वित्तीय प्रबंधन / Financial Management

पूँजी बजटन की प्रक्रिया | पूँजी बजटन की सीमाएं या कमियाँ

पूँजी बजटन की प्रक्रिया | पूँजी बजटन की सीमाएं या कमियाँ | Capital Budgeting Process in Hindi | Limitations or Drawbacks of Capital Budgeting in Hindi

पूँजी बजटन की प्रक्रिया

(Process of Capital Budgeting)

व्यावसायिक उपक्रमों में पूँजी बजटन की कोई सर्वमान्य विधि अथवा प्रक्रिया नहीं है। अलग-अलग उपक्रमों में पूँजी बजटन की विधि या प्रक्रिया अलग-अलग हो सकती है, परन्तु फिर भी बड़ी व्यावसायिक संस्थाओं में पूँजी बजटन की निम्नलिखित प्रक्रिया या विधि अपनायी जाती है।

(1) विनियोग प्रस्तावों का उद्गम (Origin of Investment Proposals) – पूँजी बजट के निर्माण में सबसे पहला कदम विनियोग प्रस्तावों के उद्गम से प्रारम्भ होता है। विनियोग प्रस्तावों का उद्गम प्रबन्ध के किसी भी स्तर पर हो सकता है। उदाहरण के लिये, उत्पादन प्रक्रिया में सुधार एवं विकास के लिये सुझाव किसी श्रमिक या फोरमैन से आ सकता है। कुछ प्रस्ताव उच्च प्रबन्ध द्वारा किये जा सकते है। जो प्रायः उत्पादन क्षमता को बढ़ाने अथवा नई वस्तुओं के उत्पादन की योजना के सम्बन्ध में होते हैं।

(2) प्रस्तावों का प्रस्तुतीकरण (Presentation of Proposals) – विनियोग प्रस्तावों का उद्गम होने के बाद उन्हें उचित अधिकारियों के सामने व्यवस्थित प्रस्तावों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है अतः प्रत्येक विभागाध्यक्ष अपने विभाग के पूँजी व्ययों का निर्धारण करता है तथा उन्हें उचित प्रस्तावों के रूप में योजना समिति को प्रस्तुत करता है। विनियोग प्रस्तावों के सम्बन्ध में विभागाध्यक्ष द्वारा दिया गया विवरण प्रायः एक फर्म से दूसरी फर्म में भिन्न होता है। सामान्यतः विनियोग प्रस्तावों में निम्नलिखित सूचनाएँ दी जाती हैं-

(i) प्रार्थना की तारीख (Date of Request);

(ii) परियोजना पहचान संख्या (Project Identification Number);

(iii) परियोजना का वर्णन (Description of the Project 🙂

(iv) परियोजना का उद्देश्य एवं जोखिम (Purpose and Risk for the Project);

(v) अनुमानित कुल लागत (Estimated Total Cost);

(vi) अनुमानित प्रारम्भ एवं समाप्ति की तारीख (Estimated Starting and Completion Dates);

(vii) अनुमानित राशि तथा व्यय की समय अवधि (Estimated Amount and Timing of Expenditures);

(viii) लागत में अनुमानित बचत अथवा अन्य आर्थिक अथवा वित्तीय औचित्य (Estimated Cost Savings or Economic or Financial Justification) तथा

(ix) परियोजना से सम्भावित आय तथा राशि प्राप्ति का समय (Estimated of the Amount and timing of Income from the Project Approvals)

(3) प्रस्तावों की जाँच (Screening of the Proposals) – विभागों द्वारा विनियोग प्रस्ताव बजट या योजना समिति के पास भेजने के बाद बजट समिति इन प्रस्ताओं की गहराई से जाँच करती है। यह जाँच उच्च प्रबन्ध तथा बजट समिति द्वारा स्थापित मानदण्डों के अनुसार की जाती है। बजट समिति यह देखती है कि प्रस्ताव संस्था के दीर्घकालीन विकास कार्यक्रमों के अनुसार है या नहीं। ये प्रस्ताव अन्य विभागों में असन्तुलन को उत्पन्न नहीं करेंगे। संस्था इनकी वित्तीय व्यवस्था कर सकेगी या नहीं। इन सब पर बजट समिति विचार करती है तथा जिन प्रस्तावों को जाँच के बाद उपयुक्त पाया जाता है उनका आर्थिक विश्लेषण किया जाता है।

(4) प्रस्तावों का आर्थिक विश्लेषण (Economic Evaluation of the Proposals) – बजट समिति आर्थिक जाँच के बाद जिन प्रस्तावों को विचारणीय मानती है उनका प्रारम्भिक  विश्लेषण किया जाता है इस विश्लेषण में प्रत्येक परियोजना की लागत एवं आर्थिक लाभों का विश्लेषण किया जाता है। इस मूल्यांकन के लिये अनेक विधियों का प्रयोग किया जाता है।

(5) परियोजना का चयन (Project Selection)- आर्थिक विश्लेषण के बाद आर्थिक एवं लाभदायक परियोजनाओं में से फर्म के वर्तमान साधनों व भावी साधनों को देखते हुए विभिन्न परियोजनाओं को फर्म की पूर्व निर्धारित आवश्यकताओं के अनुसार चुना जाता है। फर्म की आवश्यकतायें अलग-अलग समय पर अलग-अलग होती हैं। ये प्राथमिकतायें चालू अथवा अपूर्ण परियोजनाओं को शीघ्र पूरा करने, प्रतिस्थापन परियोजनाओं को स्वीकार करने, लागत में कमी लाने वाली परियोजनाओं को स्वीकार करने अथवा वैधानिक आवश्यकताओं को पूरा करने के सम्बन्ध में हो सकती हैं।

(6) परियोजना पर अन्तिम निर्णय (Final Decision on the Project) – बजट समिति विभिन्न परियोजनाओं का आर्थिक दृष्टि से गहन अध्ययन करके उनमें से आवश्यक एवं उपयुक्त परियोजनाओं का चुनाव करती है तथा उन्हें अपनी सिफारिशों के साथ संचालक मण्डल के पास भेज देती हैं संचालक मण्डल उनकी अनिवार्यता, लाभदायकता तथा उपलब्ध साधनों को ध्यान में रखकर अपना अन्तिम निर्णय घोषित करता है। संचालक मण्डल द्वारा स्वीकृति मिलने पर परियोजना को संस्था के वार्षिक पूँजी बजट में सम्मिलित कर लिया जाता है।

(7) पूँजी बजट निर्माण (Formulation of Capital Budget) – विभिन्न पूँजी व्यय प्रस्तावों पर संचालक मण्डल की स्वीकृति मिल जाने पर उनके लिये कोषों का नियोजन किया जाता है कोषों के नियोजन की व्यवस्था करना ही पूँजी बजट कहलाता है। वित्त समिति पूँजी बजट का निर्माण करती है तथा विभिन्न परियोजनाओं के लिये साधनों का आवंटन करती है। ये आबन्टित साधन प्रायः वित्तीय प्रबन्धक द्वारा जुटाये जाते हैं।

(8) व्ययों का अधिकरण (Authorisation of Capital Expenditure) – किसी परियोजना को पूँजी बजट में सम्मिलित कर लेने के बाद सम्बन्धित विभागाध्यक्ष के पास क्रियान्वयन हेतु अधिकृत कर दिया जाता है। यह अधिकरण विभागाध्यक्ष के अधिकरण के लिये किये गये प्रार्थना पत्रों के आधार पर किया जाता है। यह कार्य वित्तीय नियन्त्रक करता है।

(9) परियोजना का क्रियान्वयन (Project Execution) – परियोजना के व्यय के लिये स्वीकृति प्रदान करने के बाद परियोजना का क्रियान्वयन विभिन्न चरणों में किया जाता है।

(10) अनुवर्तन (Feedback) – परियोजना के क्रियान्वयन में वास्तविक व्यय का बजट व्ययों में समय-समय पर मिलान किया जाता है तथा अन्तर पूर्व निर्धारित सीमा से अधिक होने पर उसका विश्लेषण किया जाता है तथा लागत अनुमानों में संशोधन किया जाता है एवं लागत नियन्त्रण के लिये प्रभावी कदम उठाये जाते हैं।

पूँजी बजटन की सीमाएं या कमियाँ

(Limitations of capital Budgeting)

यद्यपि पूँजी बजटन में विनियोग प्रस्तावों के मूल्यांकन की विभिन्न विधियों द्वारा वैकल्पिक प्रस्तावों का सही विश्लेषण किया जाता है एवं प्रबन्धन द्वारा सही निर्णय लिये जाने की सम्भावना रहती है किन्तु जिन समंकों के आधार पर ये निर्णय लिये जाते हैं, उनके अशुद्ध होने पर इन विधियों से सदैव सर्वोत्तम विकल्प के चुने जाने की आशा नहीं की जा सकती। अतः पूँजी बजटन प्रक्रिया में कुछ कठिनाइयाँ प्रबन्धकों के समक्ष आती हैं जिनका उपयुक्त हल आवश्यक है। ये कठिनाइयाँ अथवा सीमायें निम्नलिखित हैं-

(1) पूँजी की लागत का अनुमान कठिन – पूँजी की लागत को अनुमानित करना पूँजी व्यय निर्णय के लिये प्रथम आवश्यकता है क्योंकि जो राशि विनियोग के लिए प्राप्त की गई है उसकी कुछ न कुछ लागत अवश्य लगेगी। किन्तु इस लागत का एक निश्चित अवधि तक अनुमान लगाया जा सकता है।

(2) प्रत्याय दर का अनुमान कठिन – विनियोजित पूँजी से भविष्य की अवधि में कितना लाभ मिलेगा इसे अनुमानित करना भी कोई सरल कार्य नहीं है। प्रायः भविष्य अनिश्चित ही रहता है और जैसे कि पहले बताया गया है, आज का व्यवसाय अनिश्चितताओं एवं जोखिमों का ही व्यवसाय है। अतः ऐसी स्थिति में भविष्य का पूर्वानुमान एक जटिल प्रक्रिया है।

(3) अवधि का अनुमान कठिन – विनियोग प्रतिवर्ष कितना करना पड़ेगा और कितने वर्षों तक करना होगा तथा आय कितने वर्षों तक प्राप्त होती रहेगी, यह सब भी जानना आवश्यक है, तभी किस सम्पत्ति में विनियोग किया जाए, इस सम्बन्ध में उचित निर्णय लिया जा सकता है। सामान्यतः इन अवधियों का निर्धारण भी एक जटिल समस्या है।

(4) निर्णय का परिणाम अनिश्चित- भविष्य में वही परिस्थितियाँ रहेंगी जो वर्तमान में हैं, यह कहना बड़ा कठिन है। नये संयन्त्र को काम में लाने के लिये नई तकनीक प्रयोग में लेनी होती है तथा श्रमिक इस नई तकनीक को समझाकर कितना सहयोग कर पाते हैं, इस सम्बन्ध में पहले से लगाया गया अनुमान बाद में गलत निकल जाता है।

(5) न मापन योग्य घटक – जैसा कि विनियोग प्रस्तावों के प्रकारों का वर्णन करते समय बताया गया है कि बहुत से घटक इस प्रकार के होते हैं जिनको मौद्रिक रूप में व्यक्त करना कठिन होता है। ऐसे घटकों का पूँजी बजट बनाने पर विपरीत प्रभाव पड़ता है और इस तकनीक की सफलता सन्दिग्ध हो जाती है।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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