विश्व का इतिहास / World History

बेबिलोनियन सभ्यता

बेबिलोनियन सभ्यता

आविर्भाव एवं विकास की दृष्टि से मेसोपोटामिया की सभ्यताओं में द्वितीय स्थान पर बेबिलोनियन सभ्यता का अपना विशिष्ट महत्व है। बेबिलोनियन संस्कृति के कर्ता-धर्ता सुमेरियन संस्कृति के अत्यन्त निकट थे। अतः दोनों का एक दूसरे से अनुप्रेरित एवं प्रभावित होना स्वाभाविक था। तत्कालीन परिस्थितियों में बेबिलोनियन ही सुमेरियनों द्वारा प्रभावित हुए। इस प्रभाव की प्रक्रिया को कार्यान्वित करने वाली मुख्यतः दो परिस्थितियां थीं। एक तो बेबिलोन के निवासियों का अर्धसभ्य होना, जिसके कारण ये निकटवर्ती किसी भी सभ्य संस्कृति के प्रभाव में आ सकते थे और दूसरे सुमेरियन संस्कृति का उत्कृष्ट होना एवं निकटवर्ती भू-क्षेत्रों में इनके विकसित सांस्कृतिक तत्त्वों का सुलभ प्रसार। इस तरह सांस्कृतिक विकास निमित्त बेबिलोनियनों के लिए अनुकूल पृष्ठभूमि पहले ही विद्यमान थी। लेकिन दुर्भाग्य से ये इसका यथोचित लाभ न उठा सके। बेबिलोन की सभ्यता अपने उत्कर्ष काल में भी वहीं रह गई जहां से प्रारम्भ हुई थी। दूसरे शब्दों में इसके सांस्कृतिक तत्त्वों में उत्कर्ष और अपकर्ष तथा आदि और अन्त दोनों स्तरों पर किसी प्रकार का अन्तर नहीं दिखाई पड़ता।

 

राजनीतिक संगठन

केन्द्रीय शासन एवं शासक

बेबिलोनियन संस्कृति अपनी पूर्ववर्ती सुमेरियन संस्कृति से जिन तत्त्वों की दृष्टि से श्रेष्ठ है उनमें राजनीतिक एवं संवैधानिक तत्त्वों का उल्लेख सर्वप्रथम आवश्यक है। बेबिलोनियन बेबिलोन में एक विजेता की हैसियत से आये थे और बेबिलोनियन साम्राज्य हम्मूराबी की विजयों के फलस्वरूप स्थापित हुआ था। अतः विजित क्षेत्र पर समुचित शासन स्थापित करना तथा राजनीतिक सत्ता को सुदृढ़ एवं सुव्यवस्थित रूप देना आवश्यक था। इसका मुख्य उद्देश्य प्रादेशिक एवं स्थानीय स्वतंत्रता को समाप्त कर शासक की शक्ति को सर्वव्यापी तथा सर्वजनीन बनाना था। शासक की सुरक्षा के लिए सभी प्रयत्न किये जाते थे। राजपद यद्यपि वंशानुगत था पर कभी-कभी अन्य व्यक्ति को भी मिल जाता था।  बेबिलोनियन कथाओं में मनुष्य के कर्तव्यों के विषय में कहा गया है कि उनका एकमात्र कर्त्तव्य ईश्वर की सेवा करना है। अतएव शासक का प्रधान कर्त्तव्य भी ईश्वर की सेवा करना था।

विस्तृत साम्राज्य के प्रशासन का उत्तरदायित्व अकेले शासक द्वारा सम्भव नहीं था। इसमें अधिकारियों की उपस्थिति अनिवार्य थी। अधिकारियों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण पद गवर्नरों का था जिनके विषय में हमारे पास सूचनाएं हैं। मारी का तर्का नामक स्थान मारी शासक जिमरी-लिम के अधीन था लेकिन वहां किब्री-दगन नामक व्यक्ति गवर्नर के रूप में शासन कर रहा था। गवर्नर के अधिकृत क्षेत्र में स्थित ग्रामों में अनेक प्रकार की जातियां रहती थीं ग्रामीण जातियों तथा गवर्नरों के बीच मध्यस्थता के लिए सक्वाकु नामक एक अन्य पदाधिकारी रहता था। हाजन्नु नामक एक अन्य अधिकारी का भी संकेत मिलता है जो छोटे-छोटे कस्बों के शासन का उत्तरदायित्व संभालता था। यह एक प्रकार से आधुनिक नगर प्रमुख के समान था। शिबुतुम नामक एक अन्य पदाधिकारी के विषय में भी सूचनाएं मिलती हैं। गवर्नर का पद यद्यपि महत्वपूर्ण था लेकिन यह किसी निर्णय के लिए स्वतंत्र नहीं था। आज्ञा देने, न्याय करने का तथा निर्माण कार्यों के लिए इसे शासक से अनिवार्य रूप से आज्ञा लेनी पड़ती थी। इसीलिए समय-समय पर प्रत्येक विषय की सूचना राजा के पास पहुंचाना गवर्नर के कर्त्तव्य का एक प्रमुख अंग माना जाता था। शासक एवं गवर्नर के बीच सम्बन्ध बनाये रखने के लिए दूत और मध्यस्थ नियुक्त रहते थे। स्वयं शासक भी गवर्नर की गतिविधियों पर सावधानी से निगरानी रखता था तथा समय-समय पर यह इन्हें सजग करता रहता था। इसकी सुरक्षा का भी बराबर ध्वान रखा जाता था। ये स्वयं अपने पास सेनिक रखते थे। सैनिक अधिकारियों को कृषि के लिए भूमि दी जाती थी। यदि कोई सकट उपास्थित होता था तो आकाशदीप जला कर लोगों को उसकी सूचना दी जाती थी।

 

सामाजिक संगठन

हम्मूराबी की विधिसंहिता के अनुसार बेबिलोनियन समाज तीन-उच्च, सर्वसाधारण एवं दास वर्गों में विभाजित था। इस सामाजिक विभाजन के अतिरिक्त कार्य एवं व्यवसाय के आधार पर बेबिलोनियन समाज कई संगठनों में विभक्त था। इस दृष्टि से बुनकर, तक्षक, कसाई, हेमकर, कुंभकार, नापित, रजक, सूपकार, कर्षक, मेषपाल एवं माली का उल्लेख किया जा सकता है। प्रत्येक वर्ग का सामाजिक स्तर भित्र-भित्र था। उच्च वर्ग के अन्तर्गत शासक, अधिकारी, मंत्री, भूस्वामी एवं व्यापारी सम्मिलित थे। कभी-कभी आर्थिक दृषटि से पिछड़े एवं सेवानिवृत्त व्यक्ति भी उच्च वर्गीय अधिकारों से वंचित नहीं किये जाते थे। इससे यह अनुमान सहज में लगाया जा सकता है कि शरनैः-शनैः वर्गभेद धन एवं पद पर नहीं, अपितु रक्त पर आधृत होता जा रहा था। उच्च वर्ग के सदस्य अबीलुम कहे जाते थे इसका अर्थ है स्वतंत्र व्यक्ति। साधारण वर्ग या मध्यम वर्ग के सदस्य भी प्रथम वर्ग की तरह ही स्वतंत्र थे लेकिन इनका स्थान उनसे निम्न था। इस वर्ग के सदस्यों को मुस्केनुम की संज्ञा दी गई थी।

इनके सामाजिक स्तर के अनुसार दण्ड की मात्रा निश्चित की जाती थी एक ही प्रकार के अपराध में यहां तक कि हत्या के अपराध में भी, मध्यम वर्ग की अपेक्षा उच्च वर्ग का अपराधी अधिक दण्ड पाता था। दण्डनिर्धारण में अपराधी के साथ-साथ अभियोगी के सामाजिक स्तर का भी ध्यान दिया जाता था। यदि अपराधी की अपेक्षा अभियोगी निम्नस्तर का होता था तो दण्ड की मात्रा घट जाती थी। पर अपराधी की अपेक्षा अभियोगी के उच्चस्तरीय होने पर दण्ड की मात्रा बढ़ जाती थी। मूलतः दण्डनिर्धारण में सामाजिक स्तर का निर्णय सुमेरियन परम्परा पर आधृत था।

बेबिलोनियन सामाजिक गठन में दासों की स्थिति अच्छी नही थी। इन्हें वरदु कहा गया हैं। इनका कार्य मुख्य रूप से उच्च एवं मध्यम बर्ग की सेवा तथा खुशामद करना था। युद्ध में पकड़े गये शत्रु दास बना लिए जाते थे, इसीलिए प्रतिदिन इनकी संख्या बढ़ती जा रही थी। इन्हें स्वामी की सम्पत्ति के रूप में स्वीकार किया जाता था। इनके स्वामी इनका भी क्रय-विक्रय उसी प्रकार करते थे जैसे पशुओं का। स्वामी की आज्ञा के उल्लंघन एवं उच्च वर्ग के सदस्यों के प्रति किये गये किसी प्रकार के अपराध के लिए इन्हें कठोर दण्ड मिलता था। यदि कभी कोई दास भाग जाता था अथवा किसी के द्वारा अपहृत कर लिया जाता था तो भगोड़े को शरण देने वाले तथा अपहरणकर्ता दोनों ही मृत्युदण्ड प्राप्त करते थे। भगोड़े दास को पकड़वाने में सहायता करने वाले को पुरस्कार रूप में धन दिया जाता था। यदि किसी के दास पर कोई दूसरा व्यक्ति अपना अधिकारसूचक चिह्न अंकित कर देता था तो उसे कठोर दण्ड दिया जाता था। दासों की स्थिति सुधारने के लिए हम्मूराबी ने कुछ महत्वपूर्ण कार्य किया था अपनी विधिसंहिता के माध्यम से इसने इनके प्रति कठोर एवं अमानवीय व्यवहार पर पाबन्दी लगायी इन्हें अर्थोपार्जन की सुविधा दी जिससे धीरे-धीरे ये अपनी स्वतंत्रता खरीद सकते थे । स्वतंत्रता खरीदने के लिए इन्हें उधार पैसे भी मिल जाते थे। मार्दुक के मंदिर से इस प्रकार के कर्ज मिलने की विशेष व्यवस्था थी।

परिवार एवं स्त्रियों की स्थिति

बेबिलोनियन समाज में पारिवारिक गठन एवं स्त्रयों की स्थिति सम्बन्धित सूचनाएं हम्मूराबी की विधि-संहिता तथा अन्य लेखों से मिलती हैं। पारिवारिक सम्बन्ध विधिसंहिता द्वारा नियंत्रित एवं अनुशासित थे। विवाह, तलाक, उत्तराधिकार इत्यादि के लिए निश्चित नियम बने थे विवाह को वैधानिक रूप देने के लिए साक्षियों की उपस्थिति एवं हस्ताक्षर (सील) सहित लिखित अनुबन्ध आवश्यक थे। इसमें उल्लिखित शर्तें दोनों पक्षों को आवश्यक रूप से माननी पड़ती थी। विवाह माता-पिता के सहयोग से सम्पन्न किये जाते थे। वर-पिता कन्या के पिता को उपहार देता था और कन्या का पिता कन्या को प्रचुर दहेज देता था। बेबिलोनिया में एकपत्नी की प्रथा थी। विवाहित स्त्रियों को नैतिकता का पालन करना पड़ता था। व्यभिचारिणी स्त्री तथा उसके प्रेमी को नदी में डुबोकर प्राणदण्ड दिया जाता था। कुछ दया करने पर उसका सारा सामान लेकर उसे घर से बाहर कर दिया जाता था। यह कहकर कि ” तू मेरी पत्नी नहीं हैं”, कोई पुरुष अपनी स्त्री को दहेज की सम्पत्ति के साथ घर से निकाल सकता था लेकिन यदि कोई पत्नी यह कहती थी कि ‘तू मेरा पति नहीं है’, तो उसे मृत्युदण्ड दिया जाता था व्यभिचारिणी, बेईमान एवं वन्ध्या होने पर स्त्रियों को तलाक दिया जाता था। कानून के अनुसार गृहकार्यों में लापरवाही करने पर भी स्त्रियों को त्याग दिया जाता था। स्त्रियां भी पुरुषों पर क्रूरता या आच्रणहीनता का आरोप लगा कर दहेज में प्राप्त सम्पत्ति लेकर पितृगृह जा सकती थीं। पति के किसी कारणवश लम्बे समय तक बाहर रहने पर स्त्री किसी अन्य व्यक्ति के साथ रह सकती थी। यदि पति युद्धबन्दी के रूप में कहीं चला जाता था तो स्त्री को पुनर्विवाह की स्वीकृति नहीं मिलती थी। किन्तु यदि उसके पास जीविका का कोई साधन नहीं रहता था तो वह दूसरा विवाह कर सकती थी। बेबिलोनियन समाज में देवदासियों को पर्याप्त प्रतिष्ठा मिली थी। इसमें उच्च वर्ग की अविवाहित महिलाओं का स्थान प्रमुख था। देवदासी बनने पर कन्या को पिता से सामान्य कन्याओं की भांति ही धन मिलता था। इसे वे व्यक्तिगत सम्पत्ति के रूप में अपनी इच्छानुसार व्यय कर सकती थीं। उच्च वर्ग की अविवाहित कन्याएं नेबिलोनिया के प्रमुख मन्दिरों में रहने वाली देवदासियों के वर्ग-विशेष की सदस्यता स्वीकार कर व्यापार आदि कर सकती थीं। कुछ दिन तक देवदासी के रूप में जीवन व्यतीत करने के बाद भी वे विवाह कर सकती थीं। विवाहित अवस्था में देवदासी बनने के बाद उन्हें अपने पति से पृथक रहना पड़ता था। देवदासियां अपने पद की गरिमा की रक्षा के प्रति सजग रहती थीं। मद्यव्यापार तो दूर रहा, मद्यशाला में प्रवेश करने पर ही इन्हें मृत्युदण्ड दिया जाता थी।

आहार-विहार एवं वस्त्राभरण

सामान्यतः बेबिलोनियन निरामिष थे। रोटी, शाक एवं शहद का ये नित्यप्रति प्रयोग करते थे । आमिष भोजन प्रभावशाली एवं धनाद्य वर्गों तक ही सीमित था। खजूर एवं अगूर से निर्मित मद्य का भी प्रचलन था। इसका व्यापार खुले बाजारों में निम्न एवं पतित आचरण की स्त्रियां करती थीं। मछली का इनके जीवन में महत्वपूर्ण स्थान था। मछुआरों की यहां अनेक श्रेणियां थीं, जैसे शुद्ध जल के मछुआरे, समुद्री मछुआरे तथा नमकीन पानी के मछुआरे। हम्मूराबी के पूर्व तक यहां सेमिटिक वस्त्राभरणों की प्रधानता थी अर्थात महंगे वस्त्र धारण किए जाते थे लेकिन हम्मूराबी के बाद सस्ते एवं सादे वस्त्रों का प्रचलन हुआ। ऊनी वस्त्रों की प्रचुरता थी। द्वितीय सहस्राब्दी ई.पू. में बेबिलोनियन सिले वस्त्र का प्रयोग करने लगे थे। वस्त्र एक चोंगे के समान था जो घुटनों तक लटका रहता था। इसे कमर पर एक पेटी द्वारा बांध दिया जाता था। शाही वस्त्र आकर्षक एवं अलंकृत होते थे। दाढ़ी एवं बाल रखने की प्रथा थी।

 

आर्थिक संगठन

कृषिकर्म एवं पशुपालन

मेसोपोटामिया में बेबिलोनियनों को वही आर्थिक सुविधाएं प्राप्त थीं जो सुमेरियनों को मिली थीं। अतः सुमेरिया की ही भांति यहां भी कृषि का समुचित विकास किया गया। इसके लिए हम्मूराबी की विधिसंहिता में कानून बनाये गये थे। भूमि पर शासक, मन्दिर, जमींदार अथवा बड़े लोगों का अधिकार रहता था। इस पर काम करने वाला वर्ग दासों का था। काश्त के लिए पट्टे पर भूमि लेने पर उपज का 1/3 अथवा कभी-कभी 1/2 भाग देना पड़ता था। भूमि लेने पर अनिवार्य रूप से खेती करनी पड़ती थी। किसी प्रकार की असावधानी करने पर भी निश्चित कर अदा करना पड़ता था। प्राकृतिक क्षति कृषक तथा भूस्वामी दोनों बराबर-बराबर वहन करते थे। अनुमति के बिना खेतों में पशु चराना वर्जित था। एबिलोनिया में सिंचाई कृत्रिम साधनों द्वारा की जाती थी।

कृषि के साथ पशुपालन का भी प्रचलन था। राजकीय कोष से सम्बद्ध बहुत से पशु रहते थे। पशुपालन पर भी कर लगाया जाता था। राजकीय पशुओं की देख-रेख के लिए शहरों में शासकीय चरवाहे नियुक्त रहते थे। नगर एवं प्रान्त के गवर्नर भी समय-समय पर राजकीय पशुओं का निरीक्षण करते थे। हम्मूराबी की विधिसंहिता में पशुपालन से सम्बन्धित आवश्यक नियम बने हुए थे।

उद्योगधन्धे

बेबिलोनियन आर्थिक गठन में उद्योगधन्धों का महत्वपूर्ण स्थान था। यहां कई प्रकार के उद्योग धन्धे प्रचलित थे जिसमें प्रमुख रूप से वस्त्रोद्योग, चम्मोद्योग, भाण्डोद्योग एवं अस्त्र-शस्त्र उद्योग की चर्चा की जा सकती है। पशुपालन का प्रभाव इनके वस्त्रोद्योग पर पड़ा। इनसे इन्हें पर्याप्त मात्रा में ऊन मिल जाता था। बेबिलोनिया में ऊनी वस्त्रोद्योग का प्रचलन वैसे ही था जैसे हमारे यहां सूती वस्त्रों का। खनिजों में स्वर्ण, रजत, ताम्र, कांस्य एवं शीशा उपलब्ध था। लोहे का ज्ञान इन्हें अवश्य था लेकिन दुर्लभता के कारण ये इसका अधिक उपयोग न कर सके। धातु की ढलायी का ज्ञान इन्हें था। इसकी सहायता से अस्त्र-शस्त्र, भाण्ड एवं आभूषण बनाये जाते थे।

व्यापार एवं वाणिज्य

उद्योगधन्धे का प्रभाव बेबिलोनियन व्यापार पर भी पड़ा। इस दिशा में यातायात के साधन अधिक उपादेय सिद्ध हुए। नहरें सिंचाई के अतिरिक्त यातायात के लिए भी उपादेय थीं। खाद्यान्न, खजूर, तेल, लकड़ी, तिल आदि का आयात-निर्यात जलमार्ग द्वारा ही सम्पन्न किया जाता था भारी सामान ढोने के लिए दजला-फरात में लट्ठों का उपयोग किया जाता था। इनके व्यापारिक सम्बन्ध सिंधु प्रदेश तथा एलम से प्राचीन काल से चले आ रहे थे। बाद में सीरिया से भी व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित हो गये। व्यापार-वाणिज्य का नियमन और नियंत्रण राज्य द्वारा किया जाता था इससे सम्बद्ध प्रत्येक कार्य के लिए पृथक-पृथक नियम बने थे। साझेदारी, धनसंचय, अभिकरण, अनुबन्ध, दस्तावेज, ब्याज इत्यादि के लिए नियम बनाये गये थे। प्राचीन बेबिलोनिया में व्यापार एक वर्ग विशेष से सम्बद्ध था जिसे तमकरु कहा गया है। यह केवल सौंदागरों का ही वर्ग नहीं था, बल्कि धनसंग्रह भी करता था। दूसरे शब्दों में यह बैंकर का कार्य करता था और आवश्यकता पड़ने पर धन उधार देता था।

 

धार्मिक जीवन

देवमण्डल

बेबिलोनिया संस्कृति के संस्थापक पश्चिमी सेमाइट सांस्कृतिक दृष्टि से सुमेरियनों से बहुत पिछड़े थे। जिस समय मेसोपोटामिया पर इन्होंने अपनी प्रभुत्ता स्थापित की सुमेरियन संस्कृति लगभग एक हजार वर्ष अपनी यात्रा कर चुकी थी। अतएव इन पर उनका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। यद्यपि अनेक सुमेरियन देवी-देवताओं को बेबिलोनियन देवसमूहों में प्रतिष्ठित स्थान मिला, किन्तु बहुत से सुमेरियन देवी-देवताओं के स्थान पर बेबिलोनियन देवी-देवता प्रतिष्ठित हुए। सुमेरियन धर्म में देवी-देवताओं में शरमश, एनलिल, एनकी, अनु, नन्नार इत्यादि विशेष प्रतिष्ठित थे। इनमें एनलिल की प्रतिष्ठा सर्वाधिक थी। बेबिलोनियन देवमण्डल के अन्तर्गत इसे बेल नाम देकर इसका समीकरण बेबिलोनियन मार्दुक से किया गया। यही बेल-मार्दुक बेबिलोनियन देवसमूहों मे सर्वाधिक प्रतिष्ठित हुआ। इसी प्रकार मिस्त्र में आमोन एवं रे को मिलाकर आमोन रे नाम से प्रतिष्ठित किया गया था।

प्रारम्भ में बेल-मार्दुक बेबिलोनिया का एक सामान्य नगर देवता था। लेकिन बाद में जब बेबिलोनिया के नेतृत्व का भार हम्मूराबी के सुदृढ़ कंधों पर आया तो मार्दुक को राष्ट्रीय देवता का पद मिला। इसी के फलस्वरूप प्राचीन सुमेरियन एनलिल देवता का स्थान इस देव ने ग्रहण किया। इसका स्पष्ट संकेत हमें एनुमा एलिश नामक कृति में मिलता है जिसमें मार्दुक के लगभग पचास नाम हैं। इसमें विश्वोत्पत्ति, मार्दुक के आविर्भाव तथा देवताओं की असुरों पर विजय का वर्णन किया गया है। मूलतः इसका नायक सुमेरिया का एनलिल देवता था। लेकिन बेंबिलोनियन साम्राज्य की स्थापना के बाद जब मार्दुक को राष्ट्रीय देवता के रूप में प्रतिष्ठा मिली तो एनलिल का स्थान मार्दुक ग्रहण कर लिया। इसकी पत्नी के रूप में सर्पेनिटम का उल्लेख मिलता है। नेबु नामक देवता से भी इसके घनिष्ठ सम्बन्ध थे। मातृशक्ति के रूप में ईश्तर देवी की प्रतिष्ठा थी जो सभी देवियों के प्रतिनिधि के रूप में पूजी जाती थी। अलग-अलग स्थानों पर इस देवी की पृथक सत्ता थी। इसी कारण इसके कई स्थानीय नाम पड़ गये, जैसे निनित की ईश्तर, अरबेला की ईश्वर, बित – कितामारित की ईश्वर इत्यादि। बेबिलोंनिया में इस देवी की दो दृष्टियों से विशेष ख्याति थी।

अभिचार एवं अन्धविश्वास

बेबिलोनियन धर्म अन्धविश्वास एवं अभिचारपरक था। अभिचार, मंत्र-तंत्र, शकुन इत्यादि का इसमें महत्वपूर्ण स्थान था। दैवी अवधारणा में सौम्य तत्त्वों के साथ-साथ रौद्र त्त्व भी परिकल्पित थे। सुमेरियन नर्गल यहां दानव की कोटि में आ गया था। इसके अतिरिक्त अन्य दानवी शक्तियों की भी कल्पना की गई थी। इनसे बचने के लिए बेबिलोनियन सचेष्ट थे। इनका निवारण धार्मिक अनुष्ठानों एवं आभिचारिक वृत्तियों द्वारा किया जाता था। यह कार्य पुरोहितों की सहायता से सम्पन्न होता था, क्योंकि धार्मिक अनुष्ठानों तथा आभिचारिक कृत्यों के पूर्ण ज्ञाता यही थे। इस रहस्य को ये सर्वसाधारण के समक्ष प्रकट नहीं करते थे। अतएव प्रत्येक बेबिलोनियन को इनकी कृपा-प्राप्ति के लिए सजग एवं सन्नद्ध रहना पड़ता था। इस दृषटि से बेबिलोनियन पुजारियों की स्थिति सुमेरियन पुजारियों से अच्छी थी। लेकिन सुमेरियन काल में शासक ही प्रायः पुजारी बनते थे, अतएव इनमें राजाओं के विशिष्ट अधिकारों के अपहरण की प्रवृत्ति विद्यमान रहती थी, जबकि बेबिलोनियन काल में सम्राट का पुजारियों पर पूर्ण नियंत्रण था। बेबिलोनियन धर्म में दानवी शक्तियों की उपासना एवं आभिचारिक प्रवृत्ति का समावेश किन परिस्थितियों में किया गया था, कहना कठिन हैं। इस सम्बन्ध में दो सम्भावनाओं की चर्चां की जा सकती है। या तो इनका परिकल्पन बेबिलोन के अस्वस्थ प्राकृतिक वातावरण के कारण किया गया था अथवा जीते हुए राज्यों के निवासियों में भय उत्पन्न करने के लिए। अधिक सम्भावना अन्तिम की ही है।

परलोकवाद

सुमेरियन धर्म के समान बेबिलोनियन धर्म में भी लोकान्तर विषयक तत्तवों का अभाव था। अमरत्व एवं पुनर्जन्म जैसे दार्शनिक विषयों के प्रति इनकी आस्था बिल्कुल नहीं थी। इसके परिप्रेक्ष्य में इनके धर्म की समीक्षा करने पर निश्चित रूप से हम कह सकते हैं कि ये पूर्णतया भौतिकवादी थे। बेबिलोनिया के निवासी देवताओं की उपासना भौतिक सुखों के लिए करते थे। इनका उद्देश्य स्वर्ग का सुख प्राप्त करना कदापि नहीं था। इनकी अवधारणा में दो लोक थे – स्वर्ग एवं पाताल। स्वर्ग देवताओं के लिए सुरक्षित था। उसे मनुष्य नहीं प्राप्त कर सकता था। इनके पाताल लोक का स्वरूप अत्यन्त भयानक था। प्रत्येक प्राणी मृत्यु के बाद इस लोक में प्रवेश करता था। इसमें प्रवेश करते समय पाप-पुण्य, ज्ञान-अज्ञान इत्यादि पर तनिक भी विचार नहीं किया जाता था। अर्थात पापी, पुण्यात्मा, मूढ़ एवं विद्वान सभी को आवश्यक रूप से इस लोक में मृत्यु के बाद जाना ही पड़ता था। पाताल लोक के स्वरूप पर गिल्गिमेश आख्यान से प्रकाश पड़ता है। गिल्गिमेश के पूछने पर कि पाताल में मृत व्यक्ति की क्या दशा होती है उसे एनकिड बताता है कि कीड़े शरीर को वस्त्र की भांति ही खाते हैं। किसी को परलोक में शान्ति तभी मिलती थी जब उसके परिवार के सदस्य उसकी समाधि पर खाद्य, पेय इत्यादि देते रहते थे। ऐसा न करने पर प्रेतात्माएं सड़कों पर घूमती हुई अपवित्र वस्तुएं ग्रहण करती थीं।

 

बेबिलोनियन सभ्यता की महत्ता एवं देन

बेबिलोनियन संस्कृति के सम्यक् अनुशीलन से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि अंगसौष्ठव की दृष्टि से यह संस्कृति पूर्णता को प्राप्त थी जिसमें राजनीतिक उतार-चढ़ाव के साथ-साथ महत्वपूर्ण सांस्कृतिक विकास भी हुए थे। बेबिलोनियन संस्कृति बेबिलोन तक ही सीमित न रह करे समय-समय पर अपनी गरिमारश्मि से अन्य संस्कृतियों को भी आलोकित करती रही। विल ड्युरैण्ट के अनुसार मानव सभ्यता को बेबिलोनियनों से उतना नहीं मिला जितना मिस्त्र, भारत अथवा चीन से मिला था। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि प्राचीन विश्व के इतिहास में बेबिलोनियनों का कोई योगदान ही नहीं था। सभ्यता एवं संस्कृति के क्षेत्र में इनके कतिपय आविष्कार एवं अनुसंधान निस्संदेह महत्वपूर्ण थे और उनका प्रभाव परवर्ती विश्व पर पड़ा था। कृषि, व्यापार-वाणिज्य, वास्तुकला तथा धार्मिक क्षेत्रों में इनके कतिपय आविष्कार एवं अनुसंधान नितान्त मौलिक थे। धार्मिक क्षेत्रों मे पुरोहितों को जो महत्व इन्होंने दिया था उसका प्रभाव बाद में प्रत्यक्ष रूप से यहूदी जाति तथा अप्रत्यक्ष रूप से यूरोप पर पड़ा। यहूदियों के हाथों साहित्यिक संस्कार प्राप्त कर योरोपीय गाथाओं की अंग बनने वाली पौराणिक कथा के मूल बेबिलोनियन रोचक गाथाओं में देखें जा सकते हैं। इनके गणित, खगोलशास्त्र, औषधिशास्त्र, कला, दर्शन इत्यादि से सम्बन्धित अनेक तत्त्व भ्रमणशील यूनानियों के पास पहुंचे यहां से वे रोम गये और उसके बाद अनुवर्तिनी संस्कृतियों द्वारा ग्रहण किये गये। धातुओं, नक्षत्रों, औषधियों, नाप एवं मापों, वाद्ययन्त्रों इत्यादि के यूनानी नाम बेबिलोनियन नामों के ही यूनानी रूपान्तर हैं। बेबिलोनियन जिगुरतों का प्रभाव निर्विवादतः मुस्लिम मस्जिदों पर देखा जा सकता है। हम्मूराबी के विधान का प्राचीन विश्व का समाज उतना ही ऋणी है जितना आधुनिक संसार रोम का। बेबिलोनियन संस्कृति के पराभव के बाद असीरियन प्रभुता स्थापित हुई लेकिन राजनीतिक दृष्टि से पराभूत बेबिलोनियनों ने असीरियनों पर सांस्कृतिक विजय प्राप्त कर ली। इस तरह सब कुछ नष्ट हो जाने पर भी बेबिलोनिया का कुछ भी नष्ट नहीं हुआ।

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About the author

Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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