शिक्षाशास्त्र / Education

विस्मृति या विस्मरण | विस्मृति का अर्थ | विस्मृति की परिभाषा | विस्मृति के कारण | विस्मरण का निराकरण | विस्मरण की उपयोगिता | अधिगम शिक्षा एवं स्मरण-विस्मरण

विस्मृति या विस्मरण | विस्मृति का अर्थ | विस्मृति की परिभाषा | विस्मृति के कारण | विस्मरण का निराकरण | विस्मरण की उपयोगिता | अधिगम शिक्षा एवं स्मरण-विस्मरण

विस्मृति या विस्मरण

स्मृति की उल्टी प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति धारण करने में असमर्थ होता है। यह स्वाभाविक एवं प्राकृतिक प्रक्रिया है। किसी चोट की पीड़ा की अनुभूति बार-बार करने से पीड़ा बढ़ती है इसलिए लोग भूलने की कोशिश करते हैं। दुखद घटनाओं को यदि जीवन में न भुलाया जावे तो जीवन और भी कठिन हो जावे। ऐसी दशा में विस्मृति जीवन में एक आवश्यकता हो जाती है। इसके अलावा कुछ लोगों का मस्तिष्क ही ऐसा बना होता है जिससे उन्हें स्मरण रखना सम्भव नहीं होता है और वे भूलते हैं, कुछ के मस्तिष्क में चोट, आधात लगने से वे विस्मरण के शिकार बनते हैं। विस्मरण भी एक प्राकृतिक प्रक्रिया है।

विस्मृति का अर्थ-

वि+स्मृति अर्थात् स्मृति न होना। इस प्रकार जब किसी उत्तेजक के उपस्थित होने पर भी व्यक्ति के पूर्व अनुभव उसी तरह से प्रकट नहीं होते जैसा कि पहले हुआ था तो वहाँ विस्मरण का होना पाया जाता है। प्रो० जेम्स ड्रेवर ने लिखा है कि “विस्मृति जब पुनस्मरण का प्रयल किया जावे तो किसी समय भी ऐसे पुनस्मरण की असफलता है अथवा पूर्व सीखे गए किसी कार्य को निष्पादन न करना।” कुछ अनुभव हम करते हैं उसे पुनः स्मरण करने में हमारी विस्मृति पाई जाती है इसमें पूर्व अनुभव चेतन स्तर पर नहीं आ पाते हैं।

विस्मृति की परिभाषा

(क) प्रो० मन- जो कुछ अर्जित किया गया है उसे धारण करने में असमर्थ होना विस्मृति है।

(ख) प्रो० फ्रायड- जो कुछ सुखदं नहीं है उसे स्मृति से दूर रखने की प्रवृत्ति विस्मृति है।

(ग) प्रो० भाटिया- बिना मौलिक उत्तेजकों की सहायता से किसी विचार या विचारों के समूह की चेतना में व्यक्ति के द्वारा पुनः लाना भूलना है।

विस्मृति के कारण

(i) समय बीतना- प्रो० एबिंघास ने अपने प्रयोग से बताया है कि ज्यों-ज्यों समय बीतता है हम भूलते हैं। 20 मिनट पश्चात् 42 प्रतिशत और एक माह पश्चात् 79 प्रतिशत भूलना होता है।

(ii) स्मरण सामग्री का अनुपयुक्त स्वरूप एवं परिमाण- अरुचिकर, निरर्थक, अनुपयोगी और अधिक मात्रा में स्मरण सामग्री होने से विस्मृति जल्दी होती है क्योंकि अभ्यास करना अच्छा एवं सम्भव नहीं होता।

(iii) स्मरण की विधि का दोषपूर्ण होना- इससे भी विस्मरण होता है। स्मरण में तत्परता प्रयत्नशीलता, लापरवाही से भूलना शीघ्र होता है।

(iv) स्मरण की मात्रा में कमी- कम स्मरण करने वाले को शीघ्र भूलता है क्योंकि उसमें प्रयत्न की कमी होती है।

(v) अवधान और अनुप्रयोग- यदि अवधान न दिया जाये और उपयोग न किया जावे तो भी शीघ्र भूलना निश्चय होता है।

(vi) मादक द्रव्यों का प्रयोग- इससे मस्तिष्क ठीक से काम नहीं करता और भूलना होता है।

(vii) मस्तिष्क का आघात व रोग- मस्तिष्क में चोट आने से स्मृति खराब हो जाती है और भूलना होता है। इसी तरह से मस्तिष्क में कुछ रासायनिक द्रव्यों की उपस्थिति से उसकी क्रियाशीलता विकृत हो जाती है और भूलना होता है। उन्माद शीजोफर्निया आदि मानसिक रोग भूलने में सहायता देते हैं।

(viii) मानसिक बाधाएँ- मनोविज्ञानियों के विचार से मानसिक बाधाएँ भी भूलने के कारण हैं। इन्हें पृष्ठोन्मुख अवरोध कहा जाता है। इस प्रकार से अप्रिय अनुभूतियों का दमन करने से भी भूलना होता है।

(ix) संवेगात्मक स्थिति- संवेगात्सक स्थिति में स्मरण क्रिया होने से भूलना होता है क्योंकि उत्तेजना अधिक होती है। इसमें सन्तुलन एवं स्थिरता नहीं रहती।

(x) परिवर्तित उत्तेजक स्थिति- उत्तेजक बदल देने से भूलना होता है। गणित या विज्ञान पढ़ाने के बाद यदि बच्चों को घर के काम-काज में लगा दिया जाये तो वे गणित या विज्ञान भूल जाते हैं।

(xi) स्मरण में क्रम-विहीनता- व्यक्तिक्रम से स्मरण करने में भूलना स्वाभाविक है क्योंकि समग्र स्मृति-चित्र नहीं बन पाता है।

(xii) मानसिक द्वन्द्व और संघर्ष- इस स्थिति में भी स्मरण खराब एवं बाधित हो जाता है और भूलना होता है।

(xiii) स्मरण में अभिप्रेरक की कमी- स्मरण की जाने वाली सामग्री से यदि बालक को कोई अभिप्रेरण नहीं मिलता है तो निश्चय ही वह उसे विस्मरणं कर देगा। प्रथम स्थान प्राप्त होने पर कोई सम्मान या पुरस्कार न मिले तो विद्यार्थी आगे सब कुछ भूल जाने की कोशिश करता है।

(xiv) साहचर्य एवं सहसम्बन्ध का अभाव- पाठ्य सामग्री में यदि साहचर्य एवं सहसम्बन्ध का प्रयोग न किया जावे तो निश्चय है कि बालक भूलता है। ये एक प्रकार के अभिप्रेरक होते हैं।

(xv) थकान का प्रभाव- शरीर थक जाने से मस्तिष्क भी शिथिल हो जाता है और थकान की दशा में स्मरण की गई वस्तु विस्मृत हो जाती है।

विस्मरण का निराकरण

मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के निष्कर्ष से हमें कुछ उपाय मिले हैं जिनके प्रयोग से हम विस्मरण का सुधार कर सकते हैं। ये उपाय निम्नलिखित हैं-

(i) स्मरण करने से अवधान को केन्द्रित किया जावे जिससे धारण करने में सहायता मिले।

(ii) स्मरण करते समय लय और पाठ का ख्याल रखा जाये।

(iii) साहचर्य एवं सहसम्बन्ध के साथ अध्ययन हो जिससे स्मृति में चीजें अच्छी तरह आ जावें।

(iv) पाठ्य सामग्री को विभाजित करके समयानुसार सरण किया जावे ताकि उसकी प्रतिमा मस्तिष्क में अच्छी तरह बन जाय।

(v) थकान दूर करने के लिए विश्राम एवं भोज्य-पेय पदार्थ का प्रयोग यथावश्यकता होवे।

(vi) समय-समय पर दोहराने की क्रिया भी चलती रहे जिससे स्थायी रूप से स्मरण हो सके।

(vii) चिन्तन-मनन-संकल्प विश्वास के साथ स्मरण किया जावे।

(viii) मनोवैज्ञानिक विधियों से स्मरण की क्रिया पूरी की जावे ।

(ix) स्मरण करने वाली सामग्री को रोचक एवं उपयोगी बनाया जावे।

(x) संवेगात्मक उत्तेजना एवं धक्के से व्यक्ति को बचाया जावे।

(xi) मानसिक रोग, शारीरिक रोग, मानसिक द्वन्द्व आदि को दूर किया जाये ।

(xii) विद्यालय, कक्षा, गृह का वातावरण स्मरण करने में सहायक हों।

विस्मरण की उपयोगिता

विस्मरण की उपयोगिता निम्न ढंग से पाई जाती है-

(i) इससे पुराने अनुभव के स्थान पर नए अनुभव अर्जित होते जाते हैं।

(ii) इससे जीवन के दुःख एवं भार से मुक्ति प्राप्त होती है।

(iii) इससे केवल उपयोगी चीजों को चुनने में सहायता शक्ति मिलती है।

(iv) निरर्थक व मूल्यहीन चीजों को धारण करने में शक्ति नहीं खर्च होती है।

(v) स्मरण-विस्मरण में सन्तुलन योग्यता से शिक्षा का कार्य पूरा होता है।

(vi) बुरी चीजों को भूलना जीवन को सुधारने के लिए अच्छा होता है।

अधिगम शिक्षा एवं स्मरण-विस्मरण

अधिगम शिक्षा की प्रमुख प्रक्रिया है और अधिगम के साथ स्मरण-विस्मरण की भी प्रक्रिया जुड़ी रहती है। अधिगम से हम अनुभव प्राप्त करते हैं, स्मरण से अनुभव के संस्कार मिलते हैं और विस्मरण से संस्कार मिट जाते हैं। शिक्षा की प्रक्रिया के अन्तर्गत अधिगम, स्मरण और विस्मरण की प्रक्रिया शामिल पाई जाती है। शिक्षा और अधिगम के साथ स्मरण-विस्मरण की प्रक्रिया का स्वाभाविक और अविच्छेद सम्बन्ध पाया जाता है। प्रो० वुडवर्थ ने लिखा है कि “स्मृति अधिगम, धारण, पुनःस्मरण और प्रत्यभिज्ञान करने में पाई जाती है। इससे शिक्षा में स्मरण-विस्मरण का महत्वपूर्ण स्थान पाया जाता है।

स्मरण के आधार पर व्यक्ति की भी पहचान होती है। व्यक्तिगत निर्माण में स्मरण- विस्मरण के द्वारा सहायता मिलती है। इससे यह संकेत मिलता है कि स्मरण-विस्गरण का शैक्षिक महत्व व्यक्ति के पहचान के विचार से होता है।

शैक्षिक सुधार, निर्देशन एवं संगठन में शिक्षक को यह ध्यान देना पड़ता है कि किसी स्मृति कैसी है और उसे क्या पढ़ाया जाए तथा कैसे पढ़ाया जाए। किसी अधिक भूलने वाले बालक को थोड़ा-थोड़ा पढ़ाया जावे, अधिक स्मरण रखने वाले को अधिक काम दिया जावे। अतएव शिक्षा एवं शिक्षण विधि की दृष्टि से स्मरण-विसरण का महत्व मिलता है। स्मरण-विस्मरण पर बालक की शैक्षिक सफलता स्मरण-विस्मरण अधिगम का एक उत्पाद्य कहा गया है।

स्मृति और प्रशिक्षण- स्मृति के अंगों को देखने से ज्ञात होता है कि स्मृति पर प्रशिक्षण का प्रभाव पड़ता है। प्रशिक्षण निर्देशित रूप से स्मरण करने की क्रिया है। इसमें व्यवस्थित ढंग से स्मरण का अभ्यास कराया जाता है। जैसे मौखिक गणित के द्वारा सिद्धान्तों को स्मरण कराया जाता है। भाषा में पद्य या गद्य के अंशों की पुनरावृत्ति करायी जाती है, यह भी एक प्रकार का प्रशिक्षण है अतएव प्रशिक्षण के द्वारा स्मृति में उन्नति अवश्य होती है।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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