शैक्षिक तकनीकी / Educational Technology

शिक्षा में तकनीकी का तात्पर्य | शिक्षा में तकनीकी का अर्थ | शिक्षा तकनीकी के प्रयोग के मुख्य सिद्धान्त | शिक्षा तकनीकी को प्रभावित करने वाले तत्व | शैक्षिक तकनीकी के प्रकार

शिक्षा में तकनीकी का तात्पर्य | शिक्षा में तकनीकी का अर्थ | शिक्षा तकनीकी के प्रयोग के मुख्य सिद्धान्त | शिक्षा तकनीकी को प्रभावित करने वाले तत्व | शैक्षिक तकनीकी के प्रकार | Meaning of technology in education in Hindi | Main principles of application of educational technology in Hindi | Factors affecting education technology in Hindi | Types of educational technology in Hindi

शिक्षा में तकनीकी का तात्पर्य

शैक्षिक तकनीकी के अन्तर्गत शिक्षा की तकनीकी और शिक्षा में तकनीकी दोनों आ जाते हैं। डॉ. जे. सी. अग्रवाल कहते हैं। “ऐसा करना एक भूल है। वास्तव में शैक्षिक तकनीकी इन दोनों रूपों को अपने में समाहित किये हुये है। विज्ञान और तकनीकी की प्रगति के फलस्वरूप ही शैक्षिक तकनीकी का विकास हुआ है”।

शिक्षा की तकनीकी एक व्यापक शब्द है। शिक्षा में तकनीकी की भाँति इसमें उपकरणों का प्रयोग तो सम्मिलित होता ही है, इसके आगे भी इससे शैक्षिक समस्याओं के समाधान और शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति और शैक्षिक प्रक्रिया के लक्ष्यों को पाने के लिए मनोविज्ञान द्वारा खोजे गये तकनीकों, सिद्धान्तों, प्रणालियों तथा विधियों आदि का लाभ लेने के लिये इन सब को व्यवस्थित करके इनका प्रयोग करना क्षेत्र में आता है। डॉ. अग्रवाल का कहना है कि शैक्षिक तकनीकी वास्तव में शिक्षा की तकनीकी हैं। यह एक प्रणली है जिसके द्वारा शिक्षा की सभी समस्याओं का पूरी तरह से विश्लेषण करके, सम्पूर्ण अधिगम प्रक्रिया को इस प्रकार से सुनियोजित, सुव्यवस्थित एवं नियन्त्रित किया जाता है, जिनसे सर्वोच्च परिणामों की प्राप्ति हो और शैक्षिक प्रक्रिया को अधिक को अधिक से अधिक प्रभावशाली बनाया जा सके। सारांशतः शिक्षा की तकनीकी का स्त्रोत मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक है, यह उपकरण तथा सिद्धान्तों पर ही आधारित हैं। इसमें सभी प्रकार के तकनीकी उपकरण, अभिक्रमित अध्ययन, सूक्ष्म अध्ययन शिक्षण प्रतिमान, व्यक्तिगत अध्ययन, टोली अथवा समूह अध्यापन आदि आते है।

शिक्षा में तकनीकी का अर्थ (Meaning of Technology in Education) –

इसका स्त्रोत पूर्णरूपेण वैज्ञानिक है और यह उपकरणों पर आधारित हैं। विज्ञान की प्रगति ने आज तकनीकी का इतना विकास कर दिया है कि वह सभी क्षेत्रों में छा सी गई है। इससे सभी क्षेत्रों का कार्य सरल हो गया, हैं शिक्षा में शिक्षण अधिगम के कार्य को भी इसने सरल बना दिया है। तमाम तरह के ऐसे उपकरण विकसित हो गये हैं जिनकी सहायता से सीखने का कार्य बहुत सरल हो गया है। हमें यहाँ शिक्षा में तकनीकी को जानना है। अतः कह सकते हैं कि नवीन वैज्ञानिक साधनों, उपकरणों मशीनों आदि का प्रयोग शिखा में करते हैं। तो यह शिक्षा तकनीकी है। इसमें हर प्रकार की  प्रक्षण सामग्री जैसे कि-दृश्य-श्रव्य सामग्री, संचार एवं सम्प्रेषाण साधन, जन-सम्पर्क माध्यम जैसे- रेडियों टेलीविजन, टेपरिकार्डर, शिक्षण मशीन, कम्प्यूटर आदि शामिल हैं। जि प्रकार अन्य क्षेत्रों जैसे कृषि उद्योग आदि क्षेत्रों में तकनीकी ने अपना चमत्कारी प्रभाव दिखाया है। उसी प्रकार शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षा में तकनीकी’ ने अपना चमत्कारी प्रभाव दिखाया है। जिससे शिक्षा के क्षेत्र में सभी जगह हलचल सी मच गई है।

सारांशतः कह सकते हैं कि ‘शिक्षा में तकनीकी’ के अन्तर्गत विज्ञान पर आधारित सभी प्रकार के उपागम (कठोर उपागम) आते है। जैसे कि आकाशवाणी, दूरदर्शन ओवर हैंड प्रोजेक्टर, प्रोजेक्टर, एपीस्कोप मायादीप टेपारिकार्डर, सी. डी. फिल्म्स, स्लाइड रिकार्डप्लेयर शिक्षण मशीन, संकणक मशीन अथवा कम्प्यूटर, स्लाइड प्रोजेक्टर, अपारदर्शी प्रक्षेपी, इण्टरनेट दूरभाष आदि यहाँ कोई छूट गए हैं तो।

शिक्षा तकनीकी के प्रयोग के मुख्य सिद्धान्त (Fundamental Principles of the use of Educational Technology)-

वाइट के दो मूल सिद्धान्त इन्हीं सिद्धान्तों पर शैक्षिक तकनीकी निर्भर है)। ये दो सिद्धान्त निम्नवत् उल्लेखित हैं-

  1. किसी भी शैक्षिक व्यवस्था के उद्देश्यों का इस प्रकार निर्धारण किया जाय जिससे कि छात्रों में व्यवाहारिक परिर्वतन आवे। इससे उनका जीवन सफल होगा।
  2. छात्रों में यदि अपेक्षित परिवर्तन नहीं होता है। तो समझना चाहिए कि पाठ्यक्रम का आयोजन ठीक नहीं है।

ऐसी दशा में छात्रों की त्रुटि नहीं हैं, शिक्षा तकनीकी व्यक्ति पर बल देती है, इसका सम्बन्ध शिक्षा के व्यक्तिकरण से है। सिर्फ पाठ्यक्रम को पूरा करना इसका उद्देश्य नहीं।

शिक्षा तकनीकी को प्रभावित करने वाले तत्व

(Factors Influencing Educational Technology)

शिक्षा तकनीकी प्रभावित करने वाले दो तत्व है- (1) मनोवैज्ञानिक आँकड़े और (2) दृश्य-श्रव्य सामग्री। इन दोनो तत्वों का विवेचना निम्नांकित हैं।

(क) मनोवैज्ञानिक प्रयोग पहले प्रयोगशालाओं तक ही सीमित रहते थे। लोग इसके लक्ष्यों और निष्कर्षों से मात्र अपने कुतूहल की शान्ति करते थे। आज ऐसा नहीं है, आज मनोविज्ञान में जो प्रयोग किये जाते हैं और जो आँकड़े तथा निष्कर्ष प्राप्त होते हैं। इनका प्रयोग अधिगम, अनुदेशन तथा प्रशिक्षण के क्षेत्र में किया जाता है। प्रयोग के निष्कर्षो का उपयोग कक्षाओं में पढ़ाते समय और शैक्षिक समस्याओं के समाधान में किया जाता है। मनोवैज्ञानिक प्रयोगों के निम्नांकित लाभ हैं-

  1. छात्रों को अपनी शक्ति के अनुसार सीखने का अवसर मिलता है। व्यक्तिगत भेदों पर ध्यान दिया जाता है।
  2. पूर्व जाना के आधार पर ज्ञान दिया जाता है।
  3. सीखने की परिस्थितियों पर नियन्त्रण रखा जाता है।
  4. छात्र सक्रिय रूप से सीखने हैं।
  5. अध्यापक की कुछ भूमिका का निर्वाह यन्त्र या अभिक्रमित सामक्रमित सामग्री के प्रयोग द्वारा किया जाता है।
  6. छात्र अभिक्रम की सहायता से सीखते है।

(ख) शिक्षा में दृश्य-श्रव्य सामग्रियों का प्रयोग बहुत पूर्व से किया जाता है, क्योंकि इसके अनेक लाभ हैं जो आसानी से सीखने में सहायता करते हैं। पहले के साधन सरल और जड़ थे, आज श्रव्य-दृश्य साधन मशीन रूपों में हमारे सामने है, ये यन्त्र रूप में है। जैसे टेलीविजन, कम्प्यूटर, टीचिंग मशीन, इण्टरनेट आदि।

बेट (Waite) कहते हैं कि इन नवीन उपकरणों को शिखा के सहायक साधन नहीं समझना चाहिए वरन् आज ये शिक्षा अनुभव प्रदान करने वाले साधन स्वयं बन गये हैं।

सारांशतः कह सकते हैं कि यह विज्ञान और तकनीकी का युग है। इस तकनीकी ने सभी क्षेत्रों को लाभान्वित किया है। जहाँ तक शिक्षा क्षेत्र की बात है, शैक्षिक तकनीकी ने अपनी सहायता से पूरे शिखा जगत का लाभान्वित किया है। कुलश्रेष्ठ का कहना है कि “शैक्षिक तकनीकी आज के तकनीकी युग में शिक्षक की उपादेयता बढ़ाती है, छात्रों व छात्राध्यपकों की प्रभावशाली विधि से सिखाती हैं और समाज के लिए ज्ञान के संचयन, प्रसार तथा विकास के लिए अत्यन्त उपयोगी है।

शैक्षिक तकनीकी के प्रकार (Kinds of Educational Technology)-

डब्लू. कैनेथ रिचमण्ड (1970) ने लिखा है कि- “शैक्षिक तकनीकी अधिगम की समुचित व्यवस्था से युक्त ऐसी परिस्थितियों के प्रस्तुतीकरण से सम्बन्धित होती है जो शिक्षण, प्रशिक्षण एवं उसके लक्ष्यों को दृष्टिगत रखते हुए अनुदेशन को अधिगम का सबसे उपयुक्त स्रोत बनाती है।” इस कथन से स्पष्ट हैं कि शैक्षिक तकनीकी मुख्य रूप से शिक्षण, व्यवहार एवं अनुदेशन से सम्बन्धित होती हैं। अतएव शैक्षिक तकनीकी के चार प्रकार निर्धारित होते है।

  1. शिक्षण नकनीकीं (Teaching Technology )
  2. व्यवहार तकनीकी (Behavioral Technology)
  3. अनुदेशन तकनीकी (Instructional Technology)
  4. अनुदेशन की रूपरेखा (Instructional Design)
शैक्षिक तकनीकी – महत्वपूर्ण लिंक

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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