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परीक्षण की विश्वसनीयता जाँचने की विधियाँ | Methods of Verifying Test Reliability in Hindi

परीक्षण की विश्वसनीयता जाँचने की विधियाँ | Methods of Verifying Test Reliability in Hindi

परीक्षण की विश्वसनीयता जाँचने की विधियाँ

परीक्षण की विश्वसनीयता जाँचने की मुख्यतः चार प्रविधियाँ हैं-

(1) परीक्षण पुनर्परीक्षण विधि (Test Re-test Method)

(2) विकल्प या समानान्तर प्रतिरूप विधि (Alternate of Parallel Form Method)

(3) अर्ध-विच्छेद विधि (Split Half Method)

(4) युक्ति-युक्त पद-साम्य विधि (Method of Rational Equivalence)

(1) परीक्षण पुनर्परीक्षण विधि (Test Re-test Method)—

यह विधि फलांको को दो सुचियों में पारस्परिक साम्य ज्ञात करने की सरलतम विधि है। कुछ समय के बाद उन्हीं विद्यार्थियों पर प्रशासित करके उनके फलांक लिख लिये जाते हैं। कुछ समय के बाद उन्हीं  विद्यार्थियों पर पुन: परीक्षण किया जाता है और उनके फलांक लिख लेते हैं तदुपरान्त प्रथम निरीक्षण एवं पुनः परीक्षण में प्राप्त फलांकों की इन दो श्रेणियों में सह-सम्बन्ध ज्ञात कर लेते हैं। यदि यह सह सम्बन्ध काफी अधिक है तो परीक्षण विश्वसनीय है, अन्यथा नहीं। इस विधि की भी  सीमायें हैं जैसे –

(i) यदि परीक्षण का तत्काल पुनर्परीक्षण किया जाय तो अनेक परीक्षार्थी अपने प्रथर्प परीक्षण के उत्तरों का प्रत्यास्मरण कर लगे एवं जिन प्रश्नों को उन्होंने प्रथम परीक्षण में सही नहीं किया था उनका उत्तर सोचने में समय व्यतीत करेंगे और इस प्रकार उनके फलांक में वृद्धि हो जायेगी। अभ्यास, परीक्षण से पूर्व परिचय, विश्वास के कारण भी फलांकों में वृद्धि होगी।

(ii) इसी प्रकार यदि प्रथम एवं पुनर्परीक्षण में मध्यान्तर काफी अधिक छः माह या उससे अधिक हो और विशेषकर परीक्षार्थी कम आयु के बालक हों तो शारीरिक वृद्धि के कारण उनके फलांकों में वृद्धि हो जायेगी।

अतः इस प्रकार की विधि का प्रयोग करने में समय पर्याप्त देना चाहिए। न बहुत ज्यादा, न बहुत कम एक या दो माह का समय उचित है। पर ऊपर बताये गये परिवर्तियों या प्रभावी तत्वों के समय का कितना हो ध्यान क्यों न रखा जाय, पूर्ण रूप से निस्सारित (Eliminate) नहीं किया जा सकता। अतः परीक्षण पुनर्परीक्षण विधि भी विश्वसनीयता के मापन की सर्वोत्तम विधि नहीं है।

(2) विकल्प या समानान्तर प्रतिरूप विधि (Alternate of Parallel Form method)—

यह विधि उन्हीं परिस्थितियों में काम आती है जब परीक्षण के दो प्रतिरूपों को संरचना सम्भव हो और दो प्रतिरूप विकल्प या समानान्तर तभी हो सकते हैं जब दोनों में विषय- वस्तु समान हो, दोनों के प्रश्न समान कठिनाई के हों और उनका रूप एक हो। दो प्रतिरूप बनाय जाने के बाद एक ही समूह पर कुछ समय के अन्तर से इन दोनों समानान्तर प्रतिरूपों को प्रशासित कर लेते हैं। इसके बाद दोनों के प्राप्त फलाकों में सह-सम्बन्ध ज्ञात करते हैं। यदि यह सह-सम्बन्ध गुणांक काफी उच्च है तो परीक्षण विश्वसनीय समझा जाता है। इस विधि की भी निम्न परिसीमायें है –

(i) इस प्रकार से विश्वसनीयता गुणांक ज्ञात करने में भी अभ्यास, समानान्तर स्मरण आदि का प्रभाव पड़ता है। अतः दो प्रतिरूपों के प्रशासन के बीच लगभग इतना समय देना चाहिए कि इन प्रभावों से बचा जा सके। लगभग दो से लेकर चार सप्ताह तक का समय सर्वश्रेष्ठ है।

(ii) दो प्रतिरूप बनाते समय यह अत्यन्त कठिन कार्य है कि दोनों प्रतिरूपों में विषय-वस्तु एवं कठिनाई के स्तर को समान रखा जा सके।

(3) अर्द्ध-विच्छेद तिथि (Split Half Reliability)-

इस विधि के अनुसार सबसे प्रथम चरण परीक्षण को दो समानान्तर भागों में बाँट लेते हैं तत्पश्चात् इन दोनों भागों को परीक्षार्थियों ने एक ही समूह पर अलग-अलग प्रशासित करते हैं। इन दोनों अर्द्ध-परीक्षणों में इस प्रकार अलग अलग फलांक आ जाते हैं। इनके बीच सह-सम्बन्ध ज्ञात कर लिया जाता है। यह सह-सम्बन्ध अर्द्ध-परीक्षण का यह सम्बन्ध हुआ।

परीक्षण को दो समान भागों में बाँटने को अनेक विधियाँ हैं। इनमें सबसे अधिक प्रचलित विधि यह है कि सम (Odd) तथा विषम, (Evin) पदों को अलग-अलग कर लिया जाय जैसे एक भाग में 1, 3, 5, 7, 9 आदि क्रम वाले पद लिख लिये जायें तथा दूसरे भाग में 2, 4, 6, 8, 10, 12 आदि क्रम वानं पद। एक अन्य विधि में प्रारम्भ के आधे पदों को यहाँ एक में तथा अन्त के आधे पदों को दूसरे भागों में लिख लेते हैं। यदि प्रश्न-पद कठिनाई के हिसाब से आरोही क्रम में लिखे हों तो सम-विषम विधि (Odd-Even Method) ही सर्वश्रेष्ठ है।

अर्द्ध-विच्छद विधि उस परिस्थिति में उपयुक्त होती है जब परीक्षण के दो समानान्तर प्रतिरूपों की संरचना करना सम्भव न हो या जब परीक्षण पुनर्परीक्षण विधि भी प्रयुक्त न की जा सकें जैसा कि निष्पादन परीक्षण, व्यक्तित्व, अभिवृत्ति या रुचि परीक्षाओं में प्रक्षेपण परीक्षाओं में भी परीक्षण पुनर्परीक्षण विधि का प्रयोग सम्भव नहीं है। अर्द्ध-विच्छेद विधि का मुख्य गुण यह है कि इसमें विश्वसनीयता की गणना के लिए सभी आवश्यक तत्व एक ही अवसर पर प्राप्त हो जाते हैं। उनमें मुक्ति मिल जाती है। इस विधि की भी निम्न परिसीमाएँ हैं-

(i) इसमें परीक्षण के प्रत्येक अर्द्ध भाग का एक ही बार प्रशासन होता है। अतः दोनों अर्द्ध-भहैं- के फलाकों पर देंव त्रुटियां (Chance-Error) का एक-सा प्रभाव पड़ता है।

(ii) परीक्षण को अनेक विधियों से अर्द्ध-विच्छेद किया जा सकता है और अलग-अलग विधि से अर्दध-विच्छेद किये जाने पर विश्वसनीयता गुणांक भी अलग-अलग आता है। इस प्रकार प्राप्त गुणांक एक अनन्य मूल्य (Unique Value) नहीं है।

(4) युक्ति-युक्त पद-साम्य विधि (Method of Rational Equivalence) –

इस विधि में प्रश्न पदों के आपसी सह सम्बन्ध को ज्ञात कर उनमें पद साम्य देखा जाता है।

(5) वैधता (Validity)— वैधता किसी भी परीक्षण का एक अत्यन्त आवश्यक गुण है, क्योंकि जब तक कोई परीक्षण वैध नहीं है वह उपयोगी नहीं हो सकता। Green. Jorenson तथा Genberich के अनुसार वैधता का अर्थ यह कार्य कुशलता है जिससे कि कोई परीक्षण उस तथ्य का मापन करता जिसके लिए वह बनाया गया है।

यदि परीक्षण इस उद्देश्य की पूर्ति न करे तो वह विद्यार्थियों के लिए अन्याय होगा। वैधता में यह बात सम्मिलित है कि परीक्षण जिन विद्यार्थियों के लिए बनाया जाय, वह उनको बौद्धिक परिपक्वता के अनुरूप हो। नवीं और दसवीं कक्षा के परीक्षार्थियों के लिए बनाया गया परीक्षण  पाँचवीं तथा छठवीं कक्षा के विद्यार्थियों के लिए अनुपयुक्त होगा। इस प्रकार वैधता एक अच्छे परीक्षण का विशिष्ट गुण हैं न कि सामान्य, क्योंकि एक परिस्थिति के लिए बनाया गया परीक्षण दूसरी परिस्थिति में अवैध होगा। किसी भी परीक्षण को सामान्यतः वैध या अवैध नहीं कहा जा सकता।

चौक यह बिल्कुल अव्यावहारिक है कि हम सभी तथ्यों तथा घटनाओं का मापन कर सके मापन योग्य व्यवहार का कार्ड न्यादर्श (Sample) लेना आवश्यक हो जाता है। जिस सीमा तक न्यादर्श को मापन करने वाला एक दिया हुआ उपकरण या परीक्षण उस न्यादर्श का वास्तव में मापन करता है। इस उसकी वैधता कहते हैं और यह दो प्रकार से ज्ञात हो सकती है। तार्किक विधि से या सांख्यिकीय विधि से और यह दो प्रकार से ज्ञात हो सकती है किन्तु दोनों ही विधियों में वैधता के निर्धारणों के लिए हमें किसी कसौटी का चुनाव करना पड़ता है। इसीलिए गुलीक्सन (Guliksen) ने वैधता की परिभाषा इस प्रकार दी है-

It is the correlation of the Test with some Criterion.” अर्थात् वैधता का अर्थ  किसी कसौटी के साथ परीक्षण का सह-सम्बन्ध। किसी भी परीक्षण का वैधता का गुणांक समय- समय पर और स्थान- स्थान पर बदल सकता है। अतः यह परीक्षण का कोई निश्चित या एकात्मक पहलु गुण नहीं है। परीक्षण के जितने नये उपयोग निकलते हैं उतने ही नये वैधता गुणांक भी निर्धारित किये जा सकते हैं। इससे ज्ञात होता है कि कोई वैधता गुणांक किसी निश्चित समय पर किसी निश्चित समुह पर मापन करने के अर्थों में हो प्रयुक्त होता है। एनस्तासी के अनुसार-

“The Question of test validity concerns what the test measures and how well it does so.”

कोई परीक्षण तभी वैध होगा जबकि वह विश्वसनीय होगा यदि किसी परीक्षण का विश्वसनीयता गुणांक शून्य है तो यह किसी परीक्षण के साथ-साथ सह-सम्बन्धित नहीं होगा। फ्रीमन के अनुसार-

The first necessary condition of a valid test is that it has an adequate degree of reliability. If the reliability coefficient of a test is zero. it cannot correlate with anything. A test that correlates poorly even with itself cannot correlate with a measure of another variable.”

वैधता अनेक प्रकार की होती है पर अनेक मनोवैज्ञानिक लेखक एकमत नहीं हैं। इसके प्रकार निम्न हैं-

(1) विषय-वस्तु या पाठ्यक्रमात्मक वैधता (Content of Curricular validity)।

(2) रूप या अनेक वैधता (Face Validity) |

(3) तर्क संगत वैधता (Logical Validity) |

(4) अन्वय वैधता (Construct Validity )

(5) अवयव वैधता (Factorial Validity)।

(6) समवर्ती वैधता (Concurrent Validity )

(7) पूर्वकथनात्मक वैधता (Predictive Validity ) ।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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