शिक्षाशास्त्र / Education

अन्तःदृष्टि अथवा सूझ सिद्धान्त की शैक्षणिक उपयोगिता | Educational Implications of the Theory of Insightful Learning in Hindi

अन्तःदृष्टि अथवा सूझ सिद्धान्त की शैक्षणिक उपयोगिता

अन्तःदृष्टि अथवा सूझ सिद्धान्त की शैक्षणिक उपयोगिता | Educational Implications of the Theory of Insightful Learning in Hindi

अन्तर्दृष्टि सिद्धान्त ने कुछ निम्न महत्त्वपूर्ण तथ्यों को प्रकाश में लाने की चेष्टा की-

(a) सम्पूर्ण अपने अंश अथवा अवयवों से महत्त्वपूर्ण होता है अंतः परिर्थिति का समग्र रूप में प्रत्यक्षीकरण किया जाना चाहिए।

(b) बिना सोचे समझे ऊल-जलूल प्रयत्न करते हुए उन्हें सुधार कर सफलता प्राप्त करना ठीक नहीं है। सीखने वाले को परिस्थिति का समग्र रूप में अध्ययन कर अपनी मानसिक शक्तियों का पूर्ण उपयोग कर नये प्रतिमान और संबंध खोज निकालने का प्रयत्न करना चाहिए ताकि समस्या का अन्तर्दृष्टि द्वारा कोई बौद्धिक हल सुझ सके।

(c) सीखने में लक्ष्य की स्पष्टता और अभिप्रेरणा (Motivation) एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

शिक्षा के क्षेत्र में इस सिद्धान्त ने इस प्रकार के काफ़ी क्रांतिकारी विचारों को जन्म दिया है। मोटे तौर पर निम्न बातों की प्रेरणा इस सिद्धान्त के माध्यम से प्राप्त हो सकती है-

(a) जब कोई वस्तु पढ़ाई जाए अथवा उसे सीखने के लिए कहा जाए तब उसे अपने समग्र रूप में ही बच्चों के सामने प्रस्तुत किया जाना चाहिए। फूलदार पौधे के भाग अथवा फूल के विभिन्न भागों का ज्ञान कराते समय अध्यापक को प्रारम्भ में भागों का अलग-अलग रूप से ज्ञान नहीं कराना चाहिए बल्कि पौधे अथवा फुल को अपने समग्र रूप में प्रस्तुत कर उसकी सम्पूर्णता से परिचित करा कर ही भागों का अलग-अलग रूप से विश्लेषण करना चाहिए। इसी प्रकार गणित की किसी समस्या को हल करने के लिए समस्या अपने समग्र रूप में बच्चे के सामने रखी जानी चाहिए। फिर सम्पूर्ण समस्या का मनन तथा विश्लेषण करके ही उसे हल करने का प्रयत्न करना चाहिए। इसी प्रकार भाषा सीखने में भी शब्दों से पहले वाक्यों का और अक्षरों से पहले शब्दों का ज्ञान कराया जाना चाहिए।

(b) पाठ्यक्रम के निर्माण तथा पाठ्यक्रम के संगठन में गैस्टाल्ट सिद्धान्त का पालन किया जाना चाहिए। किसी भी विषय को बिखरे हुए प्रकरणों अथवा तथ्यों का संग्रह मात्र ही नहीं बनाया जाना चाहिए। सारा विषय एक इकाई के समान प्रतीत हो, ऐसा प्रयत्न किया जाना चाहिए। इसी प्रकार विभिन्न विषयों तथा क्रियाओं से युक्त पाठ्यक्रम में पर्याप्त संगठन और एकता के तत्त्व दिखाई देने चाहिए।

(c) किसी भी कार्य को सिखाने से पहले उससे होने वाले लाभों तथा उद्देश्यों का स्पष्ट ज्ञान आवश्यक है। साथ ही अभिप्रेरणाओं को पूरा-पूरा स्थान देने का प्रयत्न भी किया जाना चाहिए। बच्चों में सीखने की इच्छा तथा रुचि पर्याप्त मात्रा में बनी रहे, इस बात के लिए पूरे प्रयत्न करते रहने चाहिए।

(d) सूझ सिद्धान्त का सबसे बड़ा योगदान सीखने की प्रक्रिया में बौद्धिक शक्तियों को अपना उचित स्थान दिलाने को लेकर है। प्रयास एवं त्रुटि विधि ने सीखने को मात्र यांत्रिक क्रिया बना दिया था । बिना सोचे समझे उल्टे-सीधे प्रयत्न करके सीखने में परिश्रम तथा समय का जो अनावश्यक अपव्यय हो रहा था, उसे समाप्त करने में इस सिद्धान्त ने बहुत सहायता की। मनुष्य दूसरे प्राणियों की अपेक्षा अधिक सूझ-बूझ वाला प्राणी है, अतः उसे ऊल-जलूल प्रयत्न करके सीखना शोभा नहीं देता। उसे अपनी मस्तिष्क की शक्तियों का प्रयोग करना चाहिए और इसी बात को ध्यान में रखकर अन्तर्दृष्टि सिद्धान्त ने मानव को अपनी शक्तियों का उचित उपयोग करना सिखाया ताकि वह अपनी समस्याओं का बौद्धिक हल खोज सके।

इस प्रकार रटे-रटाये ज्ञान को ग्रहण करने अथवा दूसरे के बनाये रास्ते पर चलने की अपेक्षा अपना मार्ग स्वयं ढूंढ कर ज्ञान की स्वयं खोज करने पर इस सिद्धान्त ने बल दिया तथा इस प्रकार के विचारों ने शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तनों को जन्म दिया| रटने पर जोर देने वाली अथवा मानसिक शक्तियों का प्रयोग न कर गत्यात्मक क्रियाओं पर आधारित विधियों के स्थान पर आधुनिक वैज्ञानिक विधियों जैसे खोज विधि (Heuristic Method), विश्लेषण विधि (Analytic Method), समस्या समाधान विधि (Problem Solving Method) आदि को जन्म देने का श्रेय सूझ सिद्धान्त को ही है।

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Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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