भूगोल / Geography

जल विज्ञान का विषय क्षेत्र | Scope of Hydrology in Hindi

जल विज्ञान का विषय क्षेत्र | Scope of Hydrology in Hindi

जल विज्ञान का विषय क्षेत्र (Scope of Hydrology)

जल विज्ञान का विषय क्षेत्र- प्रकृति की संरचना में जल एक परम तत्व है। ‘जलम् जीवनम्’ अर्थात् जल ही जीवन है। सम्पूर्ण पृथ्वी पर जीवन प्रदायी तत्वों में जल की उपादेयता सर्वोपरि है। प्रकृति के सभी रचना विधान चाहे जड़ (अरजैविक तत्व) हो या चेतन (जैविक तत्व) का अस्तित्व बोध प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में जल की यौगिक क्रिया से होता है। ‘बिन पानी सब सून’ अर्थात् जल के अभाव में जीवन की कल्पना ही व्यर्थ है। अतः जल विज्ञान की अध्ययन सामग्री प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक परिवेश में सर्वत्र विद्यमान है। पार्थिव दृश्य घटनाएं ही नहीं, भूपटल पर अद्यतन मानव की समस्त प्रक्रियाओं एवं प्रतिफलों में प्रतिक्षण इस विज्ञान की अनिवार्यता एवं सर्व्यापी झलक दृष्टिगोचर होती है।

 

वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर सम्पूर्ण वायुमण्डल में व्याप्त जल की मात्रा का 77% भाग महासागरों द्वारा प्राप्त होती है। शेष 23% भांग धरातलीय प्रवाहों, अधःस्तरीय संचलनों तथा वनस्पतियों के सानिध्य में विभिन्न रूपों में मौजूद है। सम्पूर्ण ग्लोब का 70.8% भाग महासागरीय पिण्डों से आवृत्त है तथा धरातलीय जल भण्डारण का 97.20% भाग केवल महासागरों में संचित है। (जल की प्रकृति सर्वत्र एक जैसी नहीं है। धरातल का वाही जल तरल अवस्था में है और ध्रुवीय प्रदेशों एवं पर्वतीय शिखरों पर यही जल हिम के रूप में ठोस है। वायुमण्डल में यही जल गैसों के रूप संचरित है जबकि धरातल के नीचे मृदासिक्त अवस्था में देखा जा सकता है। इस प्रकार जल के विभिन्न स्वरूपों के आधार पर जल विज्ञान के अध्ययन क्षेत्र को निश्चित किया जा सकता है।

 

जल की प्रकृति, जलाधिग्रहण क्षेत्र एवं जल विज्ञान के अध्ययन मण्डलों से स्पष्ट है कि जल विज्ञान का विषय क्षेत्र जल के तरले, गैसीय, ठोस एवं मिश्रित मण्डलों से सम्बन्धित एवं अत्यन्त व्यापक है। इस प्रकार जल विज्ञान के अध्ययन के लिए वायुमण्डलीय दशाओं, भूपटल पर प्रवाहित नदियों, झीलों, तालाबों, आन्तरिक सागरों, महासागरों, हिमानी एवं परिहिमानी क्षेत्रों तथा भौमजल स्थितियों का सम्यक ज्ञान होना अति आवश्यक है। इस सन्दर्भ में यह भी कहा जा सकता है कि जल विज्ञान की विषय सामग्री हिम विज्ञान (Cryology), स्थलविज्ञान/भूआकृतिविज्ञान (Geomorphology) तथा समुद्रविज्ञान (Oceanology/Oceanography) के मूलभूत उपादानों से सम्बन्धित है। यही नहीं इसका विषय क्षेत्र अन्तःस्थलीय अध्ययन (Sub-Surface Study) या भू-वैज्ञानिक अध्ययन (Geologist Study) भूजलीय अध्ययन (Geo-Hydrological Study), पादप परिस्थितिकी (Plant Ecology), कृषि वानिकी (Agro-Forestry), जलजीवविज्ञान (Hyo-biology), जैवजलविज्ञान (Bio-Hydrology) तथा पशु एवं कृमि परिस्थितिकी (Animal And Insect Ecology) से भलीभांति अन्तर्सबन्धित है।

 

यदि सूक्ष्म परीक्षण किया जाय तो स्पष्ट है कि जल विज्ञान की विषय सामग्री विज्ञान की प्रमुख शाखाओं जैसे- रसायन विज्ञान, भौतिक विज्ञान, जीवविज्ञान एवं वनस्पतिविज्ञान से भी अनुप्राणित है।) इस विज्ञान में सरिता विज्ञान (Potamology), मौसम विज्ञान (Meteorology) तथा हिमनद विज्ञान (Glaciology) की महत्वपूर्ण संकल्पनाएं स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। इस प्रकार यदि भूपटल के जल प्रभाव क्षेत्रों और उस पर आधारित विज्ञान की प्रमुख शाखाओं को क्रमबद्ध रूप में संजो कर रख दिया जाय तो जल विज्ञान के विषय क्षेत्र की व्यापकता को रेखांकित किया जा सकता है। जल विज्ञान का विषय क्षेत्र मानविकी एवं समाजविज्ञान के विंषयों से भी जुड़ा है। व्यावहारिक रूप में यह विज्ञान इन्जीनियरिंग, जल आपूर्ति, नियोजन, सिंचाई, बाढ़नियन्त्रण, जलशक्ति, नौकायन, यातायात, मनोरंजन, मत्स्यन, औद्योगीकरण, कृषि जैसे महत्वपूर्ण मानवीय क्रियाकलापों से घनिष्ठ रूप से जुड़ा है।

 

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Kumud Singh

M.A., B.Ed.

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