शिक्षाशास्त्र / Education

चीन की मुक्त शिक्षा | चीन की तकनीकी शिक्षा | चीन की अध्यापकों की समस्या

चीन की मुक्त शिक्षा | चीन की तकनीकी शिक्षा | चीन की अध्यापकों की समस्या

चीन में मुक्त शिक्षा को सार्वलौकिक शिक्षा कहा जाता है

चीन सार्वलौकिक शिक्षा के प्रसार हेतु अब पहले से अधिक सन्नद्ध हो गया है। दक्षिण पश्चिमी तथा समुद्र तटवर्ती भाग में लोग लगभग 20 प्रतिशत साक्षर हो गये, परन्तु शेष क्षेत्रों में ऐसी स्थिति नहीं है तथापि आगामी वर्षों में माध्यमिक शिक्षा को भी सार्वलौकिक रूप से अनिवार्य बना देने की योजना है।

चीन की तकनीकी शिक्षा-

एक अन्वेषण से यह पता चला है कि कुल 35 बड़े शहरों तथा अन्य प्रान्तों में 1994 में उत्तीर्ण इंजीनियर स्नातकों को केवल साधारण तकनीशियनों का काम दिया जा सका है, क्योंकि सामान्य तकनीकी कार्यकर्ताओं का बड़ा ही अभाव रहा। शिक्षा में सुधार का तात्पर्य इसे दयनीय स्थिति को सुधारना समझा गया है। देश के आधुनिकीकरण का यह तकाजा होगा कि श्रेष्ठ वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञों के साथ-साथ साधारण तकनीशियनों को भी भारी संख्या में तैयार किया जाय। पर्याप्त संख्या में तकनीकी विद्यालयों के खोलने से ही ऐसे तकनीशियनों को तैयार किया जा सकता है। ऐसे विद्यालयों की संख्या में अभी तक केवल 50 प्रतिशत ही वृद्धि की जा सकी है, जबकि उनमें अभी कई गुना वृद्धि की आवश्यकता है। 1994 में केवल 9,79,425 विद्यार्थी चीन के विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे थे। विश्वविद्यालयों तथा कॉलेजों की संख्या में कमी के कारण बहुत से विद्यार्थियों को दूरवर्ती स्थानों में उच्चतर शिक्षा के लिए जाना पड़ता है। जब बहुत से विश्वविद्यालय, टी.वी. तथा रेडियो प्रशिक्षण केन्द्र तथा पत्राचार विद्यालय खोले जा रहे हैं। जिससे इच्छुक व्यक्ति इन माध्यमों से विविध प्रकार की तकनीकी शिक्षा प्राप्त कर सकें। आज चीन में शिक्षा में सुधार हेतु विश्वविद्यालयों को अपने कार्यकलाप में पहले से अधिक स्वतंत्रता दी जा रही है।

विश्वविद्यालयों को अब अपने पाठ्यक्रम में सुधार करने की स्वतंत्रता तथा विद्यार्थियो की संख्या में आवश्यक परिवर्तन स्वयं कर लेने की छूट दे दी गई है। अध्यापकों की नियुक्ति तथा उन्हें सेवा- निवृत्त कर देने की भी कुछ विश्वविद्यालयों को स्वतंत्रता प्राप्त हो गई है। वे अब अपने अर्जित थन को अन्तर्राष्ट्रीय शैक्षिक आदान-प्रदान में भी खर्च करने के लिए कुछ स्वतंत्र बना दिये गये हैं।

चीन की अध्यापकों की समस्या-

पूरे देश में नौ वर्षीय सार्वलौकिक शिक्षा के विधान के लागू हो जाने से शिक्षकों की कमी की समस्या भयावह तो हो ही गई है, परन्तु साथ ही, अन्य उपयुक्त शिक्षकों की भरमार से स्थिति और विषम बन गई है। इस कठिन स्थिति में असंतोषजनक वेतन, स्कूल भवनों की दयनीय दशा, प्रत्येक कक्षा में विद्यार्थियों की भीड़ जीवन निर्वाह का निम्न स्तर और जनता में अध्यापकों के लिए आदर में कमी कोढ़ में खाज का काम कर रही है।

उपर्युक्त अभावों को दूर करने के लिए शिक्षक प्रशिक्षण कॉलेज टी. वी. रेडियो, पत्राचार लघु-काल, प्रशिक्षण, जनता में शिक्षा के महत्त्व का प्रचार करना, राज्यीय तथा केन्द्रीय सरकार के अधिकतम धनराशि शिक्षा-प्रसार के लिए प्राप्त करना तथा शिक्षकों के वेतन में वृद्धि आदि उपायों से शिक्षा के समुचित विस्तार का प्रयत्न किया जा रहा है ।

पहले प्राइमरी और मिडिल स्कूल के विद्यार्थियों को फीस देनी पड़ती थी, परन्तु विश्वविद्यालयी विद्यार्थी फीस देने से मुक्त थे नये शिक्षा-सुधार के अन्तर्गत, विश्वविद्यालय में फीस लगा दी गई है और प्राइमरी और मिडिल स्कूल के विद्यार्थियों की फीस कम कर दी गई है। शिक्षक-प्रशिक्षण कॉलेजों में फीस लेना बन्द कर दिया गया है और प्रत्येक प्रशिक्षणार्थी हेतु रहने के खर्च की निःशुल्क व्यवस्था की गई है। इन सुविधाओं के कारण शिक्षा-प्रसार को बड़ा प्रोत्साहन मिला है। नये शिक्षा आयोग को शिक्षा में सुधार लागू करने को पूरा अधिकार दे दिया गया है।

शिक्षा-प्रसार में प्रगति-

प्राचीन चीन में श्रमिकों के बच्चों को पढ़ाने की कोई सुविधा नहीं थी। श्रमिकों के केवल 20 प्रतिशत बच्चे ही कुछ साक्षर हो पाते थे और सामान्य जनता में भी लगभग 80 प्रतिशत लोग निरक्षर थे। कॉलेज में विद्यार्थियों की संख्या बहुत ही कम हुआ करती थी। तब 11,000 में लगभग केवल 3 ही व्यक्ति कॉलेजों में पढ़ने के लिए बहुधा जाते थे। सीमान्त प्रदेशों में बहुत ही कम स्कूल थे। 1949 के बाद पीपुल्स रिपब्लिक ने शिक्षा के विकास की ओर विशेष ध्यान दिया। 1954 तक अर्थात् केवल 5 वर्षों में स्कूल और कॉलेजों में छात्रों की संख्या पहले. से दुगुनी हो गई। यह संख्या 1954 में 25,000 थी लगभग 30,00,000 विद्यार्थी अंशकालीन स्कूलों में शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। लगभग 6,00,000 लोग 1954 तक थोड़ा-थोड़ा लिखना और पढ़ना सीख गये। मिडिल स्कूलों में छात्रों की संख्या तिगुनी बढ़कर 1954 तक 36,00,000 हो गई। माध्यमिक व्यावसायिक विद्यालयों में 6,00,000 विद्यार्थी हो गये। प्राइमरी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या 5, 10, 00,000 हो गई।

1952 में शिक्षा का व्यापक ढंग से पुनर्संगठन किया गया। इंजीनियरिंग संकाय में सभी प्रभागों अर्थात् सिविल, मैकेनिकल तथा विद्युत विषयों में पढ़ाई प्रारम्भ कर दी गई। फलतः सभी प्रकार के इंजीनियर्स प्राप्त होने लगे। 1976 से विकास की गति सभी क्षेत्रों में तेज हो चली। 1994 में कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की संख्या 1,200 हो गई। 1905 में यह संख्या केवल 225 ही थी। विद्यार्थियों की संख्या, लगभग 50 लाख हो गई। इस संख्या में लगभग 34,000 स्नातक विद्यार्थी तथा 1,200 डॉक्टरल अभ्यर्थी थे। 1984 में प्रौढ़ शिक्षा का भी अच्छा विकास हुआ। टी.वी. तथा पत्राचार कक्षाओं में 1994 में विद्यार्थियों की संख्या लगभग 25 लाख है। 1994 में लगभग 1 करोड विद्यार्थी सीनियर मिडिल स्कूलों में थे, 60 लाख जूनियर मिडिल स्कूल में, 12 लाख विद्यार्थी टेकनिकल स्कूलों में थे । प्राइमरी स्कूलों में भी इसी प्रकार अच्छी गति से विकास हुआ। 1994 में प्राइमरी स्कूलों में 2,35,600,000 विद्यार्थी थे। यह संख्या 1949 से दस गना अधिक थी। अधिकांश शहरों में सार्वलौकिक प्राइमरी स्कूलों का पूरा विकास हो गया. परन्त ग्रामीय क्षेत्रों में विकास की गति केवल 25 प्रतिशत ही रही। मध्यम आकार के शहरों में तथा कुछ बहुत ही बड़े शहरों में जूनियर मिडिल स्कूल बड़ी संख्या में खाल गये हैं। समुद्रतटवर्ती क्षेत्र में भी स्कलों के खोलने का अच्छा प्रयास किया गया है।

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Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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