शिक्षाशास्त्र / Education

शैक्षिक समाजशास्त्र | शिक्षा का समाजशान | शैक्षिक समाजशास्त्र की परिभाषा | शैक्षिक समाजशास्त्र का विषय-विस्तार

शैक्षिक समाजशास्त्र | शिक्षा का समाजशान | शैक्षिक समाजशास्त्र की परिभाषा | शैक्षिक समाजशास्त्र का विषय-विस्तार

शैक्षिक समाजशास्त्र

शिक्षाशास्त्र के विकास के साथ इसका भी विकास हुआ है। 19वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में शैक्षिक समाजशास्त्र के बारे में शिक्षाशास्त्रियों ने चिन्तन शुरू किया और आज बीसवी शताब्दी के इस चौथे चरण में इसका पर्याप्त विकास हो चुका है। भारत में विदेशों की अपेक्षा इसके विकास की गति धीमी है, फिर भी शिक्षाशास्त्र विषय के पढ़ने वालों की दृष्टि से शैक्षिक समाजशास्त्र का एक आवश्यक अंग है। प्रायः सभी विश्वविद्यालय पाठ्यक्रम में शिक्षाशास्त्र के अन्तर्गत शैक्षिक समाजशास्त्र का अध्ययन अनिवार्य रूप से होता है। अतः हमें इसके स्वरूप एवं इसकी परिभाषा पर विचार करना जरूरी है।

तात्पर्य

‘शैक्षिक समाजशास्त्र’ पद में शैक्षिक तथा समाजशास्त्र जैसे दो शब्द हैं जिसका सीधा अर्थ हुआ शिक्षा से सम्बन्धित समाजशास्त्र । शिक्षा से अभिप्राय सीखने सिखाने की क्रिया तथा तत्सम्बन्धी अनुभव और ज्ञान होता है। वास्तव में विद्यालय तथा समाज (जिसमें परिवार, समुदाय, जाति, राज्य आदि संस्थाएँ होती है) के क्षेत्र में मनुष्य जो कुछ अनुभव एवं ज्ञान सीखता-सिखाता है वही शिक्षा है। इसी से संबंधित समाजशास्त्र शैक्षिक समाजशास्त्र है। इस प्रसंग में हमें प्रो० ब्राउन के शब्द याद रखना चाहिए-

“शैक्षिक समाजशास्त्र व्यक्ति और समाज के पर्यावरण की अन्तक्रिया का अध्ययन होता है।”

यदि हम ‘समाजशास्त्र’ शब्द का अर्थ भी समझ लेवें तो शैक्षिक समाजशास्त्र का अर्थ हमें और स्पष्ट हो जावेगा। प्रो० जार्ज सिमेल ने लिखा है- “समाजशास्त्र मानवीय अन्तर्सम्बन्धों के रूप का विज्ञान है।”

उपर्युक्त कथन को ध्यान में रखकर हम इसका तात्पर्य स्पष्ट रूप से बता सकते हैं कि शैक्षिक समाजशास्त्र ऐसी स्थिति में शिक्षा के क्षेत्र में लगे विद्यार्थी एवं अध्यापक तथा समाज के लोगों (माता-पिता), प्रशासक, कार्यकर्ता आदि) के परस्पर व्यवहार आचरण, नियंत्रण, संगठन, संस्कार इत्यादि का व्यस्थित अध्ययन होता है।

शैक्षिक समाजशास्त्र तथा शिक्षा का समाजशास्त्र

शिक्षाशास्त्रियों ने दो पदों का प्रयोग किया है- (1) शैक्षिक समाजशास्त्र तथा (2) शिक्षा का समाजशास्त्र। यों तो साधारण रूप से दोनों में अन्तर नहीं दिखाई देता है परन्तु गहराई से विचार करने में दोनों पदों में भिन्नता बताई गई है। मुख्य अन्तर दृष्टिकोण में पाया जाता है। शैक्षिक समाजशास्त्र में शिक्षा पर बल दिया जाता है और शिक्षा के समाजशास्त्र में समाजशास्त्र पर बल दिया जाता है। तात्पर्य यह कि शिक्षा की प्रक्रिया में समाजशास्त्रीय तत्वों का ही अध्ययन करने से शिक्षा का समाजशास्त्र होता है। परन्तु यहाँ शिक्षा को स्वयं एक सामाजिक प्रक्रिया माना जाता है और उसे शैक्षिक परिप्रेक्ष्य में समझने समझाने की चेष्टा की जाती है। जिस पर मानवीय अन्तर्सम्बन्धों का प्रभाव पड़ता है वहाँ शैक्षिक समाजशास्त्र होता है। शिक्षा का समाजशास्त्र शिक्षा को सामाजिक व्यवस्था का एक अंग मानकर अध्ययन करता है, अतएव शिक्षा का महत्व समाज के महत्व से कम होता है अतएव शिक्षा का महत्व समाज के महत्व में घुला-मिला दिया जाता है। नीचे दोनों में भिन्नता दिखाई जा रही है-

शैक्षिक समाजशास्त्र

  1. शिक्षा की क्रिया, शिक्षार्थी एवं शिक्षक आधार होते हैं।
  2. शिक्षा की संस्था की समस्याओं के समाधान का प्रयत्न होता है।
  3. इसका अध्ययन शिक्षा शास्त्र के साथ होता है।
  4. समस्याओं के समाधान में शैक्षिक समाजशास्त्र औपचारिक एवं अनौपचारिक साधनों का प्रयोग करता है जिससे प्रायः मूलप्रवृत्यात्मक प्रयत्न महत्वपूर्ण होते हैं।
  5. इसका अध्ययन शिक्षा- शास्त्रियों द्वारा होता है।
  6. इसका लक्ष्य शिक्षा का विकास करना होता है।
  7. शैक्षिक समाजशास्त्र शैक्षिक परिप्रेक्ष्य में अध्ययन करता है, उसी पर बल देता है और निर्भर होता है।

शिक्षा का समाजशान

  1. समाज और उसकी संस्थाएँ आधार होती हैं।
  2. समाज की समस्याओं का समाधान शिक्षा के माध्यम से किया जाता है।
  3. शिक्षा के समाजशास्त्र का अध्ययन समाजशास्त्र के साथ होता है।
  4. समस्याओं के समाधान में शिक्षा का समाजशास्त्र अधिकतर वैज्ञानिक तक- नीकों का प्रयोग करता है। इससे मूल प्रवृत्यात्मक प्रयत्न की अपेक्षा वैज्ञानिक प्रयत्न अधिक होते हैं।
  5. शिक्षा समाजशास्त्र का लक्ष्य शिक्षा समाजशास्त्रियों द्वारा होता है।
  6. शिक्षा के समाजशास्त्र का लक्ष्य समाज का विकास करना होता है।
  7. शिक्षा का समाजशास्त्र समाज- शास्त्रीय परिप्रेक्ष्य में अध्ययन करता है, बल देता है, और निर्भर होता है।

परिभाषा

यहाँ पर हम कुछ विद्वानों के द्वारा दी गई परिभाषाओं को प्रस्तुत करेंगे और इन्हीं के आधार पर निष्कर्ष स्वरूप अपनी एक परिभाषा देवेंगे।

(1) प्रो० डेविड स्नेडीन- “शैक्षिक समाजशास्त्र का मुख्य क्षेत्र शैक्षिक लक्ष्यों का वैज्ञानिक निर्धारण होता है।”

(2) प्रो० अलविन गुड- “शैक्षिक समाजशास्त्र शिक्षा का वैज्ञानिक अध्ययन है जो सामाजिक समूहों में अच्छे ढंग से रहने के लिए सदस्यों द्वारा आवश्यक समझी जाती है।”

(3) प्रो० ई० जार्ज पेयन- “शैक्षिक समाजशास्त्र से हमारा अभिप्राय उस विज्ञान से है जो संस्थाओं. सामजिक समूहों पर सामाजिक सम्बन्धों का वर्णन एवं व्याख्या करता है जिनमें तथा जिनसे व्यक्ति अपने अनुभवों को प्राप्त और संगठित करता है।”

(4) प्रो० जे० एस० रूसेक- “इस प्रकार शैक्षिक समाजशास्त्र न तो शिक्षाशास्त्र है और न केवल समाजशास्त्र है; यह तो शिक्षाशास्त्र एवं समाजशास्त्र है; जब ये दोनों एक योगात्मक शैक्षिक प्रक्रिया के रूप में विचार में रखे जाते हैं।”

निष्कर्ष-

ऊपर की परिभाषाओं के आधार पर हम नीचे लिखी हुई परिभाषा निष्कर्ष रूप में निकाल सकते हैं-

“इसका समाज के जीवन से सम्बन्धित अनुभव एवं ज्ञान प्राप्त एवं प्रदान करने के संदर्भ में व्यक्तियों के अन्तर्सम्बन्धनों एवं संस्थाओं का व्यवस्थित अध्ययन होता है।”

शैक्षिक समाजशास्त्र का विषय-विस्तार

ऊपर के विचारों के आधार पर अब हम इस के विषय विस्तार को समझने का प्रयत्न कर सकते हैं। आज भी शैक्षिक समाजशास्त्र की पुस्तकों में इसका जो स्वरूप मिलता है उसमें भिन्नता पाई जाती है, फिर भी हम इसको एक निश्चित रूप देने का प्रयास करेंगे। इसके विषय-विस्तार में हम नीचे लिखी बातों को अध्ययन हेतु रख सकते हैं-

(i) शिक्षा समाजीकरण की प्रक्रिया के रूप में।

(ii) शिक्षा में व्यक्ति और समाज; दोनों का अन्तर्सम्बन्ध।

(iii) शिक्षा और समाज की संस्थाएँ-परिवार, जाति, समुदाय, राज्य, धर्म; इनके पारस्परिक सम्बन्ध एवं प्रभाव ।

(iv) शिक्षा एवं सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व्यवस्था।

(v) शिक्षा तथा सामाजिक संगठन और विघटन, एकीकरण व विभेदीकरण ।

(vi) शिक्षा और सामाजिक गतिशीलता, परिवर्तन, नगरीकरण, आधुनिकीकरण, तकनीकी एवं विज्ञान के प्रभाव।

(vii) शिक्षा और समाज की संस्कृति, परम्परा, प्रथा एवं मानवीय संस्कार।

(viii) शिक्षा और सामाजिक नियंत्रण, जनतंत्र, एकतंत्र, नेतृत्व, स्वतंत्रता और अनुशासन।

(ix) शिक्षा, राष्ट्रीयता, एवं अन्तर्राष्ट्रीयता।

(x) शिक्षा, जनसंख्या, अर्थ-व्यवस्था, नियोजन, रोजगार एवं बेरोजगारी ।

उपर्युक्त प्रसंगों का अध्ययन इस के विषय-विस्तार के अन्तर्गत होता है। इसके अलावा शिक्षा समाज के जीवन के लिए एक अनिवार्य साधन होती है और समाज के साथ अनुकूलन में पूर्ण योगदान करती है। वास्तव में शिक्षा समाज की रीढ़ होती है और समाज के लोग स्वस्थ जीवन के लिए इसे अपनाते हैं। इस दृष्टिकोण के कारण समाज के छोटे-छोटे सभी लोग अपने विकास के विचार से जैसा परस्पर सम्बन्ध रखते हैं एवं व्यवहार करते हैं, उनके बीच जो क्रियाएँ होती हैं, इन सभी तमाम चीजों का अध्ययन है।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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