विश्व का इतिहास / World History

असीरियन सभ्यता- ऐतिहासिक स्त्रोत, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक जीवन, महत्ता एवं देन

असीरियन सभ्यता

असीरियन सभ्यता – मेसोपोटामिया में ऊपरी दजला नदी के दोनों ओर असीरिया का एक छोटा प्रदेश स्थित था। यद्यपि भौगोलिक दृष्टि से इसे मेसोपोटामिया का अंग होने का सूयोग नहीं मिला था लेकिन पूर्व तथा उत्तर में स्थित क्रमशः जगरोस एवं अर्मीनियन पर्वतमालाओं से अन्य देशों से पृथक होने के कारण तथा दक्षिण में स्थित बेबिलोन से दजला नदी द्वारा सम्बद्ध होने के कारण इसकी गणना भी मेसोपोटामिया के अन्तर्गत की जाती है। पर्वतीय प्रदेश होने के कारण यहां की जलवायु बेबिलोन की अपेक्षा अधिक शक्तिवर्द्धक सिद्ध हुई। इसका प्रभाव यहां के निवासियों पर पड़ा। पर्वतीय भाग से प्रचुर मात्रा में चूनापत्थर, सेलखड़ी तथा अन्य कठोर पत्थर मिल जाते थे। नदीघाटियों में सुसम्पन्न कृषि हो जाती थी जिससे गेहूं तथा जौ की अच्छी उपज ये प्राप्त कर लेते थे। भारवाहन में गर्दभ का प्रयोग किया जाता था लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि ये अश्वपालन से अपरिचित थे। वास्तव में अश्व से इनका परिचय था लेकिन इनका आम प्रचलन नहीं था।

यह जाति पहले अरब के शुष्क प्रदेश में निवास करती थी। तीन हजार ई. पू. के पहले इनका एक समुदाय दरजला के किनारे असुर नामक स्थान में आकर बस गया था। यह एक युद्धप्रिय जाति थी। संयोग से असुर नामक नगर की भौगोलिक स्थिति इनकी युद्धप्रिय प्रवृत्ति के अनुकूल थी। यहां ये सुरक्षा का अनुभव कर सकते थे, सेना का संगठन कर सकते थे और आवश्यकता पड़ने पर साम्राज्यविस्तार की योजना भी कार्यान्वित कर सकते थे। ये सेमिटिक जाति की ही एक शाखा थे। इसीलिए इन्हें भी सेमिटिक कहा गया है। लेकिन इनके राजनीतिक और सांस्कृतिक क्रिया-कलापों में असुर नामक नगर का योगदान इतना महत्वपूर्ण रहा है कि इन्हें असीरियन नाम से विशेष प्रसिद्धि मिली। ये घुमक्कड़ थे तथा इनकी अपनी जमीन बजर और बलुई थी। अतएव सम्पन्न समुदायों को लूटना ही इनका व्यवसाय था। ऐसी परिस्थिति में असीरियनों में यदि संघर्षात्मक प्रवृत्ति विकसित हुई तो देश और काल की दृष्टि से इसे संगत ही माना जा सकता है।

 

ऐतिहासिक स्त्रोत

असीरियन सभ्यता के अध्ययन में हमें बाइबिल तथा यूनानी ग्रन्थों से कुछ सहायता मिलती है लेकिन इनका विशेष ऐतिहासिक महत्व नहीं है। असीरियन इतिहास के विषय में सबसे अधिक जानकारी इनके राजकीय लेखों से होती है। इस दृष्टि से समकालिक इतिहास का उल्लेख विशेष रूप से किया जा सकता है। इसकी रचना शायद अशुरवनिपाल के समय में इसी के निर्देश में सम्पत्र हुई थी। इससे असीरिया तथा बेबिलोनिया के समकालीन इतिहास के विषय में सूचनाएं मिलती हैं। असीरियन शासक अपने वार्षिक सैनिक अभियानों का विवरण उत्कीर्ण कर राजकीय संग्रहालयों में सुरक्षित करते थे। ये लेख असीरियन इतिहास के अध्ययन में बड़े उपयोगी सिद्ध हुए। इनसे असीरियन शासकों के शासनकाल की महत्वपूर्ण घटनाएं ज्ञात हो जाती हैं। अशुरवनिपाल के राजकीय संग्रहालय में इसके शासन काल के राजकीय लेखों के अतिरित बेबिलोनियन एवं असीरियन साहित्यिक लेखो को भी सुरक्षित किया गया था इनसे भी हमें पर्याप्त सहायता मिलती है।

 

राजनीतिक संगठन

कानून-व्यवस्था, सुरक्षा, वाणिज्य एवं शान्ति की स्थापना के लिए विविध राज्यों को समझा-बुझाकर अथवा शक्तिपूर्वक दबाकर एक साम्राज्य के अंतर्गत संगठित करने के साम्राज्यिक सिद्धान्त की महत्ता का अनुभव करते हुए असीरियनों ने सर्वप्रथम एक सुसम्पन्न एवं सुविस्तृत साम्राज्य की स्थापना की। इस प्रकार का साम्राज्य इसके पहले पश्चिम एशिया में कभी नहीं स्थापित हो सका था। अशुरबनिपाल के सुविस्तृत साम्राज्य में असीरिया के साथ-साथ बेबिलोन, अर्मीनिया, मीडिया, फिलिस्तीन, सीरिया, फीनिशिया, सुमेरिया, एलम तथा मिस्र सम्मिलित थे। इसकी बराबरी कुछ हद तक इसके पूर्व केवल बेबिलोन के हम्मूराबी तथा मिस्र के थुत्मोस तृतीय और बाद में सिकन्दर के आविर्भाव के पहले का पारसीक साम्राज्य ही कर पाया था।

केन्द्रीय शासन

विस्तृत असीरियन साम्राज्य का सर्वाधिक शक्ति-सम्पन्न व्यक्ति सम्राट स्वयं था। इसकी शक्ति निर्विवाद थी। लेकिन शासक को यह महत्ता अनायास नहीं प्राप्त थी। असीरियनों को असुर नामक नगर से प्रारम्भ कर एक सुविस्तृत असीरियन साम्राज्य की स्थापना करने में जो सफलता मिली उसके मूल में इनकी संगठित शक्ति ही क्रियाशील थी। इनका यह दृढ़ विश्वास था कि एकता के अभाव में इनका साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो सकता है। ऐसी स्थिति में ये सम्पूर्ण साम्राज्य के लिए एक ही शासक की आवश्यकता समझते थे। इसके साथ ही असीरियावासी शासक को शमश देव का अवतार मानते हुए इसे दैवी मानते थे। अतः शासक की आज्ञा स्वीकार करना राष्ट्रीय कर्तव्य के साथ-साथ धार्मिक कर्तव्य माना जाता था। अतः इसका सर्वशक्तिमान होना सहज एवं स्वाभाविक था।

सिद्धान्ततः असीरियन शासक निरंकुश एवं अविवाद्य था। अर्थात इसकी गतिविधियां पूर्णतया अनियंत्रित थीं। लेकिन व्यवहारतः इसमें कुछ शिथिलता दिखाई पड़ती है। यह किसी न किसी प्रकार से असीरियन पुजारियों की प्रभावपरिधि में आ गया था। असीरियन अपने साम्राज्य को असुर देव की संपत्ति मानते थे। असुर देव के नाम पर ही कर संग्रह करते थे, युद्ध करते थे तथा कानून बनाते थे। प्रत्येक महत्वपूर्ण कार्य जैसे युद्ध एवं उच्च पदाधिकारियों की नियुक्ति के समय ईश्वर की प्रार्थना की जाती थी। धार्मिक महत्व के साथ यहां दिन-दिन पुजारियों का महत्व बढ़ता गया और वे शासक की निरंकुशता पर किंचित अंकुश रखने लगे। आज की भांति किसी प्रकार के मंत्रि परिषद का अस्तित्व नहीं था। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि शासन का संचालन अकेले शासक द्वारा ही हो जाता था। वास्तव में शासन सहायता के लिए यहां कुछ उच्च अधिकारी रहते थे इनमें से पांच के बारे में सूचनाएं हैं। सेनानायक इस दृष्टि से शायद प्रथम अधिकारी था। इसे तर्तनु कहा गया है। रैब-शाकी नामक एक अन्य सहायक के विषय में भी सूचना मिलती है। इसके अतिरिक्त नगिर-एकाली, जो राजप्रासाद का अधीक्षक था, अबरक्कु एवं शक्नु नामक तीन अन्य अधिकारियों के विषय में भी साक्ष्य मिलते हैं। इनका खर्च राज्य द्वारा प्राप्त भूमि से चलता था।

प्रान्तीय शासन

असीरिया का अपना राज्य प्रारम्भ से ही प्रान्तों में विभाजित था। यहां का शासन शासक द्वारा नियुक्त गवर्नरों द्वारा सम्पन्न किया जाता था। प्रारम्भ में इनका शासन-संचालन सरलतापूर्वक हो जाता था, लेकिन धीरे-धीरे साम्राज्य विस्तार के साथ-साथ जब प्रान्तों की संख्या में वृद्धि होती गई तो प्रान्तीय प्रशासन भी कठिन हो गया। असीरियन प्रान्तों को उनके स्तर की दृष्टि से तीन श्रेणियों में बांटा गया था। प्रथम श्रेणी के वे करद प्रान्त थे जिन्हें प्रतिवर्ष केन्द्र को निश्चित मात्रा में कर भेजना पड़ता था। द्वितीय श्रेणी के प्रान्त कर के साथ-साथ बेगार भी देते थे। यहां असीरियन शासक का एक प्रतिनिधि भी रहता था। तृतीय श्रेणी के प्रान्त केन्द्रीय शासन की प्रत्यक्ष प्रभावपरिधि में थे इनका गवर्नर शक्नु नामक पदाधिकारी था। प्रथम एवं द्वितीय श्रेणी के प्रान्त आन्तरिक प्रशासन की दृष्टि से स्वतन्त्र थे लेकिन तृतीय श्रेणी के प्रान्त पूर्णतया शासकाधीन थे।

प्रान्तों में नियुक्त प्रान्तपतियों या गवर्नरों के स्तर का निर्धारण प्रान्त की स्थिति के अनुसार किया जाता था। इस पद पर शासक से सम्बन्धित व्यक्ति अथवा शासकीय परिवार के सदस्य या फिर किसी प्रभावशाली व्यक्ति की नियुक्ति की जाती थी इन प्रान्तों के गवर्नरों एवं अधिकारियों के उत्तरदायित्व कम नहीं थे। आन्तरिक व्यवस्था के साथ-साथ इन्हें कर वसूल कर केन्द्र के पास भेजना पड़ता था। राजकीय सेना के लिए सैनिकों को भर्ती करना तथा उनकी सेना तैयार करना पड़ता था। केन्द्र को प्रत्येक प्रान्त से क्या मिलना चाहिए, इसका निर्णय प्रान्तपति नहीं, बल्कि केन्द्रीय शासन करता था। प्रान्त एवं प्रान्तपतियों की गति-विधियों की जानकारी रखने के लिए शासक यहां गुप्तचर भेजता था जो समय-समय पर उसे प्रान्त की स्थिति के बारे में सूचनाएं देते रहते थे।

करव्यवस्था

असीरियन प्रान्तपतियों एवं अधिकारियों के कर्त्तव्यों में कर संग्रह का विशेष महत्व था। वास्तव में असीरियन केन्द्रीय अर्थव्यवस्था पूर्णतया करों पर आधारित थी। साक्ष्यों से पता लगता है कि असीरियन करव्यवस्था अत्यन्त कठोर थी। भूमि के प्रत्येक अधिकारी तथा प्रत्येक प्रान्तपति को नियमित रूप से केन्द्र को कर देना पड़ता था। इसके अतिरिक्त पराजित शासक तथा उपराज्यों के शासक नियमित कर भेजते थे। पराजित शासक द्वारा दिया जाने वाला कर तमतुं कहा जाता था। इसी प्रकार मन्दत्तु नामक एक अन्य कर के विषय में सूचना मिलती है। यह एक ऐसा कर था जो उपराज्यों द्वारा नियमित असीरियन राजधानी को भेजा जाता था।

सैन्य संगठन

असीरियन साम्राज्य पर्याप्त विस्तृत था। इसकी रक्षा का गुरुतर भार इनके कंधों पर था और हम निर्विवाद रूप से कह सकते हैं कि इस महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व का निर्वहन इन्होंने अत्यन्त सफलतापूर्वक किया। असीरियन साम्राज्य की भित्तियां सैनिक शक्ति पर टिकी थीं। इसके बल पर असीरियन एक विस्तृत साम्राज्य की स्थापना में सफल हुए थे मेसीडोनियन तथा रोमन सैनिकों की भांति असीरियन सैनिकों का आदर्श ऊंचा था। इनके पास उच्च कोटि के अस्त्र-शस्त्र थे तथा ये कठोर अनुशासन में बंधे थे। इसी कारण इन्हें प्रायः सफलता मिलती गई। सिद्धान्ततः यहां प्रत्येक नागरिक को अनिवार्य रूप से सेना में भर्ती होना पड़ता था लेकिन यह अनिवार्यता तो आवश्यकता पड़ने पर ही दिखाई पड़ती थी। इसमें भी बहुत लोग अपने बदले किसी दास को भेज कर बच जाते थे यहां दो प्रकार की सेना थी। एक पर शासक का अधिकार था जो केन्द्रीय सेना के रूप में प्रतिष्ठित थी। दूसरे प्रकार की सेना प्रान्तपतियों के अधिकार में थी, जिन पर प्रान्तों की सुरक्षा का भार था। आवश्यकता पड़ने पर शासक भी प्रान्तपतियों की सैनिक सहायता करता था।

असीरियन सेना के पदाति, अश्वारोही तथा रथारोही तीन अंग थे। इनके अतिरिक्त इनके साथ श्रमिकों का एक दल रहता था जो रक्षा-खाईं का निर्माण करता था। रथारोही की अपेक्षा पदाति तथा अश्वारोही दल अधिक उपयोगी थे। संभवतः पदाति सैनिकों की संख्या सर्वाधिक थ्री। इनके सैनिकों की वास्तविक संख्या के विषय में कुछ नहीं कहा जा सकता। अशुरबनिपाल एक स्थल पर 50,000 सैनिकों का उल्लेख करता है तो शालमनेसर तृतीय 1,20,000 सैनिकों का। सेना को कई टुकड़ियों में बांट दिया गया था। इसका प्रधान नायक तर्तनु था। इसकी अन्य टुकड़ियों की संख्या एवं इसके नायक के बारे में ठीक-ठीक पता नहीं है। इसके बाद फिर हमें सत्तर का नायक तथा पचास का नायक नामक अधिकारियों के संकेत मिलते हैं। ये अधिकारी तर्तनु के अधीन कार्य करते थे।

असीरियन सैनिक मुख्यतः लोहे की तलवार, विशाल धनुष, दीर्घप्रास, भित्तिपातक, रथचालित दुर्ग, धातु के कवच, ढाल तथा शिरस्त्राण का प्रयोग करते थे। युद्धोपयोगी उपकरणों के निर्माण में लोहे का प्रयोग प्रचुरता किया जाता था। इसे हित्तियों की देन मान सकते हैं। उपकरणों से कहीं अधिक महत्व यहां अनुशासन का था। सैनिक अनुशासित एवं पंक्तिबद्ध होकर शत्रुओं पर आक्रमण करते थे। असीरियन सैनिक प्रतिरक्षात्मक युद्धों की अपेक्षा आक्रमणात्मक युद्धों में अधिक दक्ष थे। इसकी कई विधियों का इन्हें ज्ञान था। दुर्ग-भेदन तथा शत्रु को भलीभांति घेर लेने में ये अत्यन्त निष्णात थे। आक्रमणात्मक युद्धों में ये रथचालित दुर्गों का खुलकर उपयोग करते थे। इसमें बैठ कर ये सुरक्षात्मक ढंग से आक्रमण करने में सफल हो जाते थे। असीरियन सैनिक शासक के नेतृत्व में आगे बढ़ते थे।

 

सामाजिक संगठन

वर्गभेद

असीरियन सैनिक नीति का प्रभाव इनके सामाजिक गठन पर पड़ा। विभिन्न प्रान्तों, प्रदेशों एवं राज्यों के निवासी युद्धबंदी के रूप में असीरियन समाज के अंग बनते गये। धीरे-धीरे निनिव एक अन्तर्राषट्रीय नगर बन गया, जिसमें पश्चिम में एशिया माइनर से लेकर पूर्व में एलम तक के निवासी विद्यमान थे। बहुतों ने तो यहां तक कहा है कि निनिव में असीरियनों की अपेक्षा विदेशी अधिक थे। असीरियन स्त्रियं से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर अथवा इनके दत्तक पुत्र बन कर बहुत से विदेशी असीरियन नागरिक बन गए थे। सामान्यतः असीरियन समाज स्वतन्त्र एवं दास दो वर्गों में विभाजित था। स्वतंत्र वर्ग की तीन श्रेणियां थीं। प्रथम श्रेणी के अन्तर्गत शासक, धर्माधिकारी तथा उच्च अधिकारी थे। इन्हें श्रीमन्त अथवा मारवनुति कहा गया है। इन्हें यहां विशिष्ट स्थान प्राप्त था। ऐसा लगता है कि असीरिया में इस श्रेणी के सदस्यों की संख्या बहुत कम थी क्योंकि कभी-कभी योग्य व्यक्तियों के अभाव में स्त्रियों को भी कुछ महत्वपूर्ण पद मिल जाते थे। श्रीमन्तों के अधिकारों की रक्षा के लिए यहां सतत प्रयत्न किए जाते थे। ्वतन्त्र नागरिकों की द्वितीय श्रेणी के अन्तर्गत शिल्पी या उम्माने वर्ग के सदस्य थे। इनकी संख्या अधिक थी। इस श्रेणी के सदस्यों में श्रष्ठिन् अथवा तामकरु, लिपिक अथवा तुपशर्रु, कुंभकार या परवरु, वर्द्धकि अथवा नग्गरु आदि सम्मिलित थे। इनका व्यवसाय नियत था। स्वतन्त्र नागरिकों की तृतीय श्रेणी श्रमिक वर्ग या खुब्शी की थी। असीरियन राष्ट्रीय सेना इसी वर्ग के सदस्यों की बनी थी। आवश्यकता पड़ने पर इस वर्ग के सदस्यों को विदेशों में उपनिवेश स्थापना के लिए भी भेज दिया जाता था असीरियन दास दो प्रकार के थे- विदेशी युद्धबन्दी तथा ऋण न चुका सकने के कारण स्वतन्त्रता खो देने वाले नागरिक। इनका मुख्य कार्य स्वतन्त्र वर्ग के सदस्यों की सेवा करना था इनसे बेगार ली जाती थी तथा तुच्छ कार्य करवाया जाता था। सेनैकेरिब के समय में एक प्रस्तरचित्र में दासों को एक विशाल मूर्ति से लदी मिट्टी की गाड़ी खींचते हुए दिखाया गया है। कोडेधारी अधिकारी उनका निरीक्षण कर रहे हैं। अन्य स्वतन्त्र वर्ग के सदस्यों से पृथक करने के लिए इनके कान छेद दिये जाते थे तथा सिर मुड़ा दिये जाते थे। लेकिन इतना होते हुए भी यहां दासों की स्थिति बहुत दयनीय नहीं थी। ये कुछ स्वतन्त्र व्यवसाय करके धनार्जन कर सकते थे। कभी-कभी न्यायालय में साक्षी के रूप में भी उपस्थित हो जाते थे तथा इन्हें स्वतः दास रखने की छूट मिली थी। कभी-कभी तो शासन में भी इन्हें कुछ पद मिल जाता था।

परिवार एवं त्त्रियों की स्थिति

असीरियन पारिवारिक गठन पितृसत्तात्मक था अर्थात पिता ही परिवार का सर्वेस्वा था। परिवार के शेष सदस्यों को इसकी आज्ञा का पूर्णतः पालन करना पड़ता था। असीरियनों के इस प्रकार के पारिवारिक गठन के मूल में इनकी सैनिक प्रवृत्ति को स्वीकार किया जा सकता है। युद्धों में निरन्तर व्यस्त रहने के कारण परिवार का पुरुष वर्ग यहां महत्ता प्राप्त करता गया। पुरुषों की महत्ता के कारण ही यहाँ स्त्रियों की स्थिति दयनीय हो गई। मेसोपोटामिया सभ्यता में असीरियन सियों ने उन अधिकारों को खो दिया जिसे इन्होंने बेबिलोनिया में प्राप्त कर लिया था। इनके विधिसम्मत लेखों से लवियों की स्थिति पर प्रकाश पड़ता है। इनके द्वारा की गई चोरी, पुरुषों पर प्रहार, भ्रूणहत्या, व्यभिचार इत्यादि के लिए दण्ड सम्बन्धी कानून मिलते हैं। विवाह के नियम बेबिलोनियनों के समान ही थे, लेकिन यहां सामान्यतः लड़की खरीद कर विवाह किया जाता था कभी-कभी स्त्रियों को पिता के घर में ही रहना पड़ता था और ये यदा-कदा ही पति से मिल पाती थीं। यदि विवाह की प्रारम्भिक रस्मों के बाद वर की अकस्मात मृत्यु हो जाती थी तो कन्या का विवाह इसके छोटे भाई के साथ कर दिया जाता था लेकिन इस समय इसका ध्यान रखा जाता था कि इसकी अवस्था दस वर्ष से कम न हो। यदि वर का कोई भाई नहीं रहता था तो वर पिता को खाने-पीने की सामग्री के अतिरिक्त शैष सब कुछ, जो उसे कन्यापिता की ओर से रस्म के समय मिलता था, वापस करना पड़ता था। इनकी सैनिक संख्या निरन्तर बढ़ती रहे इसके लिए इन्हें स्त्रियों से सम्बन्धित कुछ कठोर नियम बनाने पड़े। भूरूणहत्या के लिए स्त्रियों को मृत्युदण्ड दिया जाता था। यहां तक कि यदि इस प्रयास में गर्भिणी की मृत्यु हो जाती थी तो भी उसे शूली पर चढ़ाया जाता था। विवाहित र्त्रियों को पूर्ण पातिव्रत का पालन करना पड़ता था। बिना इसकी आज्ञा के न ये बाहर जा सकती थीं न व्यापार कर सकती थीं। व्यभिचार के लिए यहां प्राणदण्ड दिया जाता था। विवाहित स्त्रयों को कठोर पदें में रहना पड़ता था। ये बिना पर्दे के सार्वजनिक स्थलों पर विचरण नहीं कर सकती थीं। पर्दाप्रथा का विकास यहीं से माना जाता है। अविवाहित स्त्रियों, गणिकाओं, पूजारिणियों तथा दासियों के लिए पर्दाप्रथा नहीं थी। इन्हें सदा मुंह खोल कर रहना पड़ता था। यदि कोई व्यक्ति कुछ मित्रों के बीच किसी गणिका को घूंघट में करके यह कह देता था कि ‘यह मेरी पत्नी है’ तो उस गणिका को उस व्यक्ति की पत्नी मान लिया जाता था और विवाहिता स्त्री के निस्सन्तान होने पर उसके पुत्र को उत्तराधिकार भी मिल जाता था। र्त्र को तलाक देना, उसे कुछ देना या न देना पति की इच्छा पर था। इससे स्पष्ट हो जाता है कि असीरिया में स्त्रियों को कोई अधिकार नहीं मिला था और ये पूर्णतया पुरुषों के अधीन थीं। लेकिन इसका कहीं-कहीं अपवाद भी मिलता है। स्वतन्त्र वर्ग से सम्बद्ध उच्च वर्ग की स्रियों को यहां कुछ अधिकार मिले थे। कभी-कभी तो ये शासन भी संभाल लेती थीं। सम्मुरत नामक एक महारानी ने अल्पकाल के लिए शासन संभाला था। इसी प्रकार खुब्शी वर्ग की स्त्रियों का भी बराबर ध्यान एखा जाता था यदि कोई सनक शत्रु द्वारा बन्दी बना लिया जाता था और उसकी के पास जीविका का समूचित साधन नहीं रहता था तो नगर शासक की ओर से उसके लिए भृमि एवं मकान की व्यवस्था की जाती थी और दो वर्ष पश्चात उसे पुनः विवाह की छूट मिल जाती थी लेकिन ऐसा करने के बाद भी यदि उसका पति आ जाता था तो उस स्त्री को पुनर्विवाहित पति छोड़ना पड़ता था। गृमि एवं मकान की व्यवस्था करने के बाद यादि युद्ध में पति की मृत्यु का समाचार मिल जाता था तो उससे भूमि और मकान छीन लिया जाता था।

 

आर्थिक संगठन

कृषिकर्म

आर्थिक दृष्टि से असीरियनों को भी लगभग वही सुविधाएं मिली थी जो सुमेरियनों तथा बेबिलोनियनों को। दजला के दोनों ओर स्थित उर्वर मैदान कृषि के लिए उपयुक्त थे। यहां गेहू जी, बाजरा तथा तिल की खेती मुख्य रूप से की जाती थी बेबिलोनिया की भांति यहां भी बांध बना कर नहरों की सहायता से नदी के जल का उपयोग किया जाता था खेतों तक जल पहुंचाने के लिए मिस्र की मांति यहां भी शडूफ (ढेकुली) की सहायता ली जाती थी यहां भूमि के स्वामी उच्च वर्ग के सदस्य ही थे वास्तव में यहां भूस्वामी तथा कृषक दोनों अलग-अलग थे कृषक स्वय्य भूमिधर थे अथवा इन्हीं भूस्वामियों को लगान देकर भूमि प्राप्त करते थे, ठीक-ठीक ज्ञात नहीं है। लेकिन इतना हम जानते हैं कि जो भूमि लगान पर ली जाती थी उसकी शर्तें बड़ी कड़ी होती थीं कृषिकर्म की महत्ता के कारण कृषकों की स्थिति यहां अच्छी थी। असीरिया में कृषिकर्म को वही स्थान प्राप्त था जो बेबिलोनिया में व्यापार को असीरियन व्यापारी होने की अपेक्षा भूस्वामी होना अधिक पसन्द करते थे।

उद्योगधन्धे

कृषिकर्म के बाद असीरियनों के आर्थिक संगठन का मुख्य आधार उद्योगधन्धा था। यद्यपि असीरियनों की भौगोलिक स्थिति ऐसी थी कि यहां उद्योगधन्धे तथा व्यापार दोनों अधिक विकसित नहीं हो सकते थे क्योंकि निनिव तथा अन्य महत्वपूर्ण नगर काफी उत्तर में थे। लेकिन विभिन्न प्रान्तों एवं प्रदेशों से लूटपाट द्वारा जो धन यहां इकट्ठा हो रहा था उससे उद्योगधन्धों के विकास का मौका मिला। मुख्यतः धातुउद्योग प्रचलित थे धातुएं या तो खदानों से प्राप्त की जाती थीं या उनका आयात किया जाता था। स्वर्ण, रजत, ताम्र, कांस्य एवं लोहे से अनेक प्रकार के उपकरण बनाये जाते थे। ये धातुओं को ढालने तथा शीशा गलाने की कला से भी परिचित थे। धातुउद्योग के अतिरिक्त भाण्डोद्योग तथा वस्त्रोद्योग भी अत्यधिक प्रचलित थे। सेनैकेरिव के एक लेख में पेडों से उत्पन्न होने वाली एक ऊन का उल्लेख मिलता है। यह निस्संदेह कपास का उल्लेख है तथा पश्चिम एशिया में इसका प्राचीनतम उदाहरण है। ब्रेस्टेड के अनुसार इसका ज्ञान भारत से आया था। उद्योगघन्धे प्रायः वंशानुगत थे।

व्यापार एवं वाणिज्य

व्यक्तिगत रूप से असीरिय श्रीमन्त व्यापार को घृणा की दृष्टि से देखते थे । इनकी दूष्टि से कम दाम पर सामान खरीद कर उसे अधिक दाम में बेचना निंदध कार्य था। श्रीमन्त वर्ग की व्यापारिक उदासीनता का लाभ विदेशी एरेमियनों को मिला और धीरे-धीरे सम्पूर्ण असीरियन व्यापार एवं वाणिज्य उनके अधिकार में चला गया। विदेशी व्यापार काफिलों की सहायता से किया जाता था यहां माल तैयार करने वाले तथा उसे बाहर ले जाने वाले अलग-अलग वर्ग थे। व्यापारी और साहूकार पूंजी लगा कर माल बनाते थे तथा सौदागर उसे बाहर ले जाते थे व्यापारियों को सौदागरों से पूंजी पर पचीस प्रतिशत व्याज मिल जाता था। इससे हम सौदागरों के लाभ की अधिकता का अनुमान लगा सकते हैं। मुद्राप्रणाली अभी तक विकसित नहीं थी। विनिमय में सोने, चांदी तथा तांबे के टुकड़े प्रयुक्त किये जाते थे सेनैकेरिब के एक लेख में चांदी के एक अर्ध शेकेल के टुकड़े का उल्लेख मिलता है। व्यापारसंचालन राजधानी असुर से किया जाता था। व्यापारिक वस्तुओं की कीमत एक-सी नहीं रहती थी। मांग एवं पूर्ति के अनुसार वस्तुओं के मूल्य घटते-बढ़ते रहते थे। अशुरबनिपाल के समय में ऊंटों के दाम 11/2 शेकेल कम हो गये थे। क्योंकि दूसरे देशों से लाये जाने के कारण इनकी संख्या बढ़ गई थी। यहां व्यापार वाणिज्य से सम्बन्धित बहुत से नियम बनाये गये थे। इनका उल्लंघन करने वाले को कठोर दण्ड दिया जाता था। इनके व्यापारिक सम्बन्ध सीरिया, पेलेस्टाइन, साइप्रस तथा ईजियन द्वीप समूह से थे। मेसोपोटामिया का व्यापारिक मार्ग सीरिया से होकर जाता था अतः उसका योगदान विशेष था। यह एक सुविदित तथ्य है कि असीरियनों के दूसरों से संघर्ष प्रायशः व्यापारिक मार्गों के प्रश्न को लेकर होते थे। टायर, उरतु एवं सीरिया के साथ हुए संघर्ष इसके प्रत्यक्ष उदाहरण है।

 

धार्मिक जीवन

देवमण्डल

क्रूर एवं हिंसा के वातावरण में असीरियन सभ्यता में न तो धार्मिक मान्यताएं अधिक विकसित हुईं न इनका राजनीतिक जीवन पर कोई विशेष प्रभाव ही पड़ा। बेबिलोनियन देवी-देवताओं को यहां अपनाया अवश्य गया लेकिन बेबिलोनियन राष्ट्रीय देव मार्दुक का स्थान असीरिया के असुर नामक देवता को मिला। प्रारम्भ में यहां असुर को भी अन्य देवताओं के समान ही महत्व मिला था और उसकी प्रसिद्धि एक सोर देवता के रूप में थी। सपक्ष सूर्यचक्र इसका प्रतीक था। बाद में जब असुर नामक नगर को प्रतिष्ठा मिली, तो इसे राष्ट्रीय देवता का पद दे कर भारतीय इन्द्र की भांति युद्धदेव स्वीकार कर लिया गया| असुर युद्ध एवं शान्ति दोनों में राष्ट्र का कल्याण करता था। वास्तव में असुर एक ऐसा राष्ट्रीय देवता था जिसका शक्तिशाली हाथ असीरियनों को विजय दिलाता था तथा जिसकी अक्षय उदारता मनुष्य को समृद्धियां प्रदान करती थीं। असुर के अन्य व्यक्तिगत गुणों एवं चरित्र के विषय में अधिक ज्ञात नहीं है। अशुरनसिरपाल द्वितीय के शासन काल में एक प्रस्तरचित्र में युद्धबन्दियों को असुर के समक्ष बलि देते हुए दिखाया गया है। अशुरबनिपाल अपने एक लेख में सगर्व कहा है कि “असुर के विद्रोहियों एवं मेरे विरुद्ध षड्यनत्र करने वाले इन सैनिकों को मैंने देवताओं के सम्मुख हवन कुण्डों में बलि दे दी। इससे मैंने देवताओं को प्रसन्न किया।” इससे यह पता लगता है कि असुर बलि से सन्तुष्ट होता था। असुर का आवास असूर नगर का मन्दिर था। इसकी पत्नी के रूप में निनलिल प्रतिष्ठित थी। असुर एवं निनलिल के अतिरिक्त इआ, अनु एनलिल, सिनु, शमश, वेल मार्दुक, नाबु, इनुर्ते, नर्गल आदि की उपासना भी की जाती थी। इनकी अधिष्ठात्री देवी नित्रा प्रेम की प्रतीक थी। असीरियनों के धार्मिक जीवन में शासक को अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान मिला था। तत्कालीन मान्यता के अनुसार शासक देवताओं का प्रतिनिधि था और देवताओं की इच्छा के मुताबिक शासन करता था। यदि किसी देश के निवासी असुर के प्रति आस्था नहीं प्रकट करते थे अथवा एक बार आस्था प्रकट कर उसका अनुपालन नहा करते थे तो असीरियन शासक उस देश पर आक्रमण कर उसे जीत कर वहां के निवासियों को द्डित करता था। राष्ट्र के पुरोहित के रूप में शासक देवता की उपासना करता था।

अन्धविश्वास एवं परलोकवाद

असीरियन धर्म अंधविश्वास एवं अभिचारपरक था। इस धर्म में अशुभकारी एवं आभिचारिक शक्तियों को विशेष महत्व मिला था। असीरियनों को इन शक्तियों से उतना ही भय था जितना इन्हें अपने विरोधियों से। विल ड्युरैण्ट ने उचित ही कहा है कि ‘असीरियन धर्म का मुख्य उद्देश्य भावी नागरिकों में देशभक्तिपूर्ण विनय उत्पन्न करना तथा अभिचार एवं बलि के माध्यम से देवताओं की कृपा प्राप्त करने की कला की शिक्षा देना था।’ अशुभकारी एवं आभिचारिक शक्तियों से बचने का एकमात्र उपाय मंत्र-तंत्र था जिस पर पुजारियों का एकाधिकार था। इन मन्त्रों को तावीजों पर उत्कीर्ण कर दिया जाता था। कभी-कभी मन्त्रों के साथ-साथ अनेक प्रकार की आकृतियां भी उत्कीर्ण की जाती थीं। इन तावीजों को यहां बालक से वृद्ध तक सभी धारण करते थे। अंधविश्वास एवं अभिचार की प्रबलता का प्रभाव पुजारियों पर पड़ा और उन्हें आगे बढ़ने का अवसर मिला। यहां पुजारियों के कई वर्ग थे। अभिचारविशेषज्ञ, संगीत द्वारा देवता को प्रसन्न करने वाले, स्तुति करने वाले तथा धार्मिक कार्यों के समय देवमूर्तियों का जलाभिषेक करने वाले पुजारी अलग-अलग थे। ये घटनाओं के कार्य-कारण पर विश्वास करते थे। इनका विश्वास था कि क्रम से घटित होने वाली दो घटनाओं में पहली दूसरे का कारण होती है। इसका प्रभाव शकुनविचार पर पड़ा। यहां भी बेबिलोनिया की भांति शकुनविचारक भविष्यवाणी करते थे। इससे ज्योतिष के अध्ययन को बढ़ावा मिला। इसका लाभ बाद में यूनानियों को मिला। असीरियनों की पारलौकिक मान्यताओं के विषय में अधिक ज्ञात नहीं है। हम केवल इतना जानते हैं कि ये एक ऐसे अन्धलोक का अस्तित्व मानते थे जहां मृतात्मा को जाना पड़ता था। वहां उसके लौकिक कर्मों की जांच की जाती थी। इस जांच में जो दुष्कर्मी सिद्ध होता था उसे घोर यातना मिलती थी। मृतकों के विषय में असीरियन उदास दिखाई पड़ते हैं। पहले सामान्य रूप से जमीन में दफनाने की परम्परा थी किन्तु आगे चलकर जलाने लगे।

 

असीरियन सभ्यता की महत्ता एवं देन

सुमेरिया का बेबिलोनिया तथा बेबिलोनिया का असीरिया से वही सम्बन्ध था जो क्रीट का यूनान तथा यूनान का रोम से। अर्थात प्रथम ने सभ्यता को जन्म दिया, द्वितीय ने उसे अंतिम सीमा तक विकसित किया और तृतीय ने उसे उत्तराधिकार रूप में प्राप्त कर उसमें किंचित वृद्धि कर उसकी र्क्षा की। पोषित एवं संचित बेबिलोनियन सभ्यता, यद्यपि जिसे कैसाइटों के काल में पर्याप्त आधात पहुंचा था, के सांस्कृतिक तत्वों को ग्रहण कर उसमें यथासंभव परिवर्तन एवं परिवर्द्धन कर सुरक्षित रखने का श्लाघनीय कार्य असीरियनां ने ही किया। बेबिलोनियन सांस्कृतिक तत्त्वों के अधिग्रहण एवं संश्लेष के बावजूद भी इनकी मौलिकता में कोई कमी नहीं आयी। इसीलिए असीरियन सभ्यता को बेबिलोनियन सभ्यता की अनुक्रति तो माना जाता है लेकिन यह अनुकरण आसन्नानुकरण ही था अंधानुकरण नहीं।’ लिपि, साहित्य, धर्म, विचान एवं सामाजिक-आर्थिक संगठन के क्षेत्रों में इनके अनेक अभिनव अनुभव एवं आविष्कार इस कथन की पुष्टि करते है। असीरियनों के इन नूतन अनुभवों एवं आविष्कारों से परवर्ती विश्व निस्संदेह प्रमावित हुआ। इतिहास में सर्वप्रथम सैनिक शक्ति के बल पर एक अति विस्तृत साम्राज्य की स्थापना की सम्भावना को असीरियनों ने यथार्थ में परिवर्तित कर दिया जो बाद में पारसीक तथा मेसीडोनियन शासकों के लिए आदर्श बना। असीरियन सैन्यवाद का प्रभाव परवर्ती हिब्रू धर्म के एकेश्वरवाद पर निर्विवाद रूप से पड़ा। अमुर निवासियों तथा उनके क्रूर एवं निष्ठुर स्वभाव से भारतीय भी अपरिचित नहीं थे वैदिक साहित्य से लेकर क्लासिकी साहित्य तक असुर का उल्लेख बराबर मिलता है। ऋग्वेद में देवतागण को असुर कहा गया है। असुर का अर्थ है असु, विशिष्ट अथवा प्राणशक्तिसम्पन्न। लेकिन आगे चलकर इसे दानव का पर्याय मान लिया गया। वास्तव में प्रारम्भ में तो इसे देवताओं के लिए प्रयुक्त किया गया। लेकिन जब असुर निवासी अपने क्रूर एवं निर्मम कृत्यों के कारण कुख्यात हो गये तो इस शब्द का अर्थ बदल गया और इसे दानव का पर्याय मान लिया गया। यह मान्यता ऋग्वेदोत्तर काल में अधिक व्यापक दिखाई पड़ती है जो संभवतः असीरियनों का उत्कर्ष काल था। महाकवि कालिदास असुर-विजय की निर्ममता से परिचित थे इसीलिए वे रघु की धर्म विजय एवं प्रतिमुक्तनीति की प्रशंसा करते हैं। प्राचीनतम एशियायी वास्तुकला की पूर्णता असीरियन युग में ही दिखाई पड़ती है। वास्तुकला में प्रयुक्त इनके स्तम्भों का प्रभाव पारसीक एवं यूनानी स्तम्भों पर निर्विवाद रूप से पड़ा। भगवत शरण उपाध्याय भारतीय अशोककालीन स्तम्भों पर उत्कीर्ण सिंह एवं वृषभ आकृतियों पर असीरियन प्रभाव मानते हैं। असीरियन ज्योतिषशास्त्र एवं चिकित्साशास्त्र ने यूनानी ज्योतिषशास्त्र तथा प्रकृतिविज्ञान को प्रेरणा प्रदान की।

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Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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