%

C

12.5%

20%

D

7.5%

10%

ऊपरोक्त तालिका से स्पष्ट है कि A वस्तु 60% लाभ कमाती है लेकिन इस पर कुल व्ययों का 40% ही व्यय होता है। जबकि शेष तीनों B, C और D वस्तुओं के द्वारा 40% ही लाभ कमाया जाता है, जबकि उनपर व्यय 60% होता है। अतः आवश्यकता इस बात की है कि प्रथम वस्तु पर अधिक ध्यान दिया जाये तथा शेष की लाभदायकता को बढ़ाया जाये।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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