इतिहास / History

औरंगजेब की मराठा नीति | औरंगजेब की दक्षिण नीति | औरंगजेब की दक्षिण नीति के उद्देश्य | औरंगजेब की दक्षिणी नीति के परिणाम

औरंगजेब की मराठा नीति | औरंगजेब की दक्षिण नीति | औरंगजेब की दक्षिण नीति के उद्देश्य | औरंगजेब की दक्षिणी नीति के परिणाम

औरंगजेब की मराठा नीति

औरंगजेब एक साम्राज्यवादी शासक था। उत्तरी भारत को त्रस्त करने के पश्चात् औरंगजेब ने दक्षिण विजय की योजना बनाई। उसकी दक्षिण विजय मुगल साम्राज्य के लिए अत्यन्त अहितकर सिद्ध हुई। उसकी दक्षिण नीति पूर्णतया असफल रही और मुगल साम्राज्य का पतन का एक कारण बनी । संयोग से औरंगजेब का देहान्त भी दक्षिण में ही हुआ। इसी कारण विन्सेण्ट स्मिथ ने लिखा है, “दक्षिण में औरंगजेब के यश और शरीर दोनों की ही समाधि बनी।”

दक्षिण नीति के उद्देश्य

औरंगजेब की दक्षिणी नीति के निम्नलिखित उद्देश्य थे-

(1) शिया राज्यों को समाप्त करना- औरंगजेब जहाँ एक ओर साम्राज्यवादी था वहीं दूसरी ओर कट्टर सुन्नी भी था। उसमें धार्मिक संकीर्णता बहुत अधिक मात्रा में विद्यमान थी अतएव उसको दक्षिण विजय का उद्देश्य बीजापुर और गोलकुण्डा के शिया राज्यों का उन्मूलन करना था। औरंगजेब जितना अधिक राजनीतिक कारणों से प्रभावित था उतना अधिक धार्मिक कारणों से भी प्रभावित था।

(2) मराठों का दमन- औरंगजेब की दक्षिण विजय का दूसरा उद्देश्य मराठों का दमन करना था। मराठे दक्षिण में अत्यन्त प्रबल हो गये थे और वे उसके लिए सर दर्द बने हुए थे।

(3) अकबर के विद्रोह का दमन- औरंगजेब का पुत्र अकबर विद्रोही हो गया था और उसने दक्षिण जाकर विद्रोह प्रारम्भ कर दिया था। उसे अतिरिक्त अजीत हिंसा तथा दुर्गादास ने भी विद्रोह प्रारम्भ कर दिये थे।

दक्षिण नीति का प्रत्यक्ष रूप

(i) बीजापुर की विजय- बीजापुर मुगल साम्राज्य के दक्षिण में शिया राज्य था। इसकी स्थापना यूसुफ आदिलशाह ने की थी। औरंगजेब के काल में वहां का शासक सिकन्दर अली था। औरंगजेब इस राज्य के अस्तित्व को सहन न कर सका और 1685 ई० में उसने उस पर आक्रमण कर दिया। जैसे ही बीजापुर के सुल्तान को आक्रमण की सूचना मिली उसने गोलकुण्डा के सुल्तान से सन्धि कर ली तथा मरहठों से सहायता मांगी। औरंगजेब ने एक शक्तिशाली सेना के साथ बीजापुर को घेर लिया। औरंगजेब स्वयं ही युद्ध का नेतृत्व कर रहा था। बीजापुर व औरंगजेब की सेनाओं में भीषण युद्ध हुआ। रसद की कमी के कारण तथा महामारी और अकाल के कारण बीजापुर की सेना के सैनिक काफी संख्या में मर गये और अन्त में बीजापुर के दुर्ग के रक्षकों को 1686 ई० में औरंगजेब को आत्म-समर्पण करने के लिए विवश होना पड़ा। वीजापुर को औरंगजेब ने मुगल-साम्राज्य में मिला लिया तथा वहाँ के शासक सिकन्दर शाह को एक लाख वार्षिक पेंशन देकर दौलताबाद के दुर्ग में भेज दिया। इस प्रकार दक्षिण का बीजापुर राज्य मुगल-साम्राज्य में आ गया और वहाँ के आदिलशाही वंश का अन्त हो गया।

(ii) गोलकुण्डा विजय- बीजापुर के पश्चात् अब उसकी दृष्टि गोलकुंडा की ओर गई। इस समय गोलकुंडा में अबुल हसन का शासन था। वह एक विलासी, अयोग्य व निकम्मा था। अत: वहाँ को आन्तरिक दशा अत्यन्त खराब थी। बीजापुर की तरह गोलकुंडा में भी शिया राज्य और शियाओं से घृणा होने के कारण औरंगजेब का वहाँ आक्रमण करना, उसकी धार्मिक कट्टरता का कारण था। गोलकुंडा के सुल्तान ने औरंगजेब के विरुद्ध बीजापुर के सुल्तान की सहायता की थी। और वह मरहठों की भी सहायता कर रहा था उसने सारा राजकार्य अदन्ना और मदन्ना नामक दो ब्राह्मणों के हाथों में दे रखा था। यह भी औरंगजेब को असह्य था। इस कारण औरंगजेब ने गोलकुंडा को भी मुगल साम्राज्य में मिलाने का निश्चय किया। एक विशाल सेना के साथ उसने गोलकुंडा के किले को 1687 ई० में घेर लिया और वहाँ पर विजय प्राप्त कर ली। फिर गोलकुंडा के अफसर अब्दुल्ला, के शासक अबुल हसन को भी 50,000 की वार्षिक पेंशन देकर दौलताबाद के दुर्ग में रख दिया गया। इस प्रकार गोलकुंडा भी मुगल साम्राज्य के अन्तर्गत आ गया। अब दोनों शिया राज्यों पर औरंगजेब का अधिकार हो गया।

(iii) मरहठों के साथ युद्ध- औरंगजेब के लिए सम्पूर्ण भारत पर एकछत्र अधिकार स्थापित करने के लिए मरहठों से लोहा. लेना अनिवार्य था। बिना मरहठों पर विजय प्राप्त किये वह सम्पूर्ण भारत का एकछत्र सम्राट नहीं बन सकता था। इसके अतिरिक्त दक्षिण में औरंगजेब के विरुद्ध मराठे अपनी शक्ति बहुत बढ़ा रहे थे। महाराष्ट्र विद्रोहियों का शरण-स्थल था। औरंगजेब के विद्रोही पुत्र अकबर ने तथा दुर्गादास और अजीत सिंह ने भी यहीं शरण ली थी। मुगल साम्राज्य पर छापा मारने की नीति ने शिवाजी को औरंगजेब का कट्टर शत्रु बना दिया था। शिवाजी ने सर्वप्रथम औरंगजेब के मामा शाइस्ता खाँ के डेरे पर छापा मारने की नीति के पश्चात् उसे भगाया। इससे औरंगजेब के क्रोध की सीमा न रही और 1633 ई० में राजा जसवन्त सिंह के नेतत्व में उसने एक सेना भेजी। परन्तु मरहठों पर विजय प्राप्त करने में यह सेना भी असफल रही। मरहठे औरंगजेन के लिए एक बहुत ही बड़ी समस्या बन गये। औरंगजेब ने दिलेरखा तथा अम्बर के राजा जयसिंह को शिवाजी के विरुद्ध भेजा। दिलेर खाँ और जयसिह ने शिवाजी के अनेक दुर्गों पर अपना अधिकार कर लिया। शिवाजी को विवश होकर पुरन्दरपुर नामक स्थान पर सन्धि करनी पड़ी। शिवाजी ने अपने अनेक दुर्गों को मुगलों को सौंप दिया। दिल्ली जाने पर शिवाजी को औरंगजेब ने कैद कर लिया। शिवाजी अत्यन्त चालाक तो थे ही, उन्होंने एक युक्ति सोची। फलों और मिठाइयों के टोकरों में वह अपने को व अपने पुत्र को छिपाकर वहां से भाग निकले। नौ महीने के बाद वह फिर से अपनी राजधानी में आ गये। उन्होंने अपनी नीति नहीं छोड़ी। पुनः लूट-मार करना प्रारम्भ कर दिया और कोनकन तथा अन्य बहुत से स्थानों पर पुनः अधिकार कर लिया। 1666 ई० में औरंगजेब को विवश होकर पुनः शिवाजी से सन्धि करनी पड़ी और शिवाजी को औरंगजेब ने राजा मान लिया। पाँच वर्ष तक शान्ति रही। परन्तु 1671 ई० में औरंगजेब ने शिवाजी को पुनः कैद कर लेने का प्रयास किया। जैसे ही यह शिवाजी को पता चला तो उन्होंने फिर से लूटमार मचानी शुरू कर दी। शिवाजी ने दूसरी बार सूरत को लूटा तथा खानदेश और अन्य कई दुर्गों पर अपना अधिकार कर लिया। उन्होंने सारे महाराष्ट्र को स्वतन्त्र कर लिया। 1680 ई० में शिवाजी की मृत्यु हो गई।।

शिवाजी के पुत्र शम्भा जी का मुगलों से बराबर युद्ध चलता रहा। परन्तु शिवाजी के समान शुम्भा जी में योग्यता व कूटनीतिज्ञता न थी, अतः शम्भा जी को औरंगजेब ने कैद कर लिया और उसकी आँखें निकलवा लीं। अन्त में उसके टुकड़े-टुकड़े करके उसका मांस कुत्तों को खिला दिया। यह सब कार्य औरंगजेब की क्रूरता का परिचय देते हैं।

शिवाजी के दूसरे पुत्र राजाराम ने शम्भाजी के बाद मुगलों से युद्ध जारी रखा। औरंगजेब ने राजाराम के विरुद्ध एक सेना भेजी। राजाराम को भागकर कर्नाटक में जिन्जी के दुर्ग में शरण लेनी पड़ी। अन्त में 1686 ई० में मुगलों ने रायगढ़ को जीत लिया। परन्तु जब महराष्ट्र की जनता भी औरंगजेब से घृणा करती थी और मरहठों के युद्ध ने राष्ट्रीय युद्ध का रूप धारण कर लिया तब वे अपनी छापामार नीति से मुगलों को सदैव तंग करते रहे। औरंगजेब ने भी अपनी पूरी शक्ति को मरहठों के विरुद्ध लगाये रखा। औरंगजेब की सेना ने कर्नाटक में जिन्जी के दुर्ग को काफी समय तक घेरे रखा। परन्तु मरहठों ने अपना धैर्य न छोड़ा। अन्त में 1689 ई० में मुगलों ने जिन्जी के दुर्ग पर अधिकार कर लिया, पर राजाराम को न पकड़ पाये। राजाराम सतारा भाग गया और वहाँ जाकर मुगलों के विरुद्ध पुनः शक्ति संगठित करने लगा। औरंगजेब ने भी उनका पीछा न छोड़ा और सतारा पर आक्रमण कर दिया। इसी समय राजाराम परलोक सिधार गया।

राजाराम के पश्चात् राजाराम की पत्नी ताराबाई भी मुगलों से लोहा लेती रही। उसके काल में मरहठों की शक्ति अत्यधिक बढ़ गई। अहमदाबाद और मालवा तक उनके छापे पड़ने लगे 1703 ई० में मरहठों ने बरार पर छापा मारा और उसे खूब लूटा। 1707 ई० में गुजरात और बड़ौदा पर उनका छापा पड़ा। ताराबाई जीवन भर मुगलों से युद्ध करती रहीं और मुगलों की बार-बार पराजय होती रही। औरंगजेब ने अपने जीवन के अन्तिम दिनों में भी कूटनीति के द्वारा मरहठों में फूट डालने का प्रयास किया परन्तु उसमें भी उसे सफलता न मिल पायी।

औरंगजेब की दक्षिणी नीति के परिणाम

औरंगजेब ने अपनी महत्वाकांक्षा को पूर्ण करने के लिए जीवन भर दक्षिण में युद्ध करता रहा, परन्तु इन्हीं युद्धों ने उसका सर्वनाश भी कर दिया। डॉ० विन्सेण्ट स्मिथ ने लिखा है, ‘नेपोलियन कहा करता था कि सेन के फोड़े ने उसका सर्वनाश किया। दक्षिण के फोड़े ने औरंगजेब का नाश किया।

(1) मुगल साम्राज्य का विस्तार- उसकी दक्षिण नीति का मुख्य उद्देश्य था साम्राज्य विस्तार करना। अतः उसने बीजापुर तथा गोलकुण्डा को मुगल साम्राज्य के अन्तर्गत कर लिया।

(2) शिया राजाओं का अन्त- औरगजेब कट्टर सुन्नी मुसलमान था। शिया मुसलमानों से वह बहुत घृणा करता था। बीजापुर गोलकुण्डा पर अधिकार करके उसने वहाँ के शिया राजाओं को पेंन्शन देकर दौलताबाद भेज दिया। इस प्रकार शियाओं का प्रभुत्व समाप्त हो गया।

(3) दक्षिण की आर्थिक विपन्नता- दक्षिण में लगातार तीस वर्ष तक युद्ध की स्थिति बनी रही। परिणाम यह हुआ कि वहाँ की आर्थिक दशा बहुत ही खराब हो गई। इसके अतिरिक्त वहाँ कृषि की दशा बहुत ही खराब होने से राजकोष को काफी धक्का लगा।

(4) मुगलों के राजकोष की क्षति- मुगलों के दीर्घकाल तक युद्ध में लगे रहने के कारण धन-जन की काफी क्षति हुई। राजकोष रिक्त होता गया। आर० सी० मजूमदार के शब्दों में-

“The endless wars in the Deccan exhausted his treasury the Government turned bankrupt, the soldiers starving from arrears of pay mutinied….” -R. C. Majumdar.

(5) मुगलों की प्रतिष्ठा को धक्का- यद्यपि बीजापुर और गोलकुण्डा मुगल साम्राज्य के अन्तर्गत आ गये परन्तु मरहठों ने मुगलों को प्रतिष्ठा को काफी आघात पहुंचाया। औरंगजेब को बार-बार विफलता मिली जिससे उनको प्रतिष्ठा को धक्का लगा। मुगलों का प्राचीन गौरव नष्ट हो गया।

(6) मरहठों की शक्ति वृद्धि- औरंगजेब जब उत्तर के युद्ध में फँसा हुआ था तभी मरठे अपने शक्ति बढ़ा रहे थे। धीरे-धीरे वे अपनी शक्ति बढ़ाते रहे। बीजापुर और गोलकुण्डा के समाप्त होने पर तो उन्हें आगे बढ़ने का और अवसर मिल गया। अब वे संगठित होकर औरंगजेब से लड़ने लगे। इसके अतिरिक्त उन्होंने मरहठा राज्य का निर्माण किया। उसमें राष्ट्रीय भावना के आने से उनकी शक्ति बढ़ गयी

(7) राजपूताना की ओर से औरंगजेब की उदासीनता- दक्षिण में लगातार तीस वर्षों तक युद्ध में लगे रहने के कारण औरंगजेब राजपूताने की ओर बिल्कुल भी ध्यान न दे पाया और परिणाम यह हुआ कि वह मारवाड़ पर विजय न प्राप्त कर सका।

(8) साहित्य और कला का ह्रास- दक्षिणी नौति से मुगल काल के साहित्य और कला को बहुत क्षति पहुंची। औरंगजेब केवल युद्ध और सेना की ओर ही ध्यान दे सका। अतः साहित्य और कला की उन्नति का न होना स्वाभाविक था। यदुनाथ सरकार ने लिखा है, “सम्राट द्वारा प्रश्रय हटा दिए जाने के कारण कला और विद्वता का ह्रास हुआ। एक भी इमारत, सुलिखित पाण्डुलिपि अथवा कलापूर्ण चित्र और औरंगजेब के शासन काल की याद दिलाने के लिए नहीं है।

(9) अराजकता को बढ़ावा- दक्षिणी युद्धों ने साम्राज्य में अराजकता को बढ़ावा दिया। मरहठों की लूटमार ने साधारण लोगों को लूटमार करने व अराजकता फैलाने के लिये प्रोत्साहित किया। सुदूर के जमींदार स्वतन्त्र हो गए और अब वे भी मरहठों का साथ देने लगे तथा देश में अराजकता फैलने लगी।

(10) मुगल साम्राज्य का पतन- दक्षिण नीति के कारण मुगल साम्राज्य का पतन हुआ। दक्षिण में अधिक दिनों तक युद्धों में फंसे रहने के कारण औरंगजेब उत्तर में शासन की ओर बिल्कुल ध्यान न दे सका। सारी शासन-व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो जाने से प्रजा भी असन्तुष्ट रहने लगी। स्थान-स्थान पर छोटे-छोटे जमींदार व सरदार विद्रोह करने लगे। साम्राज्य की ढविशालता, उचित शासन व्यवस्था के अभाव में व्यर्थ सिद्ध हुई। औरंगजेब इतने विशाल साम्राज्य का शासन सम्भाल नहीं सका, अत: उसका पतनोन्मुख होना स्वाभाविक था। इस प्रकार उसकी दक्षिणी नीति का सबसे घातक परिणाम मुगल साम्राज्य का पतनोन्मुख होना था। मुगल साम्राज्य के विस्तार में ही उसका पतन निहित था। आर० सी० मजूमदार ने लिखा है-

“All seemed to have been gained by Aurangzeb now but in reality, all was lost.” -R. C. Majumdar.

इस प्रकार हम देखते हैं कि औरंगजेब की दक्षिणी नीति उसके लिये बहुत घातक सिद्ध हुई। नेपोलियन का यह मत पूर्ण समीचीन प्रतीत होता है।

“The Deccan ulcer ruined Aurangzeb.”

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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